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जून 19, 2010

कुमार विश्वास : बरसों पुरानी दो कविताओं का स्मरण

एक मित्र ने प्रसिद्ध कवि डा. कुमार विश्वास की दो पुरानी कवितायें भेजी हैं जो डा. विश्वास ने 1992 या 1993 में उनके शैक्षणिक संस्थान में हुये कवि सम्मेलन में सुनायी थीं। उनकी इन दोनों शुरुआती कविताओं से भी इस बात के पूरे पूरे सुबूत मिल जाते हैं कि इन बरसों में वे क्यों देश के एक जाने माने कवि बन गये हैं।

डा. विश्वास की कविताओं को पढ़ने वाले पाठकों और उनके ही मुख से सुनने श्रोताओं में उम्र के फासले खत्म हो जाते हैं क्योंकि कविता में कुछ न कुछ ऐसा जरुर होता है जो हर उम्र पाठक और श्रोता को आकर्षित कर सके।

मंच से श्रोताओं से एक जीवंत सम्बंध करने में तो वे पारंगत हैं हीं।

इन कविताओं के वीडियो शायद उपलब्ध न हों यू ट्यूब पर।

मित्र ने अपनी स्मृति के सहारे दोनों कविताओं को याद रखा हुआ था और बाद में कभी कागज पर लिख भी लिया था। हो सकता है स्मरण के सहारे भेजी कवितायें वास्तव में ज्यादा लम्बी हों।

पहली कविता में डा. विश्वास प्रेमियों और दूसरे लोगों द्वारा प्रियजनों के हमेशा के लिये बिछुड़ जाने पर की जाने वाली आत्महत्या की प्रवृति पर उन्हे वास्तविकता का बोध कराते हैं।

फक़त एक आदमी के लिये
ये दुनिया छोड़ने वालो
फक़त एक आदमी से
ये जमाना कम नहीं होता

दूसरी कविता में डा, विश्वास प्रेमी के अभिमान को दर्शाते हैं।

बहुत मशहूर हो तुम
बहुत मशहूर हैं हम
बहुत मसरुफ हो तुम
बहुत मसरुफ हैं हम
बहुत मगरुर हो तुम
बहुत मगरुर हैं हम
अत: मजबूर हो तुम
अत: मजबूर हैं हम

नोट : इन कविताओं को यहाँ प्रस्तुत करने का एकमात्र उद्देश्य पाठकों को डा विश्वास की दो पुरानी कविताओं से परिचित कराना है और यदि डा विश्वास या उनके प्रकाशकों को इस पर आपत्ति होगी तो कवितायें हटा दी जायेंगी।

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