क्षितिज की ओर

उदासीनता के गहनतम क्षणों
से उबरकर
मन ने पाला है आज
कुछ रचनात्मक करने के विचार को|

क्योंकि उदासी की,
निराशा की अपनी सीमाएं हैं|

जबकि सृजन की,
आशा की सीमाएं असीम हैं|

वे तो क्षितिज की भाँति हैं
जो दूर से मिलते तो प्रतीत होते हैं
पर कभी मिलते नहीं,
कभी मिलेंगे नहीं|

…[राकेश]

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2 टिप्पणियाँ to “क्षितिज की ओर”

  1. बहुत ही सुन्दर भावाव्यक्ति।

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