Posts tagged ‘pyaar’

अक्टूबर 7, 2011

घाटियों में प्रेम की, फिर कोई उतार ले

एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

प्यार से कोई मेरी ज़ुल्फ को संवार दे
बोझ सभी ज़िंदगी के प्यार से उतार दे
हाथ मेरा थामकर हर सफर में वो चले
इस चमन से जो गई वही मुझे बहार दे

प्रसून सा कहीं खिलूँ फिर कोई निहार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

मेरे नयनों में फिर सपने वो जागने लगें
तस्वीर दिल में फिर वही हम टांगने लगें
मंदिरों में, मस्जिदों में मौन होके या मुखर
साथ उम्र भर का झुके माथ मांगने लगें

घाटियों में प्रेम की, फिर कोई उतार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

नज़र मिला नज़र गिरा, ओट में ही मुस्करा
खुले बहुत मगर फिर भी लाज हो ज़रा-ज़रा
इस तरह लगे कि जैसे अंग-अंग भर उठे
धरा अगर लगे परी तो आसमां भरा-भरा
मन के तार छेड़ दे फिर कोई सितार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 30, 2011

बाज की चोंच में ब्रह्मांड

मैं खुश होते-होते रुक जाता हूँ
मैं प्यार करते-करते डर जाता हूँ
मैं कवितायें लिखते-लिखते
गद्य की तरफ मुड़ जाता हूँ
मुझे रह-रहकर आ जाती है याद
कि एक बाज की चोंच से छूट
ब्रह्मांड जायेगा फूट
फिर क्या होंगी मेरी खुशियाँ
क्या होगा मेरा प्यार
क्या होंगी ये कवितायें
जिन्हे मैं
लिख रहा हूँ।

(बद्रीनारायण)

जुलाई 26, 2011

प्यार की बात

मत करो मुझसे इस समय
प्यार की बात,
बहुत मजबूरियाँ हैं,
पिता नहीं हैं
माँ बूढ़ी है
सबसे छोटी बहन फलाँगते हुये
चढ़ गयी है सीढ़ियाँ उम्र की
और छोटा भाई
डिग्रियों का बोझ लादे
बेकार है।

करनी है बहन की शादी
लगाना है भाई को
रास्ते पर
देखना है घर-परिवार,
ऐसे में
क्या करुँ मैं तुमसे
प्यार की बात
ज़िंदगी में बहुत कुछ है
प्यार से ऊपर,
जिन्हे जिम्मेदारियाँ कहते हैं!

मैं भी चाहता हूँ
कुंतला,
येलोकेशी,
जिसके अंग सुते हुये हों साँचें में
एक गौरांगी प्रिया
जो लम्बी हो,
स्लिम हो
गहरी नाभी और सपाट पेट वाली हो
जिसकी कमर मेरी बाहोँ के घेरे में आने से शरमाए
जो मुझे चाहे मेरी तरह।
हर भारतीय नौजवान की तरह
मुझे भी लुभाती है हर यौवना।

मगर यह संभव नहीं है
हकीकतें ज़िंदगी से बड़ी हैं।
देश में
जिस वक्त्त हर मोर्चे पर
हो रहा हो अनवरत भ्रष्टाचार
और जहाँ घर में
बैठी हो जवान बहन
भाई बेकार
वहाँ मैं कर सकता हूँ
केवल
क्रांति
पर नहीं कर सकता प्यार
फिलहाल इस समय एक युवती से।

{कृष्ण बिहारी}

जून 30, 2011

प्रेम से भय कैसा

प्रेम में
खोना पड़ता है
बहुत सारी बातों को
बल्कि खो देना पड़ता है खुद को ही
इस भय से
प्रेम में पूर्ण-समर्पण
न कर पाने वालों
की संख्या अनगिनत है।

सतह पर ही तैरते रहने से
जल की गहराई
नहीं आँकी जा सकती
उसके लिये गहरे पानी पैठना
ही पड़ता है।

प्रेम में होने से
भय कैसा?
मानव जीवन
का सारा लेखा-जोखा बाँच
पता यही चलता है -
चिर काल से ही
प्रेम में उत्थान पाये
अस्तित्व ही
जी पाये हैं
काल की सीमाओं को
पार कर पाये हैं।

इस अदभुत अनुभव
को जी पाने
की संभावना
से मुँह क्यों मोड़ना?

प्रेम करो
प्रेम पाओ
प्रेम में होकर ही तो
पता चलता है
कि प्रेममयी मानव
इतना सब कुछ देख, जान,
और जी सकता है
जो कभी भी संभव न हो पाता
और जीवन कितने ही अनदेखे पहलुओं से
अनभिज्ञ ही रह जाता
अगर प्रेम उसके जीवन में न आया होता।

…[राकेश]

जून 29, 2011

प्रेम जीवन का द्वार

प्रेम में
छिपी होती है
एक आग
जो तपा कर
सोने को कुंदन बना देती है।

प्रेम के
स्वादिष्ट भोज
में
समाविष्ट
रहते हैं
मीठे,
खट्टे,
कड़वे,
और कसैले
भाव रुपी
व्यंजन भी।

प्रेम के
अमृत रुपी
कलश में
ही बसा होता है
मीठा जहर भी।

प्रेम
अस्तित्व में
पूरकता भी लाता है
और यह
एक बहुत बड़े अभाव
की ओर इशारा भी कर देता है।

प्रेम के
साथ आने वाला सुख
गुलज़ार कर देता है
गुलशन
तो इसके साथ आने वाली
पीड़ा
उपजा देती है
एक नासूर भी
जो रिस रिस कर
जीवन को
एक लुभावनी मौत की
ओर खींचता ले जाता है।

प्रेम में
आपस में गुथे होते हैं
हार और जीत
इन्हे अलग नहीं किया
जा सकता।

प्रेम
जीवन की
निजता है
अस्मिता है।

प्रेम कर पाना,
प्रेम में होना,
जीवन जीने की,
जीवन जी पाने की,
जीवन से तारतम्य
बैठा पाने की
कसौटी है।

…[राकेश]

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मई 5, 2011

ढाई अक्षर की महिमा

बेतुके शब्दों से
हमने रचे
अनगिनत गीत
काश!
सही से चुन पाते
ढाई अक्षर।
….

प्रेम में
कहाँ है अंतर
हुस्न और इश्क के बीच
ये भेद खुला उसी पर
जिसने!
लैला को मजनूँ समझा
मजनूँ को लैला जाना।
….

दुनिया भर के
तनावों में जकड़े हुए आदमी!
किसी दीवाने से लें
मुक्ति का सबक।

(रफत आलम)

मई 2, 2011

एक रचना : तीसरा प्रसंग

याद नहीं है?
तुमने ही तो कभी कहा था
तुमसे बेहतर मेरी याद को
कौन संभालेगा?
एक तुम ही तो हो जिससे
तुम्हारी जान तक मैं माँग सकती हूँ
यह अधिकार भी दे दो न कि अब मैं
तुम्हे अपनी यादें दे जाऊँ।

सुनकर लगा था
क्या मैं सचमुच इतना बड़ा हो गया
जो कुछ दे सके…कुछ ले सके।
खुशियाँ जैसे बाँध तोड़ दें…
पूछा मैंने – यह क्या माँगा तुमने?
तुम कुछ और माँगते
जिसको पूरा कर पाता तत्क्षण मुश्किल होता
प्रथम प्यार के पहले चुंबन की जैसे
अतिरिक्त खुशी हो
खुश होकर
तुम्हारी हथेली पर धर दिया हस्ताक्षर मैंने
जैसे एकलव्य ने मुस्कुराकर
अँगूठा नहीं ज़िंदगी दे दी थी

किसे मालूम था
कोरे कागज़ सी तुम्हारी वह हथेली
मुझे मेरे भीतर ही गिरवी रखकर भूल जाने की
इबारत से खुदी थी
जिस पर रसीदी टिकट भी थे…

तब से जिस्म ही तो बाकी रह गया है सुलगने को
धुँआ-धुँआ होने को
अपनी ही आत्मा पर
संतरी की-सी निगाह रखने को।
कफी वक्त्त गुज़र गया अफीम के नशे में
लेकिन अब-
पहरेदारी करते-करते मन ऊब गया है
सहते रहने की भी तो
कोई एक अवधि होती है।

{कृष्ण बिहारी}

एक रचना: पहला प्रसंग
एक रचना : दूसरा प्रसंग

एक रचना: निर्णायक प्रसंग

जुलाई 2, 2010

ख़तरनाक डगर

बहुत आसान है …
बहुत आसान है किसी से प्यार कर लेना
चाहने लगना
झूमते हुये बांस के पेड़ों की तरह
हवा को।


बहुत आसान है…
बहुत आसान है किसी को बसा लेना दिल में
सजाना सपने
और फिर देखते रहना
अपलक शून्य में नीले आसमान को।


बहुत आसान है…
बहुत आसान है किसी को छिपा लेना खुद में
बचाने लगना उसे दुनिया की हर अच्छी-बुरी नज़र से
जैसे बचाना हो खुदा को
वरना दुनिया को देखेगा कौन?


मगर,
मगर कठिन है पाना प्यार
गणित के कठिनतम सवाल से भी कठिन
रामानुजम के पास भी नहीं था
इस जटिल समस्या का हल।

और प्यार कोई खेल भी तो नहीं
कि जिसे सभी खेला करें
या कोई ऐसी चाह
जिसके पूरा होने न होने से
कोई फर्क न पड़े
प्यार उखाड़ देता है क्षणों में
बरगद बड़े-बड़े
यह बड़ी ख़तरनाक डगर है।

{कृष्ण बिहारी}

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