Posts tagged ‘Krishna Bihari’

फ़रवरी 14, 2012

प्रीत

प्रीत जन्म है प्रीत मरण है प्रीत धरा है  प्रीत गगन है

प्रीत छाँव है प्रीत तपन है प्रीत मधुर वह आलिंगन है

जिसको सबने किया नमन है!

प्रीत मधुरिमा प्रीत अरुणिमा प्रीत अमावस प्रीत पूर्णिमा

प्रीत ह्रदय में सूर्य-चन्द्र सी उदय – अस्त में यही लालिमा

प्रीत-रीत से अलग खड़ी- सी हर इक मन की ही दुल्हन है!

प्रीत रुदन है प्रीत गीत है प्रीत हार है प्रीत जीत है

कहीं मुखर है कहीं मौन है प्राणों का आधार प्रीत है

देह और मन के जुड़ने से बनी धरा पर यह वंदन है!

जड़-चेतन में यही चेतना प्रीत खुशी है प्रीत वंदना

प्रीत आदि है प्रीत अंत है कहीं ऊपरी कहीं साधना

सघन वृक्ष की तरह जगत में आवारों का प्रीत भवन है!

प्रीत गंध है प्रीत डगर है प्रीत गाँव है प्रीत नगर है

यह गोरी है यह चूनर है कहीं सिंधु है कहीं लहर है

प्रीत कहीं पर धुल हो गयी कहीं माथे पर यह चंदन है!

कालिदास में यह शकुंतला मीरा में यह कहीं किशन है

ताजमहल की यही नायिका शाहजहां का एक सपन है

माने कोई बात अगर तो प्रीत ह्रदय का ही दरपन है!

प्रीत कहीं सरनाम हुयी है प्रीत कहीं बदनाम हुयी है

प्रीत कहीं गुमनाम हुयी है प्रीत कहीं नीलाम हुयी है

लेकिन इसके बावजूद भी प्रीत जगत का अंतर्मन है!

जाने कितनी भरी पोथियाँ बात प्रीत की करते-करते

जाने कितने युग बीते हैं बात प्रीत की करते-करते

मेरे तो मौलिक चिंतन में सरल-कठिन-सा यह दर्शन है!

प्रीत राधिका प्रीत भवानी घनानन्द की आम- कहानी

प्रीत शूल है प्रीत सुमन है प्रीत चैन है प्रीत चुभन है

प्रीत तपस्या प्रीत यातना यह जीवन की सरस साधना

पिघल गए पाषण जिसे सुन आहत मन का वह क्रंदन है!

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 10, 2012

तुम्ही बताओ क्या होगा?

जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?

रजनी-गंधा देह तुम्हारी
मन गंगा का पानी
जी चाहे तुम पर मैं लिख दूं
कोई प्रेम कहानी |

जब ऐसा अदभुत रूप नयन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

बेले में है खुशबू तुमसे
रूप में रंग तुम्हारा
रंग और खुशबू का बोलो कैसे हो बंटवारा
जब इतनी कठिन घड़ी उपवन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

केश तुम्हारे रेशम – रेशम
भौंह लचकती डाली
मधु- प्याले से नयन तुम्हारे
ओठ उषा की लाली
जब इतनी रूप-राशि दर्पण के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

यह तो शायद तुम ही जानो कौन बसा है तुम में
तुम्हे देख कर मैं यह मानूं
अघट नशा है मुझमें
जब बारिश की दो बूँद तपन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?

{ कृष्ण बिहारी }

सितम्बर 5, 2011

मास्टर, डॉक्टर और पुलिस - भ्रष्टाचार के तीन स्त्रोत

वह एक पुलिस का सिपाही है
जो तलाश रहा है
एक सभ्य नागरिक
जिसकी ज़ेब से निकलवा सके
वह आखिरी नोट।

और

वह जो बंगला है ना
सामने
मेडिकल कॉलेज के एक
डॉक्टर का है
वहाँ जो भीड़ है
वह पागलों की है
बीमारों की है
मरीजों के साथ साथ उनके परिजन भी
बीमार हो गये हैं।
पागलों का इलाज करते करते
डॉक्टर भी हो गया है पागल पैसे के पीछे।

और

ये महाश्य जो अभी अभी घड़ी देखते
तेजी से घर से निकले हैं
वो रहे…
वो नाक की सीध में बढ़ते हुये
अध्यापक हैं
उन्हे पढ़ानी है ट्यूशन
फेल करते हैं बच्चों को एक एक नम्बर से
हर वीकली टैस्ट में
डर जाते हैं माँ-बाप
डर जाता है पूरा समाज
और पढ़ने लगता है ट्यूशन

ताकि हो सके सभ्य
और हो जाये पागल
दे सके ज़ेब का आखिरी नोट
किसी पुलिसिये को
किसी पागल डॉक्टर को
या फिर मास्टर को।


समाज को ये तीनों ही बचायेंगे…
फिर खायेंगे।


{कृष्ण बिहारी}

अगस्त 8, 2011

अदभुत चाँद

बाईस नवम्बर उन्नीस सौ निन्यानवे का चाँद
अभी-अभी देखकर लौटा हूँ
शेरटन होटल के सामने से
दिन बुधवार
शाम के साढ़े सात बजे हैं।
अंतरिक्ष का भेद बताने वालों ने बताया था पहले से कि
यह चाँद अब तक दिखने वाले चाँदों में
सबसे बड़ा दिखेगा।

पूरा चाँद
एक थाल…नहीं,
एक परात बराबर
लगा कि मेरी दादी ने उसे
राख से माँज दिया हो।
मैंने अपनी दादी को नहीं देखा
मगर आज चाँद को देखकर लगा कि
दादी को देख लिया।
माँ कहती है कि
मेरे जन्म के तीन महीने बाद ही दादी गुजर गई।
लेकिन आज चाँद को देखते ही
वह सब याद आया जो दादियाँ सुनाती आयी हैं।

चाँद की सीमाओं में धान कूटती बुढ़िया
चूल्हे के पास से परथन के बराबर पड़े गुंथे आटे में
दाँत मारती चुहिया
सुना हुआ सब कुछ मुझे आज के चाँद में दिखा।
सुना हुआ न दिखता तो कितना विकृत और विद्रूप लगता
सुने हुए में कल्पना समाहित होती है।
आज का परात बराबर चाँद
मैंने बचपन में अपने गाँव की
बहन-बेटियों की शादी में देखा था
उसमें रखकर सब्जियाँ और पूरियाँ परोसते थे लोग
आज लगा कि उसी परात को दादी ने
राख से माँज दिया है।
यह बाईस नवम्बर उन्नीस सौ निन्यानवे का चाँद है
रोज से बड़ा और रोज से साफ।

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 18, 2011

दहशत

आजकल मै डरा हुआ हूँ
यह एक रचनाकार का डर है
शब्द ही नहीं मिलते मुझे कि
लिखूँ
विज्ञापन में नंगी देह दिखाती युवती की
विशेषतायें क्या हैं।
उसकी वाइटल स्टेटिस्टिक्स मुझे किस तरह
लुभाती है
कि मैं दो बच्चों का बाप,
और बच्चे भी बड़े हो गये हैं
किस तरह महसूसता हूँ ऐसे पलों को।

सुगंधित साबुन से नहाती युवती की
महकती देह
सुडौल गोल और चिकनी जाँघों को
सहलाना चाहता हूँ,
स्क्रीन पर ही सही
तो क्या यह पाप है?

मुझे औरत की छातियाँ और गोलाइयाँ
खींचती हैं अपनी ओर
उनके आधे-अधनंगे ब्लॉउजों में
जहाँतक झाँक सकता हूँ
डाल देता हूँ आँखें
दिखते सौन्दर्य को न देखना
उसका अपमान है।

सौन्दर्य भी तो वस्तु नहीं
आँखों में होता है
न देखूँ तो
आँखों का होना बेकार है।

मगर पूछना चाहता हूँ कि
इन ब्लॉउजों की डिजाइन
किसने की है?
जिसने की है
उसका मकसद क्या है?
और पहनने वालियाँ क्या
पाना चाहती हैं?

एक कॉम्प्लीमेंट कि
यू आर ब्यूटीफुल…
लुकिंग गॉर्जियस…
स्टनिंग…?
यकीन मानिये
बहुत सी महिलायें
इन्ही आधे-अधूरे वाक्यों से
हो जाती हैं
लहालोट।

फिर जो कुछ होता है
उसी को लिखना चाहता हूँ मैं
मगर मुझे शब्द नहीं मिलते है
क्योंकि,
बाद की स्थितियों को
गंदगी उपजाने वाला यह लिथड़ा समाज
अश्लील कहता है।

घुटनों को मोड़कर
एड़ियों पर नितम्बों को टिकाए
बैठी जवान औरतों को
घूरने वाले
लपलपाती जीभ निकाले मर्दों को
जब देखता हूँ,
उन्ही में से मैं भी हूँ,
तो डर जाता हूँ
कि
एक दिन जब सारी गोलाइयाँ
लटककर झूल जायेंगी
हड्डियों से प्यार करता माँस
चिचुककर लटक जायेगा
तब वह कितनी खूबसूरत लगेगी
तब कितना खूबसूरत दिखूँगा मैं?

यह एक ऐसी दहशत है
जो जवान और सुंदर दिखती औरत को
मेरी नज़रों में एक पल में
अचानक बियावान और बदसूरत
बना देती है।

औरत, समाज और अपने बारे में
जो मैं कहना चाहता हूँ
लिखना चाहता हूँ
उसके लिये जितने शब्दों का प्रयोग करुँगा
वे सभी शब्द आज की भाषा में
असंसदीय हैं।

मैं डरा हुआ हूँ
शब्दों के प्रयोग से
कि कहीं माफी न माँगनी पड़े
आवारा ताकतों से
मैं गालियाँ देना चाहता हूँ सबको
मगर मुझे शब्द नहीं मिलते।

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 11, 2011

एक दुनिया यह भी है

क्लास रुम की खिड़की से भी
दिखती है एक दुनिया
एक दुनिया यह भी है…
सीमेंट के मैदान पर
चहकते बच्चे
खेलते-कूदते पसीने में
महकते बच्चे
आदमी और औरत की
डालियों से खिले फूल हैं ये।
भारतीय, सोमालियन, पाकिस्तानी…बांग्लादेशी बच्चे…
बच्चों के माथे पर देश नहीं
बचपन राष्ट्रीयता है।

एक दुनिया यह भी है…

स्कूल में एक नया ब्लॉक
बनकर तैयार होने को है
दरवाजे, खिड़कियाँ, शीशे लगाते
मजदूर थके-थके से हैं।
और पुताई की डबल कोटिंग करता हुआ आदमी
काम रोककर सोने को है
निरक्षर और अनपढ़ मजदूरों की यह निर्मति
वर्षों तक
साक्षर देती रहेगी दुनिया को।

यह भी एक दुनिया है…
एक दुनिया यह भी है…

बच्चों की उत्सुक आँखों में
काम करते मजदूर और
मजदूरों की भावुक आँखों में
एक-सी यूनिफॉर्म पहने बच्चे हैं।
बच्चों ने कभी काम नहीं किया
मजदूर कभी स्कूल नहीं गये
इनकी दुनियाओं में कोई परिवर्तन
अब हो भी नहीं सकता।

एक दुनिया यह भी है…

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 8, 2011

यह भी एक दुनिया है


दिखती है स्टाफ रुम की खिड़की से
सूनी दुनिया
सूने मकान
सूना समुद्र
सूने जंगल
बड़ा खौफनाक मंजर है।

मैं इसे मुर्दों की बस्ती कहता हूँ।

खूबसूरत मकानों से
झांकता नहीं कभी भी
एक भी चेहरा,
जंगलों की ओर
आता-जाता नहीं
एक भी चहचहाता परिंदा।
कभी-कभी
दिखता है कोई जहाज
समुद्र में, आसमान में
पोर्ट और एयरपोर्ट पास ही हैं।

जंगल भी है तो समुद्र में।

जंगलों का सन्नाटा
समुद्र का सूनापन
सरघटी मकानों का
लंबा अहाता…
कैसी तो दुनिया है…
यह भी एक दुनिया है।

खजूर के पेड़ों पर
आ रहे हैं फल
हरे-हरे, छोटे-छोटे
पकेंगे महीनों में
निर्यात होने के लिये
तब कहीं देखेंगे
बाहर की दुनिया
दुनिया की चहल-पहल।

बादाम…
अभी आये नहीं पेड़ों पर
झड़ने के लिये
जमीन पर सूखने के लिये
सुना है-
किस्म ठीक नहीं है।
शायद किस्मत ही ठीक नहीं
रह जायेंगे यहीं
सूनापन सहने के लिये,
कैसी तो दुनिया है…
यह भी एक दुनिया है।

इसी दुनिया के एक हिस्से में
मैं हूँ, लोग हैं, पड़ोसी हैं
भीड़ भी बहुत है शहर में
मगर एक को दूसरा
दूसरे को तीसरा
जानता नहीं।

इस तरह अंजान
झूठ-भरी मुस्कान
कहते हैं खूबी है
विकसित देशों की।

कैसी तो दुनिया है…
यह भी एक दुनिया है।

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 3, 2011

मैं और मेरी प्रवासी दुनिया

मेरे साथ था एक छोटा-मोटा जुलूस
जब मैंने पहली बार
छोड़ा था देश
नादान दोस्तों से लेकर
दानेदार दुश्मन तक
सभी आये थे
स्टेशन तक छोड़ने मुझे।
आँखों में आँसू
और उनके आगे थी मेरी धुँधलाती दुनिया
जो ट्रेन के चलते ही
दिखने लगी थी साफ-साफ।

फूल मालायें और
बाहों के बंधन
सब कुछ बहुत भावुक
और बहुत करुण था।

मैंने आखिर तक
की भी बहुत कोशिश
कि माँ ने जो
विदा के समय लगाया था तिलक
दही और चावल का
वह पुछ न पाये।

मगर क्या हो पाया वैसा
जहाज में चढ़ने से पहले
बहुत जोर से उठी हूक
उमड़े आँसू और फिर
धूमिल होने लगीं
धीरे-धीरे करुण कठोर स्मृतियाँ।

बरस-दर-बरस
गये बीत
आते जाते हिंदुस्तान
आना जाना मेरा
बन गया एक ढ़र्रा
अब न कोई
एयरपोर्ट आता है
न स्टेशन।

अब नहीं लिखता कोई
मुझे याद करते भीगे पत्र
नहीं भेजता कोई
नव वर्ष का कार्ड
और अपनी ताज़ा तस्वीर।

बरसों बीत गये
यह वक्त्त एक युग से कम तो नहीं!
नहीं मालूम मुझे
कि मैं और मेरी दुनिया में
कौन हो गया है अकेला।

{कृष्ण बिहारी}

जून 21, 2011

पिता की पाती पुत्र के नाम

अनचाही दूरियों का
अनचाहा दायरा
क्या किसी दिन हटेगा,
मिटेगा?
मैं तुम्हें आँखों से छूना और
हाथों से देखना चाहता हूँ,
मुझे पता है
तुम्हारे पास सब कुछ है,
सब कुछ …यानी कि माँ है
तुम्हे नहीं पता है कि
मेरे पास भी सब कुछ है
सिर्फ तुम नहीं हो
तुम्हारा मेरे पास न होना
किस कंगाली से कम है!

काश!
वह दिन आता
मेरी बाहों में मेरा आकाश होता
यानि कि तुम होते
और,
तुम्हारे कंधों पर मेरे आँसू
अविराम गिरते,
अजस्त्र…निर्भय…
जानता हूँ कि
प्रायश्चित से ही तो
सब कुछ सामान्य नहीं हो जाता
स्वीकारोक्ति भर से ही तो
सब कुछ मान्य नहीं हो जाता
फिर भी मुझे लगता है कि-
मैं अपने अधूरेपन को पाट गया हूँ
और,
स्वयं को सही ढ़ंग से बाँट गया हूँ।

मेरी आँखों में इंतजार के
दीप जल रहे हैं
मेरे सपने
अगन की मीठी आँच में पल रहे हैं
तुम इसमें ईँधन की ज्योति
जलाये रखना
मैं तुम्हे अवश्य मिलूंगा
एक सही समय पर।

{कृष्ण बिहारी}

जून 15, 2011

प्रेम : अंततः पारदर्शी मन


छुआ है जिस दिन से तुमने
मेरा मन
समा गयी है उष्णता तुम्हारी
मुझमें।

यह गरमी और इस आँच की खुश्बू
कहाँ जाये?
यह उम्र झूठ बोलने की नहीं है
पैंतालिस की उम्र में
प्लेटॉनिक/ अदभुत प्रेम
होता नहीं
और जो होता है
लाख कोशिशों के बावजूद
सोता नहीं।
चाहता है एकांत विज़न
दैहिक मिलन
धूप-छाँही तपन
सामंती थकन।

सच्ची बात-
प्रेम
तुम्हारा भी माँसल है
प्लेटॉनिक नहीं
होती है तुम्हे भी गुदगुदी
मुझसे मिलकर
बहाने से ही सही
तुम्हारी भी कोई अतृप्ति
होती है तृप्त
या पूरा होता है
बचपना
या कोई सपना
जो कभी अपना न बना।

उसे देख रहे हो मुझमें तुम
भीतर के सच
और बाहर के झूठ के साथ
यह जानते हुये भी कि
अब कुछ भी नहीं है
अपने हाथ
जो सहायक बने मिलन में।

मेरी बात
मेरा सच
क्या है, बताऊँ?

तुम सपनों में आने लगे हो
दुनिया में
दुनिया का वश चल जाये
मुमकिन है
पर
सपनों में अपना वश भी नहीं चलता
कोई सपना
अपने आप अनायास नहीं पलता
सपना
बहुत दूर दूर तक सोची हुयी,
समझी गुयी
हकीकत है
जो सच हो जाये तो
मुसीबत है।

परदे-
ढ़कते हैं खिड़कियाँ,
दरवाजे
दिल और एकांत नहीं।
ऐसे में सात परदों में भी
चाहे रहो तुम
ऊपर से जगत के लिये
चाहे जैसे दिको तुम
पर भीतर से मुझे
जाकी रही भावना जैसी
निर्वसन/ नग्न तन
दिखने लगे हो
साथ रहने लगे हो।

स्वप्न में दर्शन
दर्शन में स्पर्श
स्पर्श में एहसास
अंततः पारदर्शी मन का
कामुक
विह्वल
उच्छृंखल सहवास
खुलवा दे
जूड़ा,
कंगन,
चूड़ा,
न रहे बंधन किसी विन्यास का
सूत और कपास का
सांसों की गमक का
पसीने के महक
भाप सी लगे
देह से बाहर आये और
हमारी बर्फ को
दहकाये,
पिघलाये,
गलाये
तब कहीं प्रेम को
अदभुत बनाये।

{कृष्ण बिहारी}

चित्र: अमृता शेरगिल की पेंटिंग – श्रंगार

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