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मई 16, 2010

जीवन बस यहीँ अभी

मन ही मन दुखी तो वह पहले से ही रहता था पर जब से उसने सस्ते दामों पर मिल जाने वाली ज्योतिष की एक किताब में पढ़ लिया था कि उस जैसे जातक अपने किये कामों और भूलों के कारण पछताते रहते हैं तब से तो उसने दुख को ही अपने जीवन का ऐसा भाव मान लिया था जो उसके साथ ताउम्र रहने वाला था।

हरदम उसे यही लगता था कि उसने जिन्दगी में हर काम या तो गलत किया है या गलत तरीके से किया है। आशा की इतनी किरण उसके अंदर जरुर थी कि आधे समय वह इस ख्याल से भी भरा रहता था कि यदि उसे मौका मिल जाये तो वह अपनी जिन्दगी में पीछे जाकर इस इस कदम को सुधार ले और अपनी जिन्दगी को खुशहाल बना ले।

उसे लगता था कि यदि उसने वैसा न करके ऐसा किया होता या ऐसा न करके वैसा किया होता तो वह भी आज बहुत सफल और खुशहाल व्यक्तियों की जमात में शामिल होता।

जीवन ऐसे ही निराशाभाव से घिरे घिरे रह कर कट रहा था पर एक दिन चमत्कार हो गया। सोकर उठने पर उसने अपने आप को एक अंजान जगह पर पाया। उसके सामने एक मशीन रखी थी। जैसे ही वह उठ कर मशीन के पास गया, उसे सुनायी दिया।

वत्स यह टाइम मशीन है इसकी सहायता से तुम भूत और भविष्य दोनों में जा सकते हो।

अंधा क्या चाहे दो आँखे। उसे तो अपने कानों पर विश्वास नहीं हो पा रहा था। जिस बात को वह कबसे करना चाहता था उसे करने की सुविधा खुद उसके पास चल कर आयी थी।

उसने भूतकाल वाला बटन दबाया तो स्क्रीन पर लिखा आया, “तुम चाहो तो भूतकाल में जाकर अपने जीवन में उठाये उन कदमों को मनमाफिक सुधार सकते हो जिन्हे तुम आज गलत कदम समझते हो

रोमांच से काँपता हुआ वह आँखे बंद करके मशीन के पास बैठ गया। उसके अब तक जीवन में बीते क्षणों और बीती घटनाओं की यादें उसके सामने से गुजरने लगीं।

कुछ देर बाद उसने आँखे खोलीं पर जाने उसे क्या हुआ उसके हाथ मशीन को छूने के लिये उठे ही नहीं। पहली बार उसे अहसास हुआ कि उसने जैसी भी जी एक घटनाप्रधान जिन्दगी जी जो कि औरों से अलग थी। अगर वह पीछे जाकर कुछ कदम बदल देता है तो वह यही आदमी नहीं होगा जो कि वह अब है। तब वह कोई दूसरा ही आदमी होगा। अगर उसमें इतनी ही खराबियाँ होतीं तो प्रकृति उसे अब तक जिन्दा ही क्यों रखती?

भूत का बोझ हटते ही वह चंचल हो उठा और उसने सोचा कि क्यों न भविष्य में जाकर देखा जाये। पर भविष्य में प्रक्षेपित होने से पहले उसने मशीन पर भविष्य का समय देखने की सुविधा में सौ साल बाद का समय देखने का विकल्प दबा दिया।

स्क्रीन पर दिखते माहौल में उसे सब कुछ अलग सा लगा। लोग और किस्म के लगे। सौ साल बाद जीने वाले लोगों के बीच उसने अपने को चुके हुये जमाने का आदमी पाया। आज का कोई भी परिचित, मित्र, रिश्तेदार या घर के लोगों में से कोई भी उसके साथ नहीं होगा ऐसा खयाल आते ही उसे लगा कि वह निपट अकेला पड़ जायेगा नये जमाने में।

पहली बार उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि उसका अपने समय के संसार से एक विशिष्ट सम्बंध है और वह अपने युग का प्रतिनिधि है। उसे केवल अभी इसी समय धरा पर जीवित होना था। न पहले न बाद में।

उसने खुशी खुशी टाइम मशीन को त्याग दिया।

वह निद्रा से जागा। अंदर और बाहर दोनों तरफ एक जाग्रति आ गयी। जीवन के प्रति उसकी धारणा ही बदल गयी।

पहली बार उसे “भूतो न भविष्यति” का अर्थ समझ में आया।

पहली बार उसने अपने आप को स्वीकार किया।

पहली बार उसने अपने अंदर आनन्द की झलक देखी।

…[राकेश]

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मई 16, 2010

“मैं” है तो प्रेम कहाँ

अपने “मैं” को

खोकर जिसे पाते

वह सौगात प्रेम की !

…[राकेश]

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