गूँज : केदारनाथ सिंह के जन्मदिन के अवसर पर

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि श्री केदारनाथ सिंह के ७६वें जन्मदिवस पर उन्हें बहुत बहुत बधाई और उनकी लम्बी आयु के लिए शुभकामनायें।
इस अवसर पर प्रस्तुत है उनकी एक बहुत गहरे भाव वाली कविता गूँज


यह जो मेरा घर है
जहाँ जीने के पूरे समारोह के साथ
मैं रहता हूँ बरसों से
मेरा नहीं है

हालाँकि
बाहर दरवाजे पर एक ध्वज की तरह जो
फहरा रहा है नाम
वह मेरा ही है


खुद से एक लम्बी बहस के बाद
मैंने बड़े डाकघर को
भेज दी है सूचना
कि अब से इस घर का पता
उब सबका पता हो
जिनका कोई पता नहीं


यही सूचना मै
बारिश, हवा और कबूतर के पास
भी भेजना चाहूँगा


अगर मेरा डाकघर
इसमें मेरी ज़रा भी मदद करे


इस घर में एक गूँज है
एक बरसों पुरानी थकी हुयी गूँज
जिसे छिपाने से कोई फायदा नहीं

उसके बारे में सारे वृद्धजन
और मेरी भाषा के लगभग सारे
पंचांग चुपचाप हैं
सहमत हैं कि
वह मेरे समय की बर्फ पर
किसी हिममानव के पैरों
के चलने की आवाज है

इस आवाज की ठंडक
मेरे शहर के लोगों को अच्छी लगती है


अभी पिछली ही शाम
मैंने अपनी गली के एक गीत में
उस आवाज की हल्की सी
धमक सुनी और
मेरी शिराएँ अब तक झनझना रही हैं


चकित हूँ मैं
मुझे लग गए जीवन के कितने बरस
इस सीधी सी बात तक चलकर पहुँचने में
कि मेरे समय का नायक
कोई योद्धा
या प्रेमी नहीं
एक अदृश्य
व असाध्य हिममानव है

जो अपने वजूद के
न होने के ताप से
आहिस्ता- आहिस्ता

गल रहा है

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