Posts tagged ‘Dost’

सितम्बर 7, 2011

हिंदू, मुस्लिम सिख, ईसाई – आदमी कहाँ है भाई?

हिंदू . मुस्लिम, सिख, क्रिस्तान खूब थे
बस आदमी ही नहीं मिला इंसानों में

रौशनी देने के लिए शर्त है अँधेरे की
खूने-दिल जलाया जाए उजालदानों में

नेकियां हो जाती हैं गुनाह में शामिल
दिखावे का पुट हो अगर अहसानों में

वक्त की ठोकर की नाप ऐसी है यार
अच्छे अच्छे दिमाग आ गए पैमानों में

अपने अपने ज़र्फ की बात है ए दोस्त
कौन छलक गया कौन रहा पैमानों में

साहिल ने देखा उन बेडों को होते पार
लंगर जिन्होंने डाल दिए थे तूफानों में

निगाहें करम ओ मालिक निगाहें करम
ये जहान भी तो है तेरे ही जहानों में

जो सलूक किया तूने अच्छा ही किया
क्या कहें दुनिया के हम हैं मेहमानों में

फूलों को मुरझाना हुआ देख आये थे
दिल लगने लगा है अपना वीरानों में

पंख पिंजरे में हैं पर हौसला तो देखो
असीर का दिल है  अब भी उड़ानों में

सकून दिल कहाँ से लाओगे ए आलम
सकूने दिल मिलता नहीं है दुकानों में

असीर -कैदी

(रफत आलम)

 

अगस्त 11, 2011

गम का आसरा : नरेश कुमार ’शाद’

दिले बेमुददाआ दिया है मुझे
देने वाले ने क्या दिया है मुझे

दोस्तों ने दिए हैं ज़ख्म कहाँ
दोस्ती का सिला दिया है मुझे

मुझको दुनिया का तजुर्बा ही नहीं
तजुर्बे ने बता दिया है मुझे

जिंदगी से तो क्या शिकायत हो
मौत ने भी भुला दिया है मुझे

जब भी घबरा गया हूँ मैं गम से
गम ने खुद आसरा दिया है मुझे

…………..
प्रस्तुती : रफत आलम

जुलाई 9, 2011

तुम्हारे बिना : सूना जीवन

हवस के अँधेरे में
मचलते हुए जिस्म
आग से भर जाते हैं
नस-नस जल उठती है
होश-ओ-हवास के परे
ना दिल ना दिमाग
कुछ भी तो
बाकी नहीं बचता।

फिर एक बार
अंगों का अभिशिप्त कंपन
चंद पल साँसों का तूफ़ान
पसीने की सड़न के साथ
तुम्हारे प्यार की खुशबु
लौटा लाता है,
सुला देता है नम आँखों को।

मेरी खो गयी दोस्त!

यूँ ही कट जाती है
किसी अजनबी बिस्तर पर
एक और ज़ख़्मी रात।

(रफत आलम)

जुलाई 7, 2011

कहीं मकान बनाएँ क्या?

तकदीर की तह में उतर जाएँ क्या,
घर जलाके रौशनी को मनायें क्या?

होंटों पर ताले लगे हैं सुनायें क्या,
छुरी तले हैं ज़बाने तो गायें क्या?

बेकसी बता हद से गुजर जाएँ क्या,
जिंदगी के मारे हैं ज़हर खाएं क्या?

वहाँ भी कहीं मौत खड़ी मिलनी है,
जिंदगी तेरे रास्ते पर आयें क्या?

किस्मत कौन सी अपने हाथ में है,
किस्मत के मिले पर पछताएं क्या?

आज तो ज़रा भी दिल में नहीं दर्द,
किसी दोस्त को गले से लगाएं क्या?

कोई तो सूरत हो दिल बहलाने की
जिंदगी बता ताज़ा फरेब खाएं क्या?

हमने सरों पर छतें गिरती देखी हैं,
सोचते हैं कहीं मकान बनाएँ क्या?

(रफत आलम)

मई 23, 2011

बूँद में समंदर

सौ परिक्षाओं से गुजरोगे हर जीत हार में
प्रयास करना के रहो सदा अव्वल कतार में

उजाले नज़र आये भिखारियों की कतार में
सुना था रौशनी बंटेगी अंधों के दरबार में

गुमराही के सिवा अपने को मिलना है क्या
रहनुमाँ सच्चे हैं ना आचार में ना विचार में

ध्यान से देखो तो इसमें समंदर हैं समाये
ये बूँद जो नन्ही नज़र आ रही है आकार में

हर रास्ते सौदा हो रहा है काली कमाई का
खुले बिका करता है ज़मीर आज बाज़ार में

मंजिलों के सफर चल दिए कारवाँ के साथ
अपना नसीब देखिये हम खो गए गुबार में

नफरत की क्या कहें घाव प्रीत के थे गहरे
दिखे तक भी नहीं और मार गए प्यार में

फूलों से तो ज़ख्मों के सिवा कुछ ना मिला
काँटों का खलूस आजमाएंगे अबके बहार में

अपनों ने वो चोट दी के दुश्मन लगे शर्माने
बहुत फरेब खाए हैं आलम हमने एतबार में

(रफत आलम)

अप्रैल 9, 2011

वक्त की धुंध

महफिलों के चिराग कभी हम भी थे
खुशबुओं के बाग़ कभी हम भी थे
वक्त की बात राह की धूल भी नहीं
मंजिलों के सुराग कभी हम भी थे

चिराग थे महफ़िलें थीं दोस्त हज़ार थे
खवाब थे बेखुदी थी जाम थे खुमार थे
अपने ही घर में अजनबी हैं हम के जो
कभी शहर में रौनक के अलमबरदार थे

(अलमबरदार=ध्वज वाहक)

सूरज साथ चला करता था अपने साथ
चाँद लिपट के नींद लेता था अपने साथ
अब अँधेरे भी हमसे बच कर चलते हैं
कभी उजाला ही उजाला था अपने साथ

वक्त की धुंध में खो गयी सब पहचानें
तस्वीरों की कैद में कुछ यादें मौन हैं
मुखौटों का सफर खत्म को है शायद
हमें भी पता नहीं अब के हम कौन हैं

(रफत आलम)

मार्च 14, 2011

खून सफेद…

दिखत में लाल है पर खून सफेद
कैसा रिश्ता नाता हर घर खून सफेद

माँ के बेटों में है रिश्ता भाई का
आये हैं परन्तु लेकर खून सफेद

पुरखों के संस्कार ऐसे तो नहीं थे
कैसे आया अपने भीतर खून सफेद

तौबा यार आज के निष्ठुर रिश्तों से
हमने पाया सबके भीतर खून सफेद

संबंधों की मौत के दिन पर्दा उठा
सब संबंधों के है अंदर खून सफेद

छले गए लोग सियारी मुस्कानों से
किसे दिखा दिल के भीतर खून सफेद

सांस के चलते सुध कहाँ ली बेटों ने
छलका माँ के कफ़न पर खून सफेद

खूनी छुरा खुद की आस्तीन का था
शर्मिदा हुआ कब मगर खून सफेद

हो गया अपना दर्द पराया ए आलम
रिश्ते तो सच्चे थे मगर खून सफेद

(रफत आलम)

फ़रवरी 4, 2011

दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते हैं (रफत आलम)

खुश्बुओं के सिलसिले हवाओं से मिलते ज़रूर हैं
वो वीराने में लगे हों तो भी फूल खिलते ज़रूर हैं

रात का दिन के साथ निबाह नामुमकिन है मगर
कोई एक मुकाम है जहाँ पर दोनों मिलते ज़रूर हैं

चोटों के निशान तो मर कर ही जाते हैं ऎ दोस्त
वक्त के धागे से ज़ख्मों के मुँह सिलते ज़रूर हैं

मुस्कान के पीछे छिपी पीड़ा की बात यूँ समझिये
काँटों की नोंक पर दीख्त में फूल खिलते ज़रूर हैं

सम्बंध वही मारते हैं जिन पर विश्वास हो बहुत
दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते ज़रूर हैं

चमन की सुहानी उड़ानों का जब आता है ख़याल
पिंजरे के तारों से परों के ज़ख्म सिलते ज़रूर हैं

महफिलों की रौनक हैं बनावटी गुलदस्ते आलम
खुशबू दे नहीं सकते तो भी ये खिलते ज़रूर हैं

(रफत आलम)

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