कह देने के बाद… (एक प्रेम कविता: कृष्ण बिहारी)

जब तक कहा नहीं जाये
तब तक ही अमूल्य है प्यार।

कितना असहज था मैं
कहते हुये यह पहली बार
कि करता हूँ
तुमसे प्यार।

जाने कितनी बार
इसे कहने से पहले
चिपकती थी जबान तालू से
और मैं –
न चाहकर भर भी चुप रह जाता था
यूँ ही हर बार।

और अब
कितना आसान
सामान्य सा लगता है
यह कहना
कि
करता हूँ मैं तुमसे प्यार।

याद है-
तुमने कहा था
मुझसे क्या पूछते हो?

कुछ भी नहीं कहता क्या
मेरा यह चुप रहना
और मेरी आँखों का
झुक जाना
लगता नहीं है क्या तुमको
मेरा मौन
समर्पित स्वीकार।

{कृष्ण बिहारी}


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8 टिप्पणियाँ to “कह देने के बाद… (एक प्रेम कविता: कृष्ण बिहारी)”

  1. जब तक कहा नहीं जाये
    तब तक ही अमूल्य है प्यार।…

    सुन्दर ..!

  2. वाह्………बहुत खूब्।

  3. बेहतर…
    बात वाज़िब सी है…
    पर कह देने में हर्ज़ भी कुछ भी नहीं है….

    बस एक ही हर्ज़ होता है….
    और वह है…अपने अस्तित्व को…अपने अहम् को….
    जैसे किसी के सामने बौना सा बनाना…
    अपनी व्यक्तिगतता को…दूसरे के आगे न्यौछावर सा करना….

    और हमारी मानसिकता…शायद इसी से बचना चाहती है….
    इसीलिए…बिना अपने अहम् से समझौता सा किये…
    वह इसे…इशारों में ही समझवा लेना चाहती है….

    और शायद इसीलिए आंखें झुकी-झुकी सी जाती हैं…
    नज़रे पैरों में गड़ी सी जाती हैं….
    जैसे चोरी करते पकड़े गये हों…
    जैसे कोई गंभीर अपराध सा हो गया हो….

    बस ऐसे ही कह दिया गया है….गंभीरता से ना लें….
    अरे…यह तो एक प्रेम-कविता सी हो गयी….

  4. रवि जी,
    सही में हो तो गयी।
    आपने भी इस विरासत को घटते देख लिया 🙂

    प्रेम की तरह कविता भी बस हो ही जाती है
    और प्रेम कवितायें तो अक्सर अपने आप ही जन्मती हैं

  5. bahut sundar likha hai aapne ……mere blog par aane ke liye shukriya

  6. प्रेम पर बहुत सुंदर कविता !! बहुत सुंदर!!!

  7. साब, मिलने के बाद तो हर चीज़ की कीमत खत्म हो जाति है.आदमी ने दिल ओ दिमाग ही ऐसा पाया है जुस्तजु तक ही तलाश से रिश्ता कायम रहता है.फिर प्यार तो किया नहीं जाता हो जाता हैओर ख़ामोशी से बड़ी कोई ज़बान नहीं है .सर झुका लेने जेसी पवित्र हाँ की भाषा हमारे पास ही बची है.बाकि वेस्ट में में तो एनीमल इंस्टिक्ट वाले रिश्ता चल रहे हैं.

  8. This is a good poetry.
    i like it.
    from. Lavi jain

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