कारगिल और भारत-पाक शांति प्रयास

पाक शायर अहमद फ़राज़ को (दूसरा शुक्रवार, जुलाई 1999)

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तुम्हे ग़म था
कि पहले खिल न सके
किसी जानिब मोहब्बतों के पड़ाव
कि शाखे अमन लिये कोई फाख्ता नहीं आयी|

तुमने कहा था कि भारतीयों की आन का सवाल है तो
तुम ही हाथ बढ़ा दोगे दोस्ती के लिये|

हमारे शायर को तुम्हारे बढ़े हाथ लगे
ग़म गुसार के हाथ|

दोस्ती के प्रस्ताव से गदगद देश का प्रधानमंत्री
गया लेकर बनारस की सुबह रोशन
तुम्हारे गुलशन-ए-लाहौर में|

दोस्ती के मधु के स्वाद से उनींदे देस की पीठ में
वार किया तुम्हारे वतन ने फराज़|

फैलायी थी हंस सी श्वेत चादर हमने
सोचकर कि
दोस्ती की नई इबारत लिखेंगे
वतन ने तुम्हारे उसे खून से रंग दिया|

कहा था तुमने कि तुम्हे नाज़ है कर्बला लड़ा तुमने
पर कैसे रसूल के नाती के पक्ष का मान लें तुम्हारे हमवतनों को?
वे तो दोस्ती के लिये विनीत झुके हुये की पीठ में छुरा नहीं घोंप सकते थे
बचा यजूदी का पक्ष!
खुद निर्णय कर लो किस तरफ खड़े दिखायी देते हैं वे लोग
जिनकी तरफ से तुम आये थे?

हमारी तो विरासत है जानकर विष पीने की
सो नीलकंठ बने बैठे हैं|

तुम्हे दिखायी न दिया हो तो चेताना
हमारा फर्ज है
नफरत के ज्वालामुखी पर खड़ा तुम्हारा देश
भस्मासुर बन गया है
और एक दिन यह अपने ही बनाये
तेजाब से गल जायेगा|

कसक जरुर रह जायेगी धोखे की
पर देर सवेर भर जायेगा
हमारे वतन की पीठ का घाव
पर
तुम्हारे वतन के हाथ से
बेगुनाहों का रक्त
छुटाये न छुटेगा।

{देश पर थोपे गये व्यर्थ के युद्ध में जान लड़ा देने वाले सैनिकों को समर्पित}

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…[राकेश]

पृष्ठभूमि : एक तरफ तो भारत की तरफ से सदभावना यात्रायें भेजी जा रही थीं पाकिस्तान से दोस्ती करने के लिये और दूसरी तरफ सन 1999 के मई माह में पाकिस्तान ने कारगिल पर आक्रमण कर दिया था। “शक्ति” और “गौरी” के समय कविताओं के माध्यम से दोस्ती के पैग़ाम भेजने वाले कवियों (अहमद फराज़ और अली सरदार जाफ़री) और अन्य कलाकारों पर क्या बीती होगी इस कारगिल युद्ध से? यह पता नहीं चलता क्योंकि इस विषय पर उनकी कवितायें प्रकाश में नहीं आयीं। कलाकारों को आशावान होना पड़ता है। पर कलाकारों को अपने देश और समाज में फैली बुराइयों और अपने देश और समाज द्वारा किये गये गलत कार्यों की भर्त्सना भी करनी चाहिये तभी समाज में चेतना का फैलाव होता है। यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनके पुराने प्रयास जो उन्होने तुलनात्मक रुप से शांति काल में किये थे झूठे न भी लगें पर कमजोर और वास्तविकता से कोसों दूर जरुर लगने लगते हैं। अगर अहमद फराज़ 1998 में पाकिस्तान के प्रतिनिधि बन कर भारत आये थे और कविता के माध्यम से पैग़ाम दे रहे थे तो 1999 में भी उनका फर्ज बनता था कि अपने देश द्वारा किये कारगिल जैसे कृत्य पर भी कुछ कहें, तभी एक कलाकार का सच्चा धर्म निभ सकता है और यही बात तमाम कलाकारों पर लागू होती है। पर ऐसा भी देखा गया है कि वे अपने प्रयासों में ऎच्छिक हो जाते हैं पर एक कलाकार की संवेदना ऎच्छिक नहीं हो सकती। या तो एक कलाकार की संवेदना इंसानियत से जुड़े सारे मामलों में जाग्रत रहती है या फिर संवेदना का उपयोग सूक्ष्म किस्म की राजनीति करने के लिये किया जाता है या फिर कलाकार की संवेदना निष्क्रिय हो गयी गयी होती है। जब कलाकार राजनीति के सामने कमजोर पड़ जाते हैं तब तुच्छ राजनीति समाज को अपने कब्जे में ले लेती है और तब किसी का भला नहीं होता सिवा नेताओं को तात्कालिक लाभ पहुँचने के। कारगिल की इसी पृष्ठभूमि पर, जब कलाकार, जो कि कुछ अरसा पहले Dove Talk आदि के माध्यम से भारत-पाक दोस्ती के लिये बड़े मुखरित रुप से प्रयास कर रहे थे, चुप थे, तो उस चुप्पी से उत्पन्न असंतोष के कारण उपरोक्त्त कविता का जन्म हुआ था।

भारत को तो जो भी नुकसान उठाना पड़ा है इन तमाम बरसों में पाकिस्तान की भारत में अलगाव फैलाने की गतिविधियों की वजह से वह अपनी जगह है परन्तु पाकिस्तान के आज के हालात बखूबी दर्शा रहे हैं कि कट्टरता की आँधी में अंधे होकर बह जाने से उसका कितना बड़ा नुकसान हुआ है। 1999 के जुलाई माह के दूसरे शुक्रवार को लिखी गयी कविता पाकिस्तान के वर्तमान हालात, जो कि देश को विध्वंस की ओर जा रहे प्रतीत होते हैं, को देखते हुये कुछ हद तक सही प्रतीत होती है। भारत के लिये भी यह चेतावनी है कि अँधी कट्टरता भारत को भी ऐसे ही विध्वंस के रास्ते पर ले जायेगी। भारत की विरासत कट्टरता की नहीं है और अँधे होकर झोंक में एक ही विचारधारा के साथ बहने की तो बिल्कुल भी नहीं है।

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पाक शायर अहमद फराज़ की कविता को यहाँ पढ़ सकते हैं

भारतीय शायर अली सरदार जाफ़री की कविता को यहाँ पढ़ सकते हैं

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5 टिप्पणियाँ to “कारगिल और भारत-पाक शांति प्रयास”

  1. जन दुनिया जी,

    आपका धन्यवाद

  2. achee kavita achcha jawab. kargil karake pakistan ne dhokha diya india ko

  3. राकेश भाई ,नफरत के ज्वालामुखी पर खड़ा तुम्हारा देश
    भस्मासुर बन गया है
    और एक दिन यह अपने ही बनाये
    तेजाब से गल जायेगा| भारत को तो जो भी नुकसान उठाना पड़ा है इन तमाम बरसों में पाकिस्तान की भारत में अलगाव फैलाने की गतिविधियों की वजह से वह अपनी जगह है परन्तु पाकिस्तान के आज के हालात बखूबी दर्शा रहे हैं कि कट्टरता की आँधी में अंधे होकर बह जाने से उसका कितना बड़ा नुकसान हुआ है। 1999 के जुलाई माह के दूसरे शुक्रवार को लिखी गयी कविता पाकिस्तान के वर्तमान हालात, जो कि देश को विध्वंस की ओर जा रहे प्रतीत होते हैं, को देखते हुये कुछ हद तक सही प्रतीत होती है। भारत के लिये भी यह चेतावनी है कि अँधी कट्टरता भारत को भी ऐसे ही विध्वंस के रास्ते पर ले जायेगी। भारत की विरासत कट्टरता की नहीं है और अँधे होकर झोंक में एक ही विचारधारा के साथ बहने की तो बिल्कुल भी नहीं है।
    मैंने आपके गध्य ओर पध्य दोनों से कोट किया है.पलहे में कवि की भविष्यवाणीहै दूसरे में वर्तमान हालत की वास्तविकता है शायद .किसी ने लिखा है pakistan is a dying state.i am adding pakistan is a dead state killed by its evil self designs.
    अहमद फ़राज़ साब ,जाफरी साब या दूसरे कलमनवाज़ जहाँ तक मेरा तजुर्बा है हिंद-पाक में कोई फर्क नहीं समझते हैं .बल्कि उनका सपना आज भी अखंड भारत का है .यह जानते हुवे भी की ये सपना कभी पूरा नहीं होगा यह तुच्छ कलम सेवक सपना देखता है एसी सम्भावना का जिस में भारत,पाक,लंका,ब.देश,नेपाल आदि अपनी सरहदों में अजाद पर साँझा मुद्रा (गोरे यूरो चला सकते हैं हम क्यों नहीं)ओर साँझा विकास के भागीदार होंगे .मगर आह सपना ..किसी से कहो तो पागल कहे .ओर बिलकुल ठीक भी. हालत ही कुछ असे हैं. खेर .बात शायरी की थी ,आपने शायद फ़राज़ साब की मशहूर रचना पर हालत के मद्देनजर आपने दिल का गुबार निकला है जिससे में सहमत हूँ .साब लेख का कैनवास इतना ब्रोड है की किताबें लिखी गयी हैं ओर लिखी ज सकती हैं .में इतना जनता हूँ जिगर साब के लव्जों में
    जो उनका काम है वो अल्हे सियासत जाने /मेरा पैगाम है मोहब्बत जो अवाम तक पहोचे . आम जनता के दिलों में तो वही गंगा-जमनी है (शायर तो बहुत अलग मानवतावादी कौम है ओर जिनका ज़िक्र आपने लिया है, अज़ीम मोहबत के उपासक रहे हैं )तो नफरतों वाली बात गंदे सत्ता पिपासुओं की थी,है ओर रहेगी .पास्ट जानने के लिए पूरा इतिहास है सामने (freedom at midnight gore ki likhi magar acchi kitab hai .apne padhi hogi).vartman hamre samne hai .कितना लिखा जाये .साहिर साब की नज़्म ए शरीफ लोगों का बंद याद आ रहा है
    टेंक आगे बढ़े की पीछे हटें
    धरती की कोख बाँझ होती है
    जश्न जीत का की सोग हार का
    जिदगी मय्यतों को रोती है
    यहां यह कोट करने का सिर्फ यही मकसद है की जिनका नाम आपने लिखा है पूर्णता मानववादी थे ओर हिंदुस्तान-पाकिस्तानी बाद में थे .मैं तो यही सोचता हूँ आपकी रचना वक्त के तकाजे अनुसार कवि दिल के भावनात्मक उद्गार थे.आपके प्रोस का लास्ट पर जो मैने कोट किया है. यही हमारी वास्तविकता है .अल्लामा इक़बाल की नज़्म से अर्ज है
    कोई बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी
    सदियों रहा है दुशमन दौरए जहाँ हमारा
    बात सिर्फ गंगा –जमनी संस्कृति की है(खुदा का शुक्र है जिन नफरत वालों का जिक्र आपने किया है वोह कट्टरवादी किसी इमोशनल इशू से तो तवरित लाभ ले सकते हैं पर जनता की दिलों में इतनी गन्दी राजनीती की फिजा के बावजूद स्थान नहीं बना पाएंगे ) जिससे हम आबाद है ओर पाकिस्तान नफरत की बुनियाद पर बना है नफरत ही उसे जायगी

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