हिंदू . मुस्लिम, सिख, क्रिस्तान खूब थे
बस आदमी ही नहीं मिला इंसानों में
रौशनी देने के लिए शर्त है अँधेरे की
खूने-दिल जलाया जाए उजालदानों में
नेकियां हो जाती हैं गुनाह में शामिल
दिखावे का पुट हो अगर अहसानों में
वक्त की ठोकर की नाप ऐसी है यार
अच्छे अच्छे दिमाग आ गए पैमानों में
अपने अपने ज़र्फ की बात है ए दोस्त
कौन छलक गया कौन रहा पैमानों में
साहिल ने देखा उन बेडों को होते पार
लंगर जिन्होंने डाल दिए थे तूफानों में
निगाहें करम ओ मालिक निगाहें करम
ये जहान भी तो है तेरे ही जहानों में
जो सलूक किया तूने अच्छा ही किया
क्या कहें दुनिया के हम हैं मेहमानों में
फूलों को मुरझाना हुआ देख आये थे
दिल लगने लगा है अपना वीरानों में
पंख पिंजरे में हैं पर हौसला तो देखो
असीर का दिल है अब भी उड़ानों में
सकून दिल कहाँ से लाओगे ए आलम
सकूने दिल मिलता नहीं है दुकानों में
असीर -कैदी
(रफत आलम)

