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सितम्बर 5, 2011

मास्टर, डॉक्टर और पुलिस - भ्रष्टाचार के तीन स्त्रोत

वह एक पुलिस का सिपाही है
जो तलाश रहा है
एक सभ्य नागरिक
जिसकी ज़ेब से निकलवा सके
वह आखिरी नोट।

और

वह जो बंगला है ना
सामने
मेडिकल कॉलेज के एक
डॉक्टर का है
वहाँ जो भीड़ है
वह पागलों की है
बीमारों की है
मरीजों के साथ साथ उनके परिजन भी
बीमार हो गये हैं।
पागलों का इलाज करते करते
डॉक्टर भी हो गया है पागल पैसे के पीछे।

और

ये महाश्य जो अभी अभी घड़ी देखते
तेजी से घर से निकले हैं
वो रहे…
वो नाक की सीध में बढ़ते हुये
अध्यापक हैं
उन्हे पढ़ानी है ट्यूशन
फेल करते हैं बच्चों को एक एक नम्बर से
हर वीकली टैस्ट में
डर जाते हैं माँ-बाप
डर जाता है पूरा समाज
और पढ़ने लगता है ट्यूशन

ताकि हो सके सभ्य
और हो जाये पागल
दे सके ज़ेब का आखिरी नोट
किसी पुलिसिये को
किसी पागल डॉक्टर को
या फिर मास्टर को।


समाज को ये तीनों ही बचायेंगे…
फिर खायेंगे।


{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 3, 2011

नारी! तुम कब, कैसे माता से हत्यारिन बन गयीं?


रोज ही बस्ती में
अनगिनत बेकफन अर्थियाँ
गंदे नालों की राहों से
कीचड़ में विसर्जित कर दी जाती हैं।

प्याज़-लहसुन से भी परहेज़ करने वाली माएँ,
चाक़ू से छिलवा कर
मरवा देती हैं बेटियाँ
अपनी ही गोद में,
आखिर क्या पाप हुआ था
जो ये अबोध धड़कने कत्ल हुईं?

किसी मजबूरी का बहाना न बनाना,
मजबूर तो वेश्यांए होती हैं!
किटी पार्टियों में बहलने की हदों के आगे तक
आज़ाद है आज की नारी|

हकीकत तो ये है
बतौर फेशन हत्यारिन बनी हो तुम
मासूमों को गर्भ में मारने वाली माताओं
क्या तुमने भविष्य के गर्भ में झाँका है?

अरी! निर्दयी ह्रदयहीनो
वर्तमान से ही सबक लेती
तुमने देखा नही क्या
देश की सर्वोच्च कुर्सी पर
बैठी है एक महिला
कल तुम्हारी जन्मी भी तो
ऐसी हो सकती थी!

(रफत आलम)

अगस्त 29, 2011

कौन रहेगा ईमानदार?


विजय दिवस था कल
एक बूढी लाठी के आगे
नतमस्तक हुए शाह–वजीर
अचरज से देख रहे थे
कबाड़े से निकल आई
गाँधी टोपियों का कमाल
सिर पर रखते ही
हरीशचन्द्र बन रहे थे लोग
जिन्हें लेख का शीर्षक भी पता नही
टीकाकार बन गए थे कौवे
कोयलें चुप थीं।

उस बड़े मैदान में
सुनहरे कल के सपने
प्यासों के आगे
बिसलेरी बोतलों के समान
उछाले जा रहे थे,
परंतु जो सपना उठा लाया
वह रात भर सो न सका
उसे याद आ गया था
माटी बने पुल की नींव से
कमीशन खोद कर निकालना है,
उसने भी माइक पर
ईमान की कसम दोहराई थी
रोज गीता–कुरआन पर
हाथ रख कर,
झूठी गवाहियाँ देने वाला दिल
व्याकुल रहता कब तक?

वह उठा और
माटी के पुल के रास्ते चल पडा
उस समय तक सभी सियार
जश्न का खुमार उतरने के बाद
शेर की खाल ओढ़ रहे थे,
रोज़मर्रा समान
निजी लाकरों और स्विस बैंकों के
दफ्तर भी खुल चुके थे।

(रफत आलम)

अगस्त 28, 2011

समय साक्षी है : हिमांशु जोशी का भविष्योन्मुखी उपन्यास आज के परिपेक्ष्य में


लेखक निस्संदेह समाज के अन्य वर्गों की तुलना में करवट लेते समय को ज्यादा गहराई से समझ पाता है, वह आने वाले समय की आहट, और लोगों से पहले ही सुन लेता है। लेखक, अगर भूतकाल में घटी घटनाओं पर भी कुछ लिखता है तो वह गहराई से उस भूतकाल और उस समय हुये घटित का विश्लेषण करता है। यही पैनी दृष्टि और विश्लेषण क्षमता वह वर्तमान में घटित हो रहे घटनाक्रमों के बारे में भी अपनाता है।

अगर हिमांशु जोशी के राजनीतिक उपन्यास “समय साक्षी है” को देखें तो यह भूत काल का भी लगता है और हो सकता है कि सत्तर के दशक के जय प्रकाश आंदोलन से कुछ प्रेरणा उन्होने ली हो इस उपयास को रचते समय। जिन्होने यह उपन्यास पिछली सदी के अस्सी या नब्बे के दशकों में या नयी सदी के पहले दशक में पढ़ा हो उनके सामने यह उपन्यास ऐसी आदर्शवादी कल्पनायें लेकर आता है जहाँ लगता है कि काश ऐसा हो जाये।

लोकतंत्र में राजनीति से किनारा नहीं किया जा सकता। राजनीति और राजनीतिज्ञों की नैतिकता का स्तर किसी भी देश की समूची नैतिकता से जुड़ा होता है। अगर राजनेता ईमानदार हैं तो ऐसा हो नहीं सकता कि देश में भ्रष्टाचार फैल जाये क्योंकि वे बर्दाश्त ही नहीं करेंगे और भ्रष्टाचार करने वाले कर्मचारियों को और जब प्रशासन में ईमानदारी बसेगी तो बाकी जगह अपने आप ईमानदारी से काम होगा।

आदमी एक एकल ईकाई के रुप में ईमानदार नहीं भी हो तब भी अगर उच्च स्तरीय पदों पर ईमानदार लोग बैठे हैं और उसे पता है कि भ्रष्टाचार करने पर उसके लिये मुसीबत खड़ी हो सकती है तो वह हिम्मत ही नहीं करेगा भ्रष्ट आचरण दिखाने की।

भारत में मौजूदा समय में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में भारत के राजनेताओं के चरित्र में कितनी गिरावट आ गयी है। नैतिकता की बात उनके लिये बेमानी हो चुकी है।

भारतीय राजनीति, चुनावी राजनीति, दलगत राजनीति और राजनैतिक एवम समाज को झझकोरने वाले आंदोलन से सम्बंधित यह अपने तरह का एक अलग ही उपन्यास है। किसी किसी पृष्ठ पर ऐसा लगने लगता है कि भारतीय राजनीति की परतें कितनी गहराई से खुरची गयी हैं और इसकी शारीरिक और मानसिक बनावट का बड़ा गहरा अध्ययन किया गया है।

एक उदाहरण देखें- क्या लिखा गया है

समस्त राष्ट्र का भविष्य जब मात्र मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में समा जाता है तो अनेक जटिल समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। यदि उनके निर्णय दूरदर्शितापूर्ण न हों तो राष्ट्र को उनके दूरगामी प्रभावों के परिणाम झेलने के लिए भी विवश होना पड़ता है। भारत आज जिस संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है, उसका दायित्व इन्हीं राजनीतिज्ञों पर है, जिन्होंने राजनीति में से नीति को तिरोहित कर, जाने या अनजाने, चाहे या अनचाहे समस्त राष्ट्र के अस्तित्व को दाँव पर लगा दिया है। आए दिन चारों ओर जो हिंसा, जो रक्तपात जो विघटनकारी घटनाएँ घटित हो रही हैं, उसके मूल में कहीं ये ही कारण हैं कि मात्र अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उन्होंने किस तरह से समस्त राष्ट्र के हितों की बलि चढ़ा दी है।

हिमांशु जोशी उपन्यास की भूमिका में अपनी पैनी दृष्टि का परिचय देते हैं

राजनीति की भी कोई नीति नहीं होती है। नीति का परित्याग कर जब वह नीति अनीति का मार्ग अपनाने लगती है, तब उसके परिणाम घातक होते है- बड़े भयंकर। भारत के गत कुछ वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है।
आज़ादी के बाद लोगों के मन में नई आशाएं, आकांक्षाएं जागीं। सदियों से शोषित दीन-हीन जनों को लगा-उम्मीदों का नया सूरज उगने वाला है,
यातनाओं की काली रात बीतने वाली है।
वह नया सूरज उगा, परन्तु सबके लिए नहीं।
शायद इसलिए काल-रात्रि अभी भी शेष है।

अभी करोड़ों लोग हैं, जिन्हें एक वक्त का भोजन भरपेट नहीं मिल पाता। करोडों लोग हैं। जिनके पास सिर छुपाने के लिए छत नहीं। दो हाथ हैं, पर उन्हें देने के लिए काम नहीं। तन को ढकने के लिए पूरे वस्त्र नहीं, बीमार होने पर दबा नहीं-मरने पर कफन नहीं।
आज़ादी का सपना किसी सीमा तक साकार हुआ, परन्तु वास्तव में वह आज़ादी मिली कहां, जिसके लिए स्वाधीनता-सेनानियों ने लौह-कपाटों के भीतर नारकीय यातनाग्रहों में अपनी देह को गला दिया था, फांसी के तख्तों पर हंस-हंस कर झूलते हुए जीवन के उषाकाल में ही सन्ध्या का वरण कर लिया था। रोटी-रोटी के लिए मोहताज, भीख मांगते ऐसे बच्चे मैंने स्वयं देखे हैं, जिनके अभिभावक स्वाधीनता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे चुके थे। उन अनाम, अज्ञात शहीदों का क्या कहीं लेखा-जोखा है ? लेखा-जोखा उन्होंने चाहा भी न होगा, परन्तु उनके परिणामों का हिसाब आने वाली पीढ़ियां मागें तो उसे अनुचित भी नहीं कहूँगा।

देश के ‘भाग्य विधाता’ देश-सेवा के नाम पर क्या-क्या करते हैं ? अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किस तरह करोड़ों लोगो के भाग्य के साथ खिलवाड़ करते है ? भ्रष्टाचार्य सदाचार के आवरण में किस तरह प्रस्तुत किया जाता है-उसी ‘आदर्शोन्मुख’ समाज का चित्रण प्रस्तुत उपन्यास में किया गया है।

तिमिर वरन, मेघना, पी० पी० या अन्य पात्र काल्पनिक होते हुए भी काल्पनिक नहीं। भारतीय राजनीति से जो तनिक भी परिचित है, उन्हें पात्र भी सुपरिचित लगेंगे। उन्हें किसी-किसी रूप में आपने भी देखा होगा और आज भी देखते होंगे।
राजधानी में गत 25-26 साल से रहने के कारण राजनीति और राजनीतिज्ञों को तनिक निकट से देखने-परखने का मौका मिला। वे ही अनुभव और अनुभूतियां इसके लेखन में सहायक बनीं। कुछ घटनाएं आपको सत्य के इतने निकट लग सकती हैं कि हो सकता है, आप उन्हें सत्य ही मान लें। परन्तु अन्त में मैं यहीं कहूँगा कि मेरा उद्देश्य किसी की कमियों को, कमजोरियों को, रहस्यों को उजागर करके रस लेना नहीं रहा। हाँ जब इसे लिख रहा था, मेरी आंखों के सामने कोटि-कोटि संघर्षरत दीन-दुखियों का चित्र बार-बार अवश्य उभर आता था।

तथ्यों का उद्घाटन स्वयं में एक समस्या है। शायद इसलिए मैं महीनों तक आग के दरिया की धधकती लहरों से जूझता रहा। उन मित्रों का मैं कम आभारी नहीं जिन्होंने इसके लिए सामग्री जुटाने में हर तरह का जोखिम उठाकर मेरी सहायता की।

अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने से और आमरण अनशन करके अपने प्राणों को ताक पर रखने से उपन्यास समय साक्षी है, के तिमिर बारन की याद ताजा हो उठती है और जिस तरह से देश के युवावर्ग ने इस आंदोलन में शिरकत की है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो समय साक्षी है का अंतिम अध्याय दिल्ली में एक नाटक के रुप में खेला जा रहा हो।

जहाँ तिमिर वरन खुद एक राजनीतिज्ञ हैं और बरसों सत्ता में रहे हैं और अपने ही दल के विरोधियों द्वारा उनके खिलाफ किये जा रहे षडयंत्रों के खिलाफ वे उठ खड़े होते हैं। देश हित में वे सड़क पर उतर आते हैं और युवाओं का आह्वान करते हैं। देश को जगाते हैं और बुरी राजनीतिक ताकतों, जो कि देश के हितों के खिलाफ काम कर रही हैं, के खिलाफ आंदोलन छेड़ देते हैं और उसे एक जनांदोलन के रुप में विकसित कर देते हैं।

समय साक्षी है उपन्यास का अंश पढ़ें-

‘नहीं, नहीं यह नहीं होगा। आइ से न्नो ! दांत पीसते हुए तिमिर वरन गरजे। आँखें अंगारे की तरह धधक रही थीं। चेहरा तमतमा आया था। आवेश में सारा शरीर कांपने-सा लगा था।
मुट्ठी भींचते वह दहाड़ने लगे ‘मेरी प्रतिष्ठा पर आंच आई तो सबकी इज़्जत धूल में मिला दूँगा। देखता हूँ- मुझे मंत्रिमंडल से हटाकर कौन सत्ता में टिका रहता है !’ अन्तिम चेतावनी देते हुए वह उठे फाइल बगल में दबाकर, धोती का पल्लू संभालते हुए फटफट बाहर की ओर चल पड़े।
उन्हें इस तरह उत्तेजित देखते ही धूप में बैठा ड्राइवर घबरा उठा और सिगरेट का टोटा फेंकता हुआ गाड़ी की ओर लपका।
चमचमाती हुई, एक नीली-सी लम्बी कार फर्राटे से गेट की ओर मुड़ी और हवा को चीरती हुई, वारीन्द्र घोष मार्ग पर निकल पड़ी।

बैठक में भाग लेनेवाले संसदीय दल के सभी सदस्य  क्षण-भर के लिए सन्न रह गए। तिमिर वरन का यह विकराल रौद्र रूप सबके मन में एक अजीब-सी दहशत पैदा कर गया था। एक भयावनी आशंका की कहीं दल विघटन फिर न हो जाए! इस बार दल के विघटन का अर्थ था। घोर अराजकता, सैनिक-शासन या पूर्ण तानाशाही !
पर देश इसमें से किसी भी स्थिति के लिए तैयार न था।
तिमिर वरन के पीछे पन्द्रह बीस और सदस्य उठ खड़े हुए। एक-एक कार में पाँच छह-छह जन लदकर  उसी दिशा में बढ़े जिधर से तिमिर वरन की विदेश से आयात की गई, कीमती गाड़ी अभी-अभी गुज़री थी।

सत्तर वर्ष के तिमिर वरन आज न जाने किस तरह एक ही छलांग में तीन-तीन चार-चार सीढ़ियाँ पार कर गए थे। और दिन थोड़ा-सा पैदल चलने में उनका दम फूलने लगता था। वह बुरी तरह हांफने लगते थे। आवेश के कारण, आज उन्हें कुछ भी सूझ न रहा था।
तीर की तरह वह सीधे बैठक में गए। सचिव बर्मन पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया। सोफे पर फाइल पलटकर वह धम्म से कुर्सी पर बैठ गए।
‘यस्सर’ की भंगिमाव बनाए बर्मन हाथ में स्लिप वाली सफेद नोट-बुक उठाए, सिर झुकाए सामने खड़ा था।
‘जिन संसद-सदस्यों की सूची तुम्हें कल दी थी, उन्हें गाड़ियां भेजकर बुलाओ। अबरार से कहो कि एक नया  ड्राफ्ट तैयार करें फौरन।’

बर्मन चला गया तो उन्होंने एक लम्बी सांस ली। पाँवों को दूर तक पसारा और टोपी उतारकर मेज़ पर रख दी। देर तक उनका हाथ यों ही टोपी के ऊपर रखा रहा। फिर उनके गंजे सिर पर पहुँच गया, आँखें मूंदकर वह कुछ सोचने लगे।
अब भी उनका चेहरा तमतमा रहा था। अब तक उनका दम फूल रहा था। कभी इस तरह अपमानित किया जाएगा-उन्होंने सपने में भी न सोचा था।
अभी सुबह के नौ भी न बजे थे-चारों ओर घिरा धुंध-सी फैली थी। नमदे की तरह मोटे-मोटे घने काले बादलों से आसमान घिरा था। सर्दी के कारण बाहर निकलना कठिन था। फिर भी सड़कों पर भीड़ कम न थी। साइकलों और कारों की सचिवालय की ओर कतार-सी चली जा रही थी।

तिमिर वरन देर तक उसी मुद्रा में बैठे रहे। उनके विरुद्ध षडयंत्र का जाल निरंतर बुना जा रहा है, उन्हें इसका अहसास था। वह जानते थे, दल के लोग सरकार की नीतियों के कारण बहुत-से छोटे-छोटे गुटों में बट रहे हैं। दूसरी पार्टियों से भी बहुत-से लोग आ गए थे। जिनका एक अलग समुदाय बन रहा था। वे सत्ता को हथियाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे। तिमिर वरन के लिए यह सबसे बड़ा खतरा था। इस चुनौती का सामना करने के लिए उन्होंने भी कम चाले न चली थीं। अपनी तरफ से कहीं कोई कसर न रखी थी। किन्तु अब पासा पलट रहा था। धीरे-धीरे तिमिर वरन को शक्तिहीन करने की सुनियोजित योजना चल रही थी। उप-चुनावों में उनके ही दल के लोंगों ने, उनके समर्थक उम्मीदवारों को हराने के लिए विपक्ष के उम्मीदवारों का छिप-छिपकर समर्थन किया था। इस अभियान में उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली थी।

किन्तु तिमिर वरन भी कोई कच्चे खिलाड़ी न थे। विपक्ष के बहुत-से नेताओं से उनके आत्मीयता के गहरे सम्बन्ध थे। उन्होंने अपने ही दल के कम सदस्य-उम्मीदवारों की ज़मानते ज़ब्द नहीं करवाई थीं। बहुत-से लोग उनका आशीर्वीद प्राप्त कर संसद तक पहुँचने में सफल हुए थे। विपक्ष की बेचों पर  बैठने के बावजूद उन पर अगाध श्रद्धा रखते थे।
उनका व्यक्तित्व बर्फ से ढके ज्वालामुखी जैसा था। बाहर से जितने सौम्य-सन्त लगते थे, भीतर से उतने  ही रीति-नीति के धनी कूटनीतिज्ञ। खादी के साधारण-से कपड़े पावों में बेडोल की चप्पलें और सिर पर हिम श्रृंग की तरह जगमगाती शुभ्र स्वच्छ टोपी !  जब वह समाजवाद या गरीबी से दूर करने के नारे लगाते थे, तब लगता था, वाकई कोई भुक्त भोगी किसान अपने ही दुख-दर्द की बातें कर रहा है !

किसान-परिवार में अपने पैदा होने का उन्हें गर्व था।  मौंके-बेमौके इस तथ्य का उद्घाटन भी भूलते न थे। सोफे से धीरे से उठकर वह कमरे में ही चहलकदमी करने लगे। कमरे में किसी के भी प्रवेश की उन्होंने मनाही कर दी थी।
नई व्यूह-रचना के विषय में वह गम्भीरता से सोचने लगे। उन्हें-इस बार की पराजय का अर्थ है, राजनीति से पूर्ण संन्यास ! यानी कि उनकी राजनीतिक हत्या !

राजनीति से हटने से उन्हें एतराज न था। उम्र भी काफी हो गई थी। दस्तखत करते हुए हाथ कांपते थे। देर तक मीटिंग में बैठना भी कठिन लग रहा था। उस पर दिन रात टूर प्रोग्राम ! जन भाषाओं में भाषण तथा नित उठ खड़ी होने वाली नई-नई उलझने ! पर देश सेवा और जनहित के नाम पर वह वर्षों से इन यंत्रणाओं को सहते आ रहे थे। उनकी अन्तिम आकांक्षा थी कि कभी ऐसा संयोग हो और जनता  उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित कर, अपने पर  किए गए उनके उपकारों का बदला चुकाए तो संभवता वह इस गरीब देश की कुछ सेवा कर सकेंगे।

आज के परिपेक्ष्य में हिमांशु जोशी का उपन्यास- समय साक्षी है, बेहद प्रासंगिक हो उठा है और एक अच्छी कृति की पहचान यही है कि वह समय समय पर जीवित होता रहता है और भिन्न काल की पीढ़ियों को अपने से जोड़ता रहता है।

…[राकेश]

अगस्त 17, 2011

मुनादी…(धर्मवीर भारती)

सत्तर के दशक में डा. धर्मवीर भारती द्वारा लिखी कविता “मुनादी” उस समय की घटनाओं से प्रेरित थी पर किसी भी दौर में जब जब सत्ता निरंकुशता की ओर बढ़ेगी और जनता से कोई आगे आकर सत्ता की असंवेदनशीलता के खिलाफ आवाज उठायेगा तब-तब “मुनादी“-कविता, प्रासंगिक हो जायेगी। आज के हालात में भी “मुनादी” सटीक बैठती है। बार-बार “मुनादी” का सतह पर आना इसके कालजयी रचना होने का प्रमाण है।

खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का
हर खासो-आम को आगह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुंडी चढा़कर बन्द कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है

शहर का हर बशर वाकिफ है
कि पच्चीस साल से मुजिर है यह
कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाए
कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाए
कि मार खाते भले आदमी को
और असमत लुटती औरत को
और भूख से पेट दबाये ढाँचे को
और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को
बचाने की बेअदबी की जाये

जीप अगर बाश्शा की है तो
उसे बच्चे के पेट पर से गुजरने का हक क्यों नहीं ?
आखिर सड़क भी तो बाश्शा ने बनवायी है !
बुड्ढे के पीछे दौड़ पड़ने वाले
अहसान फरामोशों ! क्या तुम भूल गये कि बाश्शा ने
एक खूबसूरत माहौल दिया है जहाँ
भूख से ही सही, दिन में तुम्हें तारे नजर आते हैं
और फुटपाथों पर फरिश्तों के पंख रात भर
तुम पर छाँह किये रहते हैं
और हूरें हर लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ी
मोटर वालों की ओर लपकती हैं
कि जन्नत तारी हो गयी है जमीं पर;
तुम्हें इस बुड्ढे के पीछे दौड़कर
भला और क्या हासिल होने वाला है ?

आखिर क्या दुश्मनी है तुम्हारी उन लोगों से
जो भलेमानुसों की तरह अपनी कुरसी पर चुपचाप
बैठे-बैठे मुल्क की भलाई के लिए
रात-रात जागते हैं;
और गाँव की नाली की मरम्मत के लिए
मास्को, न्यूयार्क, टोकियो, लन्दन की खाक
छानते फकीरों की तरह भटकते रहते हैं…
तोड़ दिये जाएँगे पैर
और फोड़ दी जाएँगी आँखें
अगर तुमने अपने पाँव चल कर
महल-सरा की चहारदीवारी फलाँग कर
अन्दर झाँकने की कोशिश की

क्या तुमने नहीं देखी वह लाठी
जिससे हमारे एक कद्दावर जवान ने इस निहत्थे
काँपते बुड्ढे को ढेर कर दिया ?
वह लाठी हमने समय मंजूषा के साथ
गहराइयों में गाड़ दी है
कि आने वाली नस्लें उसे देखें और
हमारी जवाँमर्दी की दाद दें

अब पूछो कहाँ है वह सच जो
इस बुड्ढे ने सड़कों पर बकना शुरू किया था ?
हमने अपने रेडियो के स्वर ऊँचे करा दिये हैं
और कहा है कि जोर-जोर से फिल्मी गीत बजायें
ताकि थिरकती धुनों की दिलकश बलन्दी में
इस बुड्ढे की बकवास दब जाए

नासमझ बच्चों ने पटक दिये पोथियाँ और बस्ते
फेंक दी है खड़िया और स्लेट
इस नामाकूल जादूगर के पीछे चूहों की तरह
फदर-फदर भागते चले आ रहे हैं
और जिसका बच्चा परसों मारा गया
वह औरत आँचल परचम की तरह लहराती हुई
सड़क पर निकल आयी है।

ख़बरदार यह सारा मुल्क तुम्हारा है
पर जहाँ हो वहीं रहो
यह बगावत नहीं बर्दाश्त की जाएगी कि
तुम फासले तय करो और
मंजिल तक पहुँचो

इस बार रेलों के चक्के हम खुद जाम कर देंगे
नावें मँझधार में रोक दी जाएँगी
बैलगाड़ियाँ सड़क-किनारे नीमतले खड़ी कर दी जाएँगी
ट्रकों को नुक्कड़ से लौटा दिया जाएगा
सब अपनी-अपनी जगह ठप
क्योंकि याद रखो कि मुल्क को आगे बढ़ना है
और उसके लिए जरूरी है कि जो जहाँ है
वहीं ठप कर दिया जाए

बेताब मत हो
तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है
बाश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से
तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए
बाश्शा के खास हुक्म से
उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा
दर्शन करो !
वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी
बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी
ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा
नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा
और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा
लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में
और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो
ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से
बहा, वह पुँछ जाए

बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं

अगस्त 15, 2011

तिरंगा: कहाँ हैं इसे ऊँचा रखने वाले?

हम कब जानते हैं
स्वतत्रता दिवस का अर्थ?

हाथ रिक्शे–ठेले खेंचते
फावड़े-कुदाल चलाते
पसीने में नहाये जिस्मों के लिए
भीख के लिए फैले हाथों के लिए
मजदूर-किसानों के लिए
चंद एक रुपयों का मिलना
सर्वोपरी और महत्वपूर्ण है।

सदियों से मुफलिसी के गुलामों को
आज़ादी के दिन का क्या पता?

बाकी बचे छात्र–बाबू–नौकरीपेशा-व्यापारी
उनके लिए यह पावन दिन
औकात के मुताबिक
फार्म हाउसों से चाय की थडी तक
मौज मस्ती मनाने के लिए
सरकारी छुट्टी के सिवा कुछ नहीं।

किसे याद हैं
कौन याद दिलाता है.
गोलियाँ, लाठियां, काला पानी और जलियाँवाला
भगत सिंह, बोस, अशफाक….
अनगिनत थे आज़ादी के परवाने।

बेचारे अमिताभ-सलमान से हार गए
हमने राष्ट्रपिता उस नंगे फकीर
बापू का
आज़ादी के बदले शुक्रिया गोली से दिया
अब हम उसके ऐनक चुराते फिर रहे हैं।

हम ज़मीर फरोशों के
चहरों पर मुंह नहीं मुखौटे हैं
फिर शर्म किसे आयेगी
तिरंगा ही तो फहराना है
ऐसे नहीं तो वैसे
जैसे-तैसे फहरा ही देंगे।

(रफत आलम)

अगस्त 14, 2011

तिरंगा : किस मुँह से फहराओगे, किस मुँह से देखोगे?

केसरिया रंग

हमारे तिरंगे का मुकुट
कट्टरता का प्रतीक बन गया है
पार्कों-स्कूल के मैदानों पर
तिरंगे का काम ही क्या?

भगवा झंडों के साये में
अस्त्र-शस्त्र चालन प्रक्षिक्षण शिविर
गवाह हैं जगाई जाती नफरतों के
जहाँ से केसर की खुशबु फैलनी चाहिये थी
बमों के विस्फोट हो रहे हैं
स्वर्ग को नरक बना दिया है नफरतों ने।

सफेद रंग

हमारे तिरंगे का ह्रदय
काले को सफ़ेद करने का जादू भर है आज
मोती तोंद वाले सफेदपोश
सिल्क खादी की जगमगाहट के पीछे
अपनी तमाम काली करतूतें
आसानी से छिपाए हुए हैं
सफेद वो सियाही है
जिसके लिखे स्विस खातों के नम्बर
किसी से नहीं पढ़े जाते
हाँ,

बीच का चक्कर

ज़रूर घूम रहा है
दलाली, कमीशन और घोटालों की
पहचान बन कर
दरसल आज़ादी के ये ही रसफल
हमसे चुनाव लड़वाते हैं
हिस्ट्रीशीटरों को नेता बनवाते हैं।

हरा रंग

हमारे तिरंगे की बुनियाद
गाँवों से लाता था हरियाली की मजबूती
खेतों में मासूमियत की खाद से
गहराती थी अपने पाक संस्कारों की जड़ें
उस विशाल वृक्ष तले अपनत्व की शीतल छाँव थी
शहरियत के कंक्रीट जंगल ने
मशीनी धुंआं फेंकते दानवों का
शोर उगा दिया है
पक्षियों की कलरव के स्थान पर
अपने-अपने सीमेंट के दडबों में बंद हुआ आदमी
भूल चला है सभी संवेदनाए
राजा हरीश चन्द्र का किस्सा अब किसे लुभाता है
आज नए  दौर के हीरो राजा–राडिया-कलमाड़ी-रेड्डी-येद्दयुरप्पा हैं
बेईमानी के हमाम में सभी नंगे
घोटालों–घूसखोरी की फसलें काट रहे हैं
रूपये-डालर-मार्क–येन-मार्क-पौंड का हिसाब
स्विस बैंको में है दफन।

एक बूढ़ा नैतिकता की बात कर रहा है
नूराकुश्ती में मग्न पक्ष भी, विपक्ष भी
सब होंठों तले हंस रहे हैं।

मेरे दोस्तों! स्वतत्रता दिवस बहुत मुबारक
क्या तुम्हे कल ज़रा भी ख्याल आएगा
किस मुँह से पी.एम.फहरायेंगे तिरंगा?
किस मुँह से तुम देखोगे तिरंगे को?

(रफत आलम)

अगस्त 9, 2011

बेटी है गर्भ में, गिरायें क्या?

अँधेरे का जश्न मनाएँ क्या
उजालों में मिल जाएँ क्या

अनगिनत पेड़ कट रहे हैं
कहीं एक पौधा लगाएं क्या

आज बेचना है ज़मीर हमें
तो खादी खरीद लाएं क्या

बामुश्किल है पीने को पानी
धोएँ तो बताओ नहाएं क्या

बहु के गर्भ में बेटी है आई
पेट पर छुरी चलवायें क्या

बेबस हैं बिकती मजबूरियाँ
भूखे बदन ज़हर खाएं क्या

अंधा है क़ानून परख लिया
कोई तिजोरी लूट लाएं क्या

रोने को रो लिए बहुत हम
पल दो पल मुस्कराएं क्या

यारों ने दिल की लगी दी है
यारों से दिल लगाएं क्या

सायों का क़द नापेगा कौन
हम भी घट-बढ़ जाएँ क्या

चुप की बात समझ आलम
और हम हाल सुनाएँ क्या

(रफत आलम)

जून 19, 2011

उदारीकरण और भारत

बतकही : आरम्भ और
सोनिया गाँधी और संघ परिवार से आगे
:-
9 जनवरी, 2005

तीनों लोग धीरे धीरे चलकर पार्क में पहुँच गये। एक तरफ कुछ बच्चे टेनिस की बॉल से क्रिकेट खेल रहे थे। तीनो लोग पार्क के दूसरे कोने की और बढ़ गये जहाँ सीमेन्ट की बैंचें भी लगी हुयी थीं।
तीनों ने बैंचों पर न बैठकर नीचे घास में ही आसन जमा लिया। हरीश बाबू तो अपनी दायीं करवट से लेट ही गये और ​िसर को दायें हाथ के सहारे से उठा दिया। विजय बाबू ने बैठकर अपने दोनो हाथों को शरीर से पीछे जमीन पर टिका दिया।

अशोक बाबू सुखासन की मुद्रा में बैठ कर बोले ये विकास प्राधिकरण द्वारा विक​सित कालोनियों में ये बात अच्छी है कि ये पार्क आदि के लिये प्रावधान रखते हैं। कभी कभार यहाँ आकर बैठना हो जाता है और बच्चों को खेलने की जगह मिल जाती है वरना सड़क पर खेलते रहते हैं।

ये बात तो है ही। फिर सारी चीजें पूर्वनियोजित रहती हैं ऐसी परियोजनाओं में। नब्बे डिग्री पर आपस में काटती सड़के मिलती हैं। सीवेज ​सिस्टम पहले से मिलता है। फिर अपनी इस कालोनी के तो बहुत सारे फायदे हैं। शहर के कोलाहल और प्रदुषण से दूर। बस एक परिवहन की समस्या है यदि अपना वाहन खराब हो या न हो तो शहर जाने की दिक्कत है। पर ये भी दो तीन सालों में ठीक हो जायेगा। विजय बाबू ने कहा।

कुछ सालों में नहीं विजय बाबू। साल भर में ही। आपको पता है मेन रोड से जो डबल लेन हमारी कालोनी की तरफ आ रही है वहाँ शुरूआत में ही ​स्थित बाग वाली जमीन का विवाद सुलझ गया है और जमीन बिक गयी है। वहाँ जल्दी ही एक मल्टीप्लैक्स और एक शापिंग मॉल बनने वाला है। हरि बाबू ने सूचित करते हुये कहा।

अजी वो आम के बाग वाली जमीन की बात तो नहीं कर रहे आप। वो तो जमीन ही करोड़ों की है, किसने ले ली? अशोक बाबू ने अचरज प्रकट किया।

हाँ जी वही जमीन जो कारगिल मे शहीद हुये मेजर के नाम पर खुले पैट्रोल पम्प के पीछे है। ऐसा सुना जा रहा है कि जो उद्योगपति इस बार एम.पी. की सीट के लिये चुनाव में खड़ा हुआ था, उसी ने सारी जमीन खरीदी है। हरि बाबू ने आगे बताया।

इनका क्या है, धनी लोग हैं। जो चाहे खरीद लें जो चाहे बना लें जैसा चाहे बना लें। दिक्कत तो आम आदमी की है। यदि मकान में एक खिड़की भी बाद में अतिरिक्त बनवानी पड़ जाये तो ये प्राधिकरण और नगर निगम वाले खून पी जाते हैं आदमी का कि आपने बना कैसे ली बिना उनकी मंजुरी के। विजय बाबू ने कहा।

बात आप सही कह रहे हो जनाब। हमारे घर से दो मकान छोड़कर विकास प्राधिकरण का इंजीनियर रहता है। उसने पूरे मकान का नक्शा ही बदल दिया है कौन उसे कहने आयेगा। और एक हमारे पीछे पेपर मिल का इंजीनियर रहता है। बेचारे ने पीछे वाली खाली जमीन पर दो कमरों का सैट बनवा लिया ये सोचकर कि प्राइवेट नौकरी है और कम्पनी की हालत डांवाडोल चल रही है। बन्द भी हो सकती है और ऐसा हो गया तो नये बनाये दो कमरे किराये पर दे देगा।
एकदम से दूसरी नौकरी मिले न मिले। उसे रूला मारा प्राधिकरण वालों ने। मेरे पास आया था सोचकर कि शायद मेरी पहचान होगी विकास प्राधिकरण के इंजीनियर से। हम गये भी पर इससे बस इतना हुआ कि जो पैसा उससे माँगा जा रहा था उसमें कुछ घटोत्तरी हो गयी। हमारी तो समझ में आता नहीं कि जब प्राधिकरण मकान बेच दिये पीछे की खाली जमीन के भी पूरे पैसे लेकर तो अब खरीदने वाला आदमी कुछ भी करे उस जमीन का चाहे तो अमरूद के पेड़ लगाये या ताजमहल बनाये। उसकी मर्जी। भाई अगर कोई ऊपर की मंजिल बना रहा है या मकान के आगे की सरकारी जमीन हड़प रहा है तब तो विरोध की बात समझ में आती है पर जिस जमीन का पैसा प्राधिकरण पहले ही ले चुका है उस पर निर्माण करनें से उनके पेट में दर्द क्यों होता है? अशोक बाबू गुस्से में बोले।

इन सरकारी दफतरों का हिसाब ऐसा ही है। जहाँ जिसे जो पावर मिली हुयी है वह उसी का रोब दिखाकर कमाई कर रहा है। इन दफतरों के चक्कर में फंस कर अच्छा भला आदमी पागल हो जाये। आदमी को ये इतने कानून बता देंगे कि आदमी उस काम से ही तौबा कर लेगा। यहाँ अपने देश में तो एक ही चीज चलती है मुद्रा। पैसा दो और काम कम बाधाओं के साथ कराओ। घूस लेना देना फैशन हो गया है और अब तो लगता ही नहीं कि कोई ऐसा विभाग भी होगा जहाँ आज भी बिना धन दिये काम हो सकता हो। विजय बाबू ने कहा।

अजी आप लोगों को भले ही पसन्द न हो भाजपा पर भाजपा के राज में ही इंस्पेक्टर राज खत्म हो रहा था। सब तरह के कंट्रोल सरकार हटा रही थी। पहले रसोई गैस सिलिन्डर का क्या हाल था बुक कराने के कितने समय बाद कनेक्शन मिलता था अब आज के आज ले लो। पहले स्कूटर बुक कराने के सालों बाद स्कूटर घर में आ पाता था आज एक दिन में बीस स्कूटर आप खरीद लो। ऐसा ही टेलिफोन के साथ है। भाजपा ने सोने की तस्करी का तो धंधा ही बंद करा दिया। सड़कों वाली स्वर्णिम चतुर्भज परियोजना को ही देख लो। आठ आठ लेन के हाइवे। कुछ साल और भाजपा रह जाती तो इतना चमका जाती देश को कि विश्व शक्ति तो भारत दस सालों में ही बन जाता। अशोक बाबू गर्व से बोले।

अजी दस साल कहाँ। भाजपा ने तो भारत को पिछले लोकसभा चुनावों में ही चमका दिया था। आप भूल गये क्या “इंडिया शाइनिंग” को? हरि बाबू ने मुस्कुराते हुये कहा।

अशोक बाबू को अपनी ओर देखता पाकर वे आगे बोले ऐसा नहीं है कि भाजपा ने काम नहीं किया। पर जितने आपने काम गिनाये उनमें से बहुत सारे काम या तो राव सरकार में शुरू हो गये थे बल्कि कुछ योजनाओं पर अमल तो राजीव गांधी ही शुरू करवा चुके थे जैसे टेलिफोन की बात आपने की। भारत में दूरसंचार क्रान्ति राजीव गांधी की देन है। इसी काम के लिये राजीव ने अमेरिका से सैम पित्रोदा को बुलाया था। सी डॉट आप भूल गये क्या। उस समय कितनी आलोचना राजीव की होती थी कि वह पित्रोदा जैसे टैक्नोक्रेट पर देश का पैसा लुटा रहे हैं। स्वर्णिम चतुर्भज सड़क परियोजना का पूरा खाका राव सरकार तैयार कर चुकी थी और ये हो सकता है कि बाद की संयुक्त मोर्चे की सरकारें इस पर अमल न कर पायी हों और राव सरकार द्वारा बोयी फसल भाजपा ने काटी। ये सब भी ठीक है पर दिक्कत तब आती है जब आप जब आप योजना बनाने वाले को इतना श्रेय भी न दो कि कम से कम उसने सोचा तो कि ऐसा हो सकता है। आप ही बताओ जब भाजपा ने किसी भी अच्छे काम का श्रेय अपने पूर्ववर्तियों को नहीं दिया तो भाजपा को कौन श्रेय देना चाहेगा।

विजय बाबू ने हरीश जी की बात समाप्त होते ही कहा आप एकदम लेटस्ट बात लो अशोक बाबू। अभी पिछले दिनों राव साहब का देहान्त हुआ और अटल जी ने कहा कि परमाणु विस्फोट की सब रूपरेखा राव के समय में ही बन गयी थी और तैयारी पूरी थी पर राव सरकार किसी कारण से ​विस्फोट नही करा पायी। अटल जी ने कहा कि जब वे पी0एम बने तो राव ने उनके हाथ में एक पर्चा दिया था जिस पर लिखा था कि सब तैयारी है आप आगे बढ़कर श्रीगणेश करें। अब अटल जी ने करीब छह साल सरकार चलायी और कितनी ही बार ऐसी बातें उठीं की कितनी ही ऐसी योजनायें हैं जो राव सरकार के समय में या तो निर्धारित हो गयीं थीं या शुरू हो गयी थीं और इन बातों का श्रेय राव सरकार को मिलना चाहिये पर न तो भाजपा ने न ही अटल जी ने ऐसी किसी बात का स्वागत किया बल्कि संघ परिवार इसी बात को गाता रहा कि भाजपा भाजपा के राज से पहले भारत में कुछ नहीं हुआ और देश गर्त में जा रहा था और पुरानी सब सरकारें बेकार थीं खास तौर पर कांग्रेस की सरकारें। अब अटल जी का बहुत पुराना सम्बंध राव साहब से रहा है और हो सकता है कि मित्र के देहान्त पर शोकाकुल होकर अटल जी ने भावावेश मे सच कह दिया हो और इस बात का आज की राजनीति से कोई मतलब न रहा हो। पर जब कहने का समय था तो अटल जी ने ये बात नहीं स्वीकारी। हमारी तो अटल जी से ये शिकायत रही ही है कि वे बात को तभी स्वीकारते हैं बाद में जब उस बात का कोई मतलब नहीं रहता और जब बात स्वीकारने का महत्व था तब वे राजनीति के दबाव के कारण चुप्पी साधे बैठे रहे। कितने ही ऐसे मामले हैं उनके छह साल के शासन में।

देखो जी भाजपा ने भारत को सड़े गले समाजवादी विचारों से और बाजार को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराया। अशोक बाबू कुछ हठधर्मिता के साथ बोले।

उदारीकरण तो राव सरकार के समय डा. मनमोहन ​सिंह ने शुरू कर दिया था और भाजपा और अन्य विपक्षी दल तब पानी पी पीकर उदारीकरण को कोसते थे। ढंग से याद नहीं आ रहा किस विपक्षी नेता ने संसद में कहा था कि राव साहब आप और मनमोहन ​सिंह जी आप सुन लें आने वाली पीढ़ियाँ आप दोनों को कभी माफ़ नहीं करेंगीं। हरि बाबू ने कहा।

अजी विपक्ष में रहकर सरकार का विरोध तो करते ही हैं राजनीतिक दल। भाजपा ने भी कर दिया होगा उदारीकरण का विरोध शुरू में। पर मुख्य बात तो ये है कि जब भाजपा की सरकार बनी तो उसने बाजार को उदार बनाया या नहीं। अशोक बाबू कुछ समझौते के स्वर में बोले।

विजय बाबू ने भी सहमति में ​सिर हिलाते हुये कहा कि ठीक कह रहे हो आप हमारे राजनीनिक दल सत्ता में रहकर एक ढ़ंग से व्यवहार करते हैं और विपक्ष में रहकर दूसरे ढ़ंग से। बल्कि कई बार तो अपनी ही सरकार द्वारा चलाये कार्यक्रमों का भी विरोध करने लग जाते हैं जब वही काम दूसरी सरकार चलाये रखना चाहती है। पर इन राजनीतिक चालबाजियों से अलग बात करूं तो जब इन्दिरा जी की सरकार फिर से बनी थी जनता पार्टी के शासन के बाद तो सन उन्नासी या सन अस्सी में ही इन्दिरा जी ने स्वराज पॉल को अनुमति दी थी भारत में उद्योगों में पैसा निवेश करने की और स्वराज पॉल ने अच्छी खासी रकम दो भारतीय उद्योगों में लगायी थी। याद नहीं आ रहा किस ग्रुप के उद्योग थे पर भारतीय उद्योगपति इतने सीधे हैं नहीं। उन्होने स्वराज पॉल के पौण्डस तो लगवा लिये थे अपने उद्योगों में पर उन्हे शेयर देने के समय मुकर गये थे और घबराकर या चालाकी में कोर्ट में चले गये थे। स्वराज पॉल का तो पैसा ही डूबा पर इन्दिरा गांधी के भारतीय बाजार में उदारीकरण लाने के प्रयासों पर तो पानी फिर गया वरना भारत भी चीन की तरह अपने बाजार विश्व के लिये सन अस्सी में ही खोल देता और भारत को सन नब्बे के शर्मनाक दौर से न गुजरना पड़ता जब विदेशी मुद्रा के लिये देश को सोना गिरवी रखना पड़ा।

सही कह रहे हो आप। भारतीय उद्योगपति बहुत चालाक रहा है। जब इनके पास इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं था तो इन्होने सरकार को खूब सराहा बड़े बड़े सार्वजनिक उपक्रम खड़ा करने के लिये ताकि इन्हे सस्ते रॉ मैटिरियल मिलते रहें और सालों तक ये लोग खुद चाहते रहे थे कि बाजार पर सरकार इस तरह से नियंत्रण रखे जिससे दूसरे लोगों को लाइसेंस न मिल सके उस उत्पाद को बनाने का जिसे ये बनाते रहे हैं और उनकी मोनोपॉली चलती रहे। अब जब हर तरफ वैश्वीकरण का जोर है और ये लोग बिना किसी मल्टीनेशनल कम्पनी से गठजोड़ किये बाजार में रह नहीं सकते क्योंकि नयी तकनीक तो इन्होने विक​सित की नहीं कभी भी तो अब ये सरकार को कोसते हैं। पुराने ​सिस्टम को कोसते हैं। और हर गलत चीज सरकार के माथे मढ़ देते हैं। मानो इनके उद्योगों में शोध एवं विकास का कार्य करने भी उद्योगमंत्री जाता। हरि बाबू ने कहा।

हाँ कांग्रेस के जमाने में भारत में एक ही कार एम्बेस्डर बनती थी और उससे छूटो तो फियेट मिलती थी आज देखो बाजार अटा पड़ा है तरह तरह की कारों से। अशोक बाबू ने कहा।

अशोक जी मारूति भी कांग्रेस सरकार की ही देन है। इसके लिये सजंय गांधी की अच्छी खासी फजीहत हुयी थी विपक्ष द्वारा। जैसे राजीव गांधी की ऐसी तैसी कर रखी थी तब के विपक्ष ने कम्पयूटर के नाम पर कि देश का पैसा बिना मतलब ऐसी मशीनों पर खर्च किया जा रहा है जिनकी भारत को जरूरत ही नहीं है। आज मारूति सबसे ज्यादा कारें बेच रही है और निर्यात भी कर रही है। और कम्पयूटर का क्षेत्र विक​सित न होता भारत में तो जो नवयुवकों की फौज सॉफ्टवेयर आदि के काम में जुटी पड़ी है इसे कहाँ से तो रोजगार मिलता? आज तो ये लोग देश विदेश में झंडे गाड़ रहे हैं पर तब क्या होता? । हरि बाबू ने कहा।

अशोक बाबू ने भी हामी भरते हुये कहाये तो बात है। चाहे ​सिविल इंजीनियरिंग का स्टुडैन्ट हो या मैकेनिकल का नौकरी सब सॉफ्टवेयर में कर रहे हैं । विजय बाबू को सोच में डूबा देखकर उन्होने पूछा आप किस सोच में पड़ गये?

मैं ये सोच रहा था कि सारी सरकारें सार्वजनिक उपकरणों को क्यों बन्द करना चाहती हैं? अब ये नये पेटेन्ट कानून का हल्ला उड़ा हुआ है कि इसके लागू होने के बाद दवाइयों के दाम आसमान छूने लगेंगे। अच्छा खासा आइ.डी.पी.एल था। जीवनरक्षक दवाइयां बनाता था और इस और इस कारण बाजार में ऐसी दवाइयों के मूल्य पर नियंत्रण रहता था। सरकार ने घाटे के नाम पर बन्द करा दिया सारा का सारा आइ.डी.पी.एल जबकि उसकी सब यूनिटें तो घाटे में थी नहीं। जो घाटे में थीं उन्हे बन्द कर देते। वैसे भी नेहरू के समय आइ.डी.पी.एल कोई लाभ कमाने के लिये तो लगा नहीं था। बाजार में जीवनरक्षक दवाइयों की आपूर्ति करना और कीमतों पर नियंत्रण रखना ये दो उददेश्य थे।

अजी सरकारी कम्पनियों के साथ सौ बबाल होते हैं। कितने ही सरकारी विभाग ऐसे होंगे जिन पर कम्पनी का बकाया होगा क्योंकि कोई भी सरकारी विभाग दूसरे सरकारी विभाग को समय पर भुगतान तो करता नहीं। और हमें तो पता चला था कि दवाई बनाने के मामले में तो कम्पनी अच्छी थी पर अपनी दवाइयां बेच नहीं पाती थी बाजार में। हरि बाबू ने कहा।

बेचती भी कैसे। प्राइवेट कम्पनियाँ तो डाक्टरों को कमीशन दे सकती हैं गिफ्ट दे सकती हैं जिससे डाक्टर लोग उनकी बनायी दवा को मरीजों को रिकमेन्ड करें। सरकारी कम्पनी कहाँ से कमीशन और गिफ्ट देगी। आइ.डी.पी.एल ने भी मार्केटिंग में मात खायी होगी। हमने तो सुना है कि एक प्राइवेट दवा कम्पनी आइ.डी.पी.एल से बल्क में दवा का पाउडर खरीदती थी। कैपसूलेशन अपने आप करती थी और अस्सी के दशक में एक कैपसूल साढ़े तीन रूपये का बेचती थी। जबकि आइ.डी.पी.एल का उसी दवा का अपना बनाया कैपसूल पिच्चहत्तर पैसे या एक रूपये में मिला करता था पर तब भी डाक्टर प्राइवेट दवा कम्पनी वाले कैपसूल को खरीदने को कहते थे। इन सार्वजनिक उपकरणों का मैनेजमैंट भी सुस्त रहा होगा जो अपनी दवाओं की मार्केटिंग प्राइवेट कम्पनियों से ठेके पर नहीं करवा पाये। विजय बाबू बोले

अरे सरकारी कर्मचारी काम कहाँ करके देते हैं। फिर यूनियनबाजी। पचासों अन्य कारण रहे होंगे घाटे में जाने के। हमें तो याद आता है कि राव सरकार के समय ही बंद हो गयी थी आइ.डी.पी.एल। अशोक बाबू ने कहा।

नहीं बंद तो शायद छियानवें में हुयी है पर बी.आइ.एफ.आर ने इसे बीमार घोषित तो सन बयानवें में ही कर दिया था। विजय बाबू ने कहा।

और बेवकूफियां देखो कैसी कैसी चलती हैं भारत में। सरकारें गाना गाये जाती हैं कि टैक्स पेयर्स का पैसा ऐसे बर्बाद नहीं किया जा सकता हानि में चलने वाली यूनिटों को चलाने में और उधर आइ.डी.पी.एल जैसी यूनिटों के केस चल रहे हैं कोर्ट में। अब सरकार पैसा देती है ऐसे कर्मचारियों को जिन्होने वी.आर.एस नही लिया और जो अभी केस लड़ रहे हैं इस आशा में की कभी तो फैक्टरी दुबारा चलेगी। भले ही सरकार छह छह महीने का पैसा देती है ऐसे कर्मचारियों को पर ये पैसा क्या पेड़ से टपक रहा है? ये पैसा भी टैक्स देने वाले लोगों का ही है। अब जब तक फैक्टरी का निश्चित फैसला नहीं हो जाता तब तक सरकार ऐसे ही पैसा देगी वो भी बिना कुछ काम लिये हुये। एक तो इतना बड़ा क्षेत्र जहाँ फैक्टरी थी आावासीय कालोनी थी स्कूल थे अस्पताल था सब रखरखाव के अभाव में खंडहर हो रहा होगा दूसरे यदि खुदा न खास्ता कभी फैक्टरी को दुबारा चलाना तय हो गया तो सरकार को कितना धन खर्च करना पड़ेगा सब टूटे फूटे को फिर से संवारने में। अगर फैक्टरी चलती रहती तो कम से कम दवाओं का निर्माण तो होता रहता और हो सकता है कि मुक्त बाजार के दौर में ये कम्पनी भी उठ जाती। हरि बाबू ने कहा।

बात तो आप एकदम खरी कह रहे हो। ये जो आई.आई.एम और ऐसे अन्य मैनेजमैंट संस्थानों का इतना हल्ला है और हर साल अखबार छापते रहते हैं कि इस बार यहाँ के स्टूडैन्ट को इतने लाख रूपये का पैकेज मिला और वहाँ के स्टूडैन्ट को उतने लाख का। तो ये क्या पढ़ाते हैं वहाँ। एक भी स्टूडैन्ट ऐसे संस्थानों से नहीं निकलता जो कहे कि मुझे दो ​सिक यूनिट और मैं इसे ढ़ंग से चलाकर दिखाऊंगा। और क्या वहाँ पढ़ाने वाले प्रोफेसर करते हैं जो एक के पास भी समाधान नहीं है बीमार सार्वजनिक उपकरणों की दशा सुधारने का? अशोक बाबू ने शंका प्रकट की।

ये प्रोफेसर इतने उद्यमी होते तो अपने कई उद्योग खड़े कर चुके होते क्लासरूम में लैक्चर न दे रहे होते और सारे संस्थान लाइन लगा देते देश भर में रतन टाटा राहुल बजाज अम्बानी और प्रेमजी जैसों की। ये लोग तो नौकरी कर सकते हैं। जो कम्पनी चल रही है उसी में काम करके पैसा कमा सकते हैं। कुछ विद्धार्थी होते हैं उद्यमी भी, पर उनकी गिनती बहुत कम है। हरि बाबू ने कहा।

अशोक बाबू को बहुत मजेदार लगी बात और वे हँसकर बोले,” सही कह रहे हो आप जो कभी आई.आई.टी न निकाल पाये ऐसे अक्सर कोचिंग देते हैं जे.ई.ई पास करने की”।

विजय बाबू भी हास्य में योगदान देते हुये बोले,” याद नहीं आपको इस लोकसभा चुनाव में दिल्ली से एक मैनेजमैंट गुरू भी लोकसभा चुनाव में खड़ा हुआ था। अब खुद ही हार गया। पता नहीं जमानत भी बची थी या नहीं। स्लोगन बड़ा अच्छा है उसका- विनर्स डोन्ट डू डिफरेन्ट थिंग्स दे डू थिंग्स डिफरेन्टली। अब दिल्ली में कितने लोगों ने उसकी किताब पढ़ी होगी? मैनेजमैंट के स्टूडैन्टस ही वोट दे सकते हैं”।

अशोक बाबू भी हँसते हुये बोले,” हाँ जी पर उपदेश कुशल बहुतेरे”। लो जी सुनील जी भी आ गये आओ सुनील जी पहले तो आप बधाई स्वीकार करो बेटे के प्रमोशन की। हमें तो विजय बाबू से पता चला।

…जारी…

जून 9, 2011

मकबूल फिदा हुसैन : पंढ़रपुर के लड़के की धरती से अंतिम उड़ान


कतर की नागरिकता लेकर पासपोर्ट के आधार पर विदेशी बन चुके भारतीय चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन ने धरा से अंतिम विदाई ले ली। अपनी उम्र के लोगों में सबसे सक्रिय कलाकार अब देह में नहीं है। अब उनकी कला और उनके कृत्य ही पीछे रह गये हैं। अपने जीवनकाल में भी वे भरपूर सामग्री छोड़ते रहे जिससे लोग उनकी चर्चा करते रहें और आगे भी ऐसा ही होगा। उन्हे पसंद कीजिये, नापसंदगी की बौछारें उनके ऊपर कीजिये उन्हे नज़र अंदाज़ कर पाना मुमकिन नहीं था।

अब उनसे गिले-शिकवे रखने का कोई औचित्य नहीं रहा। भारत में जन्मे इस चित्रकार ने दुनिया भर में अपनी कला के बलबूते नाम कमाया। वे एक ज़हीन चित्रकार थे यह तो एक स्थापित सी बात है। वे फिल्मकार भी थे और साठ के दशक से शुरुआत करके (जब उन्होने एक डॉक्यूमेंटरी बनायी थी) उन्होने गजगामिनी और मीनाक्षी- ए टेल ऑफ थ्री सिटीज़, दो फिल्में बनायीं और तीसरी फिल्म वे लगभग पूरी कर चुके थे।

उन्होने पंढ़रपुर का लड़का नामक आत्मकथा भी लिखी।

उनके पास कविता रचने की कला भी थी। बानगी देख लें।

मुझे बर्फ से लिपटा आकाश भेजना
जिस पर कोई धब्बा न हो
मैं सफेद शब्दों से उस पर उभारों से भरे चित्र बनाऊँगा
तुम्हारी असीम पीड़ा के
जिस समय मैं चित्र बनाऊँ
तुम आकाश को
हाथों में थामे रखना
क्योंकि अपने कैनवास का तनाव
मेरे लिये अपरिचित है।

उनकी कविता में ही उनकी चित्रकारी शब्द नहीं उकेरती है बल्कि उनकी दोनों फिल्में भी पुकार पुकार कर बताती हैं कि इन्हे बनाने वाले निर्देशक के पास एक बहुत बड़े चित्रकार की दृष्टि है।

शांति का बहुत गहरा नाता उनके साथ रहा नहीं पर रचतात्मकता का भंडार उनके पास अवश्य रहा है अतः यही प्राथना की जा सकती है -

ईश्वर उनकी आत्मा की रचनात्मकता को बनाये रखे!

अगर वे भारत में ही दफनाये होने की इच्छा रखते थे तो आशा है तमाम विवादों को दरकिनार करके भारत उनके लिये ऐसा इंतजाम कर देगा।

यहीं की मिट्टी में वे जन्मे थे और यहीं उन्हे सुपुर्द-ए-खाक किया जाना चाहिये।

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