मार्च 17, 2011
कौन रोया किसकी आँख पानी हुई
दीवाना मर गया खत्म कहानी हुई
जिंदगी क्या थी वक्त के समंदर में
एक लहर लम्हों की आनी जानी हुई
अपने आप झुकने लगे बाप के कंधे
घर में बिटिया जब कोई सयानी हुई
ईमानदारी का सबक सुन के बाप से
आज के बच्चों को बहुत हैरानी हुई
रसूख का पैमाना है घूस या घोटाला
चोरी हुई साहब ये के हुक्मरानी हुई
बेगुनाह प्यार को बेसबूत जला दिया
झुकने नहीं दी गाँव ने मूँछ तानी हुई
मज़हब कई थे पर मज़हबी कोई नहीं
बंदगी हुई हमसे या जाने शैतानी हुई
अहसास के आंसू हैं ये अर्थहीन शब्द
आलम हमसे कब गज़ल-ख्वानी हुई
(रफत आलम)
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मार्च 15, 2011
मौत की तलाश जीने का हौसला देने लगी
जिंदगी मुस्कुरा कर फिर से सजा देने लगी
लंबा था दर्द का सफर आँखों के सूखने तक
चोट पुरानी हो कर और भी मज़ा देने लगी
सुबह का भूला लुटपिट के घर को लौटा था
गिरती दीवार ही काम आई सहारा देने लगी
चौराहे पे थक कर बैठ गए जाते किधर हम
और लोगों को मंजिल खुद रास्ता देने लगी
आँखों में झिलमिलाने लगे मजारों के चिराग
सफर की थकन मंजिल का पता देने लगी
बिक गयी थी ये भी तेरे मीठे होटों की तरह
खाली एक बोतल प्यास का अंदाजा देने लगी
अहसास की रग-रग में ज़हर घोलने के बाद
जिए जाने का सबक हमें दुनिया देने लगी
नेता चालीसा बांचने वाले पुरोहितों के साथ
बस्ती! माटी के खुदाओं को सजदा देने लगी
रूठी हुई नींद पल दो पल ही आई थी पास
टीस दिल की मुझे सपने में सदा देने लगी
तन्हाई का अहसास अब नहीं होता आलम
मीर-ओ-ग़ालिब की गज़ल साथ मेरा देने लगी
(रफत आलम)
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मार्च 15, 2011
विश्वास फरेब का नाम है बुजुर्गों ने कहा है
बता तो सही यार आस्तीन के पीछे क्या है
न शिकायत है किसी से न लबों पे गिला है
हम फकीरों के दिल में सबके लिए दुआ है
आज तो सारा माहौल ही कालिख से पुता है
आप अपना दामन बचाइए आपको क्या है
ज़ख्मो को खुला रख के घर से निकलता हूँ
मुझे मालूम है नमक भरने को दिन खड़ा है
तुम्हारा वादा-ए-मुहब्बत ज़बानी था और रहा
हमारा हर्फे वफ़ा दिल के वरक पे लिखा है
वक्त का उधार न चुका साँसों की पूंजी से
आदमी ने आखिर जीवन भी सूद में दिया है
बसे देखे दुनिया में सातों जातें चारों मज़हब
नहीं मिला तो बस आदमी ही नहीं मिला है
मैंने तो तेरी रहबरी का भरम रखा है आलम
ये रास्ता मंजिल को नहीं जाता मुझे पता है
(रफत आलम)
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मार्च 13, 2011
खुशबु किसी की आई थी तारों के पार से
चांदनी लिपट के रोई बहुत मौसम-ए-बहार से
नज़दीक ज्यादा है वो महलों की मीनार से
आसमान पसीजता नहीं गरीब की पुकार से
उसका मामला तो है सितारों के भी पार से
दीवाना लिपट के हंस रहा है सूली-ओ-दार से
क्या सोच कर दीवाने ने किया गरेबाँ चाक
लहू के कतरे टपक रहे हैं दामन के तार से
वफ़ा करने का खूब इनाम दिया चमन को
सौगात में चंद खार मिले जाती हुई बहार से
तेरे साथ माटी मिला आया था दिल को मैं
जिंदगी फिर नहीं लौटी मौत की रहगुज़ार से
तने से लिपटी लता को हसरत से देखने वाले
लम्हा कोई लौटा क्या वक्त के खूनी गार से
पाक रिश्ते रूह के जिस्मों की भूख खा गयी
लोग खरीद लाये आल म प्यार भी बाज़ार से
(रफत आलम)
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मार्च 11, 2011
ईंट महंगी पत्थर महंगे हुए
माटी सोना हुई घर महंगे हुए
माहौल लहुलुहान हमने देखा
पत्थर महंगे न सर महंगे हुए
ख़ुदकुशी तरसती देखी बेचारी
मौत सस्ती ज़हर महंगे हुए
गाँव सब के सब बिके हमारे
लोग कहते हैं शहर महंगे हुए
दूरी ज़रूर कम की साधनों ने
जाइए कहाँ सफर महंगे हुए
‘चीनी’ फरेब का बोलबाला है
दस्तकार सस्ते हुनर महंगे हुए
आलम जी हीरे ठोकरों में रहे
तुम हो क्या मगर महंगे हुए
(रफत आलम)
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मार्च 9, 2011
दोस्त बनकर कोई गले से लगाए मुझे
अरसा हो गया है ताज़ा ज़ख्म खाए मुझे
शाख से टूट गया आवारा एक पत्ता हूँ
उडा जाता हूँ जिधर हवा ले जाए मुझे
ज़ख्मों ने जब भी माँगा दर्द का हिसाब
पुराने कुछ दोस्त बहुत याद आये मुझे
इस दौर में जन्मों के रिश्ते खोजता हूँ
दुनियादारी ज़रा तो वक्त सिखाये मुझे
मेरी किस्मत को दोस्ती रास नहीं आती
कोई दोस्त हो जो के दुश्मन बनाए मुझे
दोस्त बेरुखी की शिकायत लेके आये हैं
कोई जानता हो तो दोस्ती सिखाये मुझे
नज़र से गिरा हूँ तो खाक में जा मिलूँ
उससे कहना आंसू की तरह बहाए मुझे
उसकी याद को शिकवा हो मुझसे कभी
जिंदगी ऐसा दिन न कभी दिखाए मुझे
रास आये आलम न महफ़िल न वीराने
देखिये तकदीर अब कहाँ ले जाए मुझे
(रफत आलम)
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फ़रवरी 22, 2011
एक ज़ख्म हरा था नहीं रहा
दर्द खुद मसीहा था नहीं रहा
दिल का रिश्ता था नहीं रहा
वह दोस्त मेरा था नहीं रहा
जम गया दर्द सूनी आंखों में
पानी का झरना था नहीं रहा
कोई भी अब याद नहीं आता
मुझे अपना पता था नहीं रहा
अपनों का सलूक क्या कहिये
ज़माने से गिला था नहीं रहा
अमीर खुद है वक्त का खुदा
गरीब का खुदा था नहीं रहा
लोग आज कुरान बेच खाते हैं
ईमान कभी जिंदा था नहीं रहा
काला धंधा काली हकीकत है
रोज़गार सपना था नहीं रहा
डूबती कश्ती में ठहरता कौन
नाखुदा से गिला था नहीं रहा
गम की लौ में जलबुझा दिल
मोम का टुकड़ा था नहीं रहा
रोती होंगी सन्नाटों भरी राहें
आलम आवारा था नहीं रहा
(रफत आलम)
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फ़रवरी 19, 2011
तम में उजाले की दुआ करते हैं यारो
बुझे दीपकों के भी कुछ सपने हैं यारो
दीखत में लिबास बहुत उजले हैं यारो
बदन कोयले की दलाली करते हैं यारो
दिन ने ज़रूर कहीं आग पिलाई होगी
शोले रात भर आँखों से बरसे हैं यारो
यकीन और भरम में फर्क थोडा सा है
वो मेरे कब हुए जो मेरे अपने हैं यारो
संबंधों में गिरावट की अति तो देखो
जानी दुश्मन बने माँ के जने हैं यारो
बर्तनो की खनक से घर कहाँ उजड़ता
भाई तो रसोइयां भी तोड़ चले हैं यारो
दिन वो भी थे जो खुशबू जो जैसे उड़ गये
दिन ये भी हैं के पहाड लगते हैं यारो
सोचो तो प्यास में भी तृप्ति है वरना
मयकदे पीकर भी लोग तरसते हैं यारो
बहुत आसान हो गया है उसको भुलाना
हम अपने आपको ही भूल गये हैं यारो
जितने ज़र्फदार थे कब के सब मर गए
बचे हैं आलम साब बहुत नकटे हैं यारो
(रफत आलम )
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फ़रवरी 4, 2011
खुश्बुओं के सिलसिले हवाओं से मिलते ज़रूर हैं
वो वीराने में लगे हों तो भी फूल खिलते ज़रूर हैं
रात का दिन के साथ निबाह नामुमकिन है मगर
कोई एक मुकाम है जहाँ पर दोनों मिलते ज़रूर हैं
चोटों के निशान तो मर कर ही जाते हैं ऎ दोस्त
वक्त के धागे से ज़ख्मों के मुँह सिलते ज़रूर हैं
मुस्कान के पीछे छिपी पीड़ा की बात यूँ समझिये
काँटों की नोंक पर दीख्त में फूल खिलते ज़रूर हैं
सम्बंध वही मारते हैं जिन पर विश्वास हो बहुत
दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते ज़रूर हैं
चमन की सुहानी उड़ानों का जब आता है ख़याल
पिंजरे के तारों से परों के ज़ख्म सिलते ज़रूर हैं
महफिलों की रौनक हैं बनावटी गुलदस्ते आलम
खुशबू दे नहीं सकते तो भी ये खिलते ज़रूर हैं
(रफत आलम )
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जनवरी 7, 2011
जाने कितने गीत गाए हैं खामोशी ने
ये बात और है सुने ही नहीं किसी ने
खारे पानी के स्वाद में छुपा है राज़
समंदर से मिलके क्या कहा नदी ने
खुद अपनी तलाश में कम ही निकला
खुदा को तो बहुत ढूँढा है आदमी ने
आसमान की जानिब सीढ़ी उठाने वाले
तूने देखे नहीं क्या उतरते हुए जीने
न ले गई मुझे अपने ही पास वरना
कहाँ कहाँ न भटकाया इस दीवानगी ने
दिल के ज़ख्म गिन सका तो बताऊँगा
सांसों के सिवा क्या दिया जिंदगी ने
मुझे सता के दुखी हैं वो क्या सुना
मुझको छेड़ में कहा होगा किसी ने
जुनू के रास्ते चला तो पा गया मंजिल
बंदे को खुदा से मिलाया दीवानगी ने
मैंने जलते हुए घर देखे हैं ए आलम
तुझको उजाला दिखाया होगा रौशनी ने
(रफत आलम )
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