Archive for जून 1st, 2010

जून 1, 2010

हफीज मेरठी : शायर के खून और पसीने से टपके सात सुर

शानो शौकत के लिये तू परेशान है
और मेरी य’ तमन्ना कि तेरा किरदार बने


यह बाँकपन है हमारा कि जुल्म पर हमने
बजाय माला ओ फरियाद के शाइरी की है


पैगाम ये मिला है जनाबे हफीज को
अंजाम पहले सोच लें तब शाइरी करे


पैरहन की मैने जब तारीफ की कहने लगे
हम तुम्हे अच्छे लगे या पैरहन अच्छा लगा


बारी बारी जागना है खौफ से शबखून के
हम तभी सोयेंगे जब बेदार हो जायेंगे आप


हमारा ही जिगर है यह हमारा ही कलेजा है
हम अपने जिस्म रखते हैं नमकदानों से वाबस्ता


हिसारे जब्र में जिंदा बदन जलाये गये
किसी ने दम नहीं मारा मगर धुँआ बोला
कहा न था कि नवाजेंगे हम हफीज तुझे
उड़ा के वह मेरे दामन की धज्जियाँ बोला

जून 1, 2010

उदघोषणा !

माहौल को और ज्यादा सड़ते हुये नहीं देख सके वे लोग
और खड़े होकर उन्होने हुंकार भर ही दी
सच के तेज से भरे, कई चेहरे एक साथ चमक उठे
जोश से भरी आवाजों ने एक साथ कर दी उदघोषणा।

अब धर्म के नाम पर भी
हमारे रक्त में उबाल नहीं आता
हमारे सम्प्रदाय के किसी व्यक्ति का
जुनूनी कत्ल भी
अब हमें क्रोध से आग बबूला नहीं कर पाता
बस हमारी आँखें बंद हो जाती हैं प्रार्थना में
हे प्रभू!
क्यों ये रक्त पात?
सोचने समझने की शक्ति दे सबको।

बहुतेरे कह सकते हैं
चूँकि हमारा खून नहीं खौलता
सो वह खून नहीं पानी है
देश के काम न आने वाली
बेकार हमारी जवानी है।

पर हम अंधी दौड़ में शामिल नहीं हो सकते।
हम क्यों मानव की सहज उदारता छोड़ कर
अपने धर्म की प्राकृतिक सहिष्णुता को भुलाकर
वहशी बन जायें?
हम क्यों अपने विवेक पर ताला लगाकर
हिंसक जानवर बन जायें?

हम कायर नहीं हैं
और बने भी क्यों?
कायर, कापुरुष तो वे हैं जो
लड़वाते हैं निरीह जनता को।

हमें कचोटते हैं कुछ प्रश्न हर दंगे के बाद
क्या कुसूर था उन बेगुनाहों का
जो मारे गये?
चलो पहल किसी भी सम्प्रदाय ने की हो
या किसी ने भी बदला लिया हो
पर कोई बतायेगा उन बदनसीबों का गुनाह?
जो अपने परिवार से मिलने जा रहे होते हैं
जो अपने किसी प्रिय की बीमारी से द्रवित होकर
उसके लिये दवा लेने निकल पड़ते हैं
जो अपनी नौकरी से जुड़े कर्तव्य निभाने निकल पड़ते हैं।

यदि किन्ही लोगों की महत्वाकांक्षाओं और भटकावों की
लड़ाई में
हमेशा ऐसे निर्दोष लोगों की ही बलि चढ़नी है
तो इस घृणित खेल का हिस्सा
कम से कम हम तो नहीं।

…[राकेश]

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