गरीब कब पढ़ेगा शुक्राने की नमाज़

चाह थी ईद का जोड़ा तेरा लाऊंगा
लौट कर नमाज़ से तुझे गले लगाउँगा
मेहँदी रचे हाथ चूमूँगा काजल में डूब जाउँगा|


आह! मुन्ना चार दिन से बीमार पड़ा है
डाक्टर रोज सौ की दवा लिख रहा है
शर्मसार हूँ के जेब में अब बचा क्या है|


वो जो पुराना गुलाबी जोड़ा है पहन लेना
तू उसमे मुझे बहुत अच्छी लगती है
खिलता है तेरे बदन पर गुलाबी रंग खूब
मुझे तो प्यारी तू हरहाल परी लगती है|


देख पानी आँखों का काजल ना उतार पाए
ऐसा ना हो मरमरी गाल काला पड़ जाये|


मेरी जान मुफलिस के ख्वाब की ताबीर है यही
ईद के दिन भी पोशाक नई मय्यसर नहीं |

(रफत आलम)

4 टिप्पणियाँ to “गरीब कब पढ़ेगा शुक्राने की नमाज़”

  1. Rafat Aalam Sahab,

    Aapki nazm, mein dard hai, sahi hai, hum sabko waqt ke saanche mein dhalna padta hai. Aur katotiyaan karni padti hain. Parastish behad zaruri hai, Khuda libaas ko nahin dekhta. Is sunder rachna ke liye badhaai.

  2. आलम साहब,

    बड़े भाव वाली कविता है आपकी और चित्रात्मक भी है
    पढ़ते हुये सब कुछ एक फिल्म की भाँति सजीव हो जाता है, मानो देख रहे हों इस घटना को

  3. बहुत शुक्रिया नवाजिश जनाब ,आगे शब्द नहीं मिल रहे मुझे

  4. सुरेंदर साब आपका मेरी टूटी फूटी रचना पढ़ने के लिए शुक्रिया.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: