मत करो मुझसे इस समय
प्यार की बात,
बहुत मजबूरियाँ हैं,
पिता नहीं हैं
माँ बूढ़ी है
सबसे छोटी बहन फलाँगते हुये
चढ़ गयी है सीढ़ियाँ उम्र की
और छोटा भाई
डिग्रियों का बोझ लादे
बेकार है।
करनी है बहन की शादी
लगाना है भाई को
रास्ते पर
देखना है घर-परिवार,
ऐसे में
क्या करुँ मैं तुमसे
प्यार की बात
ज़िंदगी में बहुत कुछ है
प्यार से ऊपर,
जिन्हे जिम्मेदारियाँ कहते हैं!
मैं भी चाहता हूँ
कुंतला,
येलोकेशी,
जिसके अंग सुते हुये हों साँचें में
एक गौरांगी प्रिया
जो लम्बी हो,
स्लिम हो
गहरी नाभी और सपाट पेट वाली हो
जिसकी कमर मेरी बाहोँ के घेरे में आने से शरमाए
जो मुझे चाहे मेरी तरह।
हर भारतीय नौजवान की तरह
मुझे भी लुभाती है हर यौवना।
मगर यह संभव नहीं है
हकीकतें ज़िंदगी से बड़ी हैं।
देश में
जिस वक्त्त हर मोर्चे पर
हो रहा हो अनवरत भ्रष्टाचार
और जहाँ घर में
बैठी हो जवान बहन
भाई बेकार
वहाँ मैं कर सकता हूँ
केवल
क्रांति
पर नहीं कर सकता प्यार
फिलहाल इस समय एक युवती से।
{कृष्ण बिहारी}





