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मई 3, 2010

नेह भरा काजल

बचपन,
कभी लगता है कि बस अभी ही तो बीता था,
और आज भी इतना पास है कि हाथ बढ़ाया और छू लिया,
और कभी लगता है कि किसी और ही जन्म में
बचपन भी जीवन में आया था।

पर जब जब बचपन
इसी जन्म की बात लगता है,
तब यह आकर बिल्कुल पास में बैठा रहता है,
आज फिर से यह सखा बन कर तन-मन को स्पर्श करे बैठा है|

कौंच कौंच कर याद दिला रहा है,

माँ अक्सर उस दिए से कालिख लेकर,
जो वह पूजा के लिए देसी घी से जलाया करती थी,
मेरी आँखों में काजल लगाया करती थी,
कहा करती थी,
काजल लगाने से
आखें बड़ी होंगी,
नजर कमजोर नहीं होगी,
और
जमाने की बुरी निगाहों से बचायेगा काला काजल|

इतने बरस बीत गए,
बचपन पीछे छूट गया,
पहले अपने घर से दूर आना पड़ा,
फ़िर अपने शहर से दूर आना पड़ा,
शिक्षा लेने की जरुरत जो न करवा दे,
फ़िर एक दिन अपने देश से भी दूर आना पड़ गया|

माँ आज बहुत याद आ रही है,
आज माँ का काजल लगाना भी याद आ रहा है,
आज बचपन बहुत याद आ रहा है,
साथ याद आ रही है एक एक बात,
जो बीते ज़माने की है,
पर लगती बिल्कुल अभी की हैं|

एक स्नेह भरे काजल की याद,
जाने कहाँ कहाँ ले जाती है,
एक ममता भरा स्पर्श,
जो यूँ तो हमेशा साथ रहता है,
पर केवल एक अहसास की तरह,
और उसके भौतिक साथ की
जरुरत अक्सर महसूस होती है,
आज इतने बरसों बाद
आसुओं ने बहा दिया जिसे,
जाने वह माँ का लगाया काजल था
या उसके स्नेह भरे सुरक्षा कवच का अहसास|

…[राकेश]

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