Posts tagged ‘Sooraj’

अगस्त 14, 2011

एक पूरा दिन

उगते सूरज की सुबह
और डूबते सूरज की शाम के बीच
एक पूरा दिन है।

समस्यायों की फेहरिश्त के साथ
लड़ाई शुरु होती है
एक के अंत पर
दूसरी रोती है।

यह दोपहर से पहले का हाल है
उपलब्धियों के बीच
आदमी, कंगाल है।

मरीचिका की मार से
टूटता ज़िस्म लिये एक दौड़ जारी है
कुछ थोड़ा और
पाने की ललक भरी लाचारी है।

फटी-फटी आँखों पर
धूल अटी रुमाल है
सुबह की लाली में होश था
शाम की लाली निढ़ाल है।

और
दोनों के बीच
एक पूरा दिन है।

{कृष्ण बिहारी}

अगस्त 12, 2011

श्वेत-श्याम के द्वंद

सफ़ेद और काले रँगों में
ज़न्मों ही से बैर है।

इन्द्रधनुष के घटक अवयवों में
सफ़ेद ही की उलट फेर है
कायनात में जो दिख रहा है,
देखा जा रहा श्वेत की बदौलत है।

फूल-बसंत-धूप-तितली
गुलाबी होंठ-कुंदन से बदन,
असीम शांति-पवित्रता-पाकीजगी
हसीन मंज़र–दिलकश नज़ारे
या फिर हों रोती रुतें
सूखे उड़ते पत्ते–पिंजरों के बेबस पंछी
अंतिम सच की यात्रा के लिए कफ़न
आँखों की तमाम जिंदा रौशनी
सब सफ़ेद की ही दौलत हैं।

जबकि काला रँग
सोच, समझ और बुद्धि को
अन्धकार के फेर में डाल देता है
समस्त तामसिक क्रियाएं जन्माता है
मैले ह्रदयों, कलुषित मस्तिष्कों का चहेता
सदा से दुश्मन है मानवता का।

काले रँग ने सदा फैलाई है
मानवबुद्धि पर जहालत की सियाही
जिसमें डूबती है मानवता सारी
युद्ध-रक्तपात-बलवे-गारतगर्दी
आदमी की आदमी पर बरतरी
मुल्कों, कौमों और नस्लों को
गुलामी की जंजीरों में जकड़े देखा है,
लालच की काली चुडैल की कोख से
घूस–घोटालों और बदनीयती को जन्मते देखा है।

चिरकाल से युद्ध जारी है
भलाई और बुराई के बीच
जिसके प्रतीक ये रँग है काले-उजले
गवाह है समय पुस्तक के फड़फड़ाते पन्ने।

रौशन विचारों से इन्कलाब जागता है
दबे–कुचले-पीड़ितों के लश्कर जब उठ खड़े होते हैं
दुम दबा कर अज्ञान का अन्धकार भागता है
तम कितना ही डरावना हो!
ज़ुल्म ओ सितम काली की रात के बाद
उगता है,
उजला सूरज सुहावना हो!

(रफत आलम)

जुलाई 5, 2011

अहसास जो तुम्हे जीवंत रखता है

जीवन के
सर्द कठिन दिनों में
आसमान में
एक बादल का टुकड़ा
मन व्याकुल कर देता है
सूरज की गर्मी से
वंचित होने के अहसास से
तपती दोपहरी में
तपते हाँफते वदन को
यही वह बादल का टुकड़ा
मन
अलाह्दित ,हर्षित कर देता है
वर्षा की बौछार की
राहत देने वाली
आशा से
फिर वर्षा ऋतु में
यही बादल का टुकड़ा
भयभीत….
आतंकित कर देता है
जोर की वर्षा से
होने वाली
तबाही से
और यही बादल का टुकड़ा
हेमंत में फिर
शरद आने का
आभास दिलाकर
फिर व्याकुल कर देता है
सतरंगी खिली धूप के साथ
सुगन्धित खिलते फूलों की
मुस्कान से मदमाती खुशी
लेकर आते
बसंत की
आहट तक
बादल का यह टुकड़ा मन है
और
आत्मा सूरज है
सूरज के इर्द-गिर्द घूमते
बादल के टुकड़े
और
आत्मा के इर्द-गिर्द घूमते
मन का अहसास
एक जैसा ही है
जैसे बादल का टुकड़ा
अल्प काल के लिए
सूरज को छिपा तो सकता है
लेकिन उसके होने के
अहसास को
मिटा नहीं सकता
ठीक जिस तरह मन
अल्प काल के लिए
आत्मा को भ्रमित
तो कर सकता है
लेकिन उसके होने का
अहसास नहीं मिटा सकता
मौसम
ऋतु परिवर्तन
स्वाभाविक है
नियति है
इसीलिए तो
परिवर्तित होता है मन
व्याकुलता और हर्षता में
लेकिन हर स्थिति
परिवर्तन में
यही एक अहसास
तुम्हे जीवंत रखता है
और सुख देता है कि
बादल से मन के
टुकड़े के पीछे
सूरज सी आत्मा की रोशनी
सदैव महसूसती
और
अहसासती है!

(अश्विनी रमेश)

अप्रैल 29, 2011

निर्माण फिर से

जीवन के आधार तत्व
खुद आकारहीन हैं
उस निराकार की तरह
जिसने इनसे गढे हैं
साँसों की अबूझ पहली फूँक कर
कमज़ोर और ताकतवर पुतले!

दुनिया के घर में ये किरायदार
खुद को मालिक समझ बेठे हैं.
सूर्योदय के पहले दिन ही
ताकतवर की भूख ने
कमज़ोर का किस्सा छीन लिया था
जारी है ये अंतहीन सिलसिला
प्रलय दिवस तक के लिए!

इंसानी अहम की क्या कहिये
खुदाई का दावा करने वालों ने
बहुत थूका है
आकाश की ओर मुँह करके!

खुदी में चूर आँखों ने कब देखा
वक्त के क़दमों में पड़ी हैं
अनगिनत पगडियां
कर्मों से विकृत लाखों चेहरे
जिनका कोई निशान नहीं बाकी
वे सब स्वघोषित खुदा थे।

पैगम्बर –अवतार आये
संत–सूफियों ने कोशिश की
बेठिकाना इन पांच तत्वों को
मंजिल का पता मिले
फरिश्ता ना सही
आदमी, आदमी तो बन जाए!
पाप की बस्ती के वासी
अस्तित्व से ही गुनहगार बंदे
रास्ता भला पाते कैसे?
मिथ्या तर्कों के सहारे
सूली पर चढा दिया गया
हर शाश्वत सच।

कब बाज़ आया है
आदमजाद अपनी हरकतों से
वही अन्यायी ताकतों का राज है
वही ऊँच-नीच में बंटा समाज है
वही रंग-भेद के बेमानी झगडे
वही जहनी गुलामी का रिवाज है
वही चापलूस वही मसखरे वही बहरूपिये
वही वक्त के खुदाओं का शैतानी अंदाज़ है
वही मुफलिसी और अमीरी
वही असमानता का मर्ज़े लाइलाज है।

ओ! तत्वों के किमियागर
खा गया माटी का गंदमैला रँग मुझे
एक बार दुबारा निकाल
उस सांचे से
जिसमें ढ़लकर सजता है
चाँद-तारों से सजी रात का रूप
आकाश की नीली चादर पर
उजला सूरज उगता है।

(रफत आलम)

अप्रैल 27, 2011

पत्थर नहीं हीरा बन

जिंदगी की ठोकरों से
घबरा कर
पत्थर न बन यार!

तेरे भीतर छिपा है हीरा
तलाश उसे
तराश उसे।

माना बहुत लंबा है
सडक पर लुढ़कते फिरने से
मुकुट की शोभा बनने तक का सफर।

बुद्धि और बदन को कठोर कर
हाथ की लकीरों को रोने वाले
उठा हाथ में
कलम हो के कुदाल
पसीने की नदी में बहकर ही
सफलता के सागर की मिलती है थाह।

याद रखना
बिना तपे
सोना निखरता कब है
भीतरी आग अगर नहीं होती
सूरज रात बना रहता।

कटने-छटने-सँवरने की पीड़ा में ही
छिपा है
पत्थर से हीरा बनने का राज़
जिसकी  कुंजी
तेरी पहुँच से दूर नहीं!

(रफत आलम)

अप्रैल 9, 2011

वक्त की धुंध

महफिलों के चिराग कभी हम भी थे
खुशबुओं के बाग़ कभी हम भी थे
वक्त की बात राह की धूल भी नहीं
मंजिलों के सुराग कभी हम भी थे

चिराग थे महफ़िलें थीं दोस्त हज़ार थे
खवाब थे बेखुदी थी जाम थे खुमार थे
अपने ही घर में अजनबी हैं हम के जो
कभी शहर में रौनक के अलमबरदार थे

(अलमबरदार=ध्वज वाहक)

सूरज साथ चला करता था अपने साथ
चाँद लिपट के नींद लेता था अपने साथ
अब अँधेरे भी हमसे बच कर चलते हैं
कभी उजाला ही उजाला था अपने साथ

वक्त की धुंध में खो गयी सब पहचानें
तस्वीरों की कैद में कुछ यादें मौन हैं
मुखौटों का सफर खत्म को है शायद
हमें भी पता नहीं अब के हम कौन हैं

(रफत आलम)

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