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सितम्बर 16, 2010

परवाह नहीं ग़ालिब

ग़र नहीं है मेरे अश’आर में मानी न सही

परवाह तुम्हे न थी ग़ालिब
और बात तुम्हारी आज भी सच है
परवाह किसे है?
और परवाह होनी भी क्यों कर चाहिये
अर्थ की,
वाह वाह की,
पहचान की?

ये सब मिल भी जायें तो
एक सीमा के बाद
खो जाते हैं
अर्थ इन सब बातों के।

ग़ालिब तुम्हारे बाद भी एक शायर ने
कहा था
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

रचते रचते वक्त ऐसा आता है जब
इन सबके मायने ही नहीं रहते कुछ।
रह जाता है रचनाकार
और उसके रचने की प्रकृति।

कोयल क्या कूकती है किसी से पूछ कर
या किसी मानव को रिझाने के लिये?

बुलबुल चहकती है
बहार आने पर
क्या आदमी से ताली पाने के लिये?

पहाड़ों से नीचे उतरती नदी का पानी
क्या पूछता है ट्रैफिक पुलिस से
कि किधर मुड़ना है उसे?

नदी क्या राय माँगती है किसी से
चटटानों को अपने जल से नहलाते हुये
और उन्हे अपनी रगड़ से रेत बनाते हुये?

पक्षी क्या वीज़ा के लिये कहीं करते हैं आवेदन
मौसम बदलने पर
किसी अन्य देश के लिये उड़ते समय?

सूरज क्या अर्ज़ी लगाता है
किसी शक्तिशाली राष्ट्राध्यक्ष के समक्ष
आज्ञा लेने के लिये
कि अगले दिन सुबह अपनी किरणों से
धरती को प्रकाश और ऊष्मा दे या न दे?

बसंत क्या रुका रहता है
आदमी से तारीफ सुनने के लिये?

अनगिनत घटनायें
घटती हैं अपने से
प्रकृति में हर पल।

प्रकृति रचती है
सब कुछ
स्वयं के आनंद के लिये
क्योंकि रचना
उसका
मूल स्वभाव है।

मानव भी
कहना मान सकता है
अपनी प्राकृतिक अंतरदृष्टि का
अपनी मूलभूत चेतना का
और आनंद से जी सकता है।



…[राकेश]

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