मन और देह के सत्य : सत्यम शिवम सुंदरम

देह का सत्य
हमेशा
मन का भी सत्य
नहीं होता।

जहाँ नजदीकी हो
और भय न हो खोने का
वहाँ पाने के लिये
मन पहले होता है,
देह सधी रहती है पार्श्व में,
धैर्य और आत्मविश्वास
की लय पर खूबसूरती
से मग्न होकर
नृत्य करती हुयी।


 

जहाँ हो कि
बस पा जायें किसी तरह तो अच्छा
वहाँ देह कूदकर आगे आ जाती है
मन की छाती पर पैर रख खड़ी हो जाती है।

वहाँ देह जीत
व्यक्ति को विजित करने का भाव
उभर आता है
मन को भी जीत जाने का
भ्रम भी उत्पन्न हो जाता है।

जहाँ गहरा जुड़ाव हो
वहाँ बिना मन
देह स्पंदन भी नहीं करती।

मन का सत्य
देह के सत्य
को भी समाहित कर लेता है
और यह ऐसा वर है
जो जीवन भर
साथ चलता है।

पर देह का सत्य
बिना मन जिन्दा रह तो लेता है
पर यह हमेशा
अल्पायु के श्राप
से शापित भी रहता है।


सत्यम शिवम सुंदरम
के तपोवन में
केवल देह के सत्य से
प्रवेश नहीं पाया जा सकता,
यह रास्ता तो जाता ही नहीं वहाँ,
इस देह से उस देह
की भूल-भुलैया में
खोकर ही रह जाता है।

वहाँ तो मन के सत्य के
कोमल उपवन से
से गुजर कर ही
प्रवेश मिल सकता है।

………………………………………………..

… [राकेश]

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12 टिप्पणियाँ to “मन और देह के सत्य : सत्यम शिवम सुंदरम”

  1. बहुत अच्छी अभिव्यक्ति

  2. धन्यवाद संगीता जी

  3. क्या कहूँ इस रचना के लिये…………………जीवन का यथार्थ उतार कर रख दिया………………सत्य का बोध करा दिया…………………बेहद सुन्दर प्रस्तुति…………तारीफ़ के लिये शब्द भी कम हैं।

  4. वंदना जी
    प्रोत्साहन के लिये बहुत बहुत धन्यवाद

  5. मंगलवार 29 06- 2010 को आपकी रचना … चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

  6. संगीता जी
    साभार धन्यवाद

  7. वहाँ तो मन के सत्य के
    कोमल उपवन से
    से गुजर कर ही
    प्रवेश मिल सकता है।
    बहुत सुन्दर लगी आपकी रचना .बधाई

  8. वहाँ तो मन के सत्य के
    कोमल उपवन से
    से गुजर कर ही
    प्रवेश मिल सकता है।
    बहुत सुन्दर लगी आपकी रचना .बधाई
    धन्यवाद संगीता जी

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