गुलजार साब ने चेतन भगत को सीख दी

लेखक चेतन भगत को वर्तमान समय के उन भाग्यशाली सितारों में गिना जा सकता है जिन्हे कला के क्षेत्र में उनकी योग्यता से कहीं ज्यादा सफलता मिल जाती है। फिल्मी दुनिया में ऐसा हमेशा से होता रहा है परन्तु गाहे बेगाहे लेखन की दुनिया में भी ऐसा देखने को मिल जाता है। उनके लेखन पर फिल्मों का असर बहुत ज्यादा है और वे इसी विचारधारा के साथ लिखते भी दिखाई देते हैं कि उनके लिखे हुये पर फिल्म बनेगी। अपने लिखे में विजुअल्स के तत्व का मुलम्मा चढ़ाने में कोई बुराई नहीं है। पर वे ऐसा कतई नहीं लिखते या अब तक ऐसा कतई नहीं लिख पाये हैं जिससे कि उन्हे मिली केवल आर्थिक सफलता और प्रसिद्धि के आधार पर ही अच्छे लेखकों और कवियों की जमात में शामिल कर लिया जाये।

ऊँट कभी कभी पहाड़ के नीचे आ भी/ही जाता है और ऐसा ही चेतन के साथ हो गया। आजकल कुछ भी कहीं भी कभी भी बोलने का फैशन हो गया है और चेतन को तो शशि थरुर जैसे लेखकों की संगत में भी देखा जा सकता है सो उन्हे इस बात की गलतफहमी हो जाना स्वाभाविक है कि वे विद्वान भी उच्च कोटि के हैं और अब वे कुछ भी कहीं भी और कभी भी कह सकते हैं और दुनिया उन्हे मौन होकर सुनेगी।

चेतन की प्रसिद्धि के कारण उन्हे आजकल कई कार्यक्रमों में देखा जाने लगा है। इस बार गलती से वे गुलजार साब को छेड़ बैठे। एक कार्यक्रम में चेतन गुलजार साब के बारे में बोलते हुये  कह गये,” मुझे गुलजार साब द्वारा लिखा गया गाना कजरारे कजरारे बहुत पसंद है, क्या पोएट्री है उसमें“।

उन्होने तो यह ऐसा दिखाने के लिये किया होगा कि वे पोएट्री की समझ रखते हैं या आजकल जैसा कि लोग एक दूसरे की तारीफ करके सम्बंध मधुर बनाने के प्रयत्न में लगे रहते हैं और सोचते हैं कि ऐसा करके वे अपने लेखन आदि की स्वीकृति भी सबसे ले लेंगे, ऐसा ही कुछ उन्होने भी किया होगा। उन्होने सोचा होगा कि शशि थरुर आदि लेखकों को जीतने के बाद अब वे गुलजार साब के किले में भी प्रवेश कर सकते हैं। परन्तु उनका मिठास भरा प्रयास गुलजार साब को हत्थे से उखाड़ गया और नाराज होकर उन्होने माइक्रोफोन मांगा और उसी समय कहा,”चेतन मुझे खुशी है कि आपके जैसे लेखक को गाना पसंद आया पर मुझे नहीं लगता कि उसमें उपस्थित कवित्त भाव को आप समझ पाये हैं जैसा कि आप यहाँ सबके सामने दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं। पर अगर आप जोर देंगे तो मैं आपको उस गाने की दो पक्त्तियाँ सुनाता हूँ और आप मुझे उनका मतलब बता दें“।

तेरी बातों में किमाम की खुशबू है
तेरा आना भी गरमियों की लू है
“।

चेतन हक्के बक्के रह गये गुलजार साब की ऐसी स्पष्टवादिता का स्वाद चखकर। गुलजार साब ने आगे उनसे अनुरोध किया।
कृपया उसके बारे में बोलें जिसके बारे में आपको जानकारी है। जिस बात के बारे में आपको जानकारी नहीं है उसके बारे में बोलने का प्रयत्न न करें“।

आजकल हर बात मैनेजमेंट के अंतर्गत मानी जानी लगी है और ऐसा माना जाने लगा है कि सब चलता है और सब कुछ अपने प्रबंधन से मैनेज किया जा सकता है और कला का क्षेत्र भी इस बीमारी से अछूता नहीं रह पाया है।

आधी अधूरी जानकारी और कला के क्षेत्र में थोड़ी बहुत दखलअंदाजी के बलबूते लोग दुनिया इस आधार पर फ़तेह करने निकल पड़े हैं कि वे अपनी व्यवहारकुशलता और सामने वाले की तारीफ करके सब सम्भाल लेंगे।

ऐसा भी संभव है कि ज्यादातर लोग गुलजार साब को ही दोषी ठहरायें और कहें कि कि ऐसे चेतन भगत को टोका जाना गलत था पर उनका भड़क जाना एक सूक्ष्म किस्म के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक प्रयास है

कोई दो तीन साल पहले लेखक निर्देशक अनुराग कश्यप ने अपने एक ब्लॉग में गुलजार साब से जुड़ी एक रोचक घटना का जिक्र किया था।

सत्या बनाये जाते समय निर्देशक राम गोपाल वर्मा और उनकी टीम, जिसमें अनुराग कश्यप और सौरभ शुक्ला आदि भी शामिल थे, ने महसूस किया कि गुलजार साब द्वारा लिखे गये एक गाने के दो प्रकारों में से पहले वाला ज्यादा उपयुक्त्त लगता है।

गुलजार साब ने पहले लिखा था “ग़म के नीचे बम लगा के ग़म उड़ा दे” और बाद में उन्हे लगा कि “गोली मार भेजे में” ज्यादा अच्छा है।

तय किया गया कि अनुराग ही गुलज़ार साब को यह बताने की जहमत उठायेंगें कि “ग़म के नीचे बम” वाला गीत ज्यादा अच्छा है।

अपनी नादानी में जैसे ही अनुराग ने कहा कि ” सर गम काम नहीं करता “ गुलजार साब ने उन्हे टोक दिया,” बरखुरदार पहले ग़म को ढ़ंग से बोलना तो सीख लो“।

अनुराग लिखते हैं कि बस मैं तो विचार विमर्श से एकदम बाहर ही हो गया उसके बाद। वे आगे लिखते हैं,” शुक्र है भगवान का कि उन्होने गोली मार भेजे वाले संस्करण पर जोर दिया। क्या गाना बना था वो“।

आशा है अनुराग कश्यप की तरह चेतन भी इस घटना को इसके सही परिपेक्षय में लेंगे और इसे अपनी मानहानि का मुद्दा न बना कर इससे कुछ सीखने की कोशिश करेंगे।

डिस्क्लेमर : गुलजार साब और चेतन भगत वाले मामले को छ्पी रिपोर्टस के आधार पर कोट किया गया है।

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19 Responses to “गुलजार साब ने चेतन भगत को सीख दी”

  1. बहुत सलीके से एक एक बात को रखा गया है कि कहां और किस तरह से बातों की सिलवटें खुल जाती हैं।

    बहुत बढिया पोस्ट।

  2. हम्म!! यह समाचार पहली बार सुन रहे हैं..देखिये, इसे किस तरह से लेते हैं चेतन. अभी तो सफलता का भरपूर नशा है. स्वभाविक भी है.

  3. बहुत सही जी.. पर इस बार ऊँट पहाड़ के नहीं हिमालय के नीचे आ गया.. 🙂

  4. सतीश जी,
    धन्यवाद

  5. समीर जी,

    गलतियाँ तो हो ही गयीं कुछ और संयोजकों की तरह से भी हुयीं।
    समारोह शायद गुलजार साब की पद्य में रचनात्मक यात्रा के ऊपर केन्द्रित था और ऐसे में चेतन भगत को, जिनकी कोई साख कवि के रुप में नहीं है, बुलाना गलत था और अगर समारोह में उन्हे उनकी प्रसिद्धि के कारण बुला भी लिया गया था तो यूँ मंच पर से कुछ कहलवाना गलत था। चेतन का बिना सोचे समझे कहना तो गलत था ही।

  6. दीपक जी,
    धन्यवाद,
    हिमालय वाला मामला तो कष्ट भी दे सकता है। गुस्से से बर्फ पिघलने की आशंका है। देश वैसे ही ग्लोबल वार्मिंग के लिये पसंदीदा आराम स्थली हो चला है।

  7. धन्यवाद गौरव जी

  8. अच्छी, वाकई अच्छी पोस्ट है. एक गंभीर विषय पर समझदारी और संतुलन के साथ…

  9. चेतन भगत गलती तो कर ही गए…बस ‘पसंद है ‘ कह कर चुप रह जाते….”क्या पोएट्री है उसमें“।”…कहना मुसीबत में डाल गया,उन्हें ….गुलज़ार साहब अब उस मुकाम पर हैं ,जहाँ वे ऐसी छोटी मोटी फटकार लगा सकते हैं…चेतन भगत , इसे अपना इगो इशु ना बनाकर उनकी कही बात एक सीख की तरह गाँठ बाँध लें…तो उनका ही भला होगा…

  10. आज सुबह अख़बार में पढ़ा था…
    अब दोबारा पढ़कर वही मजा तारी हो गया…

    गुलज़ार जी के पास अपने फ़्रस्टेशन्स हैं…और चेतन के पास अपना बचकानापन….

  11. विवेक जी
    धन्यवाद

  12. रश्मि जी,
    मुकाम की बात नहीं है शायद पर एक कवि के स्वाभिमान की बात ज्यादा है। जो कार्यक्रम गुलजार साब की काव्य यात्रा को केन्द्रित बनाकर आयोजित किया गया हो वहाँ कोई एक नौसिखिये की तरह उनके फिल्मी गीतों की चर्चा छेड़ दे और वह भी कजरारे और बीड़ी जलाये ले जैसे गीत जो कि विशुद्ध रुप से फिल्म में निर्देशक द्वारा दी गयी सिचुएशन के अनुसार रचे गये हों तो कवि का ऐसे आदमी की नासमझी पर आपत्ति उठाना बिल्कुल वाजिब है। और ऐसा गुलजार साब ने पहली बार ही नहीं किया है। अगर चेतन भगत ने गुलजार साब को थोड़ा सा भी पढ़ा होता तो वह उनकी किसी गैर फिल्मी कविता का उल्लेख कर सकते थे।
    आजकल लोग सबसे अच्छे सम्बंध बनाते दीखने के लिये सब बातें चुपचाप रह जाते हैं। गुलजार साब ने एक गलत बात को मौके पर चिन्हित किया और ऐसे सूक्ष्म तरीके वाली सामाजिक बुराई को घेरने वाली चर्चा को जन्म दिया, इसके लिये उनकी सराहना की जानी चाहिये। वरना रियलिटी शो में शिरकत करते सितारे इसी सब को प्रोत्साहित करते नजर आते हैं।

  13. रवि जी,
    गुलजार साब फिल्मी दुनिया में अपनी शर्तों पर काम करते हुये यहाँ तक आये हैं। जो आग में तपा हो उसकी अपनी चमक होती है। जो बात किसी को पसंद नहीं है और जिसे वह उचित नहीं मानता उसका विरोध ऐसे मौके पर करने के लिये थोड़ा साहस, स्पष्ट्वादिता और ढेर सारा स्वाभिमान चाहिये। कुंठा क्या हरेक भाव एक कलाकार के साथ हमेशा चलते हैं पर वे रचनाओं के द्वारा ही बाहर आते हैं।

  14. sabka apna apna sochna hai
    chhma badan ko chahiye chotan ko utpat
    chetan ne shyad vo kaha jo unhe laga
    koi burayee to ki nahi
    Guljar sahab itne unche pahuch chuke hain ki chetan se koi unki tulna bhi nahi kar sakta.
    par bade logo ne kaha hai ki tarif sabke samne aur daant to akele me di jati hai
    khair media ko wahi mil gyaa jiski talash me vo rahte hain

  15. सुभाशीष जी,
    यह तो सच है कि सब अपने अपने ढ़ंग से ही सोचते हैं। परन्तु छोटे बड़े वाली तो बात नजर नहीं आती इसमें। न ही गुलजार साब ने चेतन को तमाचा मारा होगा न ही जूता लेकर दौड़ाया होगा।
    चेतन के बहाने उन्होने एक प्रवृति को टोक दिया। आज चेतन को गुलजार साब द्वारा टोका जाना बुरा लगेगा पर कुछ सालों बाद शायद उन्हे अपनी गलती का अहसास हो जाये, जब अहं आड़े नहीं आ रहा होगा। आज का टोका जाना उन्हे इस बात की और प्रेरित तो करेगा ही कि वे उसी की बात करें जिसे वे जानते हैं, समझते हैं। चेतन खुद लेखक हैं और वे भी इस स्थिति से गुजरेंगे जहाँ उन्हे भी ऐसे लोग मिलेंगे जो बिना उनका काम जाने उनके काम पर एक एक्स्पर्ट की भाँति टिप्पणी करने की कोशिश करेंगे। जरुरी नहीं है कि सिर्फ एक इम्प्रेशन देने के लिये कुछ भी बोल दिया जाये। हर जगह मार्केटिंग के लिये सिखाये गय गुर काम नहीं आते हैं। जीवन के कुछ क्षेत्रों को इन सब हथकंडों से दूर भी रखा जा सकता है। सुल्ताना डाकू से जुड़े मिथक पर जायें तो अगर उसकी माँ बचपन में ही छोटी मोटी चीजें चुराने पर रोक देती तो वह बड़ा होकर डाकू न बनता। इस केस के बहाने कुछ लोग तो सही संदेश ले ही लेंगे।

  16. गुलजारजी ने अच्छा किया,चेतन भगत को भी नसीहत हो गयी

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