Archive for अप्रैल, 2010

अप्रैल 22, 2010

बिना करे पाने का लोभ

अलादीन का चिराग मिल जाये तो,

शायद पूरी हो सकें सब प्रकार की भौतिक इच्छाएं!

पर तलाश क्यों जिन्न वाले चिराग की?

वह शायद पूरी कर सकता है एक -एक इच्छा,

पर क्या तब उस संतुष्टि का एहसास भी होगा

जो अपनी मेहनत से किये कार्य की

सफलता से प्राप्त होता है ?

…[राकेश]

अप्रैल 22, 2010

उलझन

अपने ही बुने जालों में फंसा मन

जाने कब शांति को कहाँ दूर छोड़ आया?

कुछ और पाने की चाह में

मिले को भी गंवाता जाता

पर ये कुछ और परिभाषित क्यों नहीं हो पाता?

कहाँ जाकर रुकेगी

अनजान राहों पर चलने की मन की फिसलन?

…[राकेश]

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