आज के अभिमन्यु

भाग्यशाली लगता है,
आज अर्जुन पुत्र अभिमन्यु,
जिसने चक्रव्यूह भेदने की कला
माता के गर्भ में रहते हुए ही सीख ली थी|

नहीं जानता था वह चक्रव्यूह से बाहर निकलना,
पर तोड़ दुश्मन का घेरा,
घुस तो गया था अन्दर,
वह कपटियों के बिछाए जाल को तहस नहस करने को,
मरा जरुर वह,
परन्तु अपना शौर्य दिखाकर,
दुनिया को अपनी वीरता और क्षमता का प्रदर्शन दिखाकर|

आज का युवा तो
भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार, सिफारिश, परोक्ष अपरोक्ष आरक्षण,
निरंतर कम होते रोजगार के अवसरों
से बने चक्रव्यूह में घुस भी नहीं पाता
उसे तोड़ना तो बहुत दूर की कौड़ी है|

इन युवाओं की फौज पर इतराने वाले देश को
आँखें खोलनी होंगीं
वरना
कुंठित होकर कब युवा
अपनी सारी योग्याताओं की समाधि बना डालेगा
पता नहीं चलेगा|

फिर इन समाधियों पर विराजमान
इन चूक चुके थके हुए युवाओं से किसी
निर्माण की आशा करना स्वप्निल ही होगा,
भ्रांतियों में जीते इन तथाकथित युवाओं से
किसी क्रांति की अपेक्षा करना
इनका मजाक उड़ाने जैसा होगा|

क्योंकि इनकी शांति भी तब
मरघट की शांति होगी
वह शांति
रक्तहीन हो चुके शरीरों की अकर्मण्यता की छाप से भरी होगी|
देश, समाज की जिम्मेदारियों को संभालने की बात कहना
तब इन्हें व्यर्थ में परेशान करने जैसा होगा|

तब ऐसे में अपने ही कन्धों पर अपना शव ढ़ोते
इन बेचारों के सामने
सिर्फ धरा पर अपना अभिनय पूरा करने का
सीमित अवसर ही हाथ में होगा|

अभी तो मौका है, समय है
जब आज के अभिमन्यु सरीखे युवाओं को अर्जुन
बनाने का प्रयास किया जा सकता है!

…[राकेश]

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2 टिप्पणियाँ to “आज के अभिमन्यु”

  1. अभी तो मौका है, समय है
    जब आज के अभिमन्यु सरीखे युवाओं को अर्जुन
    बनाने का प्रयास किया जा सकता है!

    -सही कहा!

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