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फ़रवरी 23, 2011

Buddhism चीन से आया भारत : Paulo Coelho

बहुधा ऐसा हो जाता है कि विश्व प्रसिद्ध विदेशी लेखक अपनी पुस्तकों में भारत से जुड़ी बातों को गलत ढ़ंग से प्रस्तुत करते हैं। कई बार तो उन्हे जानकारी ही नहीं होती और वे केवल अनुमान के भरोसे कुछ लिख डालते हैं और कई दफा वे भारत के बारे में फैले भ्रमों के कारण उसे हल्के ढ़ंग से लेने के कारण इसे और इससे जुड़े मामलों को गम्भीरता से नहीं लेते और गलत तथ्यों का समावेश अपनी पुस्तकों में कर डालते हैं। फिल्म निर्देशक भी इन मामलों में पीछे नहीं हैं।

Buddhism और भारत के जुड़ाव के सम्बंध में विदेशी लेखकों में अक्सर भ्रम देखने को मिलता है। आयरलैंड के रहने वाले प्रसिद्ध लेखक J. H. Brennan अपनी पुस्तक Tibetan Magic and Mysticism में तिब्बत पर Buddhism के पड़ने वाले असर की चर्चा करते हुये लिखते हैं -

There is no question at all that the doctrines of the Buddha helped change Tibetan history. All the same, Buddhism alone is no guarantee of a peaceful culture. India, the home of Gautam Buddha, has been to war twice in my life time.

शोध करके लिखने वाले लेखकों का यह हाल है कि वे अपने समय के भारत के बारे में भी इस सत्य को नज़रअंदाज कर जाते हैं कि सन 1947 के बाद से ही भारत ने किसी भी देश पर अपनी ओर से आक्रमण नहीं किया है। विभाजन के बाद पहले कश्मीर को लेकर, बाद में सन 1965 में और 1971 में और 1999 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण करके शांतिप्रिय लोकतांत्रिक देश पर युद्ध थोपे थे।  1962 में साम्राज्यवादी चीन ने भारत पर धोखे से आक्रमण किया और अपने इस शांतिप्रिय पड़ोसी देश को युद्ध में घसीटा।

दुनिया में बहुत बड़े-बड़े विदेशी विद्वान हैं जो भारत और चीन को एक ही शीशे से देखते हैं।  और सब बातों में उनके विचार सटीक पाये जाते हैं तब भारत के मामले में वे कैसे इतनी लापरवाही का परिचय दे देते हैं। भारत चीन जैसा शक्त्तिशाली देश नहीं है और न ही चीन की तरह उसे यू.एन में वीटो पॉवर मिली हुयी है और न ही वह चीन की भाँति दुनिया भर को घुड़की देता घूमता है। भारत एक सॉफ्ट देश है और यह बात सभी मुल्क जानते हैं।

दशकों से दक्षिण एशिया के ज्यादातर देशों से लोग विकसित पश्चिमी देशों में काम करने या रहने जाते रहे हैं। प्रवासी चीनी लोग लगभग हर विकसित देश में बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं और वे वहाँ एक समूह के रुप में रहते हैं और वहाँ भी उनकी एक सामुहिक शक्त्ति कायम रहती है। जबकि भारतीय एकल रुप में विकास करने में ज्यादा रुचि लेते हैं और पूजाघरों और अन्य सामाजिक स्थलों पर मेलमिलाप का दिखावा करने के अलावा वे अंदर से बाहर के देशों में भी बँटे ही रहते हैं।

विश्व प्रसिद्ध लेखक Paulo Coelho सन 2005 में प्रकाशित होने वाले उपन्यास – The Zahir में एक स्थान पर लिखते हैं कि Buddhism चीन से भारत में आया।

And he started telling me about his life, while I tried to remember what I knew about the Silk Road, the old commercial route that connected Europe with the countries of the East. The traditional route started in Beirut, passed through Antioch and went all the way to the shores of the Yangtse in China; but in Central Asia it became a kind of web, with roads heading off in all directions, which allowed for the establishment of trading posts, which, in time, became towns, which were later destroyed in battles between rival tribes, rebuilt by the inhabitants, destroyed, and rebuilt again. Although almost everything passed along that route—gold, strange animals, ivory, seeds, political ideas, refugees from civil wars, armed bandits, private armies to protect the caravans—silk was the rarest and most coveted item. It was thanks to one of these branch roads that Buddhism traveled from China to India.

दुनिया में ऐसे भी लोग होंगे जिन्हे भारत और बुद्ध के बारे में न पता हो और Paulo Coelho की किताब में लिखा गलत तथ्य उन्हे सही जानकारी लगेगा और वे इसे ही सत्य मानेंगे।

सन 2006 के फरवरी माह में उन्हे लिखे एक ईमेल में उनकी पुस्तक में उपस्थित इस गलती की ओर उनका ध्यान दिलवाये जाने पर उन्होने जवाब तो लिखा पर इस मुद्दे पर कोई भी बात नहीं लिखी। चूँकि पुस्तक शायद स्पेनिश से अंग्रेजी में अनुवादित होकर प्रकाशित हुयी थी तो बहुत संभावना है कि अनुवाद के कारण ऐसी गलती रह गयी हो। आशा थी कि आने वाले संस्करण में ऐसी तथ्यागत गलती का सुधार करवा लेंगे परंतु हाल ही में The Zahir का एक नया संस्करण देखने को मिला और उसमें गलती अभी तक उपस्थित है।

ऐसी गलती वे अमेरिका और अन्य शक्त्तिशाली देशों से जुड़ी बातों के साथ नहीं करेंगे, परंतु उन्हे भी पता है कि भारत से जुड़ी बातों को कैसे भी प्रस्तुत कर दो।

नेतृत्व से बहुत फर्क पड़ता है कि भारत के नेता कैसा व्यवहार भारत से बाहर करते हैं। कहीं भारत के नेताओं के कपड़े उतार लिये जाते हैं और कहीं भारतीयों से बदसलूकी की जाती है पर भारत के विदेश मंत्रालय के कानों पर जूँ नहीं रेंगती।

सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि विदेश मत्रांलय और इससे जुड़े अधिकारी बाहर के देशों में जाने वाले ज्यादातर भारतीयों को अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्त्ति मानकर चलती है, ज्यादातर तो उनका व्यवहार ऐसा ही रहता है कि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों पर आने-जाने वाला हर साधारण भारतीय कबूतरबाजी या अवैध किस्म के कागजों से विदेश जा रहा है या वहाँ से आया है।

भारत का नेतृत्व और मीडिया इसी बात से खुश रहता है कि किसी शक्त्तिशाली देश ने विदेश यात्रा के दौरान हमारे नेता को भोज दिया या  अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में अपने पड़ोस में बैठा लिया या भोज के बाद हाथ धोने के लिये जाते समय रुककर मुस्कुराकर बातें कीं।

चीन अपने लिये जितने फायदे अपने लिये दूसरे देशों से ले लेता है उतनी समझ और उतने ठसके की कल्पना भी भारत नहीं कर सकता।

दूसरों को सम्मान देने का मतलब उनकी गलत-सलत माँगों के सामने बिछना नहीं होता।

पिछले कम से कम बीस-पच्चीस सालों में भारत में उच्च तबके में समृद्धि भले ही बढ़ी हो पर भारतीय नेतृत्व की कमजोरी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा दिखायी देती रही है। इसे चाहें तो गठबंधन सरकारों का साइड इफेक्ट कह लें या कि बिजनेस के दौर में माँगते रहने की प्रवृत्ति के कारण हर बात को पैसे से तोलने की नयी प्रवृत्ति से अपने को कमजोर समझकर आत्मसम्मान में कमी का प्रभाव।

ताज्जुब होता है यह पढ़कर या सुनकर कि 1971 में बांगलादेश मुक्त्ति के संघर्ष के समय जब अमेरिका ने अपने जहाजी बेड़े भारत की हदों में समुद्र में लाकर खड़े कर दिये थे तब भी भारत गरीब होते हुये भी इस घुड़की में नहीं आया था और देश ने आत्म सम्मान को ज्यादा तवज्जो दी थी।

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में तब भी भारत के रुख के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाया जा रहा था।

उसी दौरान बीबीसी को दिये एक साक्षात्कार से, उस वक्त्त देश की प्रधानमत्रीं रहीं श्रीमति इंदिरा गाँधी के तेवर देख कर रोमांच हो उठता है कि एक गरीब और विकासशील देश दुनिया की आँखों में आँखें डालकर भारत के खिलाफ फैलाये जा रहे दुष्प्रचार का जवाब दे सकता है और विश्व  शक्त्तियों को उनके गलत कार्यों की याद दिला सकता है।

अगर सत्तर के दशक की भारतीय प्रधानमंत्री ऐसा आत्मविश्वास और आत्मसम्मान दुनिया को दिखा सकीं तो आज जबकि भारत पहले से ज्यादा समृद्ध है तब भारत को क्या हो गया है जो वैश्विक मंचों पर एक भ्रष्टाचारी, कमजोर और लुंजपुंज देश के रुप में अपने को प्रस्तुत कर रहा है। भारत अवैध घुसपैठ का मसला हो या बाहरी शक्त्तियों द्वारा देश में फैलाये आतंकवाद का या मुक्त्त व्यापार के नाम पर भारत से ठगी करने का, चुप्पी साधे सब सहन करता जाता है।

भारत और भारतीयों को अपने आत्मसम्मान की फिक्र करनी चाहिये और देश के बारे में फैली किसी भी गलत बात का विरोध उचित मंच पर करना चाहिये।

दंभी होना निम्नस्तरीय दोष है पर एक देश सज्जन होते हुये भी अपने आत्मसम्मान के लिये चारित्रिक दृढ़ता संसार को दिखा सकता है और इस लक्ष्य को पाने में देश में रहने वाले और दुनिया में हर जगह रहने वाले भारतीयों के प्रयास महत्वपूर्ण हैं।

देश की साख होगी तो प्रवासियों को भी उचित स्थान और सम्मान हर देश में मिलेगा। केवल अपने भले के लिये देश की साख पर बट्टा लगाने वाली बातों की अनदेखी इस लोभ से करना कि उनके व्यक्तिगत हितों को विदेश में नुकसान न पहुँचे, भारतीयों को कम से कम ऊँचाई पर तो नहीं ले जाता।

खुले दिमाग वाले विदेशी इस बात को कहते भी हैं कि जाने क्यों भारतीयों को अपने देश के गौरवशाली इतिहास और नायकों को सम्मान देना नहीं आता। विदेशियों की निगाहों में अच्छा और उदार दिखने के लिये भारतीय अपने नायकों को नीचे घसीटने से कभी पीछे नहीं रहते।

जिन भारतीय नायकों को विदेशी भी सर्वोच्च स्थान पर रखते हैं उन्हे भी भारतीय कोसने से बाज नहीं आते।

अनुचित अंधी प्रशंसा न करें पर द्वेषपूर्ण अंधी आलोचना भी तो न करें। एक संतुलित दृष्टिकोण रखना तो अनुचित बात नहीं है न।

राजनीतिक दलों के आपसी द्वंदों में फँसकर आम भारतीय भी बंट गया है और यह बँटवारा भारत की विरासत के साथ अत्याचार कर रहा है। भारत की सामुहिक चेतना का ऐसे टुकड़े टुकड़े होना देश के सम्मान को हर दिशा से खोखला कर रहा है।

…[राकेश]

फ़रवरी 13, 2011

फैज़ : मिल जायेगी तारों की आखिरी मंजिल

अविभाजित भारत में सन 1911 के फरवरी माह की 13 तारीख को जन्मे फैज़ अहमद फैज़ की नायाब शायरी का ही जादू है कि उनके भौतिक अस्तित्व से हजारों-लाखों गुना बड़ा कद शायर फैज़ का हो गया है और अच्छा शायर जन्मता तो है पर उसकी रुखसती कभी नहीं होती धरा से। वह जिंदा रहता है लोगों के दिलों में। अच्छा कवि वह लीविंग ओर्गेनिज़्म है जो जब भी स्थितियाँ अनूकूल होती हैं तब वह अपने काव्य की बदौलत जन्म ले लेता है।

फैज़ अहमद फैज़ जैसे शायर जिन्होने मानव जीवन के हर रंग का और हर ढ़ंग का विश्लेषण अपनी शायरी के द्वारा किया हो वे तो हर दिन के हर पल कहीं न कहीं जन्मते ही रहते हैं। मानव जीवन के हर भाव के साथ उनका जुड़ाव रहता है चाहे वह मोहब्बत का क्षेत्र हो या जंग का। बात चाहे मानव के शोषण की हो रही हो या जीवन में मनुष्य की स्वतंत्रता के उत्सव की, फैज़ वहीं मिल जायेंगे अपनी शायरी की बेपनाह खूबसूरती के साथ।

उन्होने केवल किताबी शायरी ही नहीं की वरन मनुष्य की स्वतंत्रता के लिये वास्तविक जीवन में भी तानाशाही सत्ता द्वारा दी गई प्रताड़ना झेल कर भी संघर्ष किये।

मनुष्य ऊपर उठना चाहता है। आदर्श की ओर बढ़ना चाहता है। पर शक्तियाँ हैं जो मनुष्य जीवन को नीचे खींचती हैं और उसका पतन करती हैं। विकासोन्मुखी राहों पर चलते चलते ऐसे पड़ाव आते हैं जब बुराइयों के समावेश के कारण तरह तरह के प्रदुषण तौर तरीकों में आ जाते हैं और निराशा जन्म लेने लगती है। जिन्होने अपने जीवन होम कर दिये मानव जीवन के उत्थान के लिये उन्होने क्या इसलिये किया कि सब फिर से भ्रष्ट माहौल की ओर गिरते चले जायें।

ऐसे माहौल में हमेशा ही उनकी बेहद प्रसिद्ध रचना- सुबह-ए-आज़ादी, की याद बरबस ही ताज़ा हो जाती है और वह रचना पड़ाव पर ठहरे मुसाफिरों को जगाती है कि इस किस्म के औसत को पाने के लिये हमने यात्रा आरम्भ नहीं की थी। यह रचना यात्रियों में बीते हुये का विश्लेषण करके बुराइयों को हटाकर आशा के साथ आगे बढ़ने के लिये प्रेरणा का कार्य करती है। आदर्श को अभी भी एक मंजिल बनाये रखती है।

ये दाग दाग उजाला ये शब गजीदा सहर
वो इंतजार था जिसका ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरजू लेकर
चले थे यार के मिल जायेगी कहीं न कहीं
फलक के दश्त में तारों की आखिरी मंजिल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जाके रुकेगा सफीना-ए-गम-ए-दिल

भारत और पाकिस्तान के नामचीन फिल्मकारों, संगीतकारों एवम गायकों ने फैज़ की शायरी के साथ अपनी कला का संगम बार बार किया है।

फैज़ जीवित नहीं हैं आज, पर वे उपस्थित हमेशा रहते हैं। उन्हे याद करने की देर है और वे अपने शब्दों का जादू बिखेरने आ जाते हैं।

फैज़ की शायरी की हद नहीं है। बानगी देखनी हो उनकी रचना ’कुत्ते’ में देखी जा सकती है।

बीसवीं सदी का भारतीय उपमहाद्वीप धन्य हो गया फैज़ अहमद फैज़ को अपने यहाँ जन्मा पाकर।

सन 1911 के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में जन्मे हरेक मनुष्य के पूर्वज शायर फैज़ अहमद फैज़ के जन्म शताब्दी दिवस पर उन्हे श्रद्धा सुमन!

दिसम्बर 21, 2010

जॉन एलिया : तन्हा शायर, बेशकीमती अश’आर

सालहा साल और एक लम्हा
कोई भी तो ना इनमे बल आया

खुद ही एक दर पर मैंने दस्तक दी
खुद ही लड़का सा मैं निकल आया

उर्दू शायरी के गुलशन में हज़ारों फूलों ने अहसास की अमिट खुशबू बिखेरी है जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के दिलोदिमाग को आल्हादित करती रही है। वर्तमान लबो-लहजे में अशआर की यह खु्शबु इस कदर समायी हुई है कि शायद ही कोई दिन जाता हो जब हम बोलचाल में कोई न कोई उर्दू शेर का सहारा, अपनी बात को पुख्ता करने में नहीं लेते हों।

इसी गुलशन के एक महकते फूल का नाम जॉन एलिया है। वर्तमान दोर के इस मकबूल शायर का जन्म 14 दिसम्बर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में रहने वाले एक सम्भ्रांत परिवार में हुआ था। जॉन साब के पिता का नाम अल्लामा शफीक हसन एलिया था, जो जाने माने विद्वान, शायर और भविष्यद्रष्टा थे। अल्लामा की सबसे छोटी औलाद जॉन एलिया साब के अतिरिक्त इनके बड़े भाई रईस अमरोही जाने माने शायर, पत्रकार और डॉक्टर थे तथा मानव मूल्यों के बड़े हिमायती थे। बाद में रईस साब की पाकिस्तान में किसी सरफिरे धार्मिक कट्टरपंथी द्वारा हत्या कर दी गयी। जॉन साब के दूसरे भाई सय्यद मोहम्मद तकी विश्व प्रसिद्ध अहमदिया चिन्तक रहे हैं। जॉन एलिया साब की पूर्व पत्नी जाहिदा हिना इंडो- पाक की सुप्रसिद्ध पत्रकार हैं तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामायिक एवं सामाजिक घटनाओं पर आज भी सक्रीय लेखन कर रही हैं। इनके लेख, विशेष रूप से – पाकिस्तान की डायरी, भारत में भी सुधि पाठक चाव से पढते हैं। जॉन एलिया साब की हिना जी से मुलाकात उर्दू साहित्यिक पत्रिका ’इंशा’ निकालने  के दोरान हुई थी, जो बाद में विवाह में तब्दील हो गई। इस विवाह से जॉन साब को दो पुत्रियां और एक पुत्ररत्न प्राप्त हुए, परन्तु बाद में अप्रिय परिस्थतियों के चलते दोनों के बीच 1984 में विवाह विच्छेदन हो गया। तलाक के बाद तबियत से ही सारे जहाँ से खफा जॉन एलिया अवसाद में रहने लगे। उर्दू शायरी का यह देवदास अत्याधिक सुरापान करने और खुद को बर्बाद करने के नए-नए बहाने तलाशने लगा।

जॉन साब ने पैदाइशी रूप में संवेदनशील होने के अतिरिक्त, घर में सुसंस्कृत और सभ्य माहोल होने के कारण आठ साल की उम्र में ही पहला शेर कह लिया था। किशोर अवस्था आते आते जैसा कि अक्सर होता बाली उम्र में होता है वे एक ख्याली प्रेमिका सोफिया के सपने देखने लगे और उसी में जीने लगे। इसी दौर में देश के शासक अंग्रेजों से उनकी नफरत भी उभरने लगी और साम्यवादी विचारधारा उन्हें खासी प्रभावित करने लगी थी। उनके नजदीकी रिश्तेदार सईद मुमताज़ के अनुसार जॉन एलिया की भाषाओँ में खासी रूचि थी। बचपन में मदरसे से जहाँ उन्होंने अरबी फारसी का ज्ञान प्राप्त किया, आगे अध्यन के दौरान अंग्रेजी वे धारा प्रवाह बोलने लगे और हिब्रू और संस्कृत भी चलती फिरी सीख ली।

1947 में देश के टुकड़े होने पर जॉन का दिल भी खासा टूटा। वे साम्यवादी विचारधारा के पोषक होने के कारण धर्म के आधार पर बंटवारे के घोर विरोधी थे और हर हाल भारत में ही रहना चाहते थे। अंत में अधिकांश परिवार के पाकिस्तान चले जाने के फलस्वरूप १९५६ में कराची में जाकर बस गए। अपने आखरी समय आने तक वे अपने जन्म के शहर अमरोहा को बहुत प्यार से याद करते रहे। अपनी अर्थपूर्ण शायरी और मुशायरों में दिलफरेब अंदाज़ से प्रस्तुति के कारण जॉन एलिया पाकिस्तान में भी काफी लोकप्रिय और ख्यात नाम हो गए।

विधा के गंभीर जानकारों के अनुसार परम्परागत उर्दू शायरी की ज़मीन पर रहते हुए जॉन एलिया को सदा जीवन में आदर्श की तलाश रहती थी। वास्तविक जीवन में आदर्श कहाँ? लोगों की मक्कारी और बनावट पर उन्हें गुस्सा आता था जिसके चलते उन्होंने अपने ही अंदाज़ से नए मूल्य शायरी में स्थापित किए हैं। उनकी शायरी क्लासिक आशिक-माशूक की शायरी न होकर धरती पर रहते औरत-आदमी के प्रेम/नफरत  की खुरदरी ज़मीन पर लिखी गयी शायरी है। जॉन एलिया का विरह भी आज के आदमी का है जो बादलों को संदेशवाहक बनाने के बदले माशूक से सीधा मुखातिब होता है। उनका कलाम समाज द्वारा स्थापित मूल्यों के विरुद्ध गुस्से और अपनी जिद के आगे न झुकने की शायरी है। अंतत उनकी यही हट्धर्मी उनके टूटने का कारण भी बनी लगती है। तल्ख़ हालात और अपनी तबियत की संवेदना के कारण जॉन एलिया  साब खुले अराजकतावादी – शून्यवादी हो गए थे, जिनकी सदा अपने परिवेश से लड़ाई रहने लगी थी। अपने अच्छे समय में शायरी के अतिरिक्त उनके द्वारा इस्माइलिया सेक्ट पर बहुत शोधपूर्ण कार्य के साथ अन्य साहित्यिक रचनाओं का अनुवाद भी किया गया है।

जॉन एलिया साब खूब लिखते थे पर अपनी फक्कड तबियत, अलमस्तजीवन शैली और हालत से समझौता न करने की आदत के कारण इनकी पहली पुस्तक ’शायद’ मंज़र-ए-आम तक 1991 में ही आ सकी। इसके प्रकाशन में खुद जॉन एलिया साब ने खूब ढ़िलाई की और रचनाओं के चयन में ही दस से अधिक और संकलन की एडिटिंग में ही पांच वर्ष लगा दिए। खुद जॉन एलिया साब का अपने कलाम के बारे में क्या नजरिया था, देखिये -..

अपनी शायरी का जितना मुन्किर मैं हूँ, उतना मुन्किर मेरा कोई बदतरीन दुश्मन भी ना होगा। कभी कभी तो मुझे अपनी शायरी ……. बुरी, बेतुकी …… लगती है… इसलिए अब तक मेरा कोई मज्मूआ शाये नहीं हुआ.. और जब तक खुदा ही शाये नहीं कराएगा उस वक्त तक शाये होगा भी नहीं…।

नजदीकी मित्रों की काफी समझाइश से ही जॉन साब ने पुस्तक का मसौदा फाइनल किया। यह दिलजला शायर तब तक तिल-तिल मरता हुआ ज़िदा लाश बन चुका था। इस अनूठे शायर, विद्वान और मनीषी को तल्ख़ हालत ने पहले ही घायल किया हुआ था उस पर हद दर्जे के  मदिरापान ने कोढ़ पर खाज का काम कर उन्हे अर्धविशिप्त सा बना दिया था। मुशायरों और काव्यगोष्ठियों में जाना लगभग बंद करके यह शायर अपने आप में ही सिमट कर रह गया था। अगर किसी महफ़िल में पहुंचे भी तो नशे में चूर बेहाल खुद ही अपने मेंटल होने का ऐलान करते हुए। उनकी पुस्तक ’शायद’ को लोगों ने हाथों हाथ लिया, पढ़ा और सराहा। किताब के नौ संस्करण जल्द ही निकल गए। इससे जॉन एलिया साब की लोकप्रयता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। पर जॉन एलिया से तो किस्मत नाराज़ सदा से थी, शायद इसी लिए इस मुमताज़ शायर, विद्वान और अत्याधिक संवेदनशील इंसान ने 8 नवम्बर 2002 को अपने सभी प्यारों से दूर एक दोस्त के घर लंबी बीमारी के बाद, इस बेरहम दुनिया को अलविदा कह दिया।

जॉन साब की कविताओं का अगला संकलन ’यानि’ उनके मरणोपरांत सन 2003 में प्रकाशित हुआ। तदुपरांत उनके नजदीकी मित्र खालिद अंसारी द्वारा उनकी कविताएँ गुमान (2004), लेकिन (2006) और गोया (2008) नाम से पुस्तकों के रूप प्रकाशित की गईं और इन किताबों ने साहित्यिक हलकों में खासी लोकप्रिय पायी। जॉन एलिया साब ने शायरी विधा के लगभग सभी घटक ग़ज़ल, नज़्म, और कते आदि बहुत खूब लिखे हैं। जॉन एलिया  जीवन की बिसात पर तो नाकामयाब इंसान थे ही साहित्यिक दुनिया में भी गुटबंदी और अलमस्त तबियत के चलते उन्हें वो मुकाम हासिल नहीं जिसके वे हकदार थे। जॉन साब के विशाल खजाने से कुछ रचनायें सुधि पाठकों के समक्ष पेश करने की एक अदना सी कोशिश की जा रही है।

गज़ल
………….

गाहे गाहे बस अब यही हो क्या
तुमसे मिल कर बहुत खुशी हो क्या

मिल रही हो बड़े तपाक के साथ
मुझको यक्सर भुला चुकी हो क्या

याद हैं अब भी अपने ख्वाब तुम्हे
मुझसे मिलकर उदास भी हो क्या

बस मुझे यूँही एक ख्याल आया
सोचती हो तो सोचती हो क्या

अब मेरी कोई जिंदगी ही नहीं
अब भी तुम मेरी जिंदगी हो क्या

क्या कहा इश्क जाविदानी है
आखरी बार मिल रही हो क्या

हाँ फज़ा यहां की सोई सोई सी है
तो  बहुत तेज रौशनी हो क्या

मेरे सब तंज बेअसर ही रहे
तुम बहुत दूर जा चुकी हो क्या

दिल में अब सोजे इंतज़ार नहीं
शमे उम्मीद बुझ गयी हो क्या

…………………………………………………………………………………..

नज्म
……………….

तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे
मेरी तनहाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं

मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें
मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं

इन किताबों ने बडा ज़ुल्म किया है मुझ पर
इन-में एक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़हन

मुज़दा-ए-इशरत अंजाम नहीं पा सकता
ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

[ रम्ज़=जादू ,रहस्य ,मुज़्दा =अच्छी खबर ,इशरत= खुश जिंदगी ]

…………………………………………………………………………………………………..

कता
……….

शर्म, दहशत, झिझक, परेशानी
नाज़ से काम क्यों नहीं लेती

आप, वो, जी, मगर यह सब क्या है
तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेती

………………………………………………………………………

 

जॉन एलिया साब के बारे में और पढ़ने के लिये उनके ऊपर बने विकीपीडिया पेज पर दिये लिंक्स सहायक होंगे।

प्रस्तुती – (रफत आलम)

अक्टूबर 2, 2010

गाँधी : क्या खूब कारीगरी है महात्मा

ओ रे महात्मा !
एक सदी बीत गयी तुझे गाली खाते खाते
कितने सारे लोग
गाली देते हैं तुझे
जब वे बहस करते हैं
अपने कमरों में
पान की दुकानों पर
गलियों में कूचों में
होटलों में
विश्वविधालयों में
यहाँ वहाँ
इधर उधर
इस जगह उस जगह
हर जगह तुझे
गालियों से विभूषित किया जाता है।

अपनी कमजोरियों को नज़रअंदाज़ करते हुये
तेरे आलोचक कोसते हैं तुझे -
अरे बूढ़े!
तू ही तो था
जिसके कारण
भारत का बँटवारा हुआ
हम फसल काट रहे हैं
उन समस्यायों की
जिनके बीज तूने बोये थे।

लोगों को विश्वास नहीं है
अपनी साधारण समझ पर ही
परन्तु वे चुनौती देते हैं
तेरी सामाजिक और राजनीतिक समझ को
वे कहते हैं -
तू था ही ऐसा लुजं-पुंज आदमी
तभी तो झट से असहयोग आंदोलन वापिस ले लिया
अरे बाइस पुलिसिये ही तो जलाये थे
भीड़ ने,
अंग्रेजों ने क्या कम
जुल्म ढ़ाये थे
आम जनता पर?
पर नहीं तुझे भारत के लोगों के
दुख दर्द से क्या मतलब था,
तुझे तो अहिंसा के वायरस ने
बीमार किया हुआ था।

लोग कुछ नहीं करते दूसरों के लिये
पर वे तुझ पर आरोप लगाते हैं -
तू पूरी ज़िंदगी
सिर्फ और सिर्फ अपने लिये जिया
तू जिया बड़ा नाम कमाने के लिये।

लोग जो बारह से पचास तक
की आयु वाली किसी भी नारी का
अपनी वासना भरी दृष्टि से
चीर-हरण करने में हर समय
व्यस्त रहते हैं
वे ही तेरे ब्रहमचर्य के
प्रयोगों का
मज़ाक उड़ाते हैं
वे खिल्ली उड़ाते हैं तेरी-
क्यों तुझे बुढ़ापे में
कम उम्र की युवतियों के
कँधों का सहारा लेने की
आदत लगी?

हिन्दू चिल्लाते हैं -
तेरे ही कारण ये मुसलमान
इतना इतराते रहे हैं
मुसलमान जो
मोहम्मद गोरी, महमूद गजनवी, खिलजी
तैमूर, बाबर, औरंगज़ेब जैसे
दुर्दांत और क्रूर आक्रमणकारियों के
वंशज हैं
उन्हे तूने हिन्दुओं के
बराबर का मान लिया!
तू भूल गया
कैसे सदियों से हिन्दुओं को
सताया गया है
उनके सब घृणित कामों को
भूल कर तूने उन्हे
प्रेम दिया
ऐसी आततायी कौम के लोगों के
हितों के लिये
तूने आमरण अनशन किये!
जिन मुसलमानों ने भारत की
पीठ में छुरा घोंप दिया
और पाकिस्तान बना दिया
उन्ही के लिये
पचपन करोड़ की राशी देने के लिये
तू फिर से
खाना-पीना छोड़कर
खटिया पर लेट गया
धिक्कार है
तुझ पर ओ बूढ़े,
कितने घृणित कार्य थे तेरे
कितनी घटिया सोच थी तेरी
तू अवश्य ही नर्क में गया होगा
तू हड्डियों का ढ़ाँचा मात्र था
एक कमजोर आदमी
तभी तू अहिंसा के झूठे
परदे के पीछे छिपा रहा उम्र भर
गोडसे ने कितना अच्छा काम किया
तुझे मार कर
अन्यथा तू तो आजादी के बाद
देश का बेड़ा ही गर्क कर देता।
उसने एक पवित्र काम किया!

बहुत सारे हिन्दू हल्ला मचाते हैं -

नीची जातियों के जो लोग ऊँची जातियों के लोगों की
सेवा करने के लिये जन्म लेते हैं
उन्हे तूने हरिजन -ईश्वर की संतान कह दिया!
अब मज़ा देख
वही लोग अब तूझे
कोसते हैं शैतान कहकर
तू ऐसे ही व्यवहार के काबिल था।

मुसलमान भी तुझे नफरत
भरी दृष्टि से ही देखते हैं
छाती ठोककर
वे तुझे कोसते हैं और दावे करते हैं-
तू हिन्दु जन्मा था
और तूने केवल हिन्दुओं के ही हितों
का ख्याल किया उम्र भर
और तूने मुसलमानों के लिये कुछ नहीं किया।

लोग कुछ भी नहीं पढ़ते तेरे बारे में
वे इतिहास, राजनीति, मानव विज्ञान, समाज विज्ञान
कुछ भी नहीं समझते
पर वे क्षण भर भी नहीं लगाते
तेरे द्वारा किये गये कामों को नकारने में।

वे कोसते हैं
तुझे और तेरे अहिंसा के सिद्धांतों को-
अंग्रेजों ने
भारत और भारतीयों का
जमकर शोषण किया
तब भी तूने जोर दिया कि
उनके साथ अच्छा सलूक किया जाये
कितनी तुच्छ मानसिकता थी तेरी

…………….

पर बापू
एक मजे की बात यह है कि
यह सब कहते हुये
लोगों की
जुबान लड़खड़ाती है
नफरत की ज्वाला में
जलते हुये
वे कह तो जाते हैं
पर खुद उन्हे भी पता होता है कि
वे सफेद झूठ बोल रहे हैं

और सबसे बड़े आनंद की बात तो यह है
महात्मा कि
पिछले साठ सालों में
हर दल की विचारधारा और राजनीति ने
भरकस कोशिश की है कि
जनमानस तुझे भूल जाये
तेरा अस्तित्व हर राजनीतिज्ञ को
कालिख से पुता हुआ जो दिखाने लगता है
नेताओं ने भरपूर प्रयास किये हैं तुझे
अंधेरे बंद कमरों में कैद रखने के
पर पता नहीं कैसे
तुम किसी न किसी कोने से
फिर उजाला फैलाते
सामने आ ही जाते हो।

ये तुम्हारी जादूगरी है
बड़े कमाल की!

बापू, उनके जीवन और उनकी विचारधारा में रुचि रखने वाले लोग बापू को समर्पित एक वेबसाइट देख सकते हैं

…[राकेश]

अगस्त 14, 2010

पाकिस्तान : बाढ़ का प्रकोप – चंद तस्वीरें

प्रकृति का प्रकोप मानव को यदा कदा सहना ही पड़ता है और ऐसे समय मानव विवश खड़ा दिखायी देता है। विकसित देश अपनी सामर्थ्य और बेहतर प्रबंधन के बलबूते अपनी जनता को कम से कम हानि और परेशानी पहुँचने देते हैं जबकि विकासशील और गरीब देशों में प्राकृतिक प्रकोप कहर बन कर लोगों पर टूट पड़ता है।

इन गरीब और विकासशील देशों का दुर्भाग्य है कि सर्दी, गरमी और बरसात तीनों ही तरीके के मौसम में इन्हे प्राकृतिक प्रकोप की विभीषिका सहनी पड़ती है। प्रकृति के साथ मानव की छेड़छाड़ भी इन प्राकृतिक प्रकोपों को जब तब आमंत्रण देती रहती है।

इन विभीषिकाओं से परे सरकारों का प्रबंधन विचार करने का मुद्दा है।

नीचे दिये गये लिंक में दी गयी तस्वीरें देखें और बाढ़ के द्वारा दर्शायी गयी विनाश लीला को देखें।
चित्र इतने सजीव हैं मानो हरेक चित्र चित्कार कर रहा हो।

पाकिस्तान में बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों की तस्वीरें

ऐसे समय एक प्रश्न तो उठता ही है कि उसकी बेहतरीन कला की तारीफ कैसे करें क्योंकि कला एक भयानक ट्रेजडी से उत्पन्न दुख और पीड़ा  को उसके नग्न रुप में हमारे सम्मुख रख रही है। इतना विनाश देख कर पीड़ित हो चुके दिल और दिमाग तारीफ करने के काबिल नहीं रहते।

इन चित्रों से कहीं लगता है कि पाकिस्तान कुछ अलग है हमारे भारत से या वहाँ के लोग अलग हैं?

ऐसे ही लाचार लोग वहाँ भी हैं जैसे हमारे यहाँ।

बच्चों के गालों पर आँसू ऐसे ही सूख गये हैं जैस हमारे यहाँ सूख जाते हैं।

कुछ समय पूर्व प्रकाशित, श्री कृष्ण बिहारी जी की कविता मेरे गाँव का मुकद्दर कितना सटीक चित्रण करती है ऐसे माहौल का!

जुलाई 10, 2010

कारगिल और भारत-पाक शांति प्रयास

पाक शायर अहमद फ़राज़ को (दूसरा शुक्रवार, जुलाई 1999)

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तुम्हे ग़म था
कि पहले खिल न सके
किसी जानिब मोहब्बतों के पड़ाव
कि शाखे अमन लिये कोई फाख्ता नहीं आयी|

तुमने कहा था कि भारतीयों की आन का सवाल है तो
तुम ही हाथ बढ़ा दोगे दोस्ती के लिये|

हमारे शायर को तुम्हारे बढ़े हाथ लगे
ग़म गुसार के हाथ|

दोस्ती के प्रस्ताव से गदगद देश का प्रधानमंत्री
गया लेकर बनारस की सुबह रोशन
तुम्हारे गुलशन-ए-लाहौर में|

दोस्ती के मधु के स्वाद से उनींदे देस की पीठ में
वार किया तुम्हारे वतन ने फराज़|

फैलायी थी हंस सी श्वेत चादर हमने
सोचकर कि
दोस्ती की नई इबारत लिखेंगे
वतन ने तुम्हारे उसे खून से रंग दिया|

कहा था तुमने कि तुम्हे नाज़ है कर्बला लड़ा तुमने
पर कैसे रसूल के नाती के पक्ष का मान लें तुम्हारे हमवतनों को?
वे तो दोस्ती के लिये विनीत झुके हुये की पीठ में छुरा नहीं घोंप सकते थे
बचा यजूदी का पक्ष!
खुद निर्णय कर लो किस तरफ खड़े दिखायी देते हैं वे लोग
जिनकी तरफ से तुम आये थे?

हमारी तो विरासत है जानकर विष पीने की
सो नीलकंठ बने बैठे हैं|

तुम्हे दिखायी न दिया हो तो चेताना
हमारा फर्ज है
नफरत के ज्वालामुखी पर खड़ा तुम्हारा देश
भस्मासुर बन गया है
और एक दिन यह अपने ही बनाये
तेजाब से गल जायेगा|

कसक जरुर रह जायेगी धोखे की
पर देर सवेर भर जायेगा
हमारे वतन की पीठ का घाव
पर
तुम्हारे वतन के हाथ से
बेगुनाहों का रक्त
छुटाये न छुटेगा।

{देश पर थोपे गये व्यर्थ के युद्ध में जान लड़ा देने वाले सैनिकों को समर्पित}

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…[राकेश]

पृष्ठभूमि : एक तरफ तो भारत की तरफ से सदभावना यात्रायें भेजी जा रही थीं पाकिस्तान से दोस्ती करने के लिये और दूसरी तरफ सन 1999 के मई माह में पाकिस्तान ने कारगिल पर आक्रमण कर दिया था। “शक्ति” और “गौरी” के समय कविताओं के माध्यम से दोस्ती के पैग़ाम भेजने वाले कवियों (अहमद फराज़ और अली सरदार जाफ़री) और अन्य कलाकारों पर क्या बीती होगी इस कारगिल युद्ध से? यह पता नहीं चलता क्योंकि इस विषय पर उनकी कवितायें प्रकाश में नहीं आयीं। कलाकारों को आशावान होना पड़ता है। पर कलाकारों को अपने देश और समाज में फैली बुराइयों और अपने देश और समाज द्वारा किये गये गलत कार्यों की भर्त्सना भी करनी चाहिये तभी समाज में चेतना का फैलाव होता है। यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनके पुराने प्रयास जो उन्होने तुलनात्मक रुप से शांति काल में किये थे झूठे न भी लगें पर कमजोर और वास्तविकता से कोसों दूर जरुर लगने लगते हैं। अगर अहमद फराज़ 1998 में पाकिस्तान के प्रतिनिधि बन कर भारत आये थे और कविता के माध्यम से पैग़ाम दे रहे थे तो 1999 में भी उनका फर्ज बनता था कि अपने देश द्वारा किये कारगिल जैसे कृत्य पर भी कुछ कहें, तभी एक कलाकार का सच्चा धर्म निभ सकता है और यही बात तमाम कलाकारों पर लागू होती है। पर ऐसा भी देखा गया है कि वे अपने प्रयासों में ऎच्छिक हो जाते हैं पर एक कलाकार की संवेदना ऎच्छिक नहीं हो सकती। या तो एक कलाकार की संवेदना इंसानियत से जुड़े सारे मामलों में जाग्रत रहती है या फिर संवेदना का उपयोग सूक्ष्म किस्म की राजनीति करने के लिये किया जाता है या फिर कलाकार की संवेदना निष्क्रिय हो गयी गयी होती है। जब कलाकार राजनीति के सामने कमजोर पड़ जाते हैं तब तुच्छ राजनीति समाज को अपने कब्जे में ले लेती है और तब किसी का भला नहीं होता सिवा नेताओं को तात्कालिक लाभ पहुँचने के। कारगिल की इसी पृष्ठभूमि पर, जब कलाकार, जो कि कुछ अरसा पहले Dove Talk आदि के माध्यम से भारत-पाक दोस्ती के लिये बड़े मुखरित रुप से प्रयास कर रहे थे, चुप थे, तो उस चुप्पी से उत्पन्न असंतोष के कारण उपरोक्त्त कविता का जन्म हुआ था।

भारत को तो जो भी नुकसान उठाना पड़ा है इन तमाम बरसों में पाकिस्तान की भारत में अलगाव फैलाने की गतिविधियों की वजह से वह अपनी जगह है परन्तु पाकिस्तान के आज के हालात बखूबी दर्शा रहे हैं कि कट्टरता की आँधी में अंधे होकर बह जाने से उसका कितना बड़ा नुकसान हुआ है। 1999 के जुलाई माह के दूसरे शुक्रवार को लिखी गयी कविता पाकिस्तान के वर्तमान हालात, जो कि देश को विध्वंस की ओर जा रहे प्रतीत होते हैं, को देखते हुये कुछ हद तक सही प्रतीत होती है। भारत के लिये भी यह चेतावनी है कि अँधी कट्टरता भारत को भी ऐसे ही विध्वंस के रास्ते पर ले जायेगी। भारत की विरासत कट्टरता की नहीं है और अँधे होकर झोंक में एक ही विचारधारा के साथ बहने की तो बिल्कुल भी नहीं है।

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पाक शायर अहमद फराज़ की कविता को यहाँ पढ़ सकते हैं

भारतीय शायर अली सरदार जाफ़री की कविता को यहाँ पढ़ सकते हैं

जुलाई 8, 2010

भारत पाक शांति प्रयास : पाक शायर अहमद फरहाज़

बीती सदी में नब्बे के दशक के अंत में जब भारत और पाकिस्तान अपने अपने परमाणु अभियानों क्रमश: “शक्ति” और “गौरी” की आँच से तप रहे थे तो ग़ालिब के दो सदी बाद मनाये जाने वाले जयंती समारोह “अंदाज-ए.बयां” की मार्फत मशहूर पाक शायर मरहूम अहमद फराज़ साब द्वारा पढ़ी गयी निम्नलिखित कविता प्रकाश में आयी थी।

गुजरे कई मौसम, कई रातें बदलीं
उदास तुम भी हो यारों उदास हम भी हैं
फक़त तुम्ही को नहीं रंज-ए-चाक-दामानी
सच तो ये है कि दारीदाने-लिबास हम भी हैं…

तुम्हे भी जिद है कि मश्के-सितम रहे जारी
हमें भी नाज़ कि ज़ोरो-जफ़ा के आदी हैं

तुम्हे भी जाम कि महाभारत लड़ी तुमने
हमें भी नाज़ कि कर्बला के आदी हैं।

ना खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के पड़ाव
ना शाखे अमन लिये कोई फाख्ता आयी…

तो अब ये हाल है दरिंदगी के सबब
तुम्हारे पाँव सलामत रहे ना हाथ मेरे

ना जीत तुम्हारी ना कोई हार मेरी
ना साथ तुम्हारे कोई ना कोई साथ मेरे…

तुम्हारे देस में आया हूँ दोस्तों अब के
ना साज़ो-नग्मों की महफिल ना शायरी के लिये

अगर तुम्हारी आना ही का सवाल है तो
चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिये।

{Dove Talkअहमद फराज़}

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भारतीय शायर मरहूम अली सरदार जाफ़री साब द्वारा अहमद फराज़ साब के कलाम के जवाब में पढ़ी गयी कविता यहाँ पढ़ें।

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