अटल बिहारी वाजपेयी : कवि की उलझन

राह कौन सी जाऊँ मैं?

चौराहे पर लुटता चीर
चलूँ आखिरी चाल कि
बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ?

सपना जन्मा और मर गया
मधु ऋतु में ही बाग झर गया
तिनके टूटे हुये बटोरुं या
नवसृष्टि सजाऊँ मैं?

राह कौन सी जाऊँ मैं?

दो दिन मिले उधार में
घाटों के व्यापार में
कौड़ी कौड़ी का हिसाब लूँ
या निधि शेष लुटाऊँ मैं?

राह कौन सी जाऊँ मैं ?

[ चित्र : साभार PIB archives (2002), Govt. of India ]

3 टिप्पणियाँ to “अटल बिहारी वाजपेयी : कवि की उलझन”

  1. कवि ने भटकन को जैसे शब्द दे दिए हैं …निधि शेष लुटाऊँ मैं …को एक नया मोड़ भी दिया जा सकता था …निधि शेष सजाऊँ मैं …? जो जीवन को सकारात्मक लेते हुए हर दिन को जीने का सन्देश दे सकता था । ब्लॉग बहुत अच्छा लगा …कविताऐं महज भावनाऐं नहीं हैं, वे अनुभव हैं …सच्ची खरी बात …फूल कलियाँ काँटें …जाने इंसान के लिए क्या क्या मायने रखते हैं …उन्हें बयान करने से पहले महसूस करना पड़ता है …उसे बयान करना उतना मुश्किल नहीं , जितना उसे जीना । ये पता नहीं लग पाया कि इस ब्लॉग को लिखने वाले का नाम क्या है …बेशक नाम में क्या रक्खा है फिर भी नाम के बिना गाड़ी नहीं चलती ।

  2. शारदा जी,
    धन्यवाद।

    शेष निधि सजाने या बचाने से तो विरक्ति का भाव चला जायेगा जिसका भरपूर दर्शन अटल जी की इस कविता में दिखायी दे रहा है। फिर कुछ कवितायें तो किन्ही क्षणों का सच होती हैं और उनमें कुछ हेर फेर करने या सुधार करने से कहीं कुछ दूर चला जाता है उन कविताओं से। फिर वे दूसरे ही भावों वाली कवितायें हो जाती हैं।

  3. बहुत अच्छी कविता लिखी है अटल जी ने

    जन्मदिन की शुभकामनायें

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