Posts tagged ‘Khuda’

सितम्बर 13, 2011

ज़हर भी है मुस्कान में

 

काबे में मिले ना हमको सनमखानों
कुछ होश वाले जो मिले मयखानों में

मेरे जुनूं को तलाश जिस होश की है
फरजानों में पाया न मिला दीवानों में

अक्ल के फ़रमान सहन होते किससे
शुक्रिया तेरा जो रखा हमें दीवानों में

हुस्न, इश्क, यारी, ईमान, अकीदे खुदा
क्या नहीं बिकता है आज दुकानों में

मौत को भी जाने ठौर मिले न मिले
जिंदगी तो कटी किराए के मकानों में

कसले दौर में सांस लेने की है सज़ा
कांटे उग आये लोगों  की ज़बानों में

कभी खापों के रुलाते फैसले भी देख
लैला मजनू तो पढ़े तूने दास्तानों में

नर्म मैदान ने गंदा कर के खा लिया
नदी पाक थी जब तक बही चट्टानों में

हँसी की महफ़िल में ज़रा होश आलम
ज़हर का भी पुट होता है मुस्कानों में

(रफत आलम)

फरजानों – बुद्धिमानों , फ़रमान – आदेश

मई 19, 2011

पानी मयस्सर नहीं, और कहीं जाम छलकते हैं

कारीगरों के हिस्से में इनाम आ गये
हम औजारों का क्या था काम आ गए

वो खेल तो शाहों की शह-मात का था
मजबूर प्यादे बेगार में काम आ गए

प्रजा को बेच रहे हैं ज़मीर-फरोश शाह
ये कैसा दौर है कैसे निज़ाम आ गए

सियाहकारों के गुनाहों के चश्मदीद थे
मुल्जिमों की फ़ेहरिस्त में नाम आ गए

साकी तेरे मयकदे का खुदा ही हाफिज
कमज़र्फ रिन्दों के हाथों जाम आ गए

बस्तियों में तो पीने का पानी भी नहीं
नेता के वास्ते छलकते जाम आ गए

अंधेरनगरी में अवाम ने चुने थे शाह
मालायें ले के चाटुकार तमाम आ गए

हम अपना पता भूले हुए थे ए आलम
गनीमत जानिये घर सरे शाम आ गए

(रफत आलम)

ज़मीर्फारोश -अंतरात्मा विक्रेता,
निजाम -सत्ता,
सियाहकारों – काले कार्य करने वाले (बेईमान ),
फेहरिस्त -सूची,
चश्मदीद – प्रत्यक्षदर्शी,
रिंद – शराबी

मई 18, 2011

खुदा का पता

कोई कहता है खुदा बसता है कोई कहता है भगवान रहता है
बंदों का दावा है चंद मीटर गारे के घर में आसमान रहता है
अक्ल वालों होश का अंदाज़ किसी दीवाने से सीख कर आओ
आप खुद ही कहने लगोगे धरती पर तो बस इंसान रहता है

कोई हिसाब लिख रहा है सब को पता है यारो
क्या करें गुनाह से तो जनम का रिश्ता है यारो
मौत को याद करोगे तो आयेगा खुदा भी याद
वरना तो आदमी फितरत से ही बेवफा है यारो

क्यों भटक गयी मेरी बंदगी तुझी को पता
ये तेरी रज़ा को ही खबर, तुझे मंज़ूर क्या है
शैतान के हाथों में मेरी अक्ल को सौंपने वाले
मेरे गुनाहों को माफ कर, मेरा कसूर क्या है

वही बेबसी का मंज़र है जो के था
वही शैतान हमसफ़र है जो के था
वही गुनाह का इम्तिहान है जिंदगी
वही खाकी का मुकद्दर है जो के था

ये सही उसकी रजा के बिना पत्ता हिलता भी नहीं
लाख कोशिश कीजिये बंद दरवाजा खुलता भी नहीं
दीवानों ने देखा उसे तो दिखाने के काबिल न रहे
खुदी खोने से पहले खुदा का पता मिलता भी नहीं

भोर हुए ये मंदिरों के भजन हैं हमारी लोरियां
हम हैं अज़ान की आवाजें सुन कर सोने वाले
कहते हैं, कल्बों में रातों को स्वाह करके लोग
हम नहीं हैं पुराने संस्कारों का रोना रोने वाले

(रफत आलम)

खाकी  – आदमी

मई 9, 2011

देखा है नहीं और खुदा कहते हो

मेरी आँखों को कुछ सूझता ही नहीं
या अब इस शहर में उजाला ही नहीं

आखरी सांस तक एक लापता सफर
जिंदगी तेरा ठिकाना मिलता ही नहीं

पहली साँस से पहली है ये अस्तित्व
लाख तलाशिये हल निकलता ही नहीं

उमँगों का लहू पिया जाता कब तक
इन लबों पर अब कोई दुआ ही नहीं

पाल बैठे आदत तब हमने ये जाना
शराब रोग भी है सिर्फ दवा ही नहीं

खुदा से हार कर आँखों देखे सच ने
उसको मान लिया जिसे देखा ही नहीं

आलम तेरी बात पर किसे हो यकीन
तेरे पास झूठ गढने की कला ही नहीं

(रफत आलम)

अप्रैल 29, 2011

निर्माण फिर से

जीवन के आधार तत्व
खुद आकारहीन हैं
उस निराकार की तरह
जिसने इनसे गढे हैं
साँसों की अबूझ पहली फूँक कर
कमज़ोर और ताकतवर पुतले!

दुनिया के घर में ये किरायदार
खुद को मालिक समझ बेठे हैं.
सूर्योदय के पहले दिन ही
ताकतवर की भूख ने
कमज़ोर का किस्सा छीन लिया था
जारी है ये अंतहीन सिलसिला
प्रलय दिवस तक के लिए!

इंसानी अहम की क्या कहिये
खुदाई का दावा करने वालों ने
बहुत थूका है
आकाश की ओर मुँह करके!

खुदी में चूर आँखों ने कब देखा
वक्त के क़दमों में पड़ी हैं
अनगिनत पगडियां
कर्मों से विकृत लाखों चेहरे
जिनका कोई निशान नहीं बाकी
वे सब स्वघोषित खुदा थे।

पैगम्बर –अवतार आये
संत–सूफियों ने कोशिश की
बेठिकाना इन पांच तत्वों को
मंजिल का पता मिले
फरिश्ता ना सही
आदमी, आदमी तो बन जाए!
पाप की बस्ती के वासी
अस्तित्व से ही गुनहगार बंदे
रास्ता भला पाते कैसे?
मिथ्या तर्कों के सहारे
सूली पर चढा दिया गया
हर शाश्वत सच।

कब बाज़ आया है
आदमजाद अपनी हरकतों से
वही अन्यायी ताकतों का राज है
वही ऊँच-नीच में बंटा समाज है
वही रंग-भेद के बेमानी झगडे
वही जहनी गुलामी का रिवाज है
वही चापलूस वही मसखरे वही बहरूपिये
वही वक्त के खुदाओं का शैतानी अंदाज़ है
वही मुफलिसी और अमीरी
वही असमानता का मर्ज़े लाइलाज है।

ओ! तत्वों के किमियागर
खा गया माटी का गंदमैला रँग मुझे
एक बार दुबारा निकाल
उस सांचे से
जिसमें ढ़लकर सजता है
चाँद-तारों से सजी रात का रूप
आकाश की नीली चादर पर
उजला सूरज उगता है।

(रफत आलम)

फ़रवरी 22, 2011

नहीं रहा…

एक ज़ख्म हरा था नहीं रहा
दर्द खुद मसीहा था नहीं रहा

दिल का रिश्ता था नहीं रहा
वह दोस्त मेरा था नहीं रहा

जम गया दर्द सूनी आंखों में
पानी का झरना था नहीं रहा

कोई भी अब याद नहीं आता
मुझे अपना पता था नहीं रहा

अपनों का सलूक क्या कहिये
ज़माने से गिला था नहीं रहा

अमीर खुद है वक्त का खुदा
गरीब का खुदा था नहीं रहा

लोग आज कुरान बेच खाते हैं
ईमान कभी जिंदा था नहीं रहा

काला धंधा काली हकीकत है
रोज़गार सपना था नहीं रहा

डूबती कश्ती में ठहरता कौन
नाखुदा से गिला था नहीं रहा

गम की लौ में जलबुझा दिल
मोम का टुकड़ा था नहीं रहा

रोती होंगी सन्नाटों भरी राहें
आलम आवारा था नहीं रहा

(रफत आलम)

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