Posts tagged ‘Aansoo’

अक्टूबर 3, 2011

तारों पार कोई रोया

कमरे की दीवारों के
सो जाने के बाद
करवटों से उकताई हुई आंखें
छत को तक रही थीं
यूँ ही जाने क्यों ढ़लके
दो आंसू
जैसे कहते गए
तू ही नहीं दुखी
दूर तारों के पार
कोई तुझको रोता है
सुबह फूलों पर पड़ी शबनम
गवाह थी
दूर तारों के पार
ज़रूर कोई रोया था

(रफत आलम)

अक्टूबर 1, 2011

अपनी आग में जलते घर

लुटेरों के कमांडर इन चीफ हैं सरकार
पब्लिक प्रोपर्टी के बड़े थीफ हैं सरकार
ये सब पीठ पीछे का गुबार है मालिक
मुहँ आगे आप सबसे शरीफ़ हैं सरकार
………….

तीर सीने के निकाल कर रखना
अमानतों को संभाल कर रखना
वक्त आने पर करना है हिसाब
ज़ख्म दिल में पाल कर रखना
* * *

फेंकने वाले हाथ खुद अपने थे करते भी क्या
कभी सर का लहू देखा कभी पत्थर को देखा
माँ का दूध जब खट्टे रिश्तों में शामिल हुआ
अपनी आग में हमने जलते हुए घर को देखा
* * *

भूल गए हैं हवाओं का एहसान, देख रहे हैं
खुद को मान बैठे हैं आसमान, देख रहे हैं
गुब्बारे कल फुस्स होने हैं फिर कौन देखेगा
अभी तो सब लोग उनकी उड़ान देख रहे हैं
* * *

कहता है खरा सौदा है आओ मुस्कानें बाँटें
रोतों की बस्ती के लिए आराम मांग रहा है
आया कहाँ से है दीवाना कोई पूछो तो सही
आँसू के बदले खुशी का इनाम मांग रहा है

(रफत आलम)

सितम्बर 27, 2011

दूर और कुछ जाना है

साथ तुम्हारे ही चलकर के दूर और कुछ जाना है
पथ से है पहचान तुम्हारी पथ मेरा अंजाना है
चिर परिचित से मुझे लगे हो
शायद जन्मों साथ रहे हो
या फिर कोई और बात है
सुख-दुख जो तुम साथ सहे हो
मुझको तो ऐसा लगता है मन जाना-पहचाना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
मिलना और झगड़ना मिलकर
यह तो अपनी आम बात है
जीत मिली है हरदम तुमको
मुझको तो बस मिली मात है
सारी उम्र मुझे तो शायद हरदम तुम्हे मनाना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
जब-जब भी मिल जाते हो तुम
मन पर चाँद उतर आता है
दूर तुम्हारे होते ही पर
सुख जैसे सब छिन जाता है
बहुत रोकता हूँ मैं आँसू पर वह तो बाहर आना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
अपने पीछे था कल बचपन
आज द्वार पर आया यौवन
कल तक कोई रोक नहीं थी
आज लग गये मन पर बंधन
इनसे डरकर मेरे मन अब और नहीं घबराना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
प्रेम हमारा दीया-बाती
या फिर है चातक-स्वाति
निस दिन इसको बढ़ना ही है
जैसे नदिया चलती जाती
हमको भी तो मंजिल अपनी आज नहीं कल पाना है
पथ से है पहचान तुम्हारी…

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 23, 2011

बूँद और समंदर

 

जिंदगी गुजारनी थी सो गुज़र की है
ये न पूछो किस तरह से बसर की है

घायल हैं सभी पर बताता नहीं कोई
पत्थरों को तलाश किसके सर की है

छप्पर जले तो महल भी नहीं बचेंगे
आग कब देखती है हवा किधर की है

रिश्तों की मौत पर अब रोता है कौन
हर आँगन के बीच दीवार घर की है

चूड़ियों के टकराव से टूटे हैं भाईचारे
बर्तनों की खनक तो रौनक घर की है

जिधर देखा, हैं आँसू आहें और कराहें
हम कैसे कहें ये दुनिया पत्थर की है

जहाँ पर शुरू, वहीं आखिर है आलम
बूँद से है समंदर तो बूँद समंदर की है

(रफत आलम)

जुलाई 28, 2011

खुदारा पूछना मत कहाँ थे

सपनों के सजीले शहजादों जैसे कहाँ थे
आपने जो समझा था हम वैसे कहाँ थे

खो गए थे अँधेरे में कहीं शाम के बाद
क्या बताएं रात गये तक कैसे कहाँ थे

रेशमी छोड़ सूती साडी भी ना ला सके
अरमान तो था यार मगर पैसे कहाँ थे

वो कागजी डिग्रियां तो किताबें ले आईं
नौकरी की खरीद के लिए पैसे कहाँ थे

फूल, तितली, बादल, बरखा, धनक, बहार
हसीन थे सब मगर आप जैसे कहाँ थे

गम के सौ समंदरों का निचोड़ हैं आँसू
ये पानी के चंद कतरे ऎसे–वैसे कहाँ थे

शाम हुए घर लौटा है राह भूला आलम
खुदारा कोई ये ना पूछना कैसे कहाँ थे

(रफत आलम)

अप्रैल 24, 2011

दर्द की दवा

गज़ल…रफत आलम

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किसी से उम्मीद है फ़िज़ूल आज कोई क्या देगा
दिल की दौलत छुपा लेगा खाली हाथ दिखा देगा

हमारी भूख को राशनकार्ड थमा कर हाकिमे शहर
जलती प्यास पर टूटे मटकों की मुहर लगा देगा

अभी तो कीचड ने लगाए हैं दामन पर चंद धब्बे
गंद के शिकवे की सज़ा देखिए दौर हमें क्या देगा

कलम की जगह झूठे बरतन नन्हे हाथों में देकर
वक्त गरीब बच्चों को जिंदगी के ढंग सिखा देगा

कौन सा खज़ाना है आँसू जिसे छुपाये फिरते हो
ये दरिया अगर बह निकला तो तुमको डूबा देगा

सोचता हूँ देने वाला आखिर दर्द देता ही क्यों है
ये मान लिया जिसने दर्द दिया है वही दवा देगा

दुनिया क्या याद रहती अपना पता भी भूल गए
हमें मालूम नहीं था तेरा गम इस कदर नशा देगा

एक छोटी सी विज्ञापनी खबर पल में बन जाओगे
आलम  माटी का हर रिश्ता कल तुमको भुला देगा

(रफत आलम)

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