Posts tagged ‘Ghar’

अक्टूबर 1, 2011

अपनी आग में जलते घर

लुटेरों के कमांडर इन चीफ हैं सरकार
पब्लिक प्रोपर्टी के बड़े थीफ हैं सरकार
ये सब पीठ पीछे का गुबार है मालिक
मुहँ आगे आप सबसे शरीफ़ हैं सरकार
………….

तीर सीने के निकाल कर रखना
अमानतों को संभाल कर रखना
वक्त आने पर करना है हिसाब
ज़ख्म दिल में पाल कर रखना
* * *

फेंकने वाले हाथ खुद अपने थे करते भी क्या
कभी सर का लहू देखा कभी पत्थर को देखा
माँ का दूध जब खट्टे रिश्तों में शामिल हुआ
अपनी आग में हमने जलते हुए घर को देखा
* * *

भूल गए हैं हवाओं का एहसान, देख रहे हैं
खुद को मान बैठे हैं आसमान, देख रहे हैं
गुब्बारे कल फुस्स होने हैं फिर कौन देखेगा
अभी तो सब लोग उनकी उड़ान देख रहे हैं
* * *

कहता है खरा सौदा है आओ मुस्कानें बाँटें
रोतों की बस्ती के लिए आराम मांग रहा है
आया कहाँ से है दीवाना कोई पूछो तो सही
आँसू के बदले खुशी का इनाम मांग रहा है

(रफत आलम)

सितम्बर 25, 2011

शाह या फकीर, मरना दोनों को है

गुलेल की जिद है देखे, कहाँ तक पत्थर जाता है
उसे कौन समझाए घरों का शीशा बिखर जाता है

शाम ढले जब पंछी भी नीड़ों को लौटने लगते हैं
एक शख्स घर से निकल के जाने किधर जाता है

मेरी प्यास किसी निगाहें करम की मोहताज नहीं
इस फकीर का प्याला तो खुद से भी भर जाता है

यही मजबूरी तो है जिंदगी की सबसे बड़ी मजबूरी
शाह हो के फकीर आखिर में आदमी मर जाता है

उजाले के तलाशी पाँव के इन छालों से डर कैसा
दीपक से सूरज तक लपटों का रहगुज़र जाता है

ताज बने कि मशीने चले जीवन भूखों के रोते हैं
हाथ नहीं जाते आलम, इस दौर में हुनर जाता है

(रफत आलम)

सितम्बर 23, 2011

बूँद और समंदर

 

जिंदगी गुजारनी थी सो गुज़र की है
ये न पूछो किस तरह से बसर की है

घायल हैं सभी पर बताता नहीं कोई
पत्थरों को तलाश किसके सर की है

छप्पर जले तो महल भी नहीं बचेंगे
आग कब देखती है हवा किधर की है

रिश्तों की मौत पर अब रोता है कौन
हर आँगन के बीच दीवार घर की है

चूड़ियों के टकराव से टूटे हैं भाईचारे
बर्तनों की खनक तो रौनक घर की है

जिधर देखा, हैं आँसू आहें और कराहें
हम कैसे कहें ये दुनिया पत्थर की है

जहाँ पर शुरू, वहीं आखिर है आलम
बूँद से है समंदर तो बूँद समंदर की है

(रफत आलम)

जून 17, 2011

दिल बहलाने का ख्याल

तन्हाई की घुटन में सन्नाटों से दिल बहलाते रहे
रात भर गिनते रहे करवटों से दिल बहलाते रहे

खुद से भी डर गए जो जानते थे चेहरों का सच
हाँ जो बहरूपिये थे मुखौटों से दिल बहलाते रहे

घर की देहरी इन्तज़ार में पत्थर हो गयी आखिर
एहले-हवस शहर की गुड़ियों से दिल बहलाते रहे

इश्क के रास्ते में मिटने से भला डरता है कौन?
चिरागों के हौसले थे हवाओं से दिल बहलाते रहे

ज़ख्म देने वालों से मरहम की आस थी फ़िज़ूल
कुछ दर्दमंद थे जो मुस्कानों से दिल बहलाते रहे

(रफत आलम)

मई 30, 2011

अमृता प्रीतम का पता

रसीदी टिकट नामक आत्मकथा लिखने वाली अमृता प्रीतम संक्षिप्त में इस कविता में वह सब कह जाती हैं जिसे प्रदर्शित करने के लिये एक निबंधकार शायद कुछ हजार शब्दों का जमावड़ा कर देगा। कलाकार साधारण मानव की समझ वाली परिभाषाओं के बंधनों से परे चले जाते हैं। उन्मुक्त्त आत्मा की उदआन को दर्साती है यह कविता।

आज मैंने अपने घर का नम्बर हटाया है
और गली के माथे पर लगा
गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की
दिशा का नाम पोंछ दिया है
पर अगर आपको मुझे जरुर पाना है
तो हर देश के
हर शहर की
हर गली का
द्वार खटखटाओ
यह एक श्राप है
एक वर है
और जहाँ भी
आज़ाद रुह की झलक पड़े
समझना वह मेरा घर है

(अमृता प्रीतम)

अप्रैल 20, 2011

शाम के बाद

सब लोग तो घर जायेगें शाम के बाद
हम जाने किधर जाएगें शाम के बाद

दर्द के प्याले भर जाएगें शाम के बाद
हम नशे में उतर जायेगे शाम के बाद

जिदगी की जंग हारे हुए ये कुछ लोग
फुटपाथ पर पसर जाएगें शाम के बाद

दिन में ओढ़े सब मुखौटे उतार के हम
अपने अंदर उतर जायेगें शाम के बाद

तपते हुए अपने तन्हा बिस्तर पर हम
जल जल के मर जाएगें शाम के बाद

कुछ प्याले बन के होठों से जा लगेंगे
बाकी शीशे बिखर जायेगें शाम के बाद

अँधेरे से डर के राहें कब रुकेंगी आलम
मुसाफिर तो ठहर जायेगें शाम के बाद

(रफत आलम)

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