Archive for मई 20th, 2010

मई 20, 2010

मातृत्व की विरासत

माँ,
क्या कभी भी बड़ी हो पाती है अपने बच्चों की बढ़ती उम्र के साथ?
क्यों उसके अन्दर आधुनिक जमाने की समझदारी नहीं आती?

बड़े होकर बच्चे अपनी अपनी राह पकड़ कर चल देते हैं
वे आगे चले जाते हैं अपनी जिन्दगी जीने
माँ को पीछे छोड़कर।

माँ जानती है इस बात को शुरु से
पर फिर भी वह क्यों नहीं अपनी जिन्दगी जीती?

वह तो खाना भी वही खाती है
जो उसके दूध के रास्ते बच्चे को नुकसान न पहुँचाये।

बड़े होते बच्चे इस बात को नहीं समझ पाते कि
माँ ने कितनी ही रातों की नींद त्याग दी थी
उन्हे शांति से सुलाने के लिये।

वे नहीं जान पाते इस बात को कि
माँ बिस्तर के उस हिस्से पर लेटी रहीं
जो उन्होने गिला किया था
और उन्हे सूखे में आराम से सुला दिया गया था।

जब भी प्रश्न बच्चों का आता है,
मेरा, अपना, सिर्फ मेरे लिये जैसे शब्दों से
हरदम घिरी रहने वाली दुनिया में
माँ ही क्यों इन शब्दों को महत्व नहीं देती?

इस रहस्य को लोग तब समझ पाते हैं
जब उनके अपने बच्चे हो जाते हैं
तब वे समझ पाते हैं कि
किसी माँ के लिये अपने
बच्चों के जीवन को ऊपजाऊ बनाने के लिये
खुद को खाद बनाने का मतलब क्या होता है?

…[राकेश]

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मई 20, 2010

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

मैं बाहर हूँ, कॉल करके आता हूँ तुम तब तक अपनी खरीदारी पूरी कर लो“। पत्नी से इतना कहकर नेता जी दुकान से बाहर मॉल के गलियारे में आ गये।

नेता जी राजनीति में धर्म के गरमागरम मिश्रण के घालमेल के समय की उपज थे और पिछ्ले दस बरह सालों में उन्होने अपनी राजनीतिक दुकानदारी अच्छी चमका ली थी। विधर्मियों पर हमला करने का कोई भी मौका वे नहीं चूकते थे, इस बात से तो उन्हे खास मतलब था ही नहीं कि उनकी राजनीति देश का भला कर रही है या बुरा, उन्हे तो अपना राजनैतिक वजूद कायम रखना था और अपनी राजनैतिक हैसियत बढ़ानी थी। वे दिल से भी भिन्न धर्मावलम्बियों से नफरत करते थे। दूसरे धर्म के सामान्य लोग उनका नाम सुनकर ही अन्दर ही अन्दर डरने लगते थे और उनके अन्दर नेताजी के प्रति नफरत पैदा होने लगती थी।

झक सफेद कपड़े पहने नेता जी मॉल में अपने सेल फोन पर किसी से बतियाने में व्यस्त थे। उनके चेहरे की खुशी बता रही थी कि दूसरी तरफ वाला उन्हे कुछ अच्छी खबर सुना रहा था। वे चलते चलते एस्केलेटर के पास आ गये और रेलिंग पर कोहनी टिका कर खड़े हो गये।

बहुत बढ़िया बात है। बाजा बजा दो अबकी बार इन ससुरों का। चलो इंतजाम में लगे रहो, कुछ भी दिक्कत हो मुझे तुरन्त सूचित करो। लगातार सम्पर्क बनाये रखना “, कहकर नेता जी ने फोन बंद करके जेब में रख लिया। अब वे अपनी दोनो कोहनियों को रेलिंग पर टिका कर नीचे देखने लगे।

सहसा उनकी दृष्टि एस्केलेटर पर पाँव रखते हुये एक छोटे से बालक पर पड़ी। बालक बेहद खूबसूरत था। बालक लड़खड़ा तो गया परन्तु किसी तरह एस्केलेटर पर चढ़ ही गया। बालक अपने आप में ही खुश था और एस्केलेटर पर चढ़ जाने की सफलता ने उसके चेहरे पर खुशी की मात्रा कई गुना बढ़ा दी थी।

उसकी निगाहें नेता जी से मिलीं और वह हँस पड़ा।

नेता जी को बच्चे पर बेहद प्यार आया। बच्चा ऊपर तक पहुँच गया था। सीढ़ी से फर्श पर पाँव रखते समय उसका संतुलन बिगड़ गया पर इससे पहले कि वह गिरता नेता जी ने उसे अपने हाथों में उठा लिया।
वे उसके गालों को चूमने से अपने को रोक नहीं पाये। पर जैसे ही वे ऐसा करके हटे उन्हे एक महिला एस्केलेटर से ऊपर आती दिखायी दी। वह बच्चे को पुकार रही थी। बच्चे ने उस महिला की तरफ हाथ बढ़ा दिये।

नेता जी और महिला ने एक दूसरे की ओर देखा।

नेता जी असहज हो गये थे यह देखकर कि महिला दूसरे धर्म की थी और अभी अभी अपने साथी से वे इसी धर्म के खिलाफ जनसभा करने की बात करके हटे थे।

महिला यह देखकर हैरान थी कि जो नेता दिन रात उसके धर्म को और उसे मानने वालों को कोसता रहता है, उसके बच्चे को अपनी गोद में लिये खड़ा है। वह खुद इन नेता जी से नफरत करती थी।

शायद अविश्वस्नीय लगे पर जब ये दो भिन्न मजहबों में पैदा हुये व्यक्ति असमंजस में फँसे हुये खड़े थे तभी एस्केलेटर से नीचे उतरते कुछ युवाओं में से किसी एक के सेल फोन पर बज उठी रिंग टोन लता मंगेशकर की आवाज में आस पास खड़े लोगों को सुना रही थी …”मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

घटनाऐं तो बस घट जाती हैं। और वे लोगों को प्रभावित भी करती हैं यह और बात है कि कई बार परिवर्तन थोड़ा धीरे धीरे होता है।

क्या उस घटना का नेता जी और उस महिला पर कोई असर हुआ?

असर अच्छा ही पड़ा होगा वरना कैसे यह बात बाहर आती और कहानी बनती?

…[राकेश]

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