Posts tagged ‘Ujala’

सितम्बर 26, 2011

शोषितों कल का उजाला तुम्हारा

ज़ुल्म की काली घटाओं के पीछे
बंधक है
न्याय-समता-समानता का सूरज।

अश्रु पीने को मजबूर हैं
प्यासे किसान,
मेहनतकश मजदूर हैं भूखे।

रौशनी जागीर बनी
खेतों की लाशों पर उग आये
महलों की।

भूख से मौत,
क़र्ज़दार किसानो की खुद्कुशी
विरासत है फैले दामनों की।

मुफलिसी के पावों में
ज़ुल्मत की ज़ंजीर हैं
अंधेरा गरीब की तकदीर है।

ऐसे क्रंदनमय माहौल में
घोर तम के पीछे से
यहाँ वहाँ कुछ रोशन किरणे,
झिलमिला उठी हैं
झोपडों के टूटे छप्परों पर।

इन्ही नन्हे प्रकाश पुंजों में
कोई सूरज बनकर जागेगा
पस्त-त्रस्त-शोषित लोगों
कल उजाला तुम्हारा होगा।

(रफत आलम)

सितम्बर 25, 2011

शाह या फकीर, मरना दोनों को है

गुलेल की जिद है देखे, कहाँ तक पत्थर जाता है
उसे कौन समझाए घरों का शीशा बिखर जाता है

शाम ढले जब पंछी भी नीड़ों को लौटने लगते हैं
एक शख्स घर से निकल के जाने किधर जाता है

मेरी प्यास किसी निगाहें करम की मोहताज नहीं
इस फकीर का प्याला तो खुद से भी भर जाता है

यही मजबूरी तो है जिंदगी की सबसे बड़ी मजबूरी
शाह हो के फकीर आखिर में आदमी मर जाता है

उजाले के तलाशी पाँव के इन छालों से डर कैसा
दीपक से सूरज तक लपटों का रहगुज़र जाता है

ताज बने कि मशीने चले जीवन भूखों के रोते हैं
हाथ नहीं जाते आलम, इस दौर में हुनर जाता है

(रफत आलम)

सितम्बर 19, 2011

तुम बताओ साँस थम न जायेगी

काली रात के काले अंधेरे में
तुम्हारे रुप का उजला उजाला
जब भी मेरे सामने होगा कभी
तुम बताओ नींद कैसे आयेगी!

मृगनयनी तुम्हारी आँख का दर्पण
कोटरों में कैद करके यदि तुम्हे
केवल तुम्हारी प्यास दिखलाये
तुम बताओ प्यास बढ़ न जायेगी!

सोई धूप के नीले समंदर में
धुली कविता-सा तुम्हारा विम्ब तैरे
और लहरों पर मचल जाये अगर
तुम बताओ लहर क्यों न गायेगी?

मेरे हृदय के हर खुले आकाश पर
सोना तुम्हारे रंग का सौदामिनी
पिघलकर शर्म से कभी पागल बने
तुम बताओ साँस थम न जायेगी!

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 7, 2011

हिंदू, मुस्लिम सिख, ईसाई – आदमी कहाँ है भाई?

हिंदू . मुस्लिम, सिख, क्रिस्तान खूब थे
बस आदमी ही नहीं मिला इंसानों में

रौशनी देने के लिए शर्त है अँधेरे की
खूने-दिल जलाया जाए उजालदानों में

नेकियां हो जाती हैं गुनाह में शामिल
दिखावे का पुट हो अगर अहसानों में

वक्त की ठोकर की नाप ऐसी है यार
अच्छे अच्छे दिमाग आ गए पैमानों में

अपने अपने ज़र्फ की बात है ए दोस्त
कौन छलक गया कौन रहा पैमानों में

साहिल ने देखा उन बेडों को होते पार
लंगर जिन्होंने डाल दिए थे तूफानों में

निगाहें करम ओ मालिक निगाहें करम
ये जहान भी तो है तेरे ही जहानों में

जो सलूक किया तूने अच्छा ही किया
क्या कहें दुनिया के हम हैं मेहमानों में

फूलों को मुरझाना हुआ देख आये थे
दिल लगने लगा है अपना वीरानों में

पंख पिंजरे में हैं पर हौसला तो देखो
असीर का दिल है  अब भी उड़ानों में

सकून दिल कहाँ से लाओगे ए आलम
सकूने दिल मिलता नहीं है दुकानों में

असीर -कैदी

(रफत आलम)

 

अगस्त 9, 2011

बेटी है गर्भ में, गिरायें क्या?

अँधेरे का जश्न मनाएँ क्या
उजालों में मिल जाएँ क्या

अनगिनत पेड़ कट रहे हैं
कहीं एक पौधा लगाएं क्या

आज बेचना है ज़मीर हमें
तो खादी खरीद लाएं क्या

बामुश्किल है पीने को पानी
धोएँ तो बताओ नहाएं क्या

बहु के गर्भ में बेटी है आई
पेट पर छुरी चलवायें क्या

बेबस हैं बिकती मजबूरियाँ
भूखे बदन ज़हर खाएं क्या

अंधा है क़ानून परख लिया
कोई तिजोरी लूट लाएं क्या

रोने को रो लिए बहुत हम
पल दो पल मुस्कराएं क्या

यारों ने दिल की लगी दी है
यारों से दिल लगाएं क्या

सायों का क़द नापेगा कौन
हम भी घट-बढ़ जाएँ क्या

चुप की बात समझ आलम
और हम हाल सुनाएँ क्या

(रफत आलम)

अप्रैल 29, 2011

खौफ है बरपा

राह बेताब मुसाफिर है तैयार भी
खत्म हुआ अब हर इन्तेज़ार भी

पत्थर बन गए सारे सरोकार भी
गूंगी बहरी अंधी हुई सरकार भी

मंत्री गुंडा ही नहीं है चाटूकार भी
प्रजा त्रस्त बहरा हुआ दरबार भी

बिकने वाला ही यहाँ खरीदार भी
अजब है दुनिया का कारोबार भी

गरमी में खाली मटकी प्यासी है
और जान लेवा भूख की मार भी

शेख साहब आप की करतूतों से
शर्मिंदा है मुझ सा गुनहगार भी

मंदिरों मस्जिदों के झगडे यानी
नफ़े का है बन्दों ये कारोबार भी

अज़ान आरती की पाक सदा में
सुन सको तो सुन लो चीत्कार भी

पीने गए थे बंदगी की मय लोग
साथ लाये खुदाई का खुमार भी

अक्ल का कहा तो सदा माना है
कभी सुनना दिल की पुकार भी

हमें मालूम है फैसला क्या होगा
वही कातिल है जो के पैरोकार भी

कटने के खौफ से चुप हैं ज़बाने
और तेज है खंजरों की धार भी

ईमान की चिता जली थी आलम
उजाला ले आया सियाहकार भी

(रफत आलम)

फ़रवरी 11, 2011

साज़ जिंदगी का

 

अंतहीन आसमान
हाथ कब आता है
अंधेरे की कोख से
किन्तु
उजाला उगाता है

बड़ा है समुद्र
बहुत खारा है
तूफ़ान उठता है
किश्तियाँ भी चलाता है

ज़रा सी बूँद है मोती
आंसू का कतरा भी
छोटा सा हीरा कीमती
विषैला भी

छोटे-बड़े का पैमाना
अक्ल का फेर
गलत-सही का ज़िक्र बेमानी
पुण्य क्या पाप क्या
बस फितरत-ए-इंसानी

वक्त एक किस्सा
दुनिया एक कहानी
दिन रात के चक्कर में
जिंदगी है
सांसों की धुन पर बजता
एक अबूझा साज़

(रफत आलम)

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