Posts tagged ‘maa’

जुलाई 26, 2011

प्यार की बात

मत करो मुझसे इस समय
प्यार की बात,
बहुत मजबूरियाँ हैं,
पिता नहीं हैं
माँ बूढ़ी है
सबसे छोटी बहन फलाँगते हुये
चढ़ गयी है सीढ़ियाँ उम्र की
और छोटा भाई
डिग्रियों का बोझ लादे
बेकार है।

करनी है बहन की शादी
लगाना है भाई को
रास्ते पर
देखना है घर-परिवार,
ऐसे में
क्या करुँ मैं तुमसे
प्यार की बात
ज़िंदगी में बहुत कुछ है
प्यार से ऊपर,
जिन्हे जिम्मेदारियाँ कहते हैं!

मैं भी चाहता हूँ
कुंतला,
येलोकेशी,
जिसके अंग सुते हुये हों साँचें में
एक गौरांगी प्रिया
जो लम्बी हो,
स्लिम हो
गहरी नाभी और सपाट पेट वाली हो
जिसकी कमर मेरी बाहोँ के घेरे में आने से शरमाए
जो मुझे चाहे मेरी तरह।
हर भारतीय नौजवान की तरह
मुझे भी लुभाती है हर यौवना।

मगर यह संभव नहीं है
हकीकतें ज़िंदगी से बड़ी हैं।
देश में
जिस वक्त्त हर मोर्चे पर
हो रहा हो अनवरत भ्रष्टाचार
और जहाँ घर में
बैठी हो जवान बहन
भाई बेकार
वहाँ मैं कर सकता हूँ
केवल
क्रांति
पर नहीं कर सकता प्यार
फिलहाल इस समय एक युवती से।

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 24, 2011

माँ के ये लाल

बचपन में
माँ का दुलार छला

जवानी में
छाती पर मूंग दली

चिता का सामान बनी
जो होनी चाहिए थी
बुढापे की लकड़ी।

(रफत आलम)

जुलाई 23, 2011

कल और आज

अब कोई चरवाहा
बाँसुरी की सुरीली तान पर
प्रेम गीत नहीं गाता
और न ही कोयल कूकती
चिड़िया भी बहुत कम चहचहाती है
घर की चहेती गाय
जिसका दूध कई पीढ़ियों तक
अमृत पान की तरह पिया
उसके  ढूध न देने के बाद
उसे बेकार समझकर
सडकों पर आवारा घूमने
धक्के और डंडे खाने के लिए
बेसहारा छोड़ दिया
अब कोई बच्चा भावुकता भरे स्वर में
माँ को
अम्मा कहकर नहीं पुकारता
अब खेत में स्वस्थ लहलहाती फसलें नहीं
कीटनाशकों को पीने वाली
नशीली फ़सलें उगती हैं
गांव में बड़े बूढ़ों की
अब कोई चौपाल नहीं बैठती
जिसमे कभी
सुख दुःख की बातें हुआ करती थीं
अब तो घर में
बूढ़ों को बोझ समझकर
बच्चे भी उनको धक्के मारते हैं
और कुत्ते की तरह
उनको दूर से रोटी फेंकते हैं
और जवान ये सब
मौन होकर देखतें हैं
ये सब देखकर
मेरे मन में
बस रोज यही सवाल
घूमता है कि
ये इन्सानियत की नयी उन्नति है
या फिर
उपभोक्तावाद की लादी हुयी बेबसी
कुछ भी हो
मेरे पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं कि
शरीर ढ़ोया जा रहा है
या फिर
जीवन धीरे धीरे बेमौत मर रहा है
यदि उपभोक्तावाद से बेबस व्यक्ति
केवल शरीर ढ़ो रहा है
और चेतना कहीं
अंधकार के गर्त में खो गयी है
तो यही कहना होगा कि
उपभोक्तावाद की इस भयानक आंधी में
यदि तुम चेतना के
दीपक की लौ अपने घर के अंदर भी
जलाए रख सको तो भी
सत्य तुम्हे इस साहस के लिए भी
दुगुनी हिम्मत, ताकत देगा
और तुम यह हिम्मत कर बैठोगे कि
तुम्हे शरीर ढोने वाली
उधार की ज़िंदगी नहीं
बेशक दिन में कुछ पलों के लिए ही सही
मानवीय संवेदना वाली
कुदरत की दी हुई
स्वाभाविक ज़िंदगी जीनी है!

(अश्विनी रमेश)

जुलाई 15, 2011

संस्कार

हमेशा
हर बार की तरह
आज भी मैं
अपनी माटी और माँ
की शरण में
अपने गांव और घर पहुंचा हूँ
पुनः अपने भीतर
वही जान फूंकने
जिसे मैंने अपनी माटी
और
माँ के सहारे
अपने संघर्षमयी जीवनपथ पर
चलते हुए
अटूट साहस और धैर्य से
अर्जित करके
जीवन के कठिनतम क्षणों को भी
बड़े धैर्य और शालीनता से
जिया है
पहाड़ों की कोख में बसी
माँ का शरीर
उम्रदराज हुआ तो क्या
हिमालय सा मजबूत
इरादे वाला उसका दिलों-दिमाग
अभी भी डगमगाया नहीं
थका नहीं
पहले की तरह
मुझमे अभी भी
माँ का वही अदब है
इस बार भी थोड़ा
बतियाने के बाद
माँ कह रही है
शाम को खेतों का चक्कर काट आना
फसल देख लेना
कैसी उगी है|

मुझे याद है
बचपन में जब माँ
हम सब बच्चों को
स्कूल की छुटी के बाद
खेत में मक्की काटने
और
आलू खोदने ले जाया करती थी
और जब स्कूल छूटा तो
दोपहर में आराम के बाद
यह अदब कि
माँ अभी आवाज़ देगी
तीन बज गए
क्या सोकर जीवन कट जाएगा
अब उठ जा
खेत जाना होगा

माँ के ये शब्द
हमेशा मुझे
आलस्य की नींद से
जगाते रहें हैं
अपनी माटी और माँ के
एक अटूट संस्कार को
जीने के लिए
सोचता हूँ
गर में अपनी माटी और माँ के
इस संस्कार को न जीता
तो शायद मैं
एक संस्कार रहित
अधूरा व्यक्ति होता
जिसे यह मालूम न होता कि
माटी के अन्न
और माँ के संस्कार का
संघर्षमयी जीवन में
एक व्यक्ति को
सार्थक व्यक्ति बनाने में
कितना अर्थपूर्ण
और
अद्वितीय
योगदान होता है !

(अश्विनी रमेश)

मई 4, 2011

अखबारों की सुर्खियां बनते जीवन

पंख उगते  ही उड़ान भर गए बच्चे सब
कोई बताये अब आशियाने का क्या करूँ
अरसे बाद डाकिया आया है घर की तरफ
चिट्ठी मेरी भी आई क्या जा के पता करूँ
…..

बेटे विदेशों से रस्मन लोट कर आये हैं
किसी की भी आँख नीची नहीं है शर्म से
तीये की बैठक ज़रूर ए.सी हाल में होगी
बाप की अर्थी चाहे निकली वृद्धाश्रम से
…..

माँ आया बच्चों की, बाप चौकीदार मकान में
बेटों की जान अटकी है हुस्ने बीबी जान में
दुनिया दिखावे के वक्त ज़रूर होगा दिखावा
चन्दन में फूकेंगे पहुँचा कर इन्हें मसान में
…..

दो बहनों का अखबार में पढ़ा था किस्सा
राखी के रखवाले ने उन्हें भूखा मार दिया
दूध के रिश्ते ही जब इतने ज़हरीले हो गए
पड़ोस की संवेदनहीनता से क्या हो गिला
…..

कल था अखबार में एक बहिन का किस्सा
पागलखाने वाले कहते हैं यह बीमार नहीं
बेचारी पर तकदीर का अत्याचार तो देखिये
सगे भाई भी उसे अपनाने को तैयार नहीं

(रफत आलम)

अप्रैल 20, 2011

बाबाजी, मैं और औरत

बाबाजी
तुम ब्रह्मचारी
तुम्हारी सोच के अनुसार
औरत नरक का द्वार।

लेकिन
मैं तो ब्रह्मचारी नहीं
दिखने में भी
ढ़ोंगी- पुजारी नहीं
मेरे लिये तो
हर औरत खूबसूरत है
बशर्ते यह कि
वह औरत हो।

तुमने जिसे नकारा
धिक्कारा
और अस्पर्श्य विचारा है
उसके आगे मैंने तो
समूचा जीवन हारा है।

मेरी दृष्टि से देखो कभी
तो जानोगे
नरक का वह द्वार
कितना प्यारा है।

सिर से पाँवों तक
औरत में क्या नहीं
कभी देखो तो सही
दूर से उसके लहराते कुंतल
सुराहीदार गर्दन
गालों में गड्ढ़े
ओठों पर हलचल
कंधों से नीचे
कमर के कटाव
और कमर से नीचे
नितम्बों के भराव
हटती नहीं है दृष्टि
अगर फंस जाये
दैहिक आकर्षण में।

बाबाजी
कुछ तो सोचो
क्या रखा है तुम्हारी सोच,
और ऐसे ही जिये जाते,
किये जाते आत्मतर्पण में?
कभी ध्यान से देखो
औरत के वक्ष
और सोचो कि
ईश्वर ने उन्हे केवल
बच्चे के हाथों का खिलौना
या फिर उसके लिये
दूध का भरा दोना
ही बनाया है
या फिर पुरुषों की नज़रों को
चकाचौंध, हतप्रभ या फिर
आबद्ध स्थिर करते हुये
अद्वतीय सौन्दर्य दिखाया है।

बाबाजी
प्रकृति को कभी
कपड़ों का बोझ ढ़ोते देखा है?
नदी को अपनी अनावृत्त
बासन्ती देह धोते देखा है?
सांगोपांग स्नान करती नदी को
नहाते हुये देखो।

बाबाजी
महसूसो पुरुष होने की वासना
जिओ एक जीवन पूरा
कहते हैं कि
औरत के बिना
की गयी पूजा
मनाया गया उत्सव
होता है आधा-अधूरा।

हर औरत माँ   नहीं होती
बहन नहीं होती
मित्र नहीं होती
बीवी नहीं होती
पर
हर औरत
औरत अवश्य होती है।

उसके लिये भी
हर शख्स पिता नहीं होता
भाई नहीं होता
वह भी सोचती है
बहुत कुछ खोजती है
आदमी में।

कैसी विडम्बना है कि
उसे आज तक
अपना पुरुष
अपने ढ़ंग से मिला नहीं
मगर ताज्जुब है कि
उसके ओठो
पर गिला नहीं।

बाबाजी
एक बात और
मैं अधम और कामी
मुझ पर हावी
कमजोरियाँ और इंद्रियगत गुलामी
इसलिये मेरी ही दृष्टि को
मत अपनाओ
औरत के बारे में जो संतों ने कहा है -
बूड़ा वंश कबीर का…
नारी की झाईं परत…
औगुन आठ सदा उर रहहीं…
भूल जाओ
कुछ व्यापक और
मौलिक दृष्टिकोण बनाओ।

देखो उसे सोचो उसे
भाषा और भूमि से परे
वह मात्र खेती ही नहीं
बेटी भी है।
उसकी शुचिता और
रक्षा की जिम्मेदारी
भावी समाज के निर्माण में
उसकी रचनात्मक हिस्सेदारी
हम पर नहीं तो किस पर है?

{कृष्ण बिहारी}

मार्च 14, 2011

खून सफेद…

दिखत में लाल है पर खून सफेद
कैसा रिश्ता नाता हर घर खून सफेद

माँ के बेटों में है रिश्ता भाई का
आये हैं परन्तु लेकर खून सफेद

पुरखों के संस्कार ऐसे तो नहीं थे
कैसे आया अपने भीतर खून सफेद

तौबा यार आज के निष्ठुर रिश्तों से
हमने पाया सबके भीतर खून सफेद

संबंधों की मौत के दिन पर्दा उठा
सब संबंधों के है अंदर खून सफेद

छले गए लोग सियारी मुस्कानों से
किसे दिखा दिल के भीतर खून सफेद

सांस के चलते सुध कहाँ ली बेटों ने
छलका माँ के कफ़न पर खून सफेद

खूनी छुरा खुद की आस्तीन का था
शर्मिदा हुआ कब मगर खून सफेद

हो गया अपना दर्द पराया ए आलम
रिश्ते तो सच्चे थे मगर खून सफेद

(रफत आलम)

जून 7, 2010

शिशु जन्म : ममता नहीं सुरक्षित केवल स्त्री के लिये

शिशु को जन्म देने का विशेष अहसास ही ऐसा प्रतीत होता है जो मानव और पशु दोनों वर्गों की स्त्री प्रजाति में एक जैसा है। एकदम शांत किस्म के जानवरों की मादाओं को भी अपने नवजात शिशु की रक्षा के लिये आक्रामक रुख अपनाते हुये देखा गया है।

नीचे दिये गये वीडियो में देखा जा सकता है कि धरती की सतह पर चलने वाले सबसे बड़े चौपाये जीव समूह की मादा हाथी कैसे अपने अभी अभी जन्मे शिशु हाथी के निश्चल पड़े शिशु की काया को देख वह बैचेन हो उठी है और अपने शिशु को साँस लेने के लिये प्ररित करने के लिये किये प्रयासरत हो जाती है। बिना देखे हुये भी अपने विशाल शरीर को मादा हाथी इस तरह से हिला डुला रही है जिससे शिशु के ऊपर उसका पैर न पड़ जाये। उसकी सहायता के लिये कोई डाक्टर या नर्स या दाई नहीं है। सब कुछ उसे अपने आप ही करना है। उसे जीवन की पहली साँस लिवाने के बाद वह इस बात के लिये प्रयासरत है कि अब उसका शिशु अपने मुँह से कुछ आवाज निकाले और सब कुछ सामान्य करने के बाद वह शिशु को अपने पैरों पर खड़ा होने के लिये प्रेरित करने में लग जाती है और तभी चैन की साँस लेती है जब शिशु के साथ सब कुछ सामान्य हो जाता है। उसके प्रयास संवेदनशील ह्र्दय वाले व्यक्तियों की आँखों में आँसू ला सकते हैं।

वाह! प्रकृति कितनी खूबी और खूबसूरती से सब जीवों को संभालती है।

सावधानी की नैतिक सलाह : अगर किसी को शिशु के जन्म लेने की प्रक्रिया देखने में अजीब महसूस होता है तो वे कृपया इस वीडियो को न देखें हाँलाकि यह भी सच है कि न देखने वाले एक विलक्षण दृष्य को देखने से वंचित रह सकते हैं।

मई 20, 2010

मातृत्व की विरासत

माँ,
क्या कभी भी बड़ी हो पाती है अपने बच्चों की बढ़ती उम्र के साथ?
क्यों उसके अन्दर आधुनिक जमाने की समझदारी नहीं आती?

बड़े होकर बच्चे अपनी अपनी राह पकड़ कर चल देते हैं
वे आगे चले जाते हैं अपनी जिन्दगी जीने
माँ को पीछे छोड़कर।

माँ जानती है इस बात को शुरु से
पर फिर भी वह क्यों नहीं अपनी जिन्दगी जीती?

वह तो खाना भी वही खाती है
जो उसके दूध के रास्ते बच्चे को नुकसान न पहुँचाये।

बड़े होते बच्चे इस बात को नहीं समझ पाते कि
माँ ने कितनी ही रातों की नींद त्याग दी थी
उन्हे शांति से सुलाने के लिये।

वे नहीं जान पाते इस बात को कि
माँ बिस्तर के उस हिस्से पर लेटी रहीं
जो उन्होने गिला किया था
और उन्हे सूखे में आराम से सुला दिया गया था।

जब भी प्रश्न बच्चों का आता है,
मेरा, अपना, सिर्फ मेरे लिये जैसे शब्दों से
हरदम घिरी रहने वाली दुनिया में
माँ ही क्यों इन शब्दों को महत्व नहीं देती?

इस रहस्य को लोग तब समझ पाते हैं
जब उनके अपने बच्चे हो जाते हैं
तब वे समझ पाते हैं कि
किसी माँ के लिये अपने
बच्चों के जीवन को ऊपजाऊ बनाने के लिये
खुद को खाद बनाने का मतलब क्या होता है?

…[राकेश]

मई 3, 2010

नेह भरा काजल

बचपन,
कभी लगता है कि बस अभी ही तो बीता था,
और आज भी इतना पास है कि हाथ बढ़ाया और छू लिया,
और कभी लगता है कि किसी और ही जन्म में
बचपन भी जीवन में आया था।

पर जब जब बचपन
इसी जन्म की बात लगता है,
तब यह आकर बिल्कुल पास में बैठा रहता है,
आज फिर से यह सखा बन कर तन-मन को स्पर्श करे बैठा है|

कौंच कौंच कर याद दिला रहा है,

माँ अक्सर उस दिए से कालिख लेकर,
जो वह पूजा के लिए देसी घी से जलाया करती थी,
मेरी आँखों में काजल लगाया करती थी,
कहा करती थी,
काजल लगाने से
आखें बड़ी होंगी,
नजर कमजोर नहीं होगी,
और
जमाने की बुरी निगाहों से बचायेगा काला काजल|

इतने बरस बीत गए,
बचपन पीछे छूट गया,
पहले अपने घर से दूर आना पड़ा,
फ़िर अपने शहर से दूर आना पड़ा,
शिक्षा लेने की जरुरत जो न करवा दे,
फ़िर एक दिन अपने देश से भी दूर आना पड़ गया|

माँ आज बहुत याद आ रही है,
आज माँ का काजल लगाना भी याद आ रहा है,
आज बचपन बहुत याद आ रहा है,
साथ याद आ रही है एक एक बात,
जो बीते ज़माने की है,
पर लगती बिल्कुल अभी की हैं|

एक स्नेह भरे काजल की याद,
जाने कहाँ कहाँ ले जाती है,
एक ममता भरा स्पर्श,
जो यूँ तो हमेशा साथ रहता है,
पर केवल एक अहसास की तरह,
और उसके भौतिक साथ की
जरुरत अक्सर महसूस होती है,
आज इतने बरसों बाद
आसुओं ने बहा दिया जिसे,
जाने वह माँ का लगाया काजल था
या उसके स्नेह भरे सुरक्षा कवच का अहसास|

…[राकेश]

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