राग-विराग : श्रीलाल शुक्ला ने छोटा किया जीवन का विस्तार

तेज रफ्तार से भागती ज़िन्दगी और उसके पीछे भागते लोग। समय की कमी हर जगह दिखायी देती है। साहित्य रचते समय दोहा, हाइकू, त्रिवेणी, और चौपाई आदि लिखने के अलावा लेखक के ऊपर ऐसा दबाव नहीं होता कि उसे संक्षेप में अपनी कल्पना को संजोना है। लेखक विस्तार में जाना चाहता है, विस्तार से बताना चाहता है, खासकर जब उसे उपन्यास लिखना हो। उसे एक तरह का मोह हो जाता है अपने विषय से और अपने पात्रों से जुड़ी हरेक घटना उसे महत्वपूर्ण लगने लगती है।

श्रीलाल शुक्ला जी के उपन्यास राग-विराग की एक खासियत है कि यह कहानी को संक्षेप में कह जाता
है। पर 120 से कुछ कम ही पृष्ठों में सिमटी पुस्तक तीन दशकों से ज्यादा की कहानी कह जाती है और बदलते समाज, बदलते मूल्यों और न बदल सकने वाली सामाजिक बुराइयों की तरफ इशारे कर जाती है, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मेडिकल रिसर्च के क्षेत्र में चल रहे भ्रष्टाचार की और ऊँगली उठा जाती है, और साथ ही साथ प्रेम को खंगाल कर सम्बंधों में आ रही और आ सकने वाली विशेष परिस्थितियों का विवरण भी दे जाती है।

राग-विराग पाठक के अंदर एक सन्नाटा सा उत्पन्न करती हुयी चलती है। पुस्तक एक तरह से लोगों की अकेले होते जाने की प्रवृति की ओर इशारा करती है। लोगों को दूसरों के साथ सम्बंध तो चाहियें पर ऐसा बिल्कुल उनकी शर्तों पर होना चाहिये। प्रेम सम्बंध जैसे सम्बंधों में भी दिल से ज्यादा दिमाग सक्रिय हो गया है। प्रेम की तरफदारी करने और आगे सब ठीक होगा जैसी बात लोगों को आश्वास्त नहीं करती उन्हे पक्की गारंटी चाहिये कि आगे इस प्रेम सम्बंध के कारण अच्छा ही होगा। जीवन में परिवर्तन तो चाहिये पर परिवर्तन इतना बड़ा न हो कि उथल पुथल मचा जाये।

राग-विराग की नायिका सुकन्या, एक मेडिकल छात्रा, अपने सीनियर डा. शंकर, जो कि उसी मेडिकल कालेज से एम. डी कर रहा है, को पसंद करती है, उसे जीनियस मानती है परन्तु वह अंदर से डरती भी है कि कहीं शंकर उसके प्रति प्रेम का इजहार न कर दे। शंकर के प्रति अपने प्रेम के भाव पर ब्रेक उसने खुद ही लगाये हुये हैं। कहीं न कहीं उच्च जाति की सुकन्या को शंकर का निम्न जाति में जन्मा होना डराता है। उसे शायद इस बात का डर है कि यदि उसने शंकर से शादी कर ली तो उसकी सामाजिक स्थिति में अवांछित परिवर्तन न आ जायें और जीवन कठिनाइयों से न भर जाये।

पुस्तक जो शब्दों से नहीं बताती वह भी अपरोक्ष रुप से दर्शा ही देती है। रोचक ढंग से पुस्तक आगे दिखाती है कि वैवाहिक जीवन में आने वाली समस्याओं से डर कर सुकन्या शंकर के प्रेम प्रस्ताव पर कान नहीं धरती पर समस्यायें सुकन्या के जीवन को घेर ही लेती हैं जब वह अपने पिता के कहने पर उनके एक मित्र के सुपुत्र सुबीर, जो कि सेना में मेजर हैं और दिखने में खूबसूरत हैं, से विवाह कर लेती है।

राग-विराग लोगों के ज्यादा से ज्यादा प्रैक्टीकल होते जाने की ओर इशारा करती है। शुरुआत में ही एक प्रसंग में सुकन्या अपने पिता को उत्साहित होकर शंकर के बारे में बता रही है कि कैसे शंकर ने एम. एस. सी करके भी मेडिकल में प्रवेश लिया क्योंकि उसके अंदर गहरे में एक डाक्टर बनने की धुन थी और कैसे वह अपने अध्यापकों से ज्यादा जानता है। कैसे शंकर ने कार्डियोलॉजी में एम. डी करने के बाद फिर से एम.डी मेडिसिन में प्रवेश लिया क्योंकि उसे लगता है कि दिल की बीमारी के शिकार लोग अपना इलाज करा सकते हैं परन्तु लाखों गरीब लोगों को रोगी बनाने वाली कितनी ही बीमारियाँ हैं जिनके लिये भी उच्च शिक्षा प्राप्त डाक्टर्स का होना बहुत जरुरी है। सुकन्या के पिता अपनी पुत्री के मुख से शंकर की इतनी तारीफ सुनकर उसे टोकते हैं कि इतनी सब पढ़ाई करने वाला शंकर कम से कम पैंतीस साल का तो होना ही चाहिये और वह उससे तो काफी साल बड़ा होगा। वे इस बात से चिंतित होते हैं कि कहीं उनकी पुत्री शंकर के साथ प्रेम में तो नहीं पड़ गयी?

शंकर को विश्व प्रसिद्ध एक विदेशी शोध संस्थान में शोध करने के लिये फैलोशिप मिल जाती है। सुकन्या की मौसी उसे बताती है कि उसे शंकर के प्रति अपने तथाकथित प्रेम को अपने अंदर मान्यता देनी चाहिये और शंकर को भी बता देना चाहिये। पर सुकन्या अपने अंदर घर कर गयी जाति आदि से सम्बंधित पुरानी मान्यताओं को नहीं तोड़ पाती और शंकर देश छोड़ कर चला जाता है।

पर क्या शंकर को सुकन्या से गहरायी के स्तर पर प्रेम है? या वहाँ भी कुछ शर्ते हैं जिसके कारण वे दोनों केवल पसंद आने वाली हदों तक ही सीमित रहते हैं। सुकन्या के डा. पिता को वह बचपन से जानता है और पुस्तक का यह भाग प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी मंत्र की याद दिलाता है। सुकन्या के पिता द्वारा बचपन में दिखायी गयी बेरुखी उसे आज तक सालती है और वह डा. राय को भी अपने पिता की असमय मौत का कुछ हद तक जिम्मेदार मानता है।

इतने प्रैक्टीकल लोगों के बीच पुस्तक शंकर के बचपन के मित्र के द्वारा इंसानियत के भाव को जिंदा रखती है। जवानी में सुकन्या शंकर के दोस्त को पसंद नहीं करती थी पर सालों बाद जब वह अस्पताल की प्रमुख बन जाती है तब शंकर का वही दोस्त, जो कि किसी सरकारी कार्यालय में चौथी श्रेणी का कर्मचारी है, उसे इंसानियत के पाठ पढ़ा जाता है अपने बर्ताव से।

सालों बाद शंकर के एक सेमिनार में मुख्य वक्ता के रुप में आने पर यह जानकर कि शंकर ने शादी नहीं की, सुकन्या की मौसी उन दोनों को मिलाने का प्रयत्न करती हैं और सुकन्या पर कटाक्ष भी उसकी जातिवादी सोच को लेकर। पर सुकन्या सेमिनार के बाद शंकर से मिलने की संभावना को ही खत्म कर देती है और पलायन करके देहरादून चली जाती है।

अगर उनके मध्य प्रेम था तो एक और मौका उनके सामने आया था मिलन का। शंकर के पास भी सेमिनार के दौरान एक मौका था सुकन्या के प्रति अपने प्रेम के इजहार करने का पर वह उसे गंवा देता है। कहीं न कहीं उन दोनों के मध्य अहं भी है। शंकर को भी शायद मालूम है कि उसके और सुकन्या के बीच एक खाई है और जो शायद भरी नहीं जा सकती। तब भी वह एक ऐसे स्थान पर जाता है जहाँ वह और सुकन्या सालों पहले जाया करते थे। उसे पता है कि सुकन्या नहीं आयेगी वहाँ पर वह जाता है और इंतजार करता है। वह नहीं आती। और वह भी लौटकर अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हो जायेगा।

पुस्तक ढ़ेर सारे प्रश्न तो उठाती ही है। पर एक प्रेम कहानी के रुप में सबसे बड़ा प्रश्न जो यह उठाती है वह सुकन्या और शंकर के बीच पनपी हुयी हिचक का है। बात सुकन्या और शंकर के विवाह की ही नहीं है। अब तो दोनों अपनी अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हैं पर क्या वे इतने सालों बाद भी अपने प्रेम को स्वीकार नहीं कर सकते?

पुस्तक में दिखायी गयी प्रेम कहानी को समय के स्तर पर देखा जाये तो इसका ऐसा अंत इंटरनेट और मोबाइल युग से पहले के युग में सार्थक लगता है और इसके अंत को अस्सी के दशक के अंत के सालों में बीता हुआ माना जा सकता है।  इंटरनेट और मोबाइल युग का प्रवेश कथानक के अंत को निश्चित रुप से थोड़ा बदल देगा।

…[राकेश]

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