कविताऐं महज भावनाऐं नहीं हैं, वे अनुभव हैं।
एक कविता सीखने की खातिर तुम्हे शहरों, लोगों और चीजों को देखना होता है।
तुम्हे समझना होता है, महसूस करना पड़ता है कि पक्षी कैसे उड़ते हैं,
और इन इशारों को जानना होता है जो नन्हे फूल सुबह उठते ही दर्शाते हैं।
कला “पाब्लो पिकासो” की दृष्टि में
हर कोई कला को समझना चाहता है। चिड़िया के गाये गीत को समझने की चेष्टा क्यों नहीं करते? पेंटिंग के मामले में लोगों को समझना होता है... पर क्यों?
वे लोग जो चित्रों की व्याख्या करना चाहते हैं सरासर गलती पर होते हैं।
लहरें गा रही थी
अथाह गहराई में बैठा
गुनगुना रहा था कोई
वही अमर गीत
जिसकी मुझे तलाश थी।
चमन की राह से गुज़रा मैं!
फूलों का दिल बन कर
खुशबूओं में फैला रहा था कोई
वही अमर गीत
जिसकी मुझे तलाश थी।
आकाश को तकने लगा मैं !
तारों की महफ़िल में
चांदनी को सुना रहा था कोई
वही अमर गीत
जिसकी मुझे तलाश थी।
वही अमर गीत!
रुमी-तुलसी की ज़बान में है
कबीर-नानक के बयान में है
सूर–मीरा के भक्तिभाव में डूबा
राधा-किशन के बखान में है।
मासूमियत का अहसास बन कर
बच्चे की कोमल मुस्कान में है
प्रीत की कसोटी बनकर
लैला-मजनू की दास्तान में है
इश्क की बुलंदिया छूता हुआ
खुसरो ओ रसखान में है
ग़ालिब–निराला की भाषा बन कर
कविता की आन-बान में है
मंजिलों का पता देता
पक्षियों की उड़ान में है।
खय्याम से मस्ती में गवा रहा है कोई!
प्यारे, तू किराए के मकान में है।
जिस्म में रूह फूंकने वाले ने
मेरे शब्दों को शान नहीं बख्शी
कवि का दिल दे तो दिया
कलम को जान नहीं बख्शी
हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे बयां और
यह शेर कहा तो हजरत ग़ालिब ने खुद के लिये था पर जॉन साब को मंच से शायरी करते देखना और सुनना बखूबी जता देता है कि यह शेर जॉन साब पर भी उतना ही मौजूँ है जितना कि हजरत ग़ालिब के लिये था। जॉन साब द्वारा पिरोये गये अल्फाज़ गहरे मायने बिखेर देते हैं अगर उन्हे खुद जॉन साब की आवाज में ही सुना जाये और अगर उन्हे कलाम कहते देख लिया जाये तो साफ साफ पता चलता है कि वे मंच की दुनिया के बादशाह थे।
कतात
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मेरी अक्लो होश की सब हालते तुमने साँचे में जुनु के ढाल दी
कर लिया था मैंने एहदे तर्के-इश्क तुमने फिर बाहें गले में ड़ाल दी
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किसी लिबास की खुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है
तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी खुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है
तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है
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कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग होंगे जो उसको भाते होंगे
उसकी याद की बादेसबा और तो क्या होता होगा यूँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे
यारो कुछ तो जिक्र करो तुम उसकी क़यामत बाहों का वो जो सिमटते होंगे उनमे वो तो मर जाते होंगे
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गज़ल
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हालतेहाल के सबब हालतेहाल ही गयी शोक में कुछ नहीं गया शोक की जिंदगी गयी
एक ही हादसा तो है और वो यह की आज तक बात नहीं कही गयी बात नहीं सुनी गयी
बाद भी तेरे जानेजा दिल में रहा जब समां याद रही तेरी यहाँ फिर तेरी याद भी गयी
उसकी उम्मिदेनाज़ का हमसे यह मान था के आप उम्र गुजार दीजिए उम्र गुजार दी गयी
उसके विसाल के लिए अपने कमाल के लिए हालतेदिल थी खराब और खराब की गयी
तेरा फिराक जानेजा ऐश था क्या मेरे लिए तेरे फ़िराक में खूब शराब पी गयी
उसकी गली से उठ के में आन पड़ा था अपने घर एक गली की बात थी और गली गली गयी
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नज्म
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मुझ से पहले के दिन अब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हे
ख्वाब ओ ताबीर के गुमशुदा सिलसिले बारह अब सताने लगे हैं तुम्हे
दुःख जो पुहंचे थे तुमसे किसी को कभी देर तक अब जगाने लगे हैं तुम्हे
अब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हे अपने वो अहद ओ पेमा मुझे से जो न थे
ज़हर के प्याले से ना डरे
सूली के भी गले लगे
जंजीरों की आवाज़ में भी हमने
खनकती चूड़ियों के गीत सुने
तुम ना समझ सके हमें तो क्या
सदियों ने हमारे पैगाम
सर आँखों पर रखे
हम काँटों भारी राह पर चले
इसलिए के तुम्हे रास्ता साफ़ मिलें
तुम कहो जिंदगी नाकाम हुई
नाकाम ही सही
अनाम रह गाये
तो ये नाम ही सही
तुम्हारा आगाज़ हमारा अंजाम ही सही
अश्क, छाले और कांटे इनाम ही सही
हम सच के उपासक सच बोलते रहेंगें
कलम के तराजू में खरा तोलते रहेंगे
गिरह अकेले आदम की खोलते रहेंगे
तख़्त-ओ-ताज हमसे होलते रहेंगे
काट कर ही जुल्मो सितम को दम लेते हैं
जान अपनी हम सूलियों पर देते है
समझ आ ही जाऊंगा तुम्हे कभी ना कभी
(आज) ग़र नहीं मेरे अश’आर में मानी ना सही
Dove Talk के दूसरे भाग में प्रस्तुत है मशहूर शायर मरहूम अली सरदार जाफ़री साब की कविता जो उन्होने पाक शायर अहमद फराज़ साब के कलाम [यहाँपढ़ें] के जवाब में पढ़ी थी।
जो हाथ तुम ने बढ़ाया है दोस्ती के लिये
मेरे लिये है वो एक ग़म गुसार के हाथ
खुदा करे कि सलामत रहे ये हाथ अपने
अता हुये हैं जो जुल्फें संवारने के लिये
करें अहद के औजार-ए-जंग है जितने
उन्हे मिटाना है और खाक में मिलाना है
करें ये अहद के अरबाबे-जंग है जितने
उन्हे शराफत-ओ-इंसानियत सिखाना है
तुम आओ गुलशन-ए-लाहौर से चमन बरदोश
हम आये सुबह बनारस की रोशनी लेकर
और उसके बाद ये पूछें कि कौन दुश्मन है?
गधे इस बार मनुष्य के साथ आर पार की लड़ाई करने के मूड में आ गये और सारे गधों को शहर के बाहर एक खाली मैदान में इकटठा होने का संदेश पहुँचा दिया गया। सारे गधे मैदान में पहुँच गये। गधों के तात्कालिक नेता एक बुजुर्ग गधे ने सब गधों से एक स्वर में नारे लगाने को बोला।
“गर्दभ एकता जिन्दाबाद” और ” हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है” जैसे नारों से आकाश गूंज उठा और उनके रेंकने ने इतना शोर उत्पन्न किया कि शहर में घरों की खिड़कियाँ हिल गयी। लोग समझ नहीं पाये कि एकाएक ऐसा शोर क्यों और कहाँ से आया है?
बुजुर्ग गधे ने घोषणा की कि जिस भी गधे को अपना दुखड़ा सुनाना हो वे आगे आकर एक से दो मिनट के बीच अपनी बात रख सकते हैं।
ज्यादातर गधों ने मनुष्यों के उनके प्रति निर्मम व्यवहार का ऐसा सजीव वर्णन किया कि न केवल बोलने वाले बल्कि सुनने वाले गधों की आँखें भी भीग गयीं। सबने मनुष्य के क्रूर व्यवहार के प्रति विद्रोह करने का फैसला लिया।
बुजुर्ग नेता ने सभी गधों से इस फैसले के समर्थन में आगे आकर जमीन पर लोट पोट होकर शपथ लेने का आह्वान किया कि अब से वे भूखों मर जायेंगें पर मनुष्य का काम तब तक नहीं करेंगे जब तक कि वे उनके साथ हमदर्दी का बर्ताव करना शुरु नहीं करते।
आखिरकार मनुष्य का सबसे ज्यादातर काम वे ही करते हैं पर तब भी मनुष्य का प्यार पालतू कुत्तों, घोड़ों और पक्षियों को मिलता है और गधों के साथ न केवल सौतेला बल्कि क्रूरतापूर्ण बर्ताव किया जाता है।
सिर्फ एक गधे को छोड़ कर सभी गधों ने शपथ ले ली। कुछ गधे तो भावातिरेक से इतने भर गये कि उन्होने इस अंदाज में जमीन पर लोट लगायी कि चारों तरफ धूल के बादल छा गये|
बुजुर्ग गधे ने इस नौजवान गधे से पूछा कि वह शपथ लेने आगे क्यों नहीं आया?
नौजवान गधे ने थोड़ा शर्माते हुये कहा कि यूँ तो उसकी हालत कुछ अलग नहीं है और सब गधों से परन्तु उसका भविष्य मनुष्य जाति के साथ रहने के कारण बहुत अच्छा होने वाला है।
सारे गधे उसकी बात सुनकर आश्चर्यचकित रह गये।
उन्होने उसे अपनी बात विस्तार से बताने को कहा और पूछा कि उसके आशावाद का कारण क्या है?
नौजवान गधे ने कहा कि कुछ साल पहले तक तो उसका मालिक एक गरीब आदमी था परन्तु कुछ समय पहले समय ने ऐसा चक्र घुमाया कि लोगों ने उसकी पत्नी को नगर प्रमुख बना दिया। पद एक खास जाति की महिला के लिये आरक्षित हो गया था और मेरे मालिक की पत्नी ही ऐसी थी जो अपनी बिरादरी की महिलाओं से ज्यादा पढ़ी लिखी थी। पत्नी के नगर प्रमुख बन जाने के बाद मेरे मालिक ने ही प्रशासन चलाना शुरु कर दिया और जम कर धन कमाया पिछले कुछ सालों में। जब मेरे मालिक के दिन फिर सकते हैं तो भाग्य पर भरोसा क्यों न किया जाये?
बुजुर्ग गधे ने उसकी तरफ प्रश्नात्मक दृष्टि से देखते हुये पूछा कि परन्तु उसके मालिक के धनी होने से उसके अच्छे भविष्य का क्या संबंध है?
नौजवान गधे के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आ गयी और उसने बमुश्किल खुशी से चेहरे पर आ जाने वाली हँसी को दबाया। उसने बताया कि दरअसल मेरे मालिक की एक लड़की है और मैने अपने मालिक को अक्सर उसे डाँटते हुये पाया है कि यदि वह ऐसे ही भोंदू बनी कर्म करती रही और पढ़ायी लिखायी में ऐसी ही फिसडडी रही तो उसकी शादी किसी गधे से ही करनी पड़ेगी।
युवा गधा साँस लेने के लिये रुका और उसने उत्सुकता से उसी की तरफ देख रहे गधों पर एक दृष्टि दौड़ाई और आगे कहा कि अब उस घर में मैं ही अकेला गधा हूँ। और यह बात तो आप सब भाईलोग जानते ही हो कि मनुष्य सबसे ज्यादा अपने दामाद को सिर पर चढ़ाकर रखता है। अब बताओ कि मेरा फायदा तुम लोगों के साथ हड़ताल करने में है कि अपने भविष्य की चिन्ता करने में?
फिर सोचो कि नगर प्रमुख का दामाद बन कर मैं अपनी बिरादरी का भी कितना फायदा कर सकूँगा।
बुजुर्ग गधे की समझ में नहीं आया कि वह इस गधे के गधेपन को किस रुप में ले?
पता नहीं इन गधों में से कोई कुछ समझा कि नहीं पर पास से तेजी से गुजरती गाड़ी में बज रहे टेप से आवाज आ रही थी, दिल के बहला लेने को गालिब ये ख्याल अच्छा है।