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अगस्त 2, 2010

कह देने के बाद… (एक प्रेम कविता: कृष्ण बिहारी)

जब तक कहा नहीं जाये
तब तक ही अमूल्य है प्यार।

कितना असहज था मैं
कहते हुये यह पहली बार
कि करता हूँ
तुमसे प्यार।

जाने कितनी बार
इसे कहने से पहले
चिपकती थी जबान तालू से
और मैं –
न चाहकर भर भी चुप रह जाता था
यूँ ही हर बार।

और अब
कितना आसान
सामान्य सा लगता है
यह कहना
कि
करता हूँ मैं तुमसे प्यार।

याद है-
तुमने कहा था
मुझसे क्या पूछते हो?

कुछ भी नहीं कहता क्या
मेरा यह चुप रहना
और मेरी आँखों का
झुक जाना
लगता नहीं है क्या तुमको
मेरा मौन
समर्पित स्वीकार।

{कृष्ण बिहारी}


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