Archive for जून 30th, 2010

जून 30, 2010

अहिंसा हिंसा वाया गाँधी टैगोर

महात्मा गाँधी और गुरुदेव टैगोर एक साथ ठहरे थे और किसी कार्यक्रम में उन्हे एक साथ जाना था।

कार्यक्रम में जाने के लिये उन्हे देरी नहीं हो रही थी पर तब भी निकलने के वक्त से पहले ही गाँधी जी झटपट तैयार होकर गुरुदेव के अपने कमरे से बाहर आने का इंतजार करने लगे।

जब उन्हे इंतजार करते कुछ समय हो गया और गुरुदेव बाहर नहीं आये तो गाँधी जी गुरुदेव के कमरे में चले गये, कुछ तो इस उत्सुकता से कि गुरुदेव को इतना समय क्यों लग रहा है और कुछ इस भाव से कि कहीं देर न हो जाये नियत समय पर पहुँचने में।

वहाँ जाकर देखते हैं कि गुरुदेव बड़े इत्मिनान से शीशे के सामने बैठे बड़ी ही तल्लीनता से अपने लम्बे केशों और लहराती दाढ़ी को संवार रहे हैं।

गाँधी जी के लिये तो ऐसी शारीरिक साज सज्जा का कोई मतलब था नहीं और ऐसे मामलों में समय व्यतीत करना उन्हे समय नष्ट करने के बराबर लगता।

वे गुरुदेव से भी यही बोले,”आप भी क्या समय बेकार कर रहे हैं इन कामों में “।

सौंदर्य बोध से पूरी तरह जाग्रत कवि और कलाकर गुरुदेव अपने काम को जारी रखते हुये मुस्कुराते हुये बोले,” मैं तो अहिंसा के नियमों का पालन कर रहा हूँ “।

गाँधी जी कुछ चकित हो जाने के भाव से प्रश्नात्मक दृष्टि से गुरुदेव को देखने लगे।

गुरुदेव अपना श्रंगार खत्म कर चुके थे।

उन्होने कहा,”सभी लोग खूबसूरत चीज को देखकर अच्छा महसूस करते हैं जबकि बेतरतीब और अस्त व्यस्त माहौल सभी को परेशानी दे जाता है। अब आप ही बताइये कि किसी को नापसंदगी के भाव देना एक तरह की हिंसा हुयी कि नहीं? और अगर हम अच्छे ढ़ंग से किसी के सामने जाते हैं और उन्हे हमें देखकर अच्छा लगता है तो हमने अहिंसा के सिद्धांत का पूरी तरह पालन किया “।

गाँधी जी गुरुदेव की बात सुनकर मुस्कुराये। वे गुरुदेव की बात की गहरायी और चतुरायी दोनों को समझ गये।

उनकी तो सादगी में ही उनकी खूबसूरती छिपी थी। उनकी रचना तो लाखों करोड़ों भारतीय जो सादा जीवन ही जी सकते थे उनके साथ एकाकार होकर जीवन जीने से ही रचित हो जाती थी। उनसे अलग रुप लेकर तो वे अपनी रचना रच नहीं सकते थे। उन पर तो एक बहुत बड़े काम की जिम्मेदारी थी। उनकी रची रचना पर तो हजारों उपन्यास, लाखों कवितायें और करोड़ों चित्र बनाये जा सकते हैं। जनता जनार्दन के लिये तो उन्हे देखना ही अपने आप में उनसे जुड़ाव लेकर आता था और आज तक लेकर आता है।

दोनों महान विभूतियों के दृष्टिकोण अपने अपने रुप में सच थे और जीवन में सार्थकता बनाये रखे रहे।

महान व्यक्तियों की बातें भी महान होती हैं। उनके साथ घटने वाली घटनायें भी सामान्य मनुष्यों के लिये कुछ न कुछ शिक्षाप्रद समझ जन्मा जाती हैं।

जून 30, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन लुट गये राम नाम की लूट के फेर में

जैसे विचित्र मुल्ला नसरुदीन वैसे विचित्र उनके साथ होने वाली घटनायें। एक झोंक में काम करने वाले व्यक्ति ठहरे नसरुद्दीन। अगर कुछ करने की सोच लें तो न आगा देखें न पीछा बस जुट जाते थे उस काम को पूरा करने में। दूसरों से सीखने का तो मतलब ही नहीं उठा कभी उनके जीवन में। वे तो सेल्फ मेड व्यक्ति थे वैसे ये बात दीगर है कि कितना निर्माण उनके द्वारा किये कामों से होता था और कितना विध्वंस उनकी हरकतों की वजह से हो जाता था। करने के बाद सोचना उनकी फितरत में था।

खैर घरवाले उन्हे उलहाना दिये रखते कि वे घर के किसी काम से मतलब नहीं रखते और मोहल्ले के बाकी लोग अपने परिवार के साथ घुमने जाते हैं उन्हे मेला दिखाने ले जाते हैं, सिनेमा दिखाने ले जाते हैं पर नसरुद्दीन हमेशा घर और परिवार को नजरअंदाज किये रखते हैं।

नसरुद्दीन इन रोज रोज के वाद विवादों से परेशान होकर वादा कर बैठे कि वे भी परिवार को कहीं न कहीं बाहर ले जाकर सबका मनोरंजन करायेंगे पर स्थान आदि उनकी अपनी मर्जी का होगा।

उनके परिवार वाले ऐसा कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे सो उन्होने झट से हाँ कर दी।

नसरुद्दीन ने सोचा कि मेरी शांति के दुश्मन इन लोगों को कहीं भी ले जाना बिना मतलब की परेशानी को मोल लेना है और सबसे अच्छा इन सबको फिल्म दिखाने ले जाना रहेगा, कम से कम सिनेमा हॉल के अंधेरे में मैं सो तो सकता हूँ।

नसरुद्दीन ने परिवार में क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या स्त्री और क्या पुरुष सबको कह दिया कि अगामी रविवार को सब लोग तैयार रहें और वे उन सबको फिल्म दिखाने ले जायेंगे। चाहें तो वे लोग अपने अपने मित्रों को भी आमंत्रित कर सकते हैं।

पूरे मोहल्ले के लिये चर्चा का विषय बन गया नसरुददीन जैसे आदमी द्वारा परिवार और मित्रों को फिल्म दिखाने ले जाने का कर्यक्रम। रविवार तक पूरी फौज तैयार हो गयी फिल्म देखने जाने के लिये।

नसरुद्दीन उन दिनों तुलसी की राम चरित मानस का अध्ययन कर रहे थे। मुकेश द्वारा गायी राम चरित मानस की कैसेट्स तो उनके साथ ही रहती थीं और वे उनके वॉकमैन में बजती ही रहती थीं।

फिल्में उन्होने बहुत कम देखी थीं पर कुछ फिल्मी लोगों के नाम से वे परिचित थे। अपने रशियन दोस्तों से उन्होने राज कपूर और उनकी फिल्मों की रुस में लोकप्रियता के बारे में भी सुन रखा था।

शुक्रवार को ही राज कपूर की “राम तेरी गंगा मैली” प्रदर्शित हुयी थी। नसरुद्दीन ने फिल्म का नाम पढ़ा और सोचा कि धार्मिक फिल्म लगती है और राम का नाम शीर्षक में मौजूद है तो उनके जीवन के प्रसंग भी इसमें होंगे और हो सकता है कि मेरी रुचि से मिलती जुलती बातें भी फिल्म में मिल जायें। फिल्म के गाने चारों तरफ कुछ दिनों पहले से बजने लगे थे और नसरुद्दीन भी उन गानों से वाकिफ हो चले थे। लता मंगेशकर द्वारा गाया एक गीत “एक राधा एक मीरा” तो उन्हे इतना भाया कि उन्होने एक सज्जन से पूछ ही लिया कि किस फिल्म का गाना है और फिल्म का नाम जानकर उन्हे पूरी तसल्ली हो गयी कि वे एक धार्मिक फिल्म देखने जा रहे हैं। उन्होने तकरीबन दो दर्जन टिकट रविवार के मैटिनी शो के खरीद लिये।

रविवार आया। नसरुददीन सबको सिनेमा हाल ले गये।

सभी समझ गये होंगे कि नसरुद्दीन गये तो थे रामायण देखने और दिखाने पर वहाँ से लेकर आये महाभारत होने के बीज और कल्पना ही की जा सकती है कि कैसी फसल उगी होगी उन बीजों से। फिल्म शुरु होने के एक घंटे के अंदर ही सब लोग वापिस घर पर थे। नसरुद्दीन रास्ते से ही गायब हो गये।

विचित्रताओं के सम्राट नसरुद्दीन ऐसे घटनाचक्रों से दो चार तो होते ही रहते थे। ऐसा ही उन्होने कुछ बरस बाद फिर से किया। पर दूसरा किस्सा किसी और दिन।

…[ राकेश]

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