माफ़िया …(कृष्ण बिहारी)

सबने देखा है
उगता हुआ सूरज
और उसकी लालिमा
और डूब भी गये हैं लोग
उसके सतरंगी रंगों में
मगर मुझको तो सूरज वह
बाँध नहीं पाया अब तक
अपने शतरंजी फंदों में।

मैंने तो देखा है कि
धूप के उगने से
धूप के ढ़लने तक
आदमी का जितना खून जलता है
वह सब सूरज की लालिमा में उभरता है।

तुम बताओ मेरे दोस्त!
कि उसमें सौन्दर्य
कहाँ से खोजूँ
और उससे जीना किस तरह सीखूँ
एक तानाशाह का जीवन!
वह भी तब कि जब
शोषण के खिलाफ
विद्रोह
मेरी आत्मा की आवाज हो।

कैसे मान लूँ मैं
कि उगते ही सूरज के
खिलती हैं कलियाँ
महकती है बगिया
हो जाता है जीवन रसमय।

सच तो यह है कि
सूरज के उगने पर
जगते हैं भौंरे
नापाक़ इरादों के साथ बढ़ा करके हाथ
और लुटकर हो जाती है
ज़िंदगी अनाथ।

{कृष्ण बिहारी}

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4 टिप्पणियाँ to “माफ़िया …(कृष्ण बिहारी)”

  1. कैसे मान लूँ मैं
    कि उगते ही सूरज के
    खिलती हैं कलियाँ
    महकती है बगिया
    हो जाता है जीवन रसमय।

    अच्छी पंक्तिया ……..

    इसे भी पढ़कर कुछ कहे :-
    (आपने भी कभी तो जीवन में बनाये होंगे नियम ??)
    http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_19.html

  2. तुम बताओ मेरे दोस्त!
    कि उसमें सौन्दर्य
    कहाँ से खोजूँ
    और उससे जीना किस तरह सीखूँ
    एक तानाशाह का जीवन!
    वह भी तब कि जब
    शोषण के खिलाफ
    विद्रोह
    मेरी आत्मा की आवाज हो।
    बहुत सुंदर भाव हैं कृषण बिहारी साब .अश सभी आत्मा की आवाज़ की पीछे चलते

  3. एक अलग सोच वाली कविता है

  4. जीवन के प्रति एक अलग पर जरूरी नज़रिया पेश करती कविता…
    बेहतर….

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