कविताऐं महज भावनाऐं नहीं हैं, वे अनुभव हैं।
एक कविता सीखने की खातिर तुम्हे शहरों, लोगों और चीजों को देखना होता है।
तुम्हे समझना होता है, महसूस करना पड़ता है कि पक्षी कैसे उड़ते हैं,
और इन इशारों को जानना होता है जो नन्हे फूल सुबह उठते ही दर्शाते हैं।
कला “पाब्लो पिकासो” की दृष्टि में
हर कोई कला को समझना चाहता है। चिड़िया के गाये गीत को समझने की चेष्टा क्यों नहीं करते? पेंटिंग के मामले में लोगों को समझना होता है... पर क्यों?
वे लोग जो चित्रों की व्याख्या करना चाहते हैं सरासर गलती पर होते हैं।
व्यक्ति अपने जीवन की
सारी उर्जा
अपने वजूद को
तलाशने में लगा देता है
परन्तु
जब उसकी ऊर्जा
उससे जुदा होती है तो
न वह ‘वह’ रहता है
और न उसका वह वजूद।
जीवन भर..
वह धन-संपत्ति, जोरू और ज़मीन का
मालिक कहलाने
मालिक के पीछे
बड़े नाम होने की
लड़ाई लड़ता है
इनसे गौरवान्वित होता है
परन्तु उसकी उर्जा चले जाने पर
न वह ‘मालिक’ रहता है
और न उसका नाम।
जीवन भर वह नहीं जान पाता कि
जब वह अपने,
मन, शरीर और आत्मा का ही
मालिक नहीं
वही उसके नियंत्रण में नहीं
तो वह..
और किसका और कैसे
‘मालिक हो सकता है?
और नाम भी फ़िर
जो ‘वह’ के लिए मिला है
‘वह’ न रहने पर, कहाँ रहेगा?
जीवन भर व्यक्ति
यह नहीं जानता कि
वह उस ‘वजूद की
लड़ाई लड़ रहा है
जो उसके पास है
उसको पाना तो वह है
जो उसके पास नहीं है
वह नहीं जानता कि
उर्जा रुप आत्मा उसके पास है
उसे पाना तो सद्कर्म है
जो उसके पास नहीं
इस तरह
उसका जीवन
जो उसकी उर्जा से है
उसी को न तलाश सकने में
व्यर्थ ही नष्ट होता है
और जो उसके पास नहीं
वह उसे नहीं पा पाता।
और इस तरह वह
जन्म दर जन्म
अपने वजूद को तलाशता हुआ
कष्टों, दुखों और
कुछ ही सुख के
गोल जन्म चक्र में
घूमता है तब तक
जब तक वह
यह नहीं जान पाता कि
कि उसका ‘वजूद’
उसके नाम में नहीं
और न और कहीं है
वह तो उसे केवल
अपने कर्म में तलाशना है!
मेरे दोस्त कहते हैं -
यह एक कुहासा है
हर ज़िंदगी में आता है
तुम्हे निराश नहीं होना चाहिये
दूसरा बीज बोना चाहिये।
मगर मैं जानता हूँ
कि जो फसल मैंने
तुम्हारी हथेली पर उगायी थी
उसमें अपनी समूची ज़िंदगी लगायी थी
अब मैं अपनी वह ज़िंदगी
कहाँ से लाऊँ,
वैसी ही दूसरी फसल
कैसे उगाऊँ?
और इसका भी क्या भरोसा
कि तुम
उतनी ही उर्वरा होगी।
यदि ऐसा नहीं होता
या सब कुछ पहले जैसा होता
तो फिर मैं एक बार
साधिकार
तुम्हारी नरम हथेलियों को पढ़ता
उनके साथ जीता
मरता।
या फिर
किन्ही दूसरी हथेलियों की ओर बढ़ता
एक नया प्रयोग जरुर करता।
क्योंकि हारना या हार मान लेना
समूची ज़िंदगी गवाँ बैठने से
कुछ ज्यादा ही गवाँ बैठना है।
मेरे इस सवाल का जवाब कि
आदमी के पास आखिर
ज़िंदगी से भी ज्यादा कीमती क्या है?
कि जिसके खो जाने की आशंका मात्र से ही
एक अज्ञान भय भर जाता है
और आदमी जीते जी मर जाता है।
तुम बता नहीं सकते
तुम्हारे भीतर ज़िंदगी ही नहीं
जीते रहने का एहसास भी मर चुका है
तुम्हारी स्मृतियों पर
भारी-भरकम
रोड रोलर गुजर चुका है।
वो आँख ही क्या जिससे निगाह न हो
वो लब ही क्या जिससे आह न हो
वो दिल ही क्या जिससे चाह न हो
वो जिस्म ही क्या जिससे कराह न हो
वो आदमी ही क्या जिससे गुनाह न हो
मुटठी भर माटी की सजा अभी बाकी है!
…….
मस्जिदों में सर झुकाना ही इबादत नहीं है
मंदिरों में जाना ही इबादत नहीं है
जोड़ की दाढ़ियाँ बढ़ाना ही इबादत नहीं है
लंबी चोटियाँ लटकाना ही इबादत नहीं है
छाप-तिलक लगाना ही इबादत नहीं है
सारे दिन उदास रहने के बाद
शाम भी अगर उदासी में गुजर जाये
और हर पल
अपनी खामोशी में
ठहर जाये
तो लगता है कि
ज़िंदगी का सबसे संवेदनशील हिस्सा
बगैर छटपटाए मर गया है
या फिर
ज़िंदगी की नस-नस में
तेज ज़हर भर गया है।
मैं नहीं जानता मेरे दोस्त!
मुझे बताओ
कि ऐसा क्यों होता है
तमाम हलचलों के बाद भी
आदमी एक खालीपन
क्यों ढ़ोता है
या
चीख-पुकारों
शोर-शराबों के बावजूद
आदमी के ईर्द-गिर्द
बर्फ की तरह जमा हुआ
सन्नाटा क्यों होता है?
तुम कुछ भी कह सकते हो
दर्शन और तर्क में बह सकते हो
मगर
दर्शन और तर्क
मेरी समस्या का
समाधान नहीं है।
मेरे दोस्त!
मेरा सवाल
इतना आसान नहीं है
आओ मेरे साथ
तुम्हे वे चित्र दिखाऊं
ऐसा कुछ बताऊं
जिसे दिखाने और बताने में
एक पूरी व्यवस्था डरती है
और बड़ी निर्ममता से
सेंसर करती है।
ज्यादा दिन नहीं हुये
उसके बेटे को गोली लगी थी
और उसका बेटा
पूरे देश का बेटा हो गया था
क्योंकि
उसने प्रशासन के खिलाफ
आंदोलन किया था।
कितना अच्छा लगता है
दूर से सुनना
देश के किसी बेटे के बारे में
खासतौर पर तब
जब
वह अपने घर में पैदा न हुआ हो
अच्छा लगता है
भगत सिंह के खून से
मातृभूमि की मांग में
सिंदूर बोना
मगर किन्ही आँखों का
जीवन भर रोना
न दिखायी पड़ता है
न सुनाई पड़ता है
आखिर,
यह कैसी जड़ता है!
और,
उस दिन
जब अंधेरा घिरने से पहले ही
कुछ लुटेरे
उसके घर में
जबरन घुस आये थे
तब उसके नेत्र
प्रशासन की नहीं
मात्र अपनी असमर्थता पर
छलछलाये थे।
खेती क्या रखवालों से बचती है!
तब उसकी आँख
न रो रही थी
न गा रही थी
हाँ,
उसकी जवान बेटी
उसे समझा रही थी
कि
कुछ भी तो नहीं हुआ
सिवाय इसके कि
उसकी दोनों जाँघों के बीच
हेलीपैड समझकर
हेलीकॉप्टर उतर गये।
पशु और मशीन में
जो थोड़ा- सा सूक्ष्म अंतर है
वह बुद्धि के प्रयोग का है
और
बुद्धि दोनों के पास नहीं है।
फर्क बस इतना है कि
आदमी का पशु होना खतरनाक है
और,
यह घटना
एक आज़ाद मुल्क के
फिर से गुलाम होने की
शुरुआत है।
और,
वह रात
जिसमें एक खास बात
अपने आप हो गयी थी
जिसके फलस्वरुप
अनेक तकदीरें हमेशा के लिये
असमय सो गयीं थीं
चाहे वह अलीगढ़ हो
या फिर जमशेदपुर
या लखनऊ हो
या फिर
कानपुर
मैं नहीं समझता कि
इन जगहों के लोगों के बीच
कोई फर्क आ गया था
हाँ,
अगर आप मानें
तो मैं कहूँ कि -
एक सफेदपोश बड़ी चालाकी से
फिरकापरस्ती बो गया था।
फिर जो कुछ हुआ
उसे न व्यवस्था बता पाई
और न आप जान पाये।
….. ये तो सिर्फ घटनायें हैं
जो चंद सिरफिरे करते हैं।
ऐसा सफेदपोश कहते हैं।
और -
आप और हम
ज़िंदगी के मरे हुये हिस्से का
अनचाहा बोझ सहते हैं।