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अगस्त 5, 2011

नरेश कुमार “शाद” : परिचय उस महान शायर से

हर शब्द का अर्थ ज़रूर होता है, फिर शब्द अगर शब्दों के जादूगरों की कलम की पैदाइश हों तो  तो क्या कहिये! यूँ सभी श्रद्धेय हैं पर मुझे आधुनिक युग के ये हजरात – जैसे साहिर साहिब, नूर साहिब, जॉन एलिया साहिब, फैज़ साब और शाद साहिब बहुत भाते हैं। नरेश शाद साहिब पर बहुत कम लिखा गया है सो एक छोटी सी कोशिश पेश है।

उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर नरेश कुमार “शाद” का जन्म वर्ष 1928 में पंजाब राज्य के जिला जालंधर के निकट ग्राम नकोदर में साधारण से परिवार में हुआ था। इनके पिता नोहरा राम की माली हालत बहुत खराब थी, रोज़गार के रूप में वे एक लोकल साप्तहिक में काम करते थे जहां से नाम-मात्र पगार मिलती थी। शाद साब के पिता ‘दर्द’ के उपनाम से शायरी भी करते थे तथा उनके सुरापान करने की आदत के कारण से परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद शोचनीय थी। शाद साब की माँ सीधी-सादी देहाती महिला थी, जो किसी तरह घर चला रही थी। इस तरह शाद के पास शायरी विरासत में आई और दो वक्त रोटी का जुगाड ना होने जेसा माहौल घर में मिला। बाद के जीवन की नाकामियों, विषमताओं और नाउम्मीदी ने उन्हें भी शराबी बना दिया, जो कालान्तर में उनकी जवान उम्र में ही मौत का कारण भी बना। अजीब बात है नरेश केवल नाम के नरेश थे साथ ही शाद (प्रसन्न) उपनाम भी रख लिया था, कौन जाने शाद ने ऐसा गरीबी से उपजी कुंठा और उसका मजाक उड़ाने के लिए किया हो, अन्यथा तो दरिद्रता, नाकामी और उदासी का शाद साब से चोली दामन का साथ रहा। वे अपने परिवेश से इस कद्र तंग आ गये के निकल पड़े घर से एक आवारा सफर पर। पेट की भूख और तबियत की बैचेनी लाहौर, रावलपिंडी, पटियाला, दिल्ली, कानपुर, मुम्बई, और लखनऊ, कहाँ नही ले गयी उन्हें।

ऐसी ही कैफियत में शायद गज़ल के ये शेर निकले है :-

 

हाय! मेरी मासूम उम्मीदें, वाय! मेरे नाकाम इरादे
मरने की तदबीर न सूझी जीने के अंदाज़ न आये
शाद वही आवारा शायर जिसने तुझे प्यार किया था
नगर-नगर में घूम रहा है अरमानों  की लाश उठाये।

 

शाद साब, चाहे शायरी हो कि निजी जीवन में वे जो कुछ भी बने अपने बलबूते और कड़ी मेहनती के के कारण बने थे। अन्यथा तो हाल यह था कि पैसे नहीं होने के कारण उन्हें अपना कलाम तक भी बेचना पडा। एक साहब ने मात्र साठ रूपये में उनकी 60 गज़लों का सौदा अपने नाम से छापने के किया और बेहयाई ये के वे पैसे भी नकद नहीं मिले। ऐसे हालात का दर्द उनके इस कलाम में साफ़ नज़र आरहा है:-

आप गुमनाम आदमी हैं अभी
इस लिए आपका ये मजमूआ
अजसर-ए-नो दुरस्त करवाकर
अपने ही नाम से मैं छापूंगा
रह गया अब मुआवज़े का सवाल
नकद लेना कोई ज़रूर नहीं
शाम के वक्त आप आ जाएँ
मयकदा इस जगह से दूर नहीं

(मजमूआ : कवितासंकलन, अजसर-ए-नो : नए सिरे से, दुरस्त : ठीक)

 

उर्दू के प्रसिद्ध व्यंगकार फिक्र तौस्वी ने शाद साब के उस उलट-पलट जीवन का बेहतरीन खाका खींचा है। उनके शब्दों में…

 

“यह हकीकत है कि शाद ने अपनी मौजूदा जिंदगी की टूटी फूटी इमारत भी सिर्फ अपने ही बलबूते पर खड़ी की है। प्रतिभा की चिंगारी उसके नसीब में थी, उसने उसे बुझने नहीं दिया… उसके इस संघर्ष की कहानी न सिर्फ लंबी है, बल्कि तेज रफ़्तार भी। यूँ लगता है, जैसे उसने पैदल ही 100-100 मील का फासला एक–एक घंटे में तय कर लिया है। इस सफर में यद्यपि उसके चेहरे पर गर्द अट गयी, उसकी हड्डियां चटक गयी… उसके पाँव टूट गए…’’

 

जिंदगी के छोटे आवारा और परेशान सफर में नरेश शाद साब ने उर्दू कविता की तमाम बारीकियां बहुत परिपक्वता व गहराई के साथ अपने कलाम में पेश की हैं। गज़ल, नज़्म, कते और रुबाई सभी बेहतरीन अंदाज़ में पेश की हैं, परन्तु कते और गज़ल से आपको अधिक लगाव था।

शाद साब के कालाम के बारे में समकालीन बड़े शायर जोश मलीहाबादी, जिन्हें क्रान्तिकारी विचारों के कारण शायर-ए-इंकेलाब भी कहा जाता है, ने लिखा है:-

 

‘’नरेश कुमार शाद  आजकल के नौजवान शायरों से एक दम भिन्न हैं, वे दिल के तकाजों से मजबूर होकर शेर लिखते हैं, सोच समझ के शेर कहते हैं… इसी कारण उनके शेरों में प्रभाव और प्रभाव में वह विशेषता होती है जो शब्दों के बंधन में नहीं आ सकती’’।

शाद साब को निर्मोही काल चक्र ने सन 1928 से 1969 अर्थात मात्र 41 बहारों का समय ही दिया और वे बहारें भी काँटों द्वारा अहसास अजमाइश के सिवा कुछ नहीं थ॥ बहुत उदासी, दर्द और शराब के ज़हर में डूब कर इस लोकप्रिय और हर दिल अज़ीज़ शायर ने दुनिया से मुँह मोड़ लिया। पर उनका लेखन कद्रदानों को तो कयामत तक मोहता रहेगा।

प्रस्तुति : रफत आलम

 

…जारी

जून 8, 2011

भ्रष्टाचार विरोध को इंसाफ मिलेगा क्या?


बीते दिनों
सन्यासी, ठग, व्यपारी और
मसीहा के बीच
उलझे हुये
सत्य का
अजीब रूप देखने को मिला है।

खून-पसीने की चोरी का
हिसाब माँगने गए
निहत्थे आंदोलनकारियों पर
क्यों भांजी गयी लाठियाँ,
समझ से बाहर है।

फिर शुरू हो गया
आरोप प्रत्यारोप का दौर
बंदरों में होड़ मच गयी है
भ्रष्टाचार विरोध की सिकी
रोटी हथियाने की।

चक्की के दोनों बड़े पाट तैयार हैं
पिसे हुओं को और पीसने के लिए
जनसंवेदनाओं से मखौल कर
वोटों की राजनीती हुई है गर्म
कोयल के वेश में काग-राग से
असल मुद्दा–बेमुद्दा हो चला है।

हराम कमाई से हुए मुस्टंडे
नूरा-कुश्ती के माहिर
काले धन के बचाव का दाव
खेल गए हैं।

डर है डूबो न दी जाएँ
भ्रष्टाचार विरोधियों की नावें
इस गन्दी व्यवस्था के कीचड़ में
फिर धोखा खा न जाएँ
इन्साफ की बाट तकती
गीली आँखें।

(रफत आलम)

जून 6, 2011

बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के

बाबा रामदेव के काले धन की विदेश से वापसी और भ्रष्टाचार के खिलाफ किये अनशन से सम्बंधित दुखद घटनाक्रमों ने भारत को हलचल से भर दिया है। कहीं कोलाहल है तो कहीं चुपचाप देखा जा रहा है कि आगे क्या होगा। कल, विजय, अशोक, हरि और सुनील, चार बुजुर्ग मित्रों की रोज़ाना होने वाली बैठक एक बहस-गोष्ठी में बदल गयी। बहुत समय बाद चारों के दिमाग और ज़ुबान दोनों ही राजनीतिक तेवरों से ओत-प्रोत हो रहे थे।

आम तौर पर चारों सुबह दस बजे किसी भी एक के घर मिल बैठ दुनिया जहान की बातें किया करते हैं। दोस्ताना माहौल में वक्त्त अच्छा बीत जाता है। सुख-दुख की बातें हो जाती हैं।

मजमा विजय के घर पर लगा। चारों के हाथों में अलग-अलग अखबार थे।

विजय बाबू ने गहरी साँस भ्रने के बाद गम्भीर स्वर में कहा,” घटनाक्रमों ने बहुत सारे सवाल खड़े कर दिये हैं। सारे मामले के बहुत सारे पहलू उजागर हुये हैं”।

हरि – विजय जी, एक बात तो तय है कि अनशन को तोड़ने के लिये आधी रात को पुलिस बल से जैसी हिंसक कारवाही करवायी गयी है उस निर्णय ने जैसी किरकिरी कांग्रेस पार्टी और सरकार की की है, उसका कलंक आसानी से हटने वाला है नहीं। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की कहावत का इससे अच्छा उदाहरण हो नहीं सकता।

सुनील – ये तो सही कहा आपने हरि भाई। पर विजय बाबू आप कुछ सवाल और पहलुओं की बात कर रहे थे। कुछ बताओ।

अशोक – हाँ पहले आप ही बताओ आपको क्या दिखता है इस मामले में?

विजय – पहली बात तो यही है कि बाबा रामदेव, अन्ना हजारे के अनशन के समय से ही सार्वजनिक रुप से मीडिया को दिये साक्षात्कारों में बार-बार कह रहे थे कि वे जून के पहले हफ्ते से अपने एक लाख समर्थकों के साथ भ्रष्टाचार और काले धन की विदेश से वापसी जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिये सरकार पर उचित कार्यवाही करने के लिये दबाव बनाने के लिये अनशन पर बैठेंगे। सरकार कहती है कि अनुमति सिर्फ योग-शिविर लगाने के लिये ली गयी थी। अगर ऐसा था तो दिल्ली में जब रामलीला मैदान में शिविर लगाये जा रहे थे तभी सरकार ने उचित कदम क्यों नहीं उठाये? बाबा रामदेव के दिल्ली पहुँचने के बाद भी उनसे स्पष्ट क्यों नहीं कहा कि शिविर की अनुमति के साथ वे शांतिपूर्ण ढ़ंग से भी वहाँ अनशन पर नहीं बैठ सकते।

हरि – सही कह रहे हो विजय बाबू, जब बाबा रामदेव और सरकार दोनों को पता था कि अनुमति सिर्फ योग शिविर लगाने की ली गयी है और सरकार अनशन के दूसरे या तीसरे दिन कानूनी कार्यवाही कर सकती है तो क्यों हजारों लोगों की जान को जोखिम में डाला गया? अनशन से पहले दिन टीवी पर ऐसी बातें भी उठ रही थीं कि रामलीला मैदान में योग शिविर ही रहेगा और अनशन जंतर-मंतर पर किया जायेगा। सरकार के चार बड़ी मंत्रियों ने हवाई-अड्डे पर ही बाबा रामदेव को पकड़ कर क्या इस बात की संभावना उनके दिमाग से हटा दी कि जंतर-मंतर पर अलग से अनशन करने की जरुरत नहीं है और सरकार से बातचीत से उचित हल निकल आयेगा, और बाबा रामदेव जंतर मंतर को भूलकर रामलीला मैदान में ही अनशन की लीला दिखाने लगे और उन्हे लगता था कि सब कुछ ठीक पटरी पर चल रहा है और सब ऐसे ही निबट जायेगा? हमें तो घपला लगता है मामले में।

सुनील – जब अनशन की पहली ही शाम आते आते सरकार और बाबा रामदेव में वार्ता टूट गयी तो क्या सरकार का फर्ज नहीं बनता था कि अनशन स्थल पर बैठे हजारों लोगों की जान की सलामती की फिक्र करती? सरकार का बाबा रामदेव से कुछ भी रिश्ता हो, कोई भी सरकार हजारों लोगों की भीड़ की जान के साथ खिलवाड़ कैसे कर सकती है? बहुत शोर मचाकर कहा जा रहा है कि सांसद संवैधानिक रुप से जनता द्वारा चुने गये हैं तो ऐसे समय में संविधान की मूल भावना की धज्जियाँ उड़ाते हुये इन्ही सांसदों से बनी सरकार ने हजारों लोगों की जान जोखिम में डालते हुये पुलिस को आधी रात को लोगों को वहाँ से हटाने के लिये भेजा? कैसे पुलिस को आदेश देने वाले मंत्रियों ने नहीं सोचा कि अगर पुलिस की लाठियों से लोग बच भी गये तो भगदड़ में महिलायें, बच्चे और वृद्ध अपनी जान बचा पायेंगे या घायल होने से बच पायेंगे? सरकार अनशन पर बैठे लोगों को दिन में नोटिस देकर कुछ घंटे का समय नहीं दे सकती थी जिससे लोगों को पता चल जाये कि सरकार की मंशा अब रामलीला मैदान से लोगों को हटाने की है। अगर अनशन अवैध था तो कोर्ट से नोटिस लाया जा सकता था। पर किसी तरह से भी संविधान का सम्मान न करते हुये लोगों को सबक सिखाने के लिये पुलिसिया कार्यवाही की गयी।

अशोक – अरे सरकार की बदमाशी है। यह सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त है और संसदीय लोकतंत्र में इनका विश्वास दिखावा है। इन्होने ही तो इमेरजैंसी लगवायी थी, तभी भाजपा राजघाट पर अनशन में बैठ गयी है इनकी करतूतों के विरोध में।

विजय – अशोक बाबू भाजपा भी दूध की धुली नहीं है। राजघाट में कब से उसकी श्रद्धा हो गयी? कल्याण सरकार के दिन भूल गये क्या? कैसे गांधी को पानी पी पी कोसा जाता था। गाँधी से इनका क्या लेना देना। बल्कि किसी भी दल का कुछ लेना देना नहीं है गाँधी से। उन्हे तो अलग ही रखें।

सुनील – कांग्रेस नियंत्रित सप्रंग सरकार की दूसरी पारी के आरम्भ से ही भाजपा निष्क्रिय स्थिति में पड़ी हुयी थी। उसे राजनीतिक जमीन नहीं मिल रही थी। पांच साल का इंतजार उसे और निष्क्रिय बना देता। कांग्रेस की सरकार ने भाजपा में जान डाल दी। उसे मुकाबले में खड़ा कर दिया। कांग्रेस ने बाबा रामदेव को संघ की ओर धकेल दिया। सबको लगता था कि कांग्रेस नियंत्रित सरकार की दूसरी पारी आसानी से अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी और कहीं कई अड़चन नहीं आयेगी। ताजे घटनाक्रमों ने दिखा दिया है कि सरकार की आगे की राह मुश्किल हैं। सरदार जी ने माथे पर कलंक लगवा ही लिया। इतिहास तो उन्हे ऐसे प्रधानमंत्री के रुप में याद करेगा जिसकी सरकार ने रात में सोते हुये स्त्री-बच्चों, बूढ़ों और अनशनकारियों पर लाठियाँ बरसवायीं। उन्हे घायल किया और उनकी जान को जोखिम में डाला।

हरि- कांग्रेस की सरकार ने तो भाजपा को थाली में सजाकर मौका दे दिया है। इससे ज्यादा खुश भाजपा और अन्य विपक्षी दल कभी भी नहीं हुये होंगे, पिछले पांच-सात साल में।

अशोक- अजी भाजपा निष्क्रिय नहीं थी। उसी ने मुद्दा उठाया था काले धन की वापसी का, भ्रष्टाचार के खात्मे का।

विजय- अशोक जी भाजपा की ईमानदारी तो कर्नाटक के मुख्यमंत्री और रेड्डी भाइयों के मामलों में चमक ही रही है। गुजरात के मामले में उसकी नैतिकता भी जगजाहिर रही है!

सुनील – भाजपा की बात छोड़ो। मेरे दिमाग में एक प्रश्न बार बार उठ रहा है – क्या शुरु में बाबा रामदेव से मीठी मीठी बातें करने के कुछ घंटो बाद सरकार को वस्तुस्थिति का एहसास हुआ कि अगर बाबा रामदेव के अनशन के कारण उनकी माँगें मानी गयीं तो यह बाबा रामदेव की जीत कहलायेगी और सरकार द्वारा उठाये गये कदम मजबूरी में उठाये गये कदम कहलायेंगे और कांग्रेस को राजनीतिक लाभ नहीं मिल पायेगा।

हरि – सरकार के किन्ही भी सलाहकारों ने ऐसी बर्बरतापूर्ण कार्यवाही करने की सलाह दी हो और उस पर दबाव डाला हो, क्या कांग्रेस को इस घटना के बाद किसी किस्म का राजनीतिक लाभ मिल पायेगा? इसमें पूरा संदेह है।

विजय- कुछ ही दिन पूर्व कांग्रेस मायावाती सरकार द्वारा भट्टा पारसौल में उ.प्र पुलिस द्वारा किसानों पर अत्याचार कराने को लेकर संघर्षरत थी। अब उसकी खुद की सरकार ने वैसा ही कर दिया है। कांग्रेस के पास अब नैतिक चेहरा है ही नहीं किसी अन्य सरकार द्बारा पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही कराये जाने की निंदा करने का। भारत की जनता हमेशा से ही शोषित के पक्ष में रही है और अब पुराना समय नहीं रहा जब किसी तरह की कोई भी खबर दबायी जा सकती थी। इस इलेक्ट्रानिक युग में कांग्रेस ने ऐतिहासिक राजनीतिक भूल की है और इसका राजनीतिक खामियाजा या तो अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर देगा या फिर उसकी सीटें इतनी कम हो सकती हैं कि वह बड़ी संख्या में दूसरे दलों पर निर्भर हो जाये।

सुनील- देश अगली बार फिर से कई दलों की मिली जुली सरकार के चंगुल में फंसता दिखायी दे रहा है। कांग्रेस का उ.प्र अभियान भी गड्ढ़े में पड़ा समझिये। दुख की बात है कि दो दशकों से ज्यादा समय से उ.प्र क्षेत्रीय स्तर की पार्टियों द्वारा संचालित हो रहा है। विकास कार्य लगभग ठप रहे हैं। वैसे भी पाँच नहीं तो दस साल में सरकारें बदल जानी चाहियें। तभी संतुलन ठीक बना रहता है।

अशोक – कांग्रेस का आरोप है कि बाबा रामदेव के अनशन के पीछे आर.एस.एस का हाथ है। अगर ऐसा है भी तो जब हवाईअड्डे पर सरकार के बड़े मंत्री उनकी अगुवाई करने गये थे तब भी उन्हे इस बात का पता होगा। अगर पता था और उन्हे इस बात से परहेज था तो उन्होने अनशन को शुरु ही क्यों होने दिया?

सुनील- अशोक जी आपकी इस बात से सहमति है। अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो इस संगठन को कानून का सहारा लेकर प्रतिबंधित क्यों नहीं किया जाता? अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो कांग्रेस और इसके द्वारा नियंत्रित सरकार आर.एस.एस द्वारा समर्थित और नियंत्रित भाजपा के सांसदों से परहेज क्यों नहीं करती? उन्हे संसद से बाहर का रास्ता दिखा दे। उन्हे किसी भी कमेटी में न रखे। आखिरकार भाजपा को तो आर.एस.एस का पूरा समर्थन है। ऐसा कैसी हो सकता है कि भाजपा के सांसद तो स्वीकार्य हैं पर जो सांसद नहीं हैं और जिन पर शक है कि आर.एस.एस उन्हे समर्थन देता है, वे स्वीकार्य नहीं हैं।

विजय- सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे, जो भारत को खाये जा रहे हैं, को लेकर जनता को ठोस हल चाहिये और उसे इस बात से क्या मतलब कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये किये जा रहे प्रयास को आर.एस.एस समर्थन दे रहा है या कोई अन्य संगठन।

हरि- अरे अगर ऐसा है तो आर.एस.एस को देशद्रोही साबित करके प्रतिबंधित कर दो, कानूनी राह पर चला दो और अगर ऐसा साबित हो जाता है तो जनता चूँ भी नहीं करेगी।

विजय- मेरी समझ में तो ऐसा पैरानोइया आता नहीं। आप ये जानो कि जब भाजपा राजनीतिक दौर के शिखर पर थी तब भी उसे केवल 26% मतों का समर्थन हासिल था और जो अब घटकर 20% के आसपास आ गया है। देश की कुल आबादी का 75-80% हिन्दुओं को माना जा सकता है तो ऐसा तो है नहीं कि सभी हिन्दु भाजपा को समर्थन देते हैं और मत देते हैं। फिर क्यों इतनी हायतौबा, क्यों इतना भय? यह देश मुख्यतः सेकुलर रहा है और रहेगा।

…जारी…

बतकही 2 -बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस

जून 4, 2011

बाबा रामदेव : भ्रष्टाचार मुर्दाबाद

उजाला करने के लिए
सलाम आपको बाबा!

करोड़ों आखों को
आज यही ईमान की रौशनी चाहिए
अन्यथा
गाँव का सबसे ईमानदार आदमी
शराब के ठेकेदार से
सरपंच का चुनाव हारता रहेगा
रातो-रात बदलती रहेंगी निष्ठाएं

माहौल की सड़न इसी तरह
सदा बिकने वाले को
मेले का खरीदार बना देती है
जड़ों में फैली गंद को
कमल ने सर पे रख लिया है.
यानी व्यवस्था की खराबी को
जनता आवश्यकता मानने लगी है

मन से रोती है परन्तु
खुश-खुश ‘सुविधा शुल्क’ दे रही है
ले रही है

आप बाखूब जानते हैं बाबा साहिब!
ये वह दुनिया है जहाँ
मसीहाओं के उजालों का
स्वागत सदा सियारों ने किया है
जो मौका पाते ही सूली में कीलें ठोकते हैं।

हमाम के ये ही नंगे
कल आपके साथ हो लेंगे
कुछ तो अभी से शेर की बोली बोल रहे हैं।

ये केवल सत्ता के दलाल हैं
इन्हें तख्ते नही तख़्त की है आरज़ू
इन्होने सदा ही संवदनाओं का शोषण किया है
इन्होने ही पनपाया है
भ्रष्टाचार को विष वृक्ष
इन बेईमानों को दूर रखना है ज़रूरी
कल हमें इन्ही के पास कैद
काले धन को आज़ाद कराना है।

शोषण से त्रस्त सारा देश
आपको आशा से देख रहा है
लाखों दीपक चल पड़ने को हैं आतुर
आपके उजाले के साथ।

कल कश्मीर से कन्याकुमारी तक
करोड़ों नारे लगने तय हैं
भ्रष्टाचार मुर्दाबाद!
कल ज़रूर मैली धूप उजली होगी।

(रफत आलम)

अप्रैल 22, 2011

हॉफ टिकट

चाणक्यपुरी में खड़े खड़े बहुत देर तक उसे ऑटो नहीं मिला तो मोहन, शिवाजी स्टेडियम जाने वाली बस में बैठ गया। विदेशी दूतावास वालों ने उसका दिमाग मथ कर रख दिया था। अगर कम्पनी के काम से विदेश जाना न होता तो वह दूतावास की इमारत में दुबारा कदम भी न रखता पर उसे एक बार और आना पड़ेगा। दूतावास के कर्मचारियों का व्यवहार बेहद घटिया था। अपना नम्बर आने के इंतजार में बैठे हुये वह सोचता रहा था कि विदेशी दूतावास में काम करने वाले कर्मचारी ऐसा क्यों सोचते हैं कि भारत से बाहर जाने वाले सभी अपराधी ही हैं और गलत कागजों के सहारे ही बाहर जा रहे होंगे? विदेशी कर्मचारी तो एकतरफ, इन विदेशी दूतावासों में काम करने वाले भारतीय कर्मचारी भी बेहद कर्कश पाये जाते हैं और वे घटिया तरीके से भारतीयों के साथ व्यवहार करते हैं।

बस में चढ़ते ही उसने शिवाजी स्टेडियम के लिये टिकट ले लिया। उसने सौ का नोट कंडक्टर को दिया तो उसने उसे बाकी पैसे कुछ देर में देने के लिये कहा और बस के कनॉट प्लेस के क्षेत्र में घुसने से पहले ही पैसे दे भी दिये। बस में भीड़ थी और सारी यात्रा खड़े हुये ही करनी पड़ी थी। रास्ते भर लोग चढ़ते उतरते रहे और इस आवागमन के कारण वह बस के दरवाजे से बस के मध्य में पहुँच गया।

बस शिवाजी स्टेडियम जाकर रुकी तो कंडक्टर ने लोगों को नीचे उतारने की जल्दी मचा दी जबकि लोग खुद ही उतरने के लिये रेलेपेल मचाये हुये थे। कंडक्टर आगे के दरवाजे से लोगों को उतरने का निर्देश बार बार दे रहा था और पीछे के दरवाजे पर खड़े अपने सहायक को चिल्ला चिल्ला कर निर्देशित कर रहा था नयी सवारियों को वहाँ से बस में चढ़ाने के लिये।

मोहन भी उतरने लगा और बस की सीढ़ियाँ उतरते हुये उसने टिकट फाड़ा और उसका आधा हिस्सा जमीन पर गिर कर हवा के साथ उड़ गया और नीचे का आधा हिस्सा उसके हाथ में रह गया। उसने जमीन पर पैर रखे ही थे कि एक प्रौढ़ व्यक्ति ने उससे कहा,” टिकट दिखाइये”।

मोहन ने अब उस व्यक्ति पर ध्यान दिया। पुलिस के एक सिपाही के साथ खड़ा प्रौढ़ उससे टिकट माँग रहा था। शर्तिया प्रौढ़ ने उसे उतरते हुये टिकट फाड़ते हुये देखा होगा।

मोहन ने उसे टिकट का आधा हिस्सा दे दिया। प्रौढ़ ने टिकट अपने हाथ में लिया और उसे देखा और कहा कि यह वेलिड टिकट नहीं है। कंडक्टर भी मोहन के साथ नीचे उतर आया था।

प्रौढ़ ने मोहन से कहा,”इधर साइड में खड़े हो जाओ”। मोहन के बाद 5-6 लोग और उतरे। एक आदमी ने अपना टिकट एकदम मसला हुआ था। प्रौढ़ ने उसका टिकट उसके हाथ में दूर से ही देखा और उसे जाने दिया।

मोहन ने प्रौढ़ से पूछा,” टिकट वेलिड क्यों नहीं है, अभी आपके सामने इस बस से मैं उतरा हूँ, रास्ते में टिकट खरीदा है”?

प्रौढ़ ने कहा,” हमें कैसे पता चलेगा आधे टिकट से कि यह अभी का है और यात्रा के पूरे पैसे दिये गये हैं या सही टिकट लिया गया है”।

सही टिकट? आप कंडक्टर से पूछिये, मैं चाणक्यपुरी से चढ़ा, इनसे शिवाजी स्टेडियम का टिकट माँगा और इन्होने जो टिकट दिया और जितने पैसे माँगे मैंने दिये और टिकट लिया”।

पास खड़े कंडक्टर ने स्वीकृति में सिर हिलाया। प्रौढ़ ने कंडक्टर की ओर देखा भी नहीं और उसे वहाँ से हटने के लिये हाथ से इशारा किया और मोहन से कहा,” हमें इस बात से मतलब नहीं, हमें तो यहाँ पूरा और वेलिड टिकट चाहिये”।

बस पुनः सवारियों से भर चुकी थी और ड्राइवर ने तेज आवाज में हॉर्न बजाया और कंडक्टर को आवाज लगायी चलने के लिये।

कंडक्टर, सरकारी अधिकारी और मोहन को देखते हुये पिछले दरवाजे से बस में चढ़ गया और उसने सीटी मारकर ड्राइवर को चलने का संदेश दिया। बस चल दी।

मोहन को कुछ आभास हो गया कि प्रौढ़ अधिकारी उसे फँसा रहा है। कंडक्टर ही उसका गवाह था और वह चला गया था।

देखिये मैं आपको बता चुका हूँ कि मैंने चाणक्यपुरी से टिकट लिया और पूरे पैसे कंडक्टर को दिये। उसे आपने रोका नहीं वरना वह आपको सच बता देता।

हमें सुनना ही नहीं कंडक्टर से कुछ भी। हमें वेलिड टिकट दिखा दो।

टिकट तो आपको दिया अभी। बस से उतरते समय आधा फाड़ दिया था। बस में बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था कि यात्रा के पूरा होने पर टिकट को नष्ट कर दें जिससे उसका दुरुपयोग न होने पाये।

हमें बस के अंदर से मतलब ही नहीं। हमें तो यहाँ की गयी यात्रा के लिये वेलिड टिकट चाहिये।

अब मैं टिकट का दूसरा हिस्सा कहाँ से खोजूँगा।

आपने बिना टिकट यात्रा की है।

बताया तो आपको कि चाणक्यपुरी से टिकट लिया था।

हमें क्या पता कि आप चाणक्यपुरी से ही चढ़े थे? क्या पता आप किसी पहले के स्टॉप से चढ़े हो? हौज़ खास से आये हो? अपनी यात्रा की वैधता के लिये वेलिड टिकट दो।

कंडक्टर को तो आपने भगा दिया। वही तो बता सकता था कि मैं चाणक्यपुरी से ही चढ़ा और वहीं से टिकट लिया। वैसे मुझे ऐसा लग रहा है कि अगर मेरे पास पूरा टिकट भी होता तब भी आप यह बात कहते कि आपको कैसे पता कि मैं कहाँ से चढ़ा था और क्या वाकई मैंने सही टिकट लिया था?

“आपने बिना टिकट यात्रा की है”। नाक पर नीचे खिसक आये चश्मे को ऊपर खिसकाते हुये प्रौढ़ ने दोहराया।

ऐसे कैसे बिना टिकट के यात्रा की है।

आप पर बिना टिकट यात्रा करने का केस हो सकता है।

प्रौढ़ ने सिपाही की ओर देखा।

सिपाही मोहन के पास आ गया और फुसफुसाते हुये कहा,” सौ रुपये देकर रफा दफा करो मामला”।

मुझे ऐसा लग रहा है आप मुझे जानकर फंसा रहे हैं।

प्रौढ़ अपनी जेब टटोलने लगा और जेब से पान निकालकर उसने खा लिया।

सिपाही ने फिर मोहन से धीरे से कहा,” मामला न बढ़ाओ, चुपके से सौ रुपये दो और खिसको”।

मोहन ने सिपाही की बात पर ध्यान नहीं दिया और प्रौढ़ से कहा,” वहाँ नियंत्रण कक्ष में चलिये, उस बस का नम्बर पता चल जायेगा। मैं तैयार हूँ वापिस उसी बस के यहाँ तक आने के लिये। कंडक्टर बता देगा सही बात”।

प्रौढ़ ने मुँह बिचका कर कहा,” हम यहाँ सारा दिन तो बैठे नहीं रहेंगे।”

मैंने देखा कि एक कुचले मसले हुये टिकट पर आपने कोई आपत्ति नहीं की और यात्री को जाने दिया।

हमारे विवेक के ऊपर है। हमें लगा उसका टिकट सही था। आपका नहीं हैं।

एक बस चलने को तैयार थी। प्रौढ़ उसमें सवार होने लगा और सिपाही से उसने मोहन को साथ लेने के लिये कहा।

सिपाही मोहन को लेकर बस में चढ़ गया।

मोहन ने पूछा,” कहाँ ले जा रहे हैं मुझे”।

हेड आफिस जायेंगे वहीं मामला सुलटेगा।

सिपाही ने मोहन को घूर कर कहा,” अरे साहब को जुर्माने के सौ रुपये दो और जाओ”।

बस रेंग कर चल पड़ी थी। बस अड्डे से निकल कर सड़क पर रेड लाइट पर आकर खड़ी हो गयी।

मोहन ने प्रौढ़ से कहा,” मुझे जबरदस्ती फंसाया जा रहा है। आपको कोटा पूरा करना होगा। मेरे पास टिकट था। चलो मैं जुर्माना देने को तैयार हूँ। काटो कितना जुर्माना लगेगा।”

प्रौढ़ ने गुस्से से उसे घूरते हुये कहा,” हमारे ऊपर है हम जुर्माना लें न लें। हम तो आपको जेल भेज सकते हैं।”

मोहन को भी गुस्सा आ गया,” चलो आप जेल ही भेजो। मैं भी देखता हूँ क्या क्या कर सकते हो। इतनी अंधेरगर्दी नहीं छायी हुई है देश में कि आप जो चाहे सो कर लो। आप जुर्माना बताओ, मैं तैयार हूँ देने के लिये जबकि मेरी गलती नहीं है”।

प्रौढ़ उसे घूरता रहा और कहा,: दौ सौ पचास रुपये जुर्माना है”।

सिपाही ने मोहन से कहा,” अरे क्यों मामला उलझा रहा है, सौ में काम हो रहा है तेरा, दे के सुलटा ले”।

मोहन ने कहा,” ठीक है आप रसीद काटो, मैं दौ सौ पचास रुपये देता हूँ।”

ग्रीन लाइट होते ही बस चल पड़ी थी।

प्रौढ़ ने अपने बैग से रसीद काटने वाली पुस्तिका निकाली और मोहन से कहा,” निकालो दौ सौ पचास”।

इस बस का कंडक्टर और उसमें बैठी सवारियाँ उसकी ओर ऐसे देख रहीं थीं मानो वह कोई अपराधी हो।

मोहन की ऊपरी जेब में दौ सौ रुपये थे उसने निकाले और पर्स उसने हाथ में पकड़े बैग में रखा हुआ था सो उसे खोलने लगा।

सिपाही ने उसके हाथ से दौ सौ रुपये ले लिये।

सिपाही ने कंडक्टर से बस रुकवाने के लिये कहा।

बस के रुकते ही सिपाही ने मोहन को बस से नीचे धकेलते हुये कहा,”चल सुलट गया मामला”। और ड्राइवर को बस चलाने के लिये कहा।

सिपाही के अचानक नीचे धकेलने से मोहन एकदम से संभल नहीं पाया और जब तक वह संभलता बस आगे जा चुकी थी।

उसकी समझ में नहीं आया कि पहले वह अपने को कोसे कि उसने टिकट क्यों फाड़ दिया था या सिपाही और टिकट चैकर को गाली दे जिन्होने उसे फँसाकर लूट लिया था।

उसने गुस्से से जाती हुयी बस को देखा जिसके पीछे लिखी इबारत उसे चिढ़ा रही थी।

यो तो ऐसे ही चलेगी

…[राकेश]

जुलाई 14, 2010

गालिब छुटी शराब : मयखाने से होशियार लौटते रवीन्द्र कालिया

बात सूफियों की हो तो उनकी मधुशाला तो भिन्न होती है, उनकी मधु ही कुछ अलग होती है और वहाँ ऐसा आदमी तो बेकार है जो इतनी न पी ले कि होश खो जाये। वे तो कहते हैं

वही है बेखुदे-नाकाम तुम समझ लेना
शराबखाने से जो होशियार आयेगा।

पर आम जीवन में जो मयखाने से होशियार लौट आये उसे भाग्यशाली ही समझा जायेगा। आम जन जीवन वाला मयखाना तो एक ही रास्ते पर भेजता है और मयकशी के रास्ते पर अत्यंत रुचि के साथ चलने वाले के लिये ही किसी ने कहा है कि

कारवां खड़ा रहा
और वे अपनी दुकान बढ़ा चले।

जीवन के कितने कामों को अधूरा छोड़कर, अति प्रिय सपनों को पूरा करने का प्रयास करे बगैर ही आदमी कूच कर जाता है। मयगोशी के ऐसे ही वन वे ट्रैफिक वाले रास्ते से वरिष्ठ साहित्यकार श्री रवीन्द्र कालिया न केवल वापिस घर आ गये बल्कि उन्होने वापसी के इस सफर में गुजारे क्षणों में, जब वे लगभग अकेले ही यात्रा कर रहे थे, सबको अकेले ही करनी पड़ती है ऐसी यात्रा, एक बहुत ही जीवंत किताब की रचना भी कर दी। किताब की अवधारणा तो तभी बन गयी होगी जब वे वापिस जीवन की ओर आने के लिये प्रयासरत रहे होंगे, किताब को लिखा भले ही कुछ समय बाद हो उन्होने।

गालिब छुटी शराब” एक जीवंत आत्मकथा है। यह शुरु से अंत तक रोचक है और कितने ही पाठक इसे एक ही बार में पढ़ गये होंगे और जिन्होने नहीं पढ़ी है वे एक ही बार में पढ़ जाने के लिये विवश हो जायेंगे, जब भी पुस्तक उनके हाथ पड़ेगी। आत्मकथाओं के साथ ऐसा कम ही होता है और ज्यादातर पाठक इन्हे किस्तों में पढ़ते हैं क्योंकि भले ही बहुत अच्छी सामग्री इन किताबों में हो पर कहीं न कहीं वे बोझिल हो उठती हैं और लगातार पढ़ना थोड़ा भारी लगता है पाठकों को।

गालिब छुटी शराब” के साथ ऐसा नहीं है। हास्य तो हर पन्ने पर बिखरा पड़ा है और केवल दूसरों की ही खिंचाई रवीन्द्र कालिया जी ने इस हास्य बोध के द्वारा नहीं की है बल्कि बहुत निर्ममता से अपना और अपनी आदतों का पोस्ट-मार्टम भी किया है। इंसान का दिल तो दुखता ही दुखता है पर इस दुख को भी लेखक ने हास्य के आवरण में लपेट कर पेश किया है और अपनी तरफ से भरकस कोशिश की है कि सब कुछ पाठक हँसते हँसते हुये ही समझ जाये।

गालिब छुटी शराब” को पढ़ना “चार्ली चैप्लिन” की बेहतरीन मूक फिल्में देखने जैसा है जहाँ दर्शक उनके द्वारा घटनाओं को दर्शाने के तौर तरीकों पर हँसता भी रहता है और उनके द्वारा निभाये गये पात्र के दुखों को महसूस भी करता रहता है। ऐसा संतुलन बनाये रखना अत्यंत कठिन काम है। इस तरह की शैली में लिखी दूसरी आत्मकथा हिन्दी साहित्य में याद नहीं पड़ती हाँ मराठी में जरुर रामनगरकर की आत्मकथा रामनगरी ऐसी ही शैली में लिखी गयी थी जहाँ जीवन के मार्मिक प्रसंगों को भी हास्यबोध के मुलम्मे से ढ़क कर प्रस्तुत किया गया था।

पुस्तक पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि रवीन्द्र जी सपाट चेहरे से हास्य उत्पन्न करने वाली बातें कहने में पारंगत होंगे। दिल्ली में अपने मित्र के साथ माता के दरबार में हाजिरी लगाने वाले प्रसंग में उनकी यह प्रतिभा अपने विकट रुप में सामने आती है। ऐसे कई प्रसंग हैं जहाँ पाठक पढ़ते पढ़ते हँसी से लोट पोट हो सकते है।

कन्हैया लाल नंदन जी के साथ इलाहाबाद पहुँचने वाला प्रसंग भी रवीन्द्र जी की कलम की श्रेष्ठता हास्य के क्षेत्र में दर्शाता है।

गालिब छुटी शराब” में सिर्फ हास्य ही नहीं है बल्कि जीवन के और भी दूसरे रंग अपनी छटा बिखेरते हुये सामने आते हैं। ग़ालिब का नाम शीर्षक में शामिल है तो शायरी की मौजूदगी पुस्तक में मौजूद होना भरपूर वाजिब है और मौकों पर बड़े माकूल शे’र सामने आते रहते हैं। पिछले पाँच दशकों में हिन्दी साहित्य में उभरे कितने ही नाम जीवंत होकर उभरते रहते हैं। एक ही व्यक्ति का अलग अलग व्यक्तियों से अलग अलग किस्म का सम्बंध हो सकता है और अब जब रवीन्द्र कालिया जी की पीढ़ी के रचनाकार आत्मकथायें लिखने की ओर अग्रसर हैं तो अलग अलग रचनाकार इन रचनाओं में अलग अलग रुपों में नजर आयेंगे। कितनी बातें प्रभावित करती हैं किसी भी व्यक्ति का रेखाचित्र लिखने में।

एक तो रचनाकार को उसकी रचनाओं के जरिये जानना होता है, और एक होता है उसे व्यक्तिगत रुप से जानना और दोनों रुप काफी हद तक अलग हो सकते हैं और होते हैं अगर ऐसा न होता तो प्रेमकहानियों की रचना करने वाले रचनाकारों के अपनी पत्नी या प्रेमिका/ओं से अलगाव न हुआ करते। व्यक्तिगत सम्बंध रचनाकार की समझ, दृष्टिकोण और कलम को भी कहीं न कहीं किसी न किसी रुप में प्रभावित करते ही हैं।

गालिब छुटी शराब” पढ़कर ऐसा भी प्रतीत होता है कि रवीन्द्र जी की याददाश्त बहुत अच्छी होनी चाहिये या फिर हो सकता है कि वे अपने कालेज के दिनों से ही डायरी लिखते रहे हों क्योंकि बहुत पहले के प्रसंग भी अपनी पूरी जीवंतता के साथ सामने आते हैं और एक अन्य खासियत इस पुस्तक की यह लगती है कि रवीन्द्र जी ने अपनी वर्तमान आयु की समझदारी का मुलम्मा पुराने प्रसंगों और काफी पहले जीवन में आये व्यक्तियों की छवि पर नहीं चढ़ाया है और जैसा तब सोचते होंगे उन लोगों के बारे में या जैसा उन्हे देखा होगा वैसा ही उनके बारे में लिखा है। चाहे पंजाब में गुजारे हुये साल हों या बम्बई, दिल्ली और इलाहाबाद में गुजारे साल, यह बात सब जगह दिखायी देती है।

केवल व्यक्ति ही नहीं वरन वे सब जगहें भी, जहाँ रवीन्द्र जी ने अपने जीवन का कुछ समय व्यतीत किया, अपने पूरे जीवंत रुप में किताब के द्वारा पाठक के सामने आती हैं। खासकर इलाहाबाद के मिजाज को लेखक ने खास तवज्जो दी है। अमरकांत जी और राजेन्द्र यादव जी जैसे प्रसंगों के जरिये उन्होने इलाहाबादी माहौल और हिन्दी साहित्य के पिछले चालीस-पचास सालों के धुरंधर नामों के बीच बिछी, अदृष्य शतरंज की झलक भी दिखायी है। हर काल में समकालीनों के मध्य ऐसा ही होता है।

किताब में केवल शराब, लेखन, पार्टियाँ और धमाल आदि ही नहीं है वरन रवीन्द्र जी ज्योतिष और होम्योपैथी चिकित्सा शैली से अपनी मुठभेड़ और स्वाध्याय के आधार पर दोनों ही क्षेत्रों में कुछ समय तक डूबकर इन विधाओं के प्रति उत्पन्न अपने लगाव की भी चर्चा करते हैं। उनके जीवन में भविष्यवाणियों ने असर दिखाया, इस बात की पुष्टि उन्होने कुछ प्रसंगों द्वारा की है। संजय गाँधी की असमय मृत्यु की भविष्यवाणी हो या दिवंगत राजनेता चन्द्रशेखर द्वारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की घोषणा सत्तर के दशक में ही करने वाला प्रसंग हो या चेहरा देख कर ही व्यक्ति का भूत-वर्तमान और भविष्य बता सकने के प्रसंग हों, रहस्यवाद का जीवन में स्थान है यह बात आत्मकथा दर्शाती है।

आत्मकथा इस बात को स्थापित करती है कि जवानी में रवीन्द्र जी यारों के यार वाले ढ़ांचे में रहे होंगे और कुछ हद तक आदर्शवाद भी उनके मन मस्तिष्क पर छाया रहता होगा वरना डा. धर्मवीर भारती से जुड़े प्रसंग उनकी किताब में इस तरह से उभर कर न आते आखिरकार पुस्तक यही बताती है कि व्यक्तिगत रुप से डा भारती हमेशा अच्छे ही रहे रवीन्द्र जी के लिये परन्तु रवीन्द्र जी ने उनका विरोध उनकी सामान्य छवि के आधार पर किया।

किताब रवीन्द्र जी के जीवन में आये साहित्यकारों, राजनेताओं और अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन की कुछ झलकियाँ प्रस्तुत करती है।

यह बात जरुर गौर करने वाली है कि क्या कोई भी साहित्यकार बिल्कुल निरपेक्ष रह पाता है जब वह अपने जीवन में आये लोगों और खासकर प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में लिखता है?

क्या लेखक की कलम भेदभाव करती है मित्रों, गहरे मित्रों, परिचितों और व्यक्तिगत रुप से अपरिचित लोगों के प्रति?

गालिब छुटी शराब में भी कहीं कहीं इस अंतर को महसूस किया जा सकता है।

आशा की जा सकती है कि पूर्ण रुप से स्वास्थ्य लाभ करके पुनः साहित्य की दुनिया में पुरजोर सक्रिय होने वाले श्री रवीन्द्र कालिया इस बाद के जीवन पर भी अपनी आत्मकथा का दूसरा भाग लिखंगे।

जिसने न पढ़ी हो वे अवश्य पढ़ें इस बेहद रोचक ढ़ंग से लिखी आत्मकथा को।

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