गुज़री रात
गहरी नींद में
सोया देख कर
सवेरे
बिस्तर बोला-
उसको भूल गए क्या?
कोई कैसे बताये
कमीज़ के एक टूटे बटन ने
कितने अफ़साने
याद दिलाए हैं,
इस वक्त भी
धुंधला गयी आँखें
सुंई में डोरा पिरोती
देख रही हैं
वही
मेहँदी रची उंगलियां
(रफत आलम)
Life creates Art and Art reciprocates by refining the Life
काली रात के काले अंधेरे में
तुम्हारे रुप का उजला उजाला
जब भी मेरे सामने होगा कभी
तुम बताओ नींद कैसे आयेगी!
मृगनयनी तुम्हारी आँख का दर्पण
कोटरों में कैद करके यदि तुम्हे
केवल तुम्हारी प्यास दिखलाये
तुम बताओ प्यास बढ़ न जायेगी!
सोई धूप के नीले समंदर में
धुली कविता-सा तुम्हारा विम्ब तैरे
और लहरों पर मचल जाये अगर
तुम बताओ लहर क्यों न गायेगी?
मेरे हृदय के हर खुले आकाश पर
सोना तुम्हारे रंग का सौदामिनी
पिघलकर शर्म से कभी पागल बने
तुम बताओ साँस थम न जायेगी!
{कृष्ण बिहारी}
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही
लाख गलत तुम कहो मुझे पर तुम्हे गलत वो मानेगी ही
ऐसा कोई दिन जीवन में
अब तक तो मेरे ना आया
संग मेरे तस्वीर तुम्हारी
नहीं रही हो बनकर छाया
मैं हर पल बैचेन रहा जब रुह खाक तो छानेगी ही
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही
दोषी सरे आम तुम मुझको
जी चाहे अब कहो जहाँ पर
मैं तो लेकिन साँस आखिरी
लूँगा, नाम तुम्हारा लेकर
हर अवगुन भी यहाँ तुम्हारे मेरी प्रीत बखानेगी ही
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही
तू मुझमें मैं तुझमे लय तय था
जीवन, जीवन से परिचित था
फिर अब मुझको तुम्ही बताओ
यह संबंध कहाँ अनुचित था
चलो भरम भी टूट गया ये प्रीत मुझे पहचानेगी ही
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही
याद आज भी वह आती है
जब घड़ियाँ गिनते थे
ऐसे नहीं, रहेंगे ऐसे -
कड़ियां सपनों में बिनते थे
आधी रात नींद जो टूटी बैर सुबह तक ठानेगी ही
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही
{कृष्ण बिहारी}
सपनों के सजीले शहजादों जैसे कहाँ थे
आपने जो समझा था हम वैसे कहाँ थे
खो गए थे अँधेरे में कहीं शाम के बाद
क्या बताएं रात गये तक कैसे कहाँ थे
रेशमी छोड़ सूती साडी भी ना ला सके
अरमान तो था यार मगर पैसे कहाँ थे
वो कागजी डिग्रियां तो किताबें ले आईं
नौकरी की खरीद के लिए पैसे कहाँ थे
फूल, तितली, बादल, बरखा, धनक, बहार
हसीन थे सब मगर आप जैसे कहाँ थे
गम के सौ समंदरों का निचोड़ हैं आँसू
ये पानी के चंद कतरे ऎसे–वैसे कहाँ थे
शाम हुए घर लौटा है राह भूला आलम
खुदारा कोई ये ना पूछना कैसे कहाँ थे
(रफत आलम)
आज की रात मैं लिख सकता हूँ
सबसे दुख भरी पंक्तियाँ,
लिख सकता हूँ,
जैसे कि -
आज की रात टूटन भरी है
और दूरस्थ नीले तारों में कम्पन है।
रात की हवा घूम रही है आकाश में
और गा रही है।आज की रात मैं लिख सकता हूँ
सबसे दुख भरी पंक्तियाँ,
मैंने उसे प्रेम किया था,
और कभी उसने भी मुझसे प्रेम किया था।आज की रात जैसी ही रातों में
मैंने उसे अपनी बाहोँ में भरा था
मैंने उसे चूमा था बार- बार
इसी अथाह आकाश के नीचे।उसने भी कभी मुझसे किया था प्रेम
और मैंने भी उसे प्रेम किया था,
कैसे कोई उसकी शांत, गहरी आँखों से
प्रेम न करता?आज की रात मैं लिख सकता हूँ
सबसे दुख भरी पंक्तियाँ,
यह सोचकर कि
अब वह मेरे साथ नहीं है,
यह महसूस करके कि
मैंने उसे खो दिया है।इस गहरी रात को सुन कर,
जो कि उसकी अनुपस्थिति में
गहरा गई है और भी ज्यादा,
और काव्यमयी शब्द गिरते हैं
आत्मा पर उसी तरह से
जैसे ओस की बूँदें गिरती हैं घास पर,
इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि
मेरा प्यार उसे रोक नहीं पाया।आज की रात टूटन से भरी है
और वह मेरे साथ नहीं है।यह सब कुछ है,
दूर कोई गा रहा है,
बहुत दूर,
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है
कि इसने उसे खो दिया है।मेरी दृष्टि खोजती है उसे
मानो उसके पास पहुँचना चाहती हो,
मेरी दिल उसकी राह तकता है,
और वह मेरे पास नहीं है।पुरानी रातों की तरह ही
इस रात की दूधिया रोशनी भी
चमका रही है इन्ही पेड़ों को
पर उस वक्त्त के हम
वही नहीं हैं।
मैं अब उसे प्रेम नहीं करता,
यह निश्चित है,
पर ओह!
मैंने उसे कैसे प्रेम किया था!
मेरी आवाज हवा के उस झौंके को
तलाशती है जो उसे सुनायी देगी।किसी और की होगी वह।
वह किसी दूसरे की हो जायेगी,
जैसे कि मेरे चुम्बन थे पहले,
उसकी आवाज़,
उसका चमकता बदन,
उसकी अनंत आँखें,
सब हो जायेंगे किसी और के।मैं अब उसे प्रेम नहीं करता,
इतना निश्चित है,
पर शायद मैं अब भी प्रेम करता हूँ उसे,
प्रेम भले ही कम समय की बात हो,
पर भूल पाना कितने लम्बे काल की बात है,
क्योंकि यद्यपि आज रात जैसी ही
रातों में मैंने किया था उसे
आलिंगनबद्ध,
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं हो पायी है
क्योंकि मैंने उसे खो दिया है,
तब भी यह आखिरी दर्द है
जो वह मुझे दे सकती है
और यह आखिरी कविता है
जो मैं लिख रहा हूँ उसके लिये।(Pablo Neruda)
Pablo Neruda की कविता – Tonight I can write the saddest lines, से अनुवादित
मेरे तकिये के
अनगिनत गिलाफ बदल गए हैं
गए बरसों में
तुम्हारा सिरहाना अब भी
वैसा ही है
बस मेरे आँसुओं ने
रेशमी तकिये के
चंद फूल बदरंग किये हैं।
वीरान करवटों ने
बिस्तर के तुम्हारे वाले
खाली हिस्से में
लाखों बार तलाश किये हैं
तुम्हारे जिस्म के खो गये तिलिस्म
जागती आँखों ने
अक्सर यूँ ही किया है
सुबह होने का इन्तेज़ार।
(रफत आलम)