Posts tagged ‘prem’

मई 19, 2012

मूर्त होता प्रेम!

मुझे मालूम है,
मैं जानता हूँ,
और मानता भी हूँ
कि मेरे सिर के सब बाल पक कर सुर्ख हो चुके हैं|
परंतु फिर भी,
अपने सर पर तुम्हारी उँगलियों का स्पर्श,
मेरे माथे पर रखा तुम्हारा सर
और मेरे कानों को छूती
तुम्हारी चोटी की महकती खुशबू|
मुझे मालूम है
 जानता हूँ
और मानता भी हूँ
कि अब वह वक़्त बीत गया
मैं अब उन आखों से ओझल भी हो गया
मगर फिर भी
आज भी अपने भावशून्य चेहरे पर
उनकी चमक कौंधती साफ दिखती है ।
मुझे मालूम है,
मैं जनता हूँ
और मानता भी हूँ
कि इस मानवसागर में मेरे सामने खड़ी
यह एक जोड़ी आँखें तुम्हारी नहीं हैं,
लेकिन फिर आभास होने लगता है
 कि अब सब यादें मूर्त होने लगी हैं तेरी सूरत में।
( बकुल ध्रुव )
मार्च 12, 2012

सौ बार कहेंगे

तुम आये तो रंग मिले थे

गए तो पूरी धूप गयी

शायद इसको ही कहते हैं

किस्मत के हैं रूप कई

भटकी हुयी नदी में कितनी बार बहेंगे हम|

फूल-फूल तक बिखर गए हैं

पत्ते टूट गिरे शाखों से

एक तुम्हारे बिना यहाँ पर

जैसे हों हम बिना आँखों के

फिर भी इस अंधियारे जग में हंस कर यार रहेंगे हम|

ह्रदय तुम्हारे हाथ सौंपकर

प्यार किया पागल कहलाये

तुमसे यह अनमोल भेंट भी

पाकर कभी नहीं पछताए

यहीं नहीं उस दुनिया में भी यह सौ बार कहेंगे हम|

संधि नहीं कर सके किसी से

इसलिए प्यासा यह मन है

इतने से ही क्या घबराएं

यह तो पीड़ा का बचपन है

इसे जवान ज़रा होने दो वह भी भार भी सहेंगे हम|

मिलने से पहले मालूम था

अपना मिलन नहीं होगा प्रिय

अब किस लिए कुंडली देखें

कोई जतन  नहीं होगा प्रिय

कल जब तुम इस पार रहोगे तब उस पार रहेंगे हम …

{कृष्ण बिहारी}

अक्टूबर 7, 2011

घाटियों में प्रेम की, फिर कोई उतार ले

एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

प्यार से कोई मेरी ज़ुल्फ को संवार दे
बोझ सभी ज़िंदगी के प्यार से उतार दे
हाथ मेरा थामकर हर सफर में वो चले
इस चमन से जो गई वही मुझे बहार दे

प्रसून सा कहीं खिलूँ फिर कोई निहार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

मेरे नयनों में फिर सपने वो जागने लगें
तस्वीर दिल में फिर वही हम टांगने लगें
मंदिरों में, मस्जिदों में मौन होके या मुखर
साथ उम्र भर का झुके माथ मांगने लगें

घाटियों में प्रेम की, फिर कोई उतार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

नज़र मिला नज़र गिरा, ओट में ही मुस्करा
खुले बहुत मगर फिर भी लाज हो ज़रा-ज़रा
इस तरह लगे कि जैसे अंग-अंग भर उठे
धरा अगर लगे परी तो आसमां भरा-भरा
मन के तार छेड़ दे फिर कोई सितार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 30, 2011

सब बेकार की बातें हैं

आदमी की कीमत नहीं मानव अंगों का बाज़ार है बड़ा
रहम-करम, दया-करुणा, शराफत सब बेकार की बातें हैं

आत्महत्या करने पर मजबूर है बेबस सर्वहारा आदमी
ईमानदारी, इन्साफ, इंसानियत सब बेकार की बातें हैं

शहर में आजकल फैशन है दो रातें लिवइन रिश्तों का
इश्क, प्रीत–प्रेम, प्यार, मोहब्बत सब बेकार की बातें हैं

खूनेदिल का लिखा रद्दीभाव, सरकारी चालीसे चलते हैं
गद्य, कविता, समीक्षा, ज़हानत सब बेकार की बातें हैं

झूठ को सौ बार बोल कर सच बनाने वाले का दौर है
सत्य, यथार्थ, सच्चाई, हकीक़त सब बेकार की बातें हैं

सकून की ज़रूरत कहाँ तनाव पालने वाली बस्ती को
सूफी–दरबार, आध्यात्मिक-संगत सब बेकार की बातें हैं

ज़हानत – बुद्धिजीविता

(रफत आलम)

सितम्बर 27, 2011

दूर और कुछ जाना है

साथ तुम्हारे ही चलकर के दूर और कुछ जाना है
पथ से है पहचान तुम्हारी पथ मेरा अंजाना है
चिर परिचित से मुझे लगे हो
शायद जन्मों साथ रहे हो
या फिर कोई और बात है
सुख-दुख जो तुम साथ सहे हो
मुझको तो ऐसा लगता है मन जाना-पहचाना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
मिलना और झगड़ना मिलकर
यह तो अपनी आम बात है
जीत मिली है हरदम तुमको
मुझको तो बस मिली मात है
सारी उम्र मुझे तो शायद हरदम तुम्हे मनाना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
जब-जब भी मिल जाते हो तुम
मन पर चाँद उतर आता है
दूर तुम्हारे होते ही पर
सुख जैसे सब छिन जाता है
बहुत रोकता हूँ मैं आँसू पर वह तो बाहर आना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
अपने पीछे था कल बचपन
आज द्वार पर आया यौवन
कल तक कोई रोक नहीं थी
आज लग गये मन पर बंधन
इनसे डरकर मेरे मन अब और नहीं घबराना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
प्रेम हमारा दीया-बाती
या फिर है चातक-स्वाति
निस दिन इसको बढ़ना ही है
जैसे नदिया चलती जाती
हमको भी तो मंजिल अपनी आज नहीं कल पाना है
पथ से है पहचान तुम्हारी…

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 22, 2011

खुदकशी – मर्ज़ और दवा

बिखरे हुए सपने अपनी जिंदगी से गए
बूढ़े कुछ चश्मे आँख की रोशनी से गए
झुका हुआ एक दरख्त ठूंठ हुआ बेचारा
बेरुते फल थे टूट कर खुद-खुशी से गए

दुःख को साथी मानते कट जाता दुःख
कबीर-गालिब को पढ़ते बट जाता दुःख
तुम मोल तो करते अमूल्य जीवन का
बिन अश्रु आँखों में सिमट जाता दुःख

जलते दीपक से सीख जीने का करीना
दुनिया के आगे हँसना पीछे अश्रु पीना
सोच ये हो तेरे साथ बिताये पल जीलूँ
ये सोच गलत है तेरे बिना क्या जीना

टूटे आस तो खुदा का आसरा है बहुत
हो भरोसा तो स्वयं का सहारा है बहुत
सपनों के साथ आँखे नहीं मरा करती
देख तो सही आगे अभी रास्ता है बहुत

नफा-नुकसान, दुख-सुख, मिलना–बिछड़ना
अनुभव है जिंदगी के, इनसे सीख समझ
समय का शिकारी तो खुद तेरी टोह में है
उसके जाल में न आ, फंदों में न उलझ

(प्रेम में असफलता पाने से की गई आत्महत्या की खबर से जन्मा ख्याल)

(रफत आलम)

सितम्बर 20, 2011

कमजोरों की भाषा

मानवता, न्याय, स्वतंत्रता
कमजोर लोगों की भाषा के शब्द हैं
बलवान केवल आदेश देते हैं
जिनकी पालना में लाखों बार
समय पुस्तक के पन्ने
आदमी के लहू से बदरंग हुए हैं।

खुदा की कहलाने वाली दुनिया
गिरवी रही है
कालखण्डों में बरसों
रावणों, नमरुदों, चंगेजों, हिटलरों, योरपियनों
के हाथों।

एक बड़ा दुशमन और है आदमी का
मज़हब, जिसके नाम पर
क्रूसेडों- जिहादों– धर्मयुद्दों- दंगों में
इतने इंसान मरे हैं के उसके सामने
तमाम विश्वयुद्धों का संहार शरमा जाए।

धर्म तो सभी प्रेम पर आधारित हैं
पर अँधकार डूबी नफरत के दंभ ने
जारी किये
मंसूर-सरमद जैसों की मौत के फतवे
वे खुदा के प्रेम में थे दीवाने
ताज-तख़्त के आगे झुकते कैसे?

सूली साथ लेकर चलने वालों का सफर
अभी भी खत्म कहाँ हुआ है?
माना ज़ुल्म-हिंसा का जीवन लंबा नहीं
किसे याद आते हैं लहू से नहाने वाले?
आते हैं भी तों दुत्कारों के साथ।

हाँ, सच की आबरू रखने के लिए
ज़हर के प्याले पीने वाले अमर हो गये
फिर भी ये कहना ठीक नहीं के
पापियों ने किये की सज़ा पाई है सदा।

माना आये मानवता के उद्धारक
फिर भी ज़ुल्म की फ़ितरत कब बदली
बारूद के ढेर फट रहे हैं
अब भी अस्पतालों–प्रसूतिग्रहों पर।

ये न कहना मौत तो आनी ही थी
हाँ, आनी थी
परन्तु
अकाल म्रत्यु का दर्द
बच गयों ने कैसे सहा है
तुमने देखी नहीं क्या?
रोती-पुकारती सिसकियाँ,
बिलख-बिलख कर मनाते लोग
हादसों में मरने वालों की बरसियाँ
ताकतवर महल कभी नहीं रोते
न तीन हजार बेगुनाहों के मरने पर
न दस लाख मासूमों को मारने
के पश्चाताप में।

ताकत का एक आदेश और
शहर के शहर
आग के गोले बन जाते हैं
मानवता को स्वाह कर
विजयी सेनाओं की जीत का जश्न
विजितों की लाशों के ढेर के आगे
मनता है।

स्वतंत्रता के नाम पर कत्ले आम को
राक्षसी शासन के अंत
कहा जाता है
आज़ादी के बहाने
कर्महीन कौमों की बेडियां
ऐसे काटी जाती है के
पाँव ही नही बचते।

भोले देशों के मूल निवासी
कभी सोने-चांदी-रत्नों को लूटने के लिए
कहीं प्राक्रतिक सम्पदा पर कब्ज़े के लिए
गुलाम बने बेगार की चक्कियों में
पिसे जाते हैं,
मिट जाते हैं धरती के नक़्शे से।

आज भी ताकत का वही आदेश
कभी आतंककारियों के बमों में ढ़ल कर
कभी आतंक-उद्धारकों के हमले बन कर
कमज़ोर, बेगुनाह, बेबस मानवता के
दुश्मन बने हुए हैं।

भारी सांसत में हैं,
इन दिनों बाशिंदे
अय्याश शाहों की धरती के
जान पर आफत हुए तेल के कुँए
काला सोना हथियाने की साज़िश में
बेमौत मारे जा रहे हैं बेचारे।

वक्त के नए खुदाओं का हुक्म जारी है
न्यू वर्ल्ड आर्डर की तैयारी है
मानवता, न्याय, स्वतंत्रता,
कमजोर लोगों की भाषा के शब्द हैं।

(रफत आलम)

सितम्बर 6, 2011

कैसे हुई बदनाम कहानी?

शायद कहता नहीं तो रह जाती गुमनाम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी,

कुहरे की मैं शाम हो गया
घर-बाहर नीलाम हो गया
तेरे साथ घड़ी भर रहकर
जीवन भर बदनाम हो गया

तेरी-मेरी खास बात थी मगर बन गई आम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी,

चर्चित भी मैं खूब हुआ हूँ
गली रही हो या चौराहा
मधुर-मिलन के पहले लेकिन
आना था आया दोराहा

अलग वहाँ से होनी ही थी अपनी वो सरनाम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी,

तुम क्या छूटे मंजिल छूटी
दिल टूटा पर प्रीत न टूटी
जैसे किसी सुहागन की हो
यौवन में ही किस्मत फूटी

सब कुछ तो लुट गया मगर शेष रही नाकाम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी,

यूँ तो सारा खेल जगत में
विधि का ही बस रचा हुआ है
लेकिन मेरे भोले मन पर
एक प्रश्न यह खिंचा हुआ है

आखिर उजले मन की ही क्यों बन जाती है श्याम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी।

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 2, 2011

वह जीवन भी क्या जीवन है

वह जीवन भी क्या जीवन है
जो कि कहीं असमर्थ नहीं है।

मेरा ही प्रतिबंधित, आना
मुझ पर ही आरोप लगाना
चाहत गर जो तुझ तक लाये
प्रश्नों की ही खाट बिछाना

ऐसे प्रश्नों के क्या उत्तर
जिनका कोई अर्थ नहीं है

प्रीत कहीं कैदी हो जाये
सच भी जब बंदी हो जाये
केवल गैरों के कहने से
वैदेही गंदी हो जाये

चाह रहा हूँ पूछूँ तुमसे
बोलो मीत! अनर्थ नहीं है

मुझे प्रीत थी, नहीं वासना
जन्म-जन्म की थी उपासना
माना जग ने प्यार किया है
मैंने तो की एक साधना

तुम्ही नहीं पहचान सके जब
क्या यह परिचय व्यर्थ नहीं है!

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 27, 2011

पाब्लो नेरुदा : आज की रात लिख सकता हूँ

आज की रात मैं लिख सकता हूँ
सबसे दुख भरी पंक्तियाँ,
लिख सकता हूँ,
जैसे कि -
आज की रात टूटन भरी है
और दूरस्थ नीले तारों में कम्पन है।
रात की हवा घूम रही है आकाश में
और गा रही है।

आज की रात मैं लिख सकता हूँ
सबसे दुख भरी पंक्तियाँ,
मैंने उसे प्रेम किया था,
और कभी उसने भी मुझसे प्रेम किया था।

आज की रात जैसी ही रातों में
मैंने उसे अपनी बाहोँ में भरा था
मैंने उसे चूमा था बार- बार
इसी अथाह आकाश के नीचे।

उसने भी कभी मुझसे किया था प्रेम
और मैंने भी उसे प्रेम किया था,
कैसे कोई उसकी शांत, गहरी आँखों से
प्रेम न करता?

आज की रात मैं लिख सकता हूँ
सबसे दुख भरी पंक्तियाँ,
यह सोचकर कि
अब वह मेरे साथ नहीं है,
यह महसूस करके कि
मैंने उसे खो दिया है।

इस गहरी रात को सुन कर,
जो कि उसकी अनुपस्थिति में
गहरा गई है और भी ज्यादा,
और काव्यमयी शब्द गिरते हैं
आत्मा पर उसी तरह से
जैसे ओस की बूँदें गिरती हैं घास पर,
इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि
मेरा प्यार उसे रोक नहीं पाया।

आज की रात टूटन से भरी है
और वह मेरे साथ नहीं है।

यह सब कुछ है,
दूर कोई गा रहा है,
बहुत दूर,
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है
कि इसने उसे खो दिया है।

मेरी दृष्टि खोजती है उसे
मानो उसके पास पहुँचना चाहती हो,
मेरी दिल उसकी राह तकता है,
और वह मेरे पास नहीं है।

पुरानी रातों की तरह ही
इस रात की दूधिया रोशनी भी
चमका रही है इन्ही पेड़ों को
पर उस वक्त्त के हम
वही नहीं हैं।


मैं अब उसे प्रेम नहीं करता,
यह निश्चित है,
पर ओह!
मैंने उसे कैसे प्रेम किया था!
मेरी आवाज हवा के उस झौंके को
तलाशती है जो उसे सुनायी देगी।

किसी और की होगी वह।
वह किसी दूसरे की हो जायेगी,
जैसे कि मेरे चुम्बन थे पहले,
उसकी आवाज़,
उसका चमकता बदन,
उसकी अनंत आँखें,
सब हो जायेंगे किसी और के।

मैं अब उसे प्रेम नहीं करता,
इतना निश्चित है,
पर शायद मैं अब भी प्रेम करता हूँ उसे,
प्रेम भले ही कम समय की बात हो,
पर भूल पाना कितने लम्बे काल की बात है,
क्योंकि यद्यपि आज रात जैसी ही
रातों में मैंने किया था उसे
आलिंगनबद्ध,
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं हो पायी है
क्योंकि मैंने उसे खो दिया है,
तब भी यह आखिरी दर्द है
जो वह मुझे दे सकती है
और यह आखिरी कविता है
जो मैं लिख रहा हूँ उसके लिये।

(Pablo Neruda)

Pablo Neruda की कविता – Tonight I can write the saddest lines, से अनुवादित

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 44 other followers