Posts tagged ‘Aadmi’

सितम्बर 25, 2011

शाह या फकीर, मरना दोनों को है

गुलेल की जिद है देखे, कहाँ तक पत्थर जाता है
उसे कौन समझाए घरों का शीशा बिखर जाता है

शाम ढले जब पंछी भी नीड़ों को लौटने लगते हैं
एक शख्स घर से निकल के जाने किधर जाता है

मेरी प्यास किसी निगाहें करम की मोहताज नहीं
इस फकीर का प्याला तो खुद से भी भर जाता है

यही मजबूरी तो है जिंदगी की सबसे बड़ी मजबूरी
शाह हो के फकीर आखिर में आदमी मर जाता है

उजाले के तलाशी पाँव के इन छालों से डर कैसा
दीपक से सूरज तक लपटों का रहगुज़र जाता है

ताज बने कि मशीने चले जीवन भूखों के रोते हैं
हाथ नहीं जाते आलम, इस दौर में हुनर जाता है

(रफत आलम)

सितम्बर 17, 2011

टूटे दिल का कौन मसीहा

कली का दिल फटा
पुष्प महका

बांस का दिल छिदा
बाँसुरी बना

सीप का दिल कटा
मोती जन्मा

आदमी का दिल टूटा
क्या हुआ?

न सुगंध,
न सुर,
न मोल,
एक अनाम दर्द
वह भी लापता

दरक गई धड़कनों के,
न स्वप्न,
न वास्तविकता,
तोड़ दिए गए दिल का,
कोई नहीं मसीहा

(रफत आलम)

सितम्बर 11, 2011

अपना वजूद तलाशता व्यक्ति

व्यक्ति अपने जीवन की
सारी उर्जा
अपने वजूद को
तलाशने में लगा देता है
परन्तु
जब उसकी ऊर्जा
उससे जुदा होती है तो
न वह ‘वह’ रहता है
और न उसका वह वजूद।

जीवन भर..
वह धन-संपत्ति, जोरू और ज़मीन का
मालिक कहलाने
मालिक के पीछे
बड़े नाम होने की
लड़ाई लड़ता है
इनसे गौरवान्वित होता है
परन्तु उसकी उर्जा चले जाने पर
न वह ‘मालिक’ रहता है
और न उसका नाम।

जीवन भर वह नहीं जान पाता कि
जब वह अपने,
मन, शरीर और आत्मा का ही
मालिक नहीं
वही उसके नियंत्रण में नहीं
तो वह..
और किसका और कैसे
‘मालिक हो सकता है?
और नाम भी फ़िर
जो ‘वह’  के लिए मिला है
‘वह’ न रहने पर, कहाँ रहेगा?

जीवन भर व्यक्ति
यह नहीं जानता कि
वह उस ‘वजूद की
लड़ाई लड़ रहा है
जो उसके पास है
उसको पाना तो वह है
जो उसके पास नहीं है
वह  नहीं जानता कि
उर्जा रुप आत्मा उसके पास है
उसे पाना तो सद्कर्म है
जो उसके पास नहीं
इस तरह
उसका जीवन
जो उसकी उर्जा से है
उसी को न तलाश सकने में
व्यर्थ ही नष्ट होता है
और जो उसके पास नहीं
वह उसे नहीं पा पाता।

और इस तरह वह
जन्म दर जन्म
अपने वजूद को तलाशता हुआ
कष्टों, दुखों और
कुछ ही सुख के
गोल जन्म चक्र में
घूमता है तब तक
जब तक वह
यह नहीं जान पाता कि
कि उसका ‘वजूद’
उसके नाम में नहीं
और न और कहीं है
वह तो उसे केवल
अपने कर्म में तलाशना है!

(अश्विनी रमेश)

सितम्बर 7, 2011

हिंदू, मुस्लिम सिख, ईसाई – आदमी कहाँ है भाई?

हिंदू . मुस्लिम, सिख, क्रिस्तान खूब थे
बस आदमी ही नहीं मिला इंसानों में

रौशनी देने के लिए शर्त है अँधेरे की
खूने-दिल जलाया जाए उजालदानों में

नेकियां हो जाती हैं गुनाह में शामिल
दिखावे का पुट हो अगर अहसानों में

वक्त की ठोकर की नाप ऐसी है यार
अच्छे अच्छे दिमाग आ गए पैमानों में

अपने अपने ज़र्फ की बात है ए दोस्त
कौन छलक गया कौन रहा पैमानों में

साहिल ने देखा उन बेडों को होते पार
लंगर जिन्होंने डाल दिए थे तूफानों में

निगाहें करम ओ मालिक निगाहें करम
ये जहान भी तो है तेरे ही जहानों में

जो सलूक किया तूने अच्छा ही किया
क्या कहें दुनिया के हम हैं मेहमानों में

फूलों को मुरझाना हुआ देख आये थे
दिल लगने लगा है अपना वीरानों में

पंख पिंजरे में हैं पर हौसला तो देखो
असीर का दिल है  अब भी उड़ानों में

सकून दिल कहाँ से लाओगे ए आलम
सकूने दिल मिलता नहीं है दुकानों में

असीर -कैदी

(रफत आलम)

 

अगस्त 14, 2011

एक पूरा दिन

उगते सूरज की सुबह
और डूबते सूरज की शाम के बीच
एक पूरा दिन है।

समस्यायों की फेहरिश्त के साथ
लड़ाई शुरु होती है
एक के अंत पर
दूसरी रोती है।

यह दोपहर से पहले का हाल है
उपलब्धियों के बीच
आदमी, कंगाल है।

मरीचिका की मार से
टूटता ज़िस्म लिये एक दौड़ जारी है
कुछ थोड़ा और
पाने की ललक भरी लाचारी है।

फटी-फटी आँखों पर
धूल अटी रुमाल है
सुबह की लाली में होश था
शाम की लाली निढ़ाल है।

और
दोनों के बीच
एक पूरा दिन है।

{कृष्ण बिहारी}

मई 26, 2011

कुचली स्मृतियाँ

मेरे दोस्त कहते हैं -
यह एक कुहासा है
हर ज़िंदगी में आता है
तुम्हे निराश नहीं होना चाहिये
दूसरा बीज बोना चाहिये।

मगर मैं जानता हूँ
कि जो फसल मैंने
तुम्हारी हथेली पर उगायी थी
उसमें अपनी समूची ज़िंदगी लगायी थी
अब मैं अपनी वह ज़िंदगी
कहाँ से लाऊँ,
वैसी ही दूसरी फसल
कैसे उगाऊँ?

और इसका भी क्या भरोसा
कि तुम
उतनी ही उर्वरा होगी।

यदि ऐसा नहीं होता
या सब कुछ पहले जैसा होता
तो फिर मैं एक बार
साधिकार
तुम्हारी नरम हथेलियों को पढ़ता
उनके साथ जीता
मरता।

या फिर
किन्ही दूसरी हथेलियों की ओर बढ़ता
एक नया प्रयोग जरुर करता।

क्योंकि हारना या हार मान लेना
समूची ज़िंदगी गवाँ बैठने से
कुछ ज्यादा ही गवाँ बैठना है।

मेरे इस सवाल का जवाब कि
आदमी के पास आखिर
ज़िंदगी से भी ज्यादा कीमती क्या है?
कि जिसके खो जाने की आशंका मात्र से ही
एक अज्ञान भय भर जाता है
और आदमी जीते जी मर जाता है।

तुम बता नहीं सकते
तुम्हारे भीतर ज़िंदगी ही नहीं
जीते रहने का एहसास भी मर चुका है
तुम्हारी स्मृतियों पर
भारी-भरकम
रोड रोलर गुजर चुका है।

{कृष्ण बिहारी}

मई 5, 2011

ढाई अक्षर की महिमा

बेतुके शब्दों से
हमने रचे
अनगिनत गीत
काश!
सही से चुन पाते
ढाई अक्षर।
….

प्रेम में
कहाँ है अंतर
हुस्न और इश्क के बीच
ये भेद खुला उसी पर
जिसने!
लैला को मजनूँ समझा
मजनूँ को लैला जाना।
….

दुनिया भर के
तनावों में जकड़े हुए आदमी!
किसी दीवाने से लें
मुक्ति का सबक।

(रफत आलम)

अप्रैल 17, 2011

सच्ची इबादत

वो आँख ही क्या जिससे निगाह न हो
वो लब ही क्या जिससे आह न हो
वो दिल ही क्या जिससे चाह न हो
वो जिस्म ही क्या जिससे कराह न हो
वो आदमी ही क्या जिससे गुनाह न हो

मुटठी भर माटी की सजा अभी बाकी है!
…….

मस्जिदों में सर झुकाना ही इबादत नहीं है
मंदिरों में जाना ही इबादत नहीं है
जोड़ की दाढ़ियाँ बढ़ाना ही इबादत नहीं है
लंबी चोटियाँ लटकाना ही इबादत नहीं है
छाप-तिलक लगाना ही इबादत नहीं है

अपने भीतर की खोज सच्ची उपासना है शायद!

(रफत आलम)

मार्च 22, 2011

भगत सिंह का खून (कृष्ण बिहारी)

सारे दिन उदास रहने के बाद
शाम भी अगर उदासी में गुजर जाये
और हर पल
अपनी खामोशी में
ठहर जाये
तो लगता है कि
ज़िंदगी का सबसे संवेदनशील हिस्सा
बगैर छटपटाए मर गया है
या फिर
ज़िंदगी की नस-नस में
तेज ज़हर भर गया है।

मैं नहीं जानता मेरे दोस्त!
मुझे बताओ
कि ऐसा क्यों होता है
तमाम हलचलों के बाद भी
आदमी एक खालीपन
क्यों ढ़ोता है
या
चीख-पुकारों
शोर-शराबों के बावजूद
आदमी के ईर्द-गिर्द
बर्फ की तरह जमा हुआ
सन्नाटा क्यों होता है?

तुम कुछ भी कह सकते हो
दर्शन और तर्क में बह सकते हो
मगर
दर्शन और तर्क
मेरी समस्या का
समाधान नहीं है।

मेरे दोस्त!
मेरा सवाल
इतना आसान नहीं है
आओ मेरे साथ
तुम्हे वे चित्र दिखाऊं
ऐसा कुछ बताऊं
जिसे दिखाने और बताने में
एक पूरी व्यवस्था डरती है
और बड़ी निर्ममता से
सेंसर करती है।

ज्यादा दिन नहीं हुये
उसके बेटे को गोली लगी थी
और उसका बेटा
पूरे देश का बेटा हो गया था
क्योंकि
उसने प्रशासन के खिलाफ
आंदोलन किया था।

कितना अच्छा लगता है
दूर से सुनना
देश के किसी बेटे के बारे में
खासतौर पर तब
जब
वह अपने घर में पैदा न हुआ हो
अच्छा लगता है
भगत सिंह के खून से
मातृभूमि की मांग में
सिंदूर बोना
मगर किन्ही आँखों का
जीवन भर रोना
न दिखायी पड़ता है
न सुनाई पड़ता है
आखिर,
यह कैसी जड़ता है!

और,
उस दिन
जब अंधेरा घिरने से पहले ही
कुछ लुटेरे
उसके घर में
जबरन घुस आये थे
तब उसके नेत्र
प्रशासन की नहीं
मात्र अपनी असमर्थता पर
छलछलाये थे।

खेती क्या रखवालों से बचती है!

तब उसकी आँख
न रो रही थी
न गा रही थी
हाँ,
उसकी जवान बेटी
उसे समझा रही थी
कि
कुछ भी तो नहीं हुआ
सिवाय इसके कि
उसकी दोनों जाँघों के बीच
हेलीपैड समझकर
हेलीकॉप्टर उतर गये।

पशु और मशीन में
जो थोड़ा- सा सूक्ष्म अंतर है
वह बुद्धि के प्रयोग का है
और
बुद्धि दोनों के पास नहीं है।
फर्क बस इतना है कि
आदमी का पशु होना खतरनाक है
और,
यह घटना
एक आज़ाद मुल्क के
फिर से गुलाम होने की
शुरुआत है।

और,
वह रात
जिसमें एक खास बात
अपने आप हो गयी थी
जिसके फलस्वरुप
अनेक तकदीरें हमेशा के लिये
असमय सो गयीं थीं
चाहे वह अलीगढ़ हो
या फिर जमशेदपुर
या लखनऊ हो
या फिर
कानपुर
मैं नहीं समझता कि
इन जगहों के लोगों के बीच
कोई फर्क आ गया था
हाँ,
अगर आप मानें
तो मैं कहूँ कि -
एक सफेदपोश बड़ी चालाकी से
फिरकापरस्ती बो गया था।
फिर जो कुछ हुआ
उसे न व्यवस्था बता पाई
और न आप जान पाये।

….. ये तो सिर्फ घटनायें हैं
जो चंद सिरफिरे करते हैं।
ऐसा सफेदपोश कहते हैं।
और -
आप और हम
ज़िंदगी के मरे हुये हिस्से का
अनचाहा बोझ सहते हैं।

आदमी मर गया है!

{कृष्ण बिहारी}

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