Archive for मई 4th, 2010

मई 4, 2010

शर्म और प्रेम

साँस उखड़ती जाती है
पलकें झुकती जाती हैं
गाल सुर्ख़ हुए जाते हैं
ऊँगलियाँ खेलती जाती हैं
बालों की घुंघराली लटों से
पैर क़ुरेदते जाते हैं जमीन को

पर लबों की हिमाकत तो देखिए
कहे चले जाते हैं अभी भी
हमें उनकी परवाह नहीं!

…[राकेश]

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