Posts tagged ‘Patthar’

अक्टूबर 5, 2011

झुकी मूँछ

मुझमें पत्थर पड़े हैं क्या
लोग हीरे के बने हैं क्या

अँधे, बहरे और बस चुप
ये हादसों के बचे हैं क्या

फुटपाथ पर बड़ी है भीड़
कहीं झोपड़े जले हैं क्या

आपको भाती है जिंदगी
हवा महल में बसे हैं क्या

नमक क्यों लाए हो यार
घाव अब भी हरे हैं क्या

जिंदगी-मौत, धुंआ–खुशबु
ये किसी के सगे हैं क्या

माहौल काला सा क्यों है
बस्ती में पेड़ कटे हैं क्या

हाथों के पत्थर किसलिए
शहर में शीशे बचे हैं क्या

भला लगने की बात जुदा
लोग सच में भले हैं क्या

इन्साफ का पता पूछते हैं
आप शहर में नए हैं क्या

मूँछ झुकी कैसे है आलम
बेटी  के बाप बने हैं क्या

(रफत आलम)

अक्टूबर 1, 2011

अपनी आग में जलते घर

लुटेरों के कमांडर इन चीफ हैं सरकार
पब्लिक प्रोपर्टी के बड़े थीफ हैं सरकार
ये सब पीठ पीछे का गुबार है मालिक
मुहँ आगे आप सबसे शरीफ़ हैं सरकार
………….

तीर सीने के निकाल कर रखना
अमानतों को संभाल कर रखना
वक्त आने पर करना है हिसाब
ज़ख्म दिल में पाल कर रखना
* * *

फेंकने वाले हाथ खुद अपने थे करते भी क्या
कभी सर का लहू देखा कभी पत्थर को देखा
माँ का दूध जब खट्टे रिश्तों में शामिल हुआ
अपनी आग में हमने जलते हुए घर को देखा
* * *

भूल गए हैं हवाओं का एहसान, देख रहे हैं
खुद को मान बैठे हैं आसमान, देख रहे हैं
गुब्बारे कल फुस्स होने हैं फिर कौन देखेगा
अभी तो सब लोग उनकी उड़ान देख रहे हैं
* * *

कहता है खरा सौदा है आओ मुस्कानें बाँटें
रोतों की बस्ती के लिए आराम मांग रहा है
आया कहाँ से है दीवाना कोई पूछो तो सही
आँसू के बदले खुशी का इनाम मांग रहा है

(रफत आलम)

सितम्बर 25, 2011

शाह या फकीर, मरना दोनों को है

गुलेल की जिद है देखे, कहाँ तक पत्थर जाता है
उसे कौन समझाए घरों का शीशा बिखर जाता है

शाम ढले जब पंछी भी नीड़ों को लौटने लगते हैं
एक शख्स घर से निकल के जाने किधर जाता है

मेरी प्यास किसी निगाहें करम की मोहताज नहीं
इस फकीर का प्याला तो खुद से भी भर जाता है

यही मजबूरी तो है जिंदगी की सबसे बड़ी मजबूरी
शाह हो के फकीर आखिर में आदमी मर जाता है

उजाले के तलाशी पाँव के इन छालों से डर कैसा
दीपक से सूरज तक लपटों का रहगुज़र जाता है

ताज बने कि मशीने चले जीवन भूखों के रोते हैं
हाथ नहीं जाते आलम, इस दौर में हुनर जाता है

(रफत आलम)

सितम्बर 23, 2011

बूँद और समंदर

 

जिंदगी गुजारनी थी सो गुज़र की है
ये न पूछो किस तरह से बसर की है

घायल हैं सभी पर बताता नहीं कोई
पत्थरों को तलाश किसके सर की है

छप्पर जले तो महल भी नहीं बचेंगे
आग कब देखती है हवा किधर की है

रिश्तों की मौत पर अब रोता है कौन
हर आँगन के बीच दीवार घर की है

चूड़ियों के टकराव से टूटे हैं भाईचारे
बर्तनों की खनक तो रौनक घर की है

जिधर देखा, हैं आँसू आहें और कराहें
हम कैसे कहें ये दुनिया पत्थर की है

जहाँ पर शुरू, वहीं आखिर है आलम
बूँद से है समंदर तो बूँद समंदर की है

(रफत आलम)

अगस्त 20, 2011

जिहादी हूँ, दहशतगर्दी नहीं इंसानियत मेरा इस्लाम है

अजीब हैं दर्द का रिश्ता जो टूट कर भी नहीं टूटता कभी
ज़ख्म को सूखे बरस बीते फिर भी दिल को आराम नहीं

हम भी जिहादी हैं मगर इंसानियत की राह पर चलते हैं
ये जो तेरा इस्लाम है दहशतगर्द वो अपना इस्लाम नहीं

सच दिखाने की सजा किरच किरच पायी है दर्पणों ने
पत्थरों की इस बस्ती में शीशा दिल लोगों का काम नहीं

अपना ही लहू पीने वालों को क्या गरज मयखानो से
हमारी प्यास अलग है साकी जिसका मकसद जाम नहीं

ख़्वाबों में जीने की सजा नींद खोकर पाई है, क्या बताएं
जागती आँखें पूछती हैं पगले क्यों तुझको आराम नहीं

इस मयकदे में अपनी प्यास का मुदावा खुद करना होगा
यहाँ साकी को क्या परवाह किसे है किसको जाम नहीं

हराम खाने से बेहतर है पेट पर पत्थर बांधे गुज़र जाना
तलब वो ही है सच्ची जो हाथ फैलाने को बदनाम नहीं

आप बादलों के सायों से चाहे बहल लो वरना ऐ आलम
जिंदगी के रास्ते में कोई मंजिल नहीं कोई मुकाम नहीं

दहशतगर् – आतंकवादी, मुदावा – इलाज

(रफत आलम)

जून 17, 2011

दिल बहलाने का ख्याल

तन्हाई की घुटन में सन्नाटों से दिल बहलाते रहे
रात भर गिनते रहे करवटों से दिल बहलाते रहे

खुद से भी डर गए जो जानते थे चेहरों का सच
हाँ जो बहरूपिये थे मुखौटों से दिल बहलाते रहे

घर की देहरी इन्तज़ार में पत्थर हो गयी आखिर
एहले-हवस शहर की गुड़ियों से दिल बहलाते रहे

इश्क के रास्ते में मिटने से भला डरता है कौन?
चिरागों के हौसले थे हवाओं से दिल बहलाते रहे

ज़ख्म देने वालों से मरहम की आस थी फ़िज़ूल
कुछ दर्दमंद थे जो मुस्कानों से दिल बहलाते रहे

(रफत आलम)

मई 10, 2011

नीम की छांव

लोग जिसका नाम बेच रहे हैं खुली दुकानों में
कहते हैं उसका घर है दूर कहीं आसमानों में

मुझे कब से है तलाश कहीं उसका पता मिले
मंदिर की झाँकी में के मस्जिद की अजानों में

हकीकत की सख्त ज़मीन पर सब बिखर गए
हवा-महलों से निकला करते थे सपने उड़ानों में

कंक्रीट के दडबों से तंग आओ तो कभी लौटना
नीम की छांव आज भी है गावं के मकानों में

गौर से देखो तो सभी के चेहरे खून से रंगे हैं
इतिहास ने लिखे हैं जितने भी नाम महानों में

किसने कहा पत्थर के सीने में दिल नहीं होता
चोट खा के दरारें पड जाती हैं सख्त चट्टानों में

हर कहीं देख लो मासूम इश्क का वही अंजाम
यार खोये हो कहाँ लैला मजनूँ की दास्तानों में

गया वक्त रोता फिर रहा है सन्नाटों के साथ
वहाँ भी सकून नहीं है जाके देख लो वीरानों में

शर्मदार की मौत को चुल्लू भर पानी है काफी
छली गयी उमंगें ही डूबी आलम शराबखानों में

(रफत आलम)

अप्रैल 30, 2011

सपने डूबते हैं ज़हर में

नज़रें थक गयी नज़ारे इतने समाये नजर में
सब कुछ देखा आदमी के सिवा इस शहर में

ये बात अलग है उसका पता मिला या नहीं
किसी ने हवा में ढूँढा उसे किसी ने पत्थर में

हुई रात तो बच्चे अपने दड़बों में दुबक गए
पुरानी कुछ दीवारें जाग रही हैं अकेले घर में

मुँह दिखाई के रिश्ते दिल की राहें भूल गए
अजनबी अपने कमरे हैं आज सब के घर में

अँधेरा रात के संग मैली राहों पर जा भटका
चांदनी करवटें बदलती रही जलते बिस्तर में

धुंधले हुए नजारों के रंग तेरे बिना ए दोस्त
मंज़र कोई ठहरता ही नहीं अब इस नज़र में

जलती धूप में चलते रहना है जाने कब तक
पाँवों के कांटे क्या गिनें अभी तो हैं सफर में

जिंदगी बेअर्थ हुई क्या संवेदनहीन माहौल में
वरना क्यों कोमल सपने डूब रहे हैं ज़हर में

दिन की चाकरी के बाद भी चैन कहाँ आलम  
वही खड़कते बर्तन मिलगे जब लौटूँगा घर में

(रफत आलम)

अप्रैल 27, 2011

पत्थर नहीं हीरा बन

जिंदगी की ठोकरों से
घबरा कर
पत्थर न बन यार!

तेरे भीतर छिपा है हीरा
तलाश उसे
तराश उसे।

माना बहुत लंबा है
सडक पर लुढ़कते फिरने से
मुकुट की शोभा बनने तक का सफर।

बुद्धि और बदन को कठोर कर
हाथ की लकीरों को रोने वाले
उठा हाथ में
कलम हो के कुदाल
पसीने की नदी में बहकर ही
सफलता के सागर की मिलती है थाह।

याद रखना
बिना तपे
सोना निखरता कब है
भीतरी आग अगर नहीं होती
सूरज रात बना रहता।

कटने-छटने-सँवरने की पीड़ा में ही
छिपा है
पत्थर से हीरा बनने का राज़
जिसकी  कुंजी
तेरी पहुँच से दूर नहीं!

(रफत आलम)

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