Archive for ‘हास्य-व्यंग्य’

अप्रैल 12, 2011

लोकपाल समिति : सदस्यता लूट ले

भारत में चढ़ती गाड़ी में चढ़ने की कोशिश करने वालों की संख्या बहुत अधिक है और नेतागण तो इस काम में बहुत आगे हैं। कुछ नेता लोकपाल मसले के बहाने अपनी छवि बनाने के लिये दैनिक स्तर पर तरह तरह की बयानबाजी कर रहे हैं और कुछ नेता इस पूरे मामले में पलीता लगाकर इसे उड़ाने की चेष्टा में हैं। इसे ध्वस्त करने की कोशिश करने वालों में सबसे बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो लोकपाल तैयार करने वाली समिति में शामिल लोगों पर एतराज करके अपनी अपनी पंसद के लोग वहाँ देखना चाहते हैं। बहाना वे कर रहे हैं कि महिला क्यों नहीं है, दलित क्यों नहीं है, पिछड़ा क्यों नहीं है, मुसलमान क्यों नहीं है, फलाना क्यों नहीं है ढ़िमाका क्यों नहीं है।

121  करोड़ लोगों की आबादी तले दबे भारत में भाँति-भाँति के लोग हैं और अगर किसी एक भी श्रेणी के लोगों की संख्या गिनी जाये तो वह भी करोड़ों में निकलेगी, मसलन गंजे लोग भी करोड़ों की संख्या में होंगे।

पूरे समाज का प्रतिनिधित्व यह समिति करे इसके लिये आवश्यक है कि समाज में वास कर रहे लोगों की हर श्रेणी से प्रतिनिधि इस बिल को बनाने वाली समिति के सदस्य होने चाहियें। तभी तो सामाजिक न्याय की कसौटी पर यह खरा उतरेगा। कुछ श्रेणियाँ नीचे सूचिबद्ध की गयी हैं।

लोकपाल बिल बनाने वाली समिति में निम्नांकित लोगों का होना बेहद जरुरी है।

  • एक काले बालों वाला, एक भूरे बालों वाला, और एक सफेद बालों वाला;
  • एक आधा गंजा और एक पूरा गंजा;
  • एक काली आँखों वाला, एक भूरी आँखों वाला, एक नीली आँखों वाला, एक कंजी आँखों वाला;
  • एक सिक्स पैक एब्स वाला, और एक तोंद वाला;
  • एक सबसे लम्बे कद का और एक सबसे छोटे कद का;
  • एक बिल्कुल स्वस्थ, और एक पूरी तरह से बीमार और रुग्ण शरीर वाला;
  • एक डी.लिट उपाधि वाला और एक बिल्कुल अनपढ़;
  • एक पूर्णतया शाकाहारी, एक पूर्णतया माँसाहारी;
  • एक दुनियाभर की सैर कर चुकने वाला और एक वह जो कभी अपने मोहल्ले से बाहर ही न गया हो;
  • एक हमेशा कपड़े पहनने वाला और एक हमेशा नग्न रहने वाला;
  • एक 32 दाँतो वाला और एक बिना दाँतो के पोपले मुँह वाला;
  • एक रोल्स रॉयस चलाने वाला और एक पैदल चलने वाला;
  • एक योग, व्यायाम करने वाला और एक सदा सोने वाला;
  • एक नाचने वाला और एक नाच न जाने आंगन टेढ़ा कहने वाला;
  • एक गा सकने वाला और एक गाने में गधे से मुकाबला करने वाला;
  • एक दिन में सोने वाला और एक रात में सोने वाला;
  • एक हिंसक और एक अहिंसक;
  • एक दो आँखों वाला, एक एक आँख वाला और एक न देख सकने वाला;
  • एक पूरा सुनने वाला और एक न सुन पाने वाला;
  • एक लगातार बोलने वाला और एक कभी भी बोल न सकने वाला;
  • एक दिन में तीन बार नहाने वाला और एक साल में एक बार नहाने वाला;
  • एक ब्रहमचारी और एक कामी;
  • एक ऐसा जो पत्नी के अलावा हरेक स्त्री में माँ-बहन देखे और एक ऐसा जिसे कम से कम एक बलात्कार का अनुभव हो;
  • एक साधु और एक हद दर्जे का अपराधी;
  • एक लगभग 5 साल का बच्चा और एक कम से कम 95 साल का वृद्ध;
  • एक सदैव प्रथम आने वाला और एक सदैव अनुत्तीर्ण होने वाला;
  • एक बला का शातिर, और एक निपट भोंदू…एकदम गोबरगणेश;
  • एक सवर्णों में सवर्ण, और एक दलितों में अति दलित;
  • एक अगड़ों में अगड़ा और एक पिछड़ों में पिछड़ा;
  • एक अतिआधुनिक, और एक पुरातनपंथी – एकदम पोंगापंथी;
  • एक खिलाड़ी और एक अनाड़ी;
  • एक खतरों का खिलाड़ी और एक चींटी तक से डर जाने वाला;
  • एक पुजारी और एक पूजा-प्रार्थना से घृणा करने वाला;
  • एक सन्यासी और एक संसारी;
  • एक आस्तिक और एक नास्तिक;
  • एक भ्रष्टाचारी और एक ईमानदार,
  • एक दानवीर और एक भिखारी;
  • एक महल में रहने वाला एक फुटपाथ पर बसर करने वाला;
  • एक वोट लेने वाला और एक वोट देने वाला;

आदि इत्यादी!

और बहुत सारी श्रेणियाँ छूट गयी हैं, पढ़ने वाले और इस मामले में रुचि रखने वाले लोग अपनी अपनी इच्छानुसार समाज के विभिन्न तबके के लोगों के प्रतिनिधि इस सूचि में जोड़ सकते हैं।

लोगों के बीमार शरीरों को ठीक करने वाली दवा को बनाने वाली शोधार्थियों की टीम से भारत के ये पंगेबाज महानुभाव यह नहीं कहते कि अपनी टीम में हर श्रेणी के लोग रखो क्योंकि वहाँ इनका बस नहीं चलता। करोड़ों तो ऐसे होंगे जो दवा का नाम भी ढ़ंग से उच्चारित नहीं कर सकते और वहाँ चूँकि शरीर के लाभ की बात है तो वहाँ इन्हे विशेषज्ञ चाहियें पर चूँकि यहाँ लोकपाल इनके हितों के खिलाफ है और चूँकि मामला मानसिक रुग्णता का है और मानसिक रुप से बीमार कभी भी ऐसा नहीं मानते कि वे बीमार हैं तो हरेक आदमी बढ़-चढ़ कर बोल रहा है।

जाति, सम्प्रदाय (रिलीजन), आर्थिक, क्षेत्र और भाषा के अंतर के मुद्दों को कुटिलता से उठाकर कुछ शातिर लोग लोकपाल बिल के मामले की हत्या करना चाहते हैं। इन शातिरों की राजनीति एक भ्रष्ट समाज में ही चल सकती है अतः वे घबराये हुये हैं कि अगर समाज ईमानदार बन गया तो उनकी दुकान बंद हो जायेगी इसलिये तरह तरह के मुखौटे ओढ़कर वे लोकपाल की भ्रूणहत्या करने आ गये हैं।

भारत को बचाना है तो ईमानदार, देशभक्त्तों को जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्रवाद, और भाषा के तुच्छ अंतरों को भूलकर अपनी एकता बनाये रखकर इन शातिरों को करारा जवाब देना पड़ेगा। अगर भारत के सर्वनाश से फर्क नहीं पड़ता तो बनाये रखो इसे भ्रष्ट, जातिवादी, और साम्प्रदायिक। वर्तमान के भारत के लोगों की आने वाली पीढ़ियाँ मानवता के निम्न बिंदू को छूकर नये कीर्तिमान स्थापित करेंगी।

अब यहाँ कालिदास बन सकने की प्रक्रिया और परंपरा मर चुकी है, बहुमत मूर्ख ही जन्मते हैं, मूर्ख ही जीते हैं और ऐसे ही धरा छोड़ जाते हैं।

मुस्कुराइये कि आप भारत में रहते हैं।

…[राकेश]

Pic: Courtesy – srknews.com

फ़रवरी 11, 2011

रेगिस्तान में हिमपात : कविराज की पहली पुस्तक

और अंततः कविराज, जैसे कि पढ़ाई के जमाने से ही वे मित्रों में पुकारे जाते थे, की पहली पुस्तक प्रकाशित हो ही गयी। बीसियों साल लगे हैं इस पुण्य कार्य को फलीभूत होने में पर न होने से देर से होना बेहतर!

पहले कम्प्यूटर इंजीनियरिंग और बाद में मैनेजमेंट की पढ़ाई करके प्रबंधन के क्षेत्र में झण्डे गाड़ने की व्यस्तता के कारण उन्हे ऐसा मौका नहीं मिल पाया कि वे किताब प्रकाशित करा पाते । पर एक दिन किताब छपवाने का ख्याल फिर से आ गया तो उसने जाने का नाम ही नहीं लिया। सर पर चढ़ कर बैठ गया विचार कि इससे पहले की तुम और गंजे हो जाओ उससे पहले किताब छपवा लो। बस विचार के आगे समर्पण करके उन्होने अपने पुराने हस्तलिखित कागज ढूँढे। हिन्दी में टाइप करना सीखा और युद्ध स्तर पर कम्प्यूटर में अपनी पुरानी कवितायें टाइप करके संग्रहित कर दीं।

विरोधाभासी बातें एक ही कविता में कहना उनका एक खास गुण रहा है और इसीलिये उन्होने अपनी किताब का शीर्षक भी ’रेगिस्तान में हिमपात’ रखा है।

तब हॉस्टल के समय वे बैठे बैठे, चलते चलते, नहाते नहाते, खाते खाते  कवितायें उवाचते रहते थे, बल्कि उनके रुम मेट तो कहा करते थे कि यह बंदा नींद में भी कवितायें गढ़ता रहता है। एक बार तो ऐसे ही मित्रों ने किसी अवसर पर खुद खाना बनाने का आयोजन किया तो प्याज काटते काटते कविराज के मुख से सुर झड़ने लगे।

नैनों में अश्रु आये प्याज जो काटी हाये
ऐसे में कोई आके मोहे चश्मा लगा दे

कविता में कैसी भी तुकबंदी कर दें पर कविराज गाते बहुत अच्छा थे। किशोर के गीत को उनके जैसी आवाज में खुले गले से गाने की कोशिश करते और मुकेश के गीत को उनके जैसी विधा में।

वैसे तुकबंदी की प्रेरणा उन्हे अभिनेता प्राण से मिली। हुआ यूँ कि उन्होने दिल दिया दर्द लिया फिल्म देखी और प्राण के बचपन की भूमिका निभाने वाले बाल कलाकार के मुख से निकले एक  काव्यात्मक नारे ने उन्हे बहुत लुभाया था। वह पात्र दूध लेकर आये नौकर से गाकर कहा करता था

दूध नहीं पीना तेरा खून पीना है

कविराज को भी बचपन से ही दूध नापसंद था सो स्पष्ट है कि उन्हे उपरोक्त्त नारा पसंद आना था। हाँ खून पीने की बात उन्हे पसंद न आयी थी। सो उन्होने उसकी जगह चाय रख दी थी और अक्सर वे गुनगुनाते थे।

दूध नहीं पीना मुझे चाय पीनी है

और भी तमाम फिल्मों में प्राण कुछ न कुछ काव्यात्मक तकियाकलाम बोला करते थे और उनके अभिनय की यही बात कविराज को लुभा गयी। बाद में उन्होने प्राण के तरीके से ही बड़े अभ्यास के बाद सिगरेट के धुंये से हवा में छल्ले बनाना सीख लिया। हालाँकि वे धुम्रपान नहीं करते थे पर ऐसा करने वाले साथियों से कहते थे कि जब थोड़ी सी सिगरेट रह जाये तो मुझे छल्लों की प्रेक्टिस के लिये दे देना।

बकौल खुद उनके, कविता रचने के प्रति उनका प्रेम जीवन के पहले पहले प्रेम के कारण ही पनपा। आठवीं कक्षा में पढ़ते थे और साइकिल पर स्कूल जाते हुये उन्हे एक अन्य स्कूल की छात्रा से प्रेम हो गया। उनकी साइकिल बिल्कुल उसी गति और तरीके से चलने लगी जैसे कि उस लड़की की साइकिल के पहिये चलते।

घर में कविराज के पिता भी आरामकुर्सी पर आँखें बंद करके  देखा देखी बलम हुयी जाये गाती हुयी बेग़म अख्तर की आवाज में घंटों खोये रहते थे।

प्रेम का जीन तो पक्का पीढ़ी दर पीढ़ी जिंदा रहता है।

कविराज का प्रेम जब देखादेखी की हदों में सिमटने से इंकार करने लगा और पढ़ते हुये कॉपी किताबों के पन्नों में भी तथाकथित प्रेमिका का चेहरा दिखायी देने लगा और बैठे बैठे वे उसके ख्याल में खो जाने लगे तो उन्हे प्रेरणा मिली प्रेम पत्र लिखने की। कायदे से यही उनकी पहली रचना थी। दुनिया के बहुत बड़े बड़े लेखकों के लेखन की शुरुआत प्रेम पत्र लिखने से ही हुयी है।

तो शुरुआत उनकी गद्य से हुयी। करुण हास्य का बोध उन्हे इस प्रेम गाथा से गुजरने के बाद ही हुआ। बाद में वे खुद ही चटकारे लेकर अपने पहले प्यार की पहली चिट्ठी का हाथों लिखा और आँखों देखा हाल सुनाया करते थे।

कुछ पंक्त्तियाँ तो अभी भी याद आती हैं। उस जमाने में उन्हे लड़की की नाक बहुत पसंद थी। मुमताज़ उनकी पसंदीदा नायिका थीं और उनके जैसी ही नाक उस लड़की की भी थी। पत्र में उसके प्रति प्रेम को विस्तार से स्वीकारने की औपचारिकता के बाद उन्होने अपनी कल्पनाओं को प्रदर्शित करते हुये लिखा था कि वे उसकी नाक को अपनी नाक से छूना चाहते हैं

तब तो उन्हे पता न था कि संसार के बहुत सारे कबीले ऐसे हैं जहाँ नाक से नाक छुआकर प्रेम को प्रदर्शित किया जाता है।

हंसते हुये लड़की के गाल सुर्ख लाल हो जाया करते थे और उनके अनुसार उन्हे लाल अमरुद याद आ जाते थे। दुनिया के बहुत सारे लोगों की तरह उन्हे भी बचपन में सफेद से ज्यादा लाल रंग वाले अमरुद बहुत ज्यादा आकर्षित करते थे। लाल अमरुद उनके अंदर सौंदर्य बोध जगाता था जैसे कि बसंत में टेसू के फूल भी उन्हे आह्लादित कर जाते थे। नदी किनारे लगे अमलतास के पेड़ तो उन्हे इतना आकर्षित करते थे कि वे बहुत बार पेड़ से लटकी फूलों की झालरें तोड़ने के लिये नीचे नदी में गिर चुके थे। तैरना उन्हे थोड़ा बहुत आता था पर तैरने में कुशलता तो उन्होने अपनी इसी हरकत से हासिल की।

कहने का तात्पर्य यह है कि बचपन से ही वे कुदरती तौर पर एक प्रेमी थे। जिसे अंग्रेजी में कहा जाता है,” Ohh! By nature he was a romantic person”, ऐसे वे हुआ करते थे। अभी भी हैं।

प्रेम करना या प्रेम में होना उनके लिये बहुत जरुरी था। वे भी कहते थे और बहुत सारे मित्र इस बात से इत्तेफाक रखते थे कि भारत नामक देश में, खासकर हिन्दी भाषी प्रदेशों में, युवा लोग दो इच्छाओं का तहेदिल से पीछा करते हैं- एक थी किसी लड़की से प्रेम करना और दूसरी आई.ए.एस बनना। दूसरी इच्छा बहुत कठिन श्रम माँगती है तो उसे सम्भालने के लिये और जीवन की अन्य कठिनाइयों से उत्पन्न ऋणात्मक ऊर्जा को सम्भालने के लिये युवा प्रेम में आसरा खोजा करते थे। आजकल भी खोजा करते होंगे बस प्रेम अब कागजी और हवाई न रहकर देह से ज्यादा जुड़ गया है और अब जैसे भी हो जल्दी से जल्दी देह-सम्बंध बनाने की इच्छा कुलबुलाती रहती है।

बहरहाल कविराज ने कॉपी से पन्ने फाड़कर एक लम्बा सा रुक्का लिखा जिसमें उन्होने अपने पहले प्यार की सारी भावनायें बहा दीं और कई दिनों तक मौका तलाशते रहे कि लड़की उन्हे मिनट भर को भी अकेली मिल जाये। एक दिन सुबह स्कूल जाते हुये उन्हे ऐसा मौका मिल भी गया और उन्होने शीघ्रता से साइकिल लड़की की साइकिल के नजदीक लाकर रेलगाड़ी की रफतार से धड़कते दिल के साथ पत्र जेब से निकाला और हकलाते हुये लड़की से कहा,” तुम्हारे लिये है पढ़ लेना“।

चेहरा उनका डर के मारे लाल हो चुका था। पत्र को उसके हाथों में थमाकर उन्होने सरपट साइकिल दौड़ा दी।

दोपहर बाद स्कूल से लौटते हुये उसी जगह जहाँ उन्होने लड़की को पत्र सौंपा था एक बलिष्ठ युवक ने उन्हे रोका।

संयोग की बात कि इस घटना से पहले दिन उनके अंग्रेजी के अध्यापक ने सबको Aftermath शब्द का अर्थ समझाया था पर कविराज उसे समझ नहीं पाये थे। हो सकता है कि उनका अंतर्मन प्रेमिका के ख्यालों में गुम हो और उनकी इंद्रियाँ ज्ञान ग्रहण न कर पायीं। पर उस युवक के रोके जाने के बाद हुयी घटना और उसके बाद मन में उठने वाले भावों ने उन्हे अंग्रेजी के शब्द का अर्थ बखूबी समझा दिया। कहते भी हैं कि जीवन में स्व: अनुभव का बड़ा महत्व है।

उस शाम उनके विचलित मन में प्रथम बार काव्य का प्रस्फुटन हुआ और उन्हे कक्षा में पढ़ी काव्य पंक्तियों के अर्थ ऐसे समझ में आने लगे जैसे उनकी कुंडलिनी जाग्रत हो गयी हो।

वियोगी होगा पहला कवि विरह से उपजा होगा गान

जैसी पंक्त्तियों ने उनसे कहलवाया

वियोगी ही बन पाते हैं कवि विरह से ही उपजता है ज्ञान

तो उपरोक्त्त पंक्ति उनके द्वारा रची गयी पहली काव्यात्मक पंक्त्ति थी। पूरे चौबीस घंटे उनका दिमाग किसी और ही दुनिया में विचरण करता रहा। फिर जाने क्या हुआ कि उन्हे करुण – हास्य जैसे  मिश्रित भाव का बोध होने लगा। अगली रात के करीब दो बजे होंगे, जब पूरे मोहल्ले में शायद वे ही जाग रहे थे, उन्होने सिनेमा के परदे पर भावनात्मक रुप से लुटने-पिटने के बाद एक अजीब सी मुस्कान फेंकने वाले राज कपूर की भांति एक मुस्कान अपने चेहरे पर महसूस की और उनके हाथों में थमी कलम सामने मेज पर रखी कॉपी के पन्ने पर चलने लगी।

कलम रुकी तो उन्होने पढ़ा कि कुछ पंक्तियाँ पन्ने पर ठहाका मार रही थीं। उन्होने उन पंक्तियों को ऐसे पढ़ा जैसे कि इनका अस्तित्व उनके लिये अजनबी हो।

समझते रहे हम आज तक जिसे अपनी कविता
वह तो निकली सूरज पहलवान की बहन सविता
अब कभी न होने वाले साले ने, घुमा के थप्पड़ ऐसे मारे
लाल कर दिये गाल हमारे, आंखों में नचा दिये तारे

तो हास्य मिश्रित करुण भाव से यह उनका पहला साक्षात्कार था। पहले प्यार में खाये थप्पड़ों ने उन्हे यह साहस न करने दिया कि वे यह राज जान पाते कि कैसे लड़की के भाई को उनके प्रेम पत्र के बारे में पता चला। यह राज राज ही बना रहा और उन्हे सालों तक सालता रहा।

पहले प्यार ने उन्हे कवि बना दिया। बाद में उनकी लेखन प्रतिभा उन लोगों के बड़ी काम आयी जो प्रेम करने की जुर्रत तो कर बैठते थे पर प्रेम पत्र तो छोड़िये घर वालों को कुशल क्षेम का पत्र भी नहीं लिख पाते थे ऐसे सारे साक्षर अनपढ़ तथाकथित प्रेमियों के लिये प्रेम पत्र कविराज ही लिखा करते थे।

कविराज की काव्य रचने की क्षमता में सबसे खास बात थी कि जब ’बस दो मिनट’ जैसे विज्ञापन नूडल्स को भारतीयों पर थोप रहे थे वे मिनट भर में ही लुभाने वाली पंक्तियाँ लेकर हाजिर हो जाते थे। नारे बनाने में उनका कोई सानी न था।

सीनियर बुश ने इराक पर हमला किया और सैटेलाइट टी.वी की बदौलत जब दुनिया ने युद्ध का लाइव कवरेज देखा और भारत में बुश और सद्दाम हुसैन के पक्ष और विपक्ष में ध्रुवीकरण होने लगा तो उन्हे सद्दाम हुसैन से व्यक्तिगत कोई लगाव न था पर कविराज बुश की साम्राज्यवादी नीतियों के सख्त खिलाफ थे। एक रोज सुबह जब कुछ लोग जॉगिंग करते हुये नवाबगंज की दीवार के पास से गुजरे तो उन्होने बड़े बड़े अक्षरों में लिखा पाया

सद्दाम उतरे खाड़ी में बुश घुस गये झाड़ी में

बीती रात कविराज खाना खाने के बाद से कुछ घंटों के लिये गायब थे। लौटने पर उन्होने बताया था कि वे पास के सिनेमा हॉल में नाइट शो देखने गये थे।
पहले तो कभी वे अकेले फिल्म देखने न गये थे। उन्होने कभी स्वीकार न किया परंतु मित्रों को संदेह था कि बुश और सद्दाम हुसैन के ऊपर बनाया गया नारा उन्होने ही गढ़ा था।

ऐसा नहीं कि वे केवल तुकबंदी वाली कवितायें ही रचते थे। वे बेहद ज़हीन और संवेदनशील कवितायें भी रचते थे। बस उन्हे देख पाने का सौभाग्य उनके केवल दो मित्रों को ही मिला था और वह भी इस आश्वासन के बाद कि उनके इस संवेदनशील रुप की बात जाहिर न की जाये। वे अमिताभ बच्चन के चरित्रों जैसी दिलजलों वाली धीर-गम्भीर छवि ही बनाये रखना चाहते थे, ऐसा दिलजला जो कॉमेडी का सहारा तो लेता है पर अंदर से अकेला है।

कितने ही साथियों के प्रेम सम्बंध कविराज की लेखनी के कारण मजबूती के जोड़ से जीवित रहे। कितनों के प्रेम सम्बंध शादी की परिणति पा गये। यह संदेहास्पद है कि किसी भी साथी ने अपनी पत्नी पर कभी यह राज खोला होगा कि उसे लिखे जाने वाले उच्च कोटि के प्रेम पत्रों में उसका योगदान बस इतना था कि वह कविराज के लिये चाय, फिल्म और खाने का इंतजाम करता था।

कविराज की कवितायें कॉपियों, रजिस्टरों एवम डायरियों के पन्नों में बंद होती गयीं।

सालों बीत गये। साथी दुनिया में इधर उधर बिखर गये। ईमेल का पर्दापण हुआ तो सम्बंध फिर से स्थापित हुये और फिर ऊर्जा जाती रही तो त्योहारों और नव वर्ष आदि के अवसरों पर शुभकामनायें भेजने तक संवाद बने रहे। यादें तो यादें हैं कभी जाया नहीं करतीं, जीवन कितनी ही और कैसी ही व्यस्तताओं में क्यों न उलझा ले पर ऐसे मौके आते हैं जब बीते हुये की स्मृतियाँ पास आकर बैठ जाती हैं।

और जब एक रोज़ सूचना मिले कि आखिरकार कविराज की कवितायें छप ही गयीं और पुस्तक डाक से पहुँचने वाली है तो प्रसन्नता तो होती है भाई!

प्रसन्नता होनी लाजिमी है।

…[राकेश]

फ़रवरी 2, 2011

मुल्ला नसरुद्दीन : लंका में सभी बावन गज के

बात उन दिनों की है जब मुल्ला नसरुद्दीन को एक प्रदेश के शिक्षा विभाग ने कुछ समय के लिये इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स के पद पर ससम्मान आमंत्रित करके नियुक्त्त किया था और नसरुद्दीन ने देश के विकास में शिक्षा के मह्त्व को देखते हुये यह जिम्मेदारी अपनाने की स्वीकृति दे दी थी। उन्होने शिक्षा विभाग को कहा कि विभाग को सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा के स्तर को सुधारना चाहिये। वे प्रदेश भर के प्राथमिक स्कूलों के दौरे करने लगे। आज यहाँ तो कल वहाँ। साल के किसी दिन अवकाश न था उन्हे।

सारे दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर

उनका तो अटल विश्वास था ’कर्म ही पूजा है’ के सिद्धांत पर। किसी तरह की बाधा उन्हे न रोक पाती।

उसके बाद उन्होने दसवीं और बारहवीं तक के विद्यालयों के दौरे किये। उन्होने अपने इन तूफानी दौरों के दौरान सरकारी, अर्द्ध-सरकारी, निजी, गरीब और धनी स्कूलों एवम विद्यालयों के इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, दर्शन शास्त्र और अर्थशास्त्र के कला और विज्ञान को गहराई से खंगाला।

इन यात्राओं से उपजे ज्ञान को देश के चहुँमुखी विकास और इसकी एकता और अखंडता की मजबूती के लिये उपयोग में लाने के लिये उन्होने राज्य सरकार को बेशकीमती सुझावों से भरी रिपोर्ट सौंपी। अगर मुल्ला नसरुद्दीन की रिपोर्ट पहले राज्य और बाद में समूचे देश में लागू हो जाती तो देश की दशा और दिशा ही और होती। पर राजनीतिज्ञों से ऐसी आशा रखनी कि वे विशुद्ध देश हित में कोई काम करेंगे ऐसा है कि जैसे कोई बरसते सावन में बिना छाते के बाहर निकल पड़े और सोचने लगे कि भीगेगा नहीं या कोई शराब का तबियती शौकीन दूरदराज से आती बेग़म अख्तर की आवाज में सुनकर कि

हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब

हाथ में बड़े बड़े जग आदि लेकर बरसात में खड़े हो जायें और बाद में निराश होकर बरसात को और उस आदमी को गालियाँ दें जो बेग़म की गज़ल सुन रहा था।

मुल्ला नसरुद्दीन की बुनियादी सिफारिशें थीं कि देश के बच्चे देश की जिम्मेदारी हैं और ये बच्चे ही आने वाले भविष्य की दुनिया को संवार सकते हैं और हर बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने की एक जैसी सुविधा मिलनी चाहिये। अगर प्राथमिक स्कूल के स्तर पर ही बच्चों में धन, जाति और सम्प्रदाय के भेद होने लगेंगे तो यह बात भूल जानी चाहिये कि बड़े होकर वे इन भेदभावों से ऊपर उठ पायेंगे। ऐसा कभी नहीं हो पायेगा और देश के संसाधन, ऊर्जा और विचारशक्त्ति जैसे सभी बहुमूल्य गुण इन झगड़ों से निबटने में ही नष्ट होती रहेंगे और देश और इसके वासी पिछड़े ही रहेंगे।

शिक्षा सरकार का सबसे परम कर्त्तव्य होना चाहिये और सरकार को सबसे अच्छे स्कूल और विद्यालय खुद खोलने चाहिये और देश के सभी बच्चों को उनमें ही पढ़ाया जाये।

प्रदेश सरकार ने मुल्ला नसरुद्दीन की सिफारिशों पर कान न रखे।

सरकारें यदि देशहित में शिक्षा पद्यति लागू कर दें तो शिक्षा के क्षेत्र में घुसपैठ करके लाखों करोड़ रुपये कमा रहे माफियाओं का क्या होगा। समाज खुद नहीं चाहता कि बच्चों से भेदभाव खत्म हो अतः लोग खुद पसंद करते हैं कि आर्थिक, जाति और सम्प्रदाय के आधार पर बने स्कूल और विद्यालयों में ही उनके बच्चे पढ़ें ताकि उनके झूठे अहं बने रहें।

बहरहाल मुल्ला नसरुद्दीन ने जिस काम में अपना समय और अपनी ऊर्जा झौंकी वह प्रयास उस समय तो सफल न हो पाया, हो सकता है कि कभी ऐसा भी देश में हो जाये। आशा का साथ छोड़ना मनुष्य के लिये संभव नहीं।

नसरुद्दीन जीवन के किसी भी क्षेत्र से हास्य की बात खोज ही लेते थे। अपने इन दौरों से जुड़ी बहुत सारी मजेदार बातें वे बताया करते थे और उनमें से बहुत सारी बातें चुटकलों के रुप में प्रसिद्ध हो चुकी हैं। भले ही लोग जानते न हों कि इन चुटकलों की शुरुआत मुल्ला नसरुद्दीन ने ही की थी।

अपने इन दौरों से जुड़ा एक मजेदार वाक्या वे सुनाते थे।

एक बार वे किसी पर्वतीय इलाके में बड़े ही दुर्गम स्थल पर स्थित एक स्कूल का दौरा करने पहुँच गये। उस दूरदराज के स्कूल में कभी कोई अधिकारी नहीं गया था पर मुल्ला तो कवियों एवम रवि से भी ज्यादा कुशल थे और जहाँ रवि और कवि भी न पहुँच पायें वे वहाँ भी पहुँच जाते थे।

नसरुद्दीन तो उस जगह के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर अभिभूत हो गये। प्रकृति ने हर तरफ अपने सौंदर्य का ऐसा जलवा बिखेर रखा था कि आँखें हटती ही न थी। हवा में ऐसी ताजगी थी कि साँस लेने में भी आनंद की अनुभूति होती थी। आंनदविभोर नसरुद्दीन स्कूल में प्रवेश करते ही प्रधानाध्यापक के कक्ष में गये और उन्हे अपना परिचय देते हुये कहा कि वे अकेले ही कक्षाओं का मुआयना करेंगे और अध्यापकों को बताकर परेशान और सचेत न किया जाये।

छोटा सा स्कूल था। नसरुद्दीन कक्षाओं के बाहर से ही अध्यापकों एवम विधार्थियों को आपस में संवाद करते हुये देखते और सुनते रहे। तभी उनकी दृष्टि बाहर मैदान में पेड़ के नीचे बैठे कुछ बच्चों पर पड़ी। वे वहाँ पहुँचे और बच्चों से पूछा कि वे वहाँ क्यों बैठे हैं तो एक बच्चे ने बताया कि यहाँ उनकी अंग्रेजी की क्लास लग रही है।

नसरुद्दीन ने पूछा,” और आपके टीचर कहाँ हैं?”

जी, वे अभी आ जायेंगे। कल गिर गये थे हाथ में फ्रैक्टर हो गया था, उसी के लिये पास के अस्पताल से होकर स्कूल आने को बोल गये थे।

नसरुद्दीन बच्चों से बातें करने लगे।

कुछ देर बाद उन्होने ध्यान दिया कि बच्चे अंग्रेजी शब्दों को उनके मूल उच्चारण के साथ न बोलकर उन्हे उनके लिखने के आधार पर उच्चारित कर रहे हैं। मसलन ’अम्ब्रेला’ को कुछ ’यूम्बरेला’ बोल रहे थे और कुछ ’उम्ब्रेला’, ’स्टडी’ को ’स्टयूडी’ या ’स्टूडी’, ’गोट’ को ’जोट’ बोल रहे थे। अंग्रेजी की वर्णमाला में जो वर्ण जैसा उच्चारित किया जाता है वे शब्दों में भी उसे लगभग वैसा ही बोल रहे थे।

नसरुद्दीन ने सोचा कि टीचर से ही बात करेंगे। सो वे बच्चों से कहने लगे कि यहाँ चारों तरफ कितनी प्राकृतिक सुंदरता फैली हुयी है। उन्होने एक बच्चे से पूछा कि प्रकृति को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?

’जी नेटूर’

’नेटूर’?

’जी हाँ नेटूर’

’इसकी स्पेलिंग बता सकते हो’?

जी हाँ… एन ए टी य़ू आर इ ।

तब तक टीचर भी हाथ में प्लास्टर चढ़वाये हुये वहाँ आ गये। प्रधानाध्यापक ने उन्हे मुल्ला नसरुद्दीन के दौरे के बारे में बता ही दिया था। आते ही वे नमस्कार करके मुस्कुराते हुये खड़े हो गये।

नसरुद्दीन ने उनका हाल पूछा, हाथ के बारे में पूछा और फिर उसी बच्चे से कहा कि अब फिर से बताये कि प्रकृति को अंग्रेजी में क्या कहते हैं और उस अंग्रेजी शब्द की स्पेलिंग क्या है?

बच्चे ने फिर से दोहरा दिया।

नसरुद्दीन ने टीचर की ओर देखा। टीचर बच्चे की तरफ गर्व से मुस्कुराकर देख रहे थे। शाबास बेटा।

नसरुद्दीन ने दोहराया, एन ए टी य़ू आर इ, इन सबसे मिलकर क्या बना।

सब बच्चों ने समवेत स्वर में नारा लगाया और उनके साथ साथ उनके टीचर ने भी स्वर मिलाया, ” एन ए टी य़ू आर इ, नेटूर”।

नसरुद्दीन के मस्तक पर पसीने की नमी आ गयी। पर वे अपने भावों पर नियंत्रण कर गये।

अच्छा बच्चों पढ़ाई करो।

टीचर से विदाई लेकर नसरुद्दीन प्रधानाध्यापक के कक्ष में आ गये। वे कुछ क्रोधित भी थे। उन्होने प्रधानाध्यापक से कहा,” महोदय आपके स्कूल के अंग्रेजी के अध्यापक, कैसी अंग्रेजी बच्चों को पढ़ा रहे हैं।”

अच्छी अंग्रेजी पढ़ाते हैं श्रीमान।

कैसी अंग्रेजी पढ़ाते हैं, वे बच्चों को शब्दों का सही उच्चारण भी नहीं सिखाते। एन ए टी य़ू आर इ, नेटूर, पढ़ाते हैं। इच्छा तो हो रही है कि उनकी शिकायत लिखूँ।

प्रधानाध्यापक निवेदन करने लगे,” नहीं श्रीमान ऐसा न करें, घर में अकेला कमाने वाला है। बेचारे का फुटूर बिगड़ जायेगा”।

’फुटूर’ सुनकर तो नसरुद्दीन प्रधानाध्यापक का चेहरा देखते रह गये।

वहाँ सुधार का प्रबंध तो उन्होने किया ही। बाद में जब वे यह किस्सा सुनाते थे तो कहते थे कि इसलिये कहा जाता है कि लंका में सभी बावन गज के।

…[राकेश]

दिसम्बर 19, 2010

कैप्टन विक्रमादित्य की शादी और हिम्मत सिंह के कारनामे

साधारण जवान से लेकर सीओ साहब तक पूरी कमान में कैप्टन विक्रमादित्य और उनके सहायक हिम्मत सिंह की जोड़ी वीएचएस के नाम से मशहूर है और उनके किस्से अक्सर क्लब को सेना के जांबाजों के ठहाकों से गुंजा दिया करते हैं। विक्रमादित्य को उनके साथी और अफसर विक्रम के नाम से सम्बोधित करते हैं और हिम्मत सिंह को ऊपर से नीचे तक सभी एच एस के नाम से सम्बोधित करते हैं। खुद विक्रम भी हिम्मत सिंह को एच एस ही कहते हैं। जब से विक्रम कमीशन लेकर सेना में भर्ती हुये एच एस उन्ही के साथ हैं।

वीएचएस की जोड़ी कमाल की है और उन्हे देखकर ऐसा ही लगता है कि अगर सेना ने उन्हे न भी मिलाया होता तब भी कायनात किसी तरह उनका मिलन करा ही देती। शुरु से ही ऐसा रहा कि सुबह सवेरे उठते ही विक्रम एच एस का मुँह देखते थे जो उनकी वर्दी आदि को तैयार करके चाय बनाकर उन्हे उठा देते थे।

बैचलर जीवन में विक्रम पूरी तरह से एचएस पर ही निर्भर थे। उन दोनों की जोड़ी के तमाम किस्से प्रसिद्ध हैं, इस वक्त्त विक्रम की शादी के बाद की घटनायें याद आती हैं।

विक्रम नये नये कैप्टन बने थे और घरवालों ने उनकी शादी करा दी। शादी के दो-तीन दिन बाद ही विक्रम को वापिस आना था। वे अपनी पत्नी, चित्रांगदा, को लेकर छावनी स्थित अपने घर पहुँचे तो रात हो चुकी थी। एच एस ने उनका स्वागत किया। विक्रम ने एच एस को हिदायत दी कि रोज की तरह वह सुबह छ्ह बजे उनके बैडरूम में न पँहुच जाये और न ही दरवाजा खटखटाकर उन्हे उठाये। पर सुबह नौ बजे उनकी मीटिंग है सो उनकी वर्दी आदि सभी तैयार करके रखे।

अगले दिन सुबह अस्तव्यस्त सो रहे विक्रम और चित्रा को कमरे में कुछ आवाज सुनायी दी। विक्रम को रोज की आदत थी सो वे सोते रहे पर चित्रा ने मुँह उठाकर देखा तो उनकी लगभग चीख निकलते निकलते रह गयी। उन्होने विक्रम को हिलाकर उठाया तो वे ऊँघते हुये अंगड़ाई लेते हुये उठकर बैठे। चित्रा ने इशारा किया तो उन्होने पाया कि एच एस उनके बिस्तर की तरफ पीठ करे हुये, जूतों की रैक के पास बैठे जूतों पर पालिश कर रहे थे। वर्दी उन्होने सम्भालकर कुर्सी पर रखी हुयी थी। गनीमत थी कि विक्रम और चित्रा मच्छरदानी के अंदर सो रहे थे।

गाऊन पहनकर विक्रम मच्छरदानी से बाहर निकले। उन्होने देखा कि कमरे का दरवाजा तो अंदर से बंद है।

उन्होने एच एस से पूछा,” एच एस क्या कर रहे हो?”

एच एस ने उठकर उन्हे सेल्यूट मारा और कहा,” साब, वर्दी तैयार कर दी है, जूते चमका रहा हूँ”।

रात को तुमसे मना किया था न कि अंदर मत आना और दरवाजा तो बंद है अंदर कैसे आये?

साब, सुबह जब आया तो याद आया कि वर्दी और जूते तो आपके कमरे में ही रखे हैं, दरवाजा खटखटाने को आपने मना किया था सो दरवाजा खुलवा नहीं सकता था, फिर बाद में मैं खिड़की से अंदर आ गया।

विक्रम की समझ में नहीं आया कि वे एच एस को क्या कहें?

बहरहाल विक्रम तैयार होकर ऑफिस जाते हुये चित्रा से कह गये कि वे लंच के समय घर नहीं आ पायेंगे और एच एस लंच लेने आ जायेंगे, उनके हाथ लंच भिजवा दें।

लंच के समय एच एस घर पंहुच गये, चित्रा ने भोजन तैयार किया हुआ था। उन्होने टिफिन तैयार करके मेज पर रख दिया और एच एस से कहा कि मिनरल वॉटर की बॉटल साथ ले ले।

कुछ देर बाद उन्होने देखा कि एच एस मिनरल वॉटर की बॉटल को सिंक में खाली करके उसमें नल से पानी भर रहे हैं। उन्होने पूछा कि ये आप क्या कर रहे हैं?

मैडम, देखिये कितना पुराना पानी है, छह महीने पहले भरा गया था। मैंने ताजा पानी भर दिया है। साहब तो हमेशा ऐसा ही पुराना पानी बाजार से ले आते हैं, मैं ही तारीख देखकर उसमें ताजा पानी भर देता हूँ। साहब बिल्कुल ख्याल नहीं रखते इन बातों का, आप ध्यान रखना।

उस समय तो चित्रा को लगा कि या तो वे अपने बाल नोंच लें या एच एस का मुँह नोंच दें, पर किसी तरह उन्होने गुस्से को शांत किया।

बाद में तो उन्हे शादी के बाद छावनी में बिताये पहले ही दिन के दोनों किस्से हँसी ही दिलाते रहे हैं। शाम को विक्रम आये तो उनके सामने भी पहली ही बार रहस्योदघाटन हुआ कि मिनरल वॉटर के नाम पर वे नल का सादा पानी ही पीते आ रहे हैं।

एच एस का वे क्या करते? एच एस उनके जीवन का आवश्यक अंग बन चुके थे। फौजी तरीके से सोचने के अलावा एच एस एकदम खरे इंसान हैं।

बाद में तो चित्रा की भी एच एस से खूब छनने लगी।

अक्टूबर 29, 2010

गुल्लू बाबू और स्विस बैंक में भारत का काला धन

गुल्लू बाबू अभी चौदह साल के हैं। उम्र की यह दहलीज बड़ी रोचक स्थितियाँ रचती है। बचपन तो चला जाता है इस उम्र के आने तक पर अभी किशोरवस्था जवानी की तरफ पूरी तरह से जा नहीं पाती और किशोर हार्मोंस की उठापठक के बीच जाने अन्जाने अहसासों से रुबरु होने लगते हैं। कुछ लड़कों की आवाज भर्राने लगती है तो वे थोड़े चुप हो जाते हैं और कुछ आवाज के इस परिवर्तन से या तो समझौता करके या लड़ाई करके हद दर्जे के लफ्फाज हो जाते हैं। गुल्लू बाबू दूसरी श्रेणी में आते हैं। दो-चार उनके यार दोस्त भी हैं ऐसे ही और ये लोग जहाँ भी इकट्ठे होते हैं वहीं मेले जैसा शोर-शराबा और माहौल रच देते हैं। इंटरनेट की कृपा से दुनिया भर के विषयों की जानकारी इन महानुभावों को हो गयी है और सार्थक या अनर्गल, किसी भी तरह की बहस में घिरे हुये गुल्लू बाबू और उनके गैंग को पाया जा सकता है। कभी कभी उनकी बहस खासा मनोरंजन भी उत्पन्न कर देती है।

बीते रविवार को गुल्लू एंड पार्टी नयी प्रदर्शित हुयी फिल्म Knock Out देख कर आये थे और उनकी बहस केन्द्रित हो गयी थी कथित रुप से स्विस बैंकों में रखे भारत के काले धन पर।

बहस तो उनकी लम्बी थी पर कुछ मुख्य और रोचक बातों का जिक्र किया जा सकता है। किशोर दिमाग बड़े रोचक तरीके से सोच सकते हैं और बहुत दफा अनुभवी और पके हुये दिमागों के लिये अलग ढ़ंग से सोच पाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन हो जाता है।

सबसे बड़ी बात है कि भारत की किशोर पीढ़ी के बहुत सारे नुमांइदे कितने ही गम्भीर मुद्दों पर बहस करने को तैयार दिखते हैं। उनके पास सूचनाओं का भंडार है और वे आत्मविश्वास से लबरेज़ दिखते हैं।

उनकी बहस के कुछ अंश…

अरे इतना हल्ला होता रहता है भारत के काले धन और स्विस बैंको का और फिल्म ने भी दिखाया कैसे एक नेता हजारों करोड़ रुपये स्विस बैंक में जमा करता है। पर ये बात समझ में नहीं आयी कि स्विस बैंक किस करेंसी में धन जमा करके रखते हैं अपने लॉकर्स में?

क्या फर्क पड़ता है किसी भी करेंसी में रखें?

फर्क कैसे नहीं पड़ता, कोई बताओ, पौंड, डॉलर, यूरो या स्विस फ्रेंक, किस मुद्रा में पैसा रखा जाता है वहाँ?

चलो मान लो कि अमेरिकन डॉलर के रुप में रखा जाता है, पर इस बात से क्या फर्क पड़ता है?

ओ.के. मान लिया अमेरिकन डॉलर… पर अब सवाल उठता है, जैसा कि कहा जा रहा है कि भारत का ही लाखों करोड़ रुपया वहाँ जमा है। और भी देश हैं जिनका काला धन वहाँ जमा है तो क्या अमेरिका इतने विशाल धन के लिये अलग से करेंसी नोटों की व्यवस्था करता है?

अरे ये बात तो सही है- कौन सा देश इतने सारे करेंसी नोट अलग से छापता होगा स्विस बैंक के लिये?

ये भी तो हो सकता है कि धन वहाँ सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात आदि वैकल्पिक मुद्राओं के रुप में रखा जाता है।

हो सकता है पर इतने सारे लोग स्विस बैंक और काले धन के बारे में सालों से चर्चा कर रहे हैं और हमें यह भी पढ़ने को नहीं मिला कि कौन सी करेंसी वहाँ चलती है?

एक और मुद्दा है कि क्या स्विस बैंक इस धन पर ब्याज भी देते हैं जैसे कि अन्य बैंक या वे अपने यहाँ धन रखने के लिये फीस लेते हैं?

ब्याज कहाँ से देंगे, रखने के बदले पैसा लेते होंगे आखिरकार तभी बैंक इतने अमीर हैं। करोड़ों डॉलर्स की जमापूँजी पर ब्याज देने के लिये तो उन्हे बहुत सारा धन कमाना भी पड़ेगा, कहाँ से लायेंगे इतना पैसा और उनकी गतिविधियाँ तो गुप्त रहती हैं, ओपन मार्केट में तो क्या ही लगाते होंगे पैसा?

कहीं पढ़ा था कि अमेरिका 9/11 के बाद डर गया था कि कहीं ओसामा लादेन स्विस बैंकों जैसे गुप्त खाता खोलने वाले बैंको में धन जमा न कर ले।

मेरी समझ में नहीं आता कि ओसामा चाहे अरबों डॉलर्स जमा कर ले पर हथियार तो वह कहीं से खरीदता ही होगा।

सही बात है, हथियार ओसामा लादेन जैसे आतंकवादी खुद तो बना नहीं सकते। अमेरिका, रुस, फ्रांस, ब्रिटेन, इज़रायल, चीन, कोरिया, और जापान, जैसे बड़े और विकसित देश और पाकिस्तान जैसे लड़ाकू देश हथियार बेचने का धंधा दुनिया में चलाना बंद कर दें तो ओसामा का सारा धन रखा रह जायेगा।

तब तो ओसामा जैसे किसी देश में उस धन से कैसिनो या पब चलाकर जीविका कमाने के लिये विवश हो जायेंगे और चुपचाप जीवन जियेंगे। हथियार तो उन्हे यही शक्तिशाली देश ही देते हैं।

हाँ ऐसा पढ़ा था कि अमेरिका स्विस बैंकों पर प्रैशर डाल रहा है और वहाँ जमा अमेरिकी धन पर कब्जा करने के मूड में है।

पर खाली धन से तो आतंकवाद फैल नहीं सकता। खाली धन तो किसी भी काम का नहीं होता। अगर दुनिया में विनाश फैलाने वाले हथियार ही नहीं होंगे तो आतंकवादी क्या कर लेंगे। आमने सामने की कुश्ती में तो हरेक देश की जनता ही पीट पीट कर भुर्ता बना देगी इन आतंकवादियों का।

सही बात है अगर अमेरिका जैसे देश ठान लें तो आतंकवाद का नामोनिशान न रहे दुनिया में।

हथियार की बिक्री बंद कर दो जैसे कि कोई भी देश परमाणु हथियार नहीं खरीद सकता या बना नहीं सकता ऐसे ही सारे मारक हथियारों पर यू.एन से रोक लगवा दो। जो भी देश इस बात का उल्लंघन करे उसका पूरी तरह से बॉयकाट कर दे सारे देश। एक महीने में ठीक हो जायेगा बदमाशी करने वाला देश। जब कोई भी देश न कुछ खरीदेगा कोई भी चीज उस देश से न ही उसे कुछ बेचेगा तो वहाँ की जनता अपने आप अपनी सरकार पर दबाव डालेगी।

सही बात है, सब दिखावा होता है वर्ल्ड पॉलिटिक्स में। सब नाटकबाजी है।

और क्या, अगर यू.एन, अमेरिका, भारत और तमाम बड़े देश चाहते तो चीन, तिब्बत को आजद न कर देता। दुनिया भर की मैनूफैक्चरिंग इंडस्ट्री चीन में लगी हुयी हैं और अगर सारे प्रभावशाली देश चीन पर प्रैशर डाल देते या हर देश की जनता ही ऐसी घोषणा कर देती कि न तो चीनी सामान खरीदेंगे न ही किसी चीनी को कुछ बेचेंगे तो एक महीने में चीन की जनता अपने नेताओं और सेना वालों को पीट पीट कर विवश कर देती तिब्बत को आजाद करने के लिये।

सही है, इतना ज्यादा व्यापार देशों का आपस में होता है कि अगर किसी सही बात के लिये सब शक्तिशाली देश ठान लें तो उसे पूरा करने में आज के दौर में बहुत समय नहीं लग सकता।

सब ड्रामा चलता है। किसी को भी तिब्बत की आजादी से कुछ मतलब है नहीं। हम भारतीय ही कौन सा चीन को नाराज करना चाहते हैं। चीन के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो जाते हैं हमारे नेता, सेना वाले और उधोगपति लोग। अगर भारत की जनता ही ठान ले कि चीनी सामान का बहिष्कार करेगी तो भी बड़ा फर्क पड़ेगा चीन की दादागिरी पर।

जनता तो सस्ते पर जाती है और चीनी सामान सबसे सस्ता है। कैसे बहिष्कार करेगी भारत की जनता चीनी सामान का?

चलो हम तुम ही बहिष्कार कर दें चीनी सामान का।

तिब्बत छोड़ो, हमारे तुम्हारे चार लोगों के करने से क्या होगा? अगर जाकर देखोगे तो प्रधानमंत्री के दफ्तर में भी मेड इन चाइना सील वाला सामान लगा हुया होगा।

आज चार हैं बाद में बढ़ भी जायेंगे। शुरुआत तो करनी चाहिये।

चलो फिर आज से ही चीनी सामान पर पाबंदी। स्कूल में कल से ही प्रचार शुरु।

स्विस बैंक से कहाँ भटक गये तुम लोग? स्विस बैंक में जमा कालाधन भारत के लिये बहुत महत्वपूर्ण विषय है।

कहते हैं कि भारत का इतना धन वहाँ जमा है कि अगर सारा वापस आ जाये तो भारत का सारा विदेशी कर्ज चुकता हो जाये और तब भी बहुत सारा धन बचा रहेगा।

गजब के करप्ट रहे होंगे भारत के नेता और बाकी दलाल किस्म के लोग जिन्होने वहाँ लाखों करोड़ रुपया जमा करा दिया।

मैं ने भी पढ़ा था कहीं इंटरनेट पर कि काला धन वापस लाने से भारत ऊर्जा के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर हो जायेगा।

अरे कैसी वाहियात बात कर रहे हो, धन लाने से कैसे भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो जायेगा?

ये भी न ऐसी ऐसी दूर की कौड़ी सामने लाता है। अरे भाई, क्या खाली धन भारत में ऊर्जा के लिये वैज्ञानिक शोध को टॉप गियर में डाल देगा। वैज्ञानिक रातों रात कुछ खोज देंगे क्या?

मेरे भइया एक दिन बता रहे थे कि ज्यादातर तो बाहर की रिसर्च को देख कर ही भारत में रिसर्च होती है। 95% लोगों की कोशिश यही होती है कि किसी तरह से रिसर्च पेपर छप जाये किसी बाहर से छपने वाले जर्नल में। अब उनकी रिसर्च देश के काम आनी है या नहीं इस बात से उन्हे कोई मतलब नहीं होता। सी.वी पर पेपर्स की संख्या बढ़ाते रहते हैं। भइया के एक दोस्त तो कह रहे थे कि बड़े नामी इंस्टीट्यूशन्स के भी यही हाल हैं।

सही बात है, इतने तीरंदाज होते भारत के वैज्ञानिक तो आज देश में न पोल्यूशन इतना न होता और न ही ऊर्जा के क्षेत्र में देश इतना कमजोर होता। पानी साफ करने तक की टैक्नोलॉजी है नहीं अपने देश के पास। देश के काम आने वाली टैक्निक डेवेलप की होतीं अगर हमारे साइंटिस्टों ने तो आज देश की तस्वीर ही और होती, किसान और गरीब आत्महत्यायें न कर रहे होते।

किसी को पी.आई.एल करनी चाहिये या फिर आर.टी.आई पोलिसी के अंदर जाँच करवानी चाहिये देश की सभी शिक्षण और शोध संस्थानों के पिछले साठ सालों के क्रियाकलापों के सही मूल्यांकन के लिये। तभी दूध का दूध और पानी का पाने हो पायेगा। आखिर जनता का ही पैसा तो है जो खर्च होता है।

तुम लोग फिर भटक गये। स्विस बैंक से वापस मिले धन से विकसित देशों से तकनीक खरीदी जा सकती हैं। कितना इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारा जा सकता है, कितना नया खड़ा किया जा सकता है। देश एकदम धनी हो जायेगा।

जितने काम पैसे से हो सकते हैं उतने तो हो जायेंगे पर विकसित होने की मानसिकता तो नहीं आ जायेगी रातोंरात। अगर कोई रॉ-मेटीरियल नहीं है हमारे देश के पास या कोई तकनीक नहीं हैं तब पैसे उसे विकसित तो नहीं कर देंगे। उसके लिये तो क्षमता विकसित करनी पड़ेगी और उसके लिये टाइम, लगन और बुद्धि चाहिये।

सही बात है, सब कुछ सिर्फ पैसे से नहीं हो जायेगा। बुद्धि और देश के प्रति निष्ठा की जरुरत है। पर देश को नियंत्रण करने वाले नेता, इंडस्ट्रियेलिस्ट्स और बड़े लोग जब देश हित में निर्णय लेंगे तभी ऐसा हो सकता है। वे तो देश के रिसोर्सेज के खनन करने का ठेक भी विदेशी कमपनियों को दे रहे हैं। भला कौन सी ऐसी कम्पनी है दुनिया की जो अपना हित छोड़कर भारत का हित देखेगी?

हाँ उन्हे हमारे एनवारयन्मेंट से क्या मतलब, चाहे यहाँ सूखा पड़े या बाढ़ आये, उन्हे तो रॉ-मेटीरियल चाहिये और प्रोफिट चाहिये, वो उन्हे हमारे यहाँ के भ्रष्ट नेता और कर्मचारी दिलवा ही देंगे

उनकी बातों का सिलसिला लम्बा खिंचा पर बहस का बाकी हिस्सा किसी और दिन। क्या पता उससे पहले ही गुल्लू और मित्र लोग किसी अन्य मुद्दे पर इससे भी रोचक बहस छेड़ दें।

सितम्बर 24, 2010

ब्लॉग की दुनिया में एक घुसपैठिया …रफत आलम

नौकरी से रिटायर होने पर एक साथी ने उनसे मजाक में कहा था,” कहो दिलीप बाबू बुढ़ापा मानते हुये राम भजोगे, डर डर कर मरोगे या नेट वगैरहा की रंग-रंगीली दुनिया और ब्लॉग आदि से  मन बहला कर आनंद पूर्वक मरना चाहोगे”।
तब दिलीप सेवानिवृत होने के तत्काल बाद की भयानक शांति और जीवनचर्या में एकदम से आये बदलावों से परिचित न थे सो न तो साथी की बात समझ पाये और न ही कुछ उत्तर दे पाये।
पर शीघ ही पार्टियां और मेल मुलाकातें खत्म हुयीं और इन सब व्यस्तताओं से फारिग होकर एक दोपहर वे अकेले बैठे थे। कहते है ना – खाली दिमाग शैतान का घर सो उनके दिमाग में भी खुरापात ने घर कर लिया और उन्हे अपने साथी की कही बात याद आ गयी। उनके मन में ललक उठी कि कुछ दिन नेट के भी मज़े ले लें बाकी राम तो आखिर में भजना ही है।

ब्लॉग वाणी के ज़रिये ब्लॉग-संसार में जा घुसे। बस साब क्या कहें ब्लॉग की दुनिया के बारे में। अजीब अजीब से नाम उन्हे पुकार रहे थे और भाँति भाँति के सुंदर, औसत और साधारण पासपोर्ट साइज़ चेहरे उनका स्वागत कर रहे थे।

ब्लॉग संसार में विचरण करते हुये उन्हे एक साब, जो टी.वी. की दुनिया के ठीक ठाक से नाम वाले कलाकार हैं और जिनके उछल-कूद  भरे अभिनय से दिलीप अपनी ढ़ल गयी जवानी का दर्द भूल कर कुछ देर के लिये मस्त हो जाया करते हैं, का मुखडा एक ब्लॉग पर देखा।

दिलीप ने पहली एंट्री उन्ही के ब्लॉग में लगायी। दिलीप तो इस आशंका से ब्लॉग पर गये थे कि हीरो साब ने ज़रूर उछल-कूद में शामिल हसीन तारिकाओं के चटपटे किस्से लिखे होंगे पर वहाँ तो लघभग आधे किस्से सत्तारुढ़ पार्टी के नेताओं की फूहड़ स्तुति में लिखे गये थे और बाकी में दिनांक वार सामाजिक समस्यायें, बॉडी फिटनेस ,शायरी, हास्य और दुनिया भर के बारे में यह ऐसा है वह वैसा है जैसा लिखा था। नहीं थे तो हसीनाओं के अन्तरंग किस्से जिनकी तलाश दिलीप जी की ढ़ली जवानी के कांपते ऊबाल को थी।

उस ब्लॉग में एक कथा एक उमर दराज़ बूढी महिला से सम्बंधित थी। पति के स्वर्गवास होते ही पांच माह में ही उस बदनसीब को  बहुओं और बेटों ने  सड़क पर धकेल दिया था। बेचारी अब मंदिर के आगे भीख माँग कर किसी तरह अपना गुजारा कर रही थी। कथा मार्मिक लगी।  पोस्ट के नीचे टिप्पणी का बक्सा लगा दिख रहा था। पसीजे दिल से टिप्पणी वाला बक्सा खोल लिया।
पचास के लगभग  टिप्पणियाँ  लिखी थीं। आधी लाइन से डेढ़ लाइन तक की। वास्तविक जीवन के इतनी मार्मिक किस्से पर अजीबोगरीब टिप्पणियाँ देखकर मन और ज्यादा गीला हो गया।
ज़रा मुलाहिज़ा कीजिये टिप्पणियों के नमूनों का -
सुंदर है, साधुवाद, आभार आदि। बस इसी पर बात खत्म। दुखियारी बूढ़ी महिला की रूठी किस्मत के मुकदमे का फैसला एक शब्द में? वाह क्या इंसाफ था! अधिक किसी ने कलम को कष्ट दिया तो यूँ  लिख दिया था – अच्छा पोस्ट पढ़ाने के लिए धन्यवाद, कृपया मेरे लिंक्स – फलां फलां ,  भी देखें। और टिप्पणीकार का मतलब सिद्ध। समझ गये ना आप।
दिलीप यद्यपि कुछ हद तक मोहभंग की स्थिति में थे पर फर्ज़ मानकर अपने पसंदीदा अदाकार ब्लोगर महोदय की शान में कुछ कसीदे लिखे। माउस क्लिक और उनकी टिप्पणी भी दर्ज हो गयी। इसी ब्लॉग पर उन्हे एक ग़ज़ल भी दिखायी दी। उखड़े मूड को कुछ शांति प्रदान करने के लिये ग़ज़ल की शरण में चले गये।
ग़ज़ल बड़े ही रंगीन बैकग्राउण्ड और सुंदर अंदाज़ में शोभायमान थी पर शायर का नाम नीचे बिलकुल नन्हे अक्षरों में लगभग अदृष्य सा लिखा था। .गज़ल अच्छी लगने के कारण पूरी पढ़ी और कवि का नाम भी दिमाग में रट सा गया। उन्होने टिप्पणी वाला बक्सा यहाँ भी खोला और खँगाला। लगभग सभी टिप्पणीकारों द्वारा शायर के स्थान पर ब्लॉगर साब की शान में सुंदर गज़ल लिखने से सम्बंधित कलम कसीदाकारी की गयी थी।
प्रशंसागान में लीन टिप्पणियों के बीच बेचारे शायर की डेढ़ लाइन वाली गुहार भी गिरगिराती दिखायी दी कि साब हमारा नाम ऊपर लिख दो। लोगों में आपके शायर होने का गलतगुमानी हो रही है।

दिलीप शायर साब की काबलियत से खासे प्रभवित हो ही गये थे सो उन्होने लोगों की अल्पदृष्टि को इंगित करते हुये शायर और गज़ल की तारीफ में काफी कुछ लिख मारा पर यह क्या, टिप्पणी बक्से के उपर अंग्रेजी में लिखी हु्यी कुछ इस प्रकार की लिखावट प्रकट हो गई- युअर कमेन्ट इस सेव्ड और मोडरेटर द्वारा स्वीकृत होने पर छपेगी। देर तक इन्तज़ार करने के बाद निराश होकर लौटते वक्त नज़र जो पड़ी तो देखा- शायर की गज़ल के दो शेर ब्लॉगर साब की तस्वीर के ठीक नीचे छपे थे। दिलीप की आशंका बलवती हो गयी कि अब उनकी टिप्पणी कभी नहीं छपेगी।

दिलीप जी उखड़े मन से इधर उधर आँखे चला रहे थे कि स्क्रीन पर कुछ देखकर वे वे बेसाख्ता मुस्कराने लगे। एक ब्लॉग का नाम ही ऐसा था। एक अतिसुंदर महिला के चित्र के उपर लिखा था, “पुरुष के सर पर चप्पल”। चप्पल तो महिला की तस्वीर के सर पर थी और नाम ब्लॉग का था – पुरुष  के सर पर चप्पल। ऐसे कारनामे पर किसे हँसी न आती। दिलीप तुरंत ब्लॉग के भीतर हो लिए।
यहाँ भी दिलीप को निराशा ही मिली। सोच कर गये थे कुछ चंचलता होगी, हुस्न का जादू मर्द के सर पर नाचता दिखाई देगा, पर पहला ही पोस्ट था – पति देवता को कैसे मनाएं। फिर कविता थी- प्राण नाथ के चरणों की सौगंध। आगे थी करवा चौथ के व्रत की जानकारी आदि, आदि। यानि पुरुष के सर पर चप्पल के सिवा, मर्द के अहंकार की चापलूसी सम्बंधित सभी कुछ था।
दिलीप का पहले से उखड़ा मन थोड़ा और कसैला हो गया पर फिर भी अबला पर दया ही आयी. बेचारी बात तो सर उठाने की करती है, एम.एल.ए, सरपंच भी बन जाती है परन्तु  घूँघट के साथ। पुरुष  समाज बुरा हो तेरा। दिलीप को समझ नहीं आया कि क्या टिप्पणी करें सो चुपके से बाहर हो लिए।
दिलीप ने कई और ब्लॉगों के चक्कर लगाये। अंदाज़ लेखन के चाहे बिलकुल अलग रहे हों पर दो वस्तुओं की समानता लगभग सभी ब्लॉगों में बिना विविधता देखने को मिली – एक तो रचनायें, लेख और जानकारिया चाहे जो हों, कोई भी 10 से 15 साल से कम पुरानी  नहीं  थी या किसी से साभार उधार ली गयी थीं और दूसरी सभी टिप्पणीकार वही आधी से डेड लाइन वाली टिप्पणी जमाने में लगे थे। पाठक भूले तो नहीं हैं, सुंदर…आभार आदि वाली बात।

दिलीप का तो जी घबरा सा गया। लगा नमाज़ के चक्कर में रोज़े गले पड़ रहे हैं। उन्होने अपने दिमाग की खैर मनाने में ही भलाई समझी और निकल चले ब्लॉग संसार से बाहर की ओर। वापसी के रास्ते में एक ब्लॉग का अजीब सा नाम देख कर फिर से उत्सुकता जागी। माउस पर क्लिक और वे अंदर।
वहाँ भी वही राग- तेरी भी सफ़ेद मेरी भी सफ़ेद वाली बात देखने को मिली। खैर आ ही गये थे तो ब्लॉगर साब की उस १० वर्ष पुरानी रचना जिस के बारे में उन्होंने कितने ही अन्य ब्लॉगरों द्वारा चोरी का  दावा किया था, देखी। यानि चोरी से ये कम्प्यूटरों की कैद में बंद ब्लॉग भी अछूते नहीं। इतनी बड़ी तारीफ के बाद भी ना पढते तो रचना के साथ नाइंसाफी होती। अचानक नादान मन के लुभाने पर, टिप्पणी बक्से में नाम देखने के लालच ने उनसे वहाँ भी ब्लॉगर महोदय की शान में कसीदा लिखवाया और तुरत इनाम भी मिल गया – उनकी टिप्पणी भी कुछ दिनों के लिए अमर हो गयी।

ब्लॉगर साब की एक और कविता, जो कुछ नास्तिकता के विचार लिए हुये थी, पढ़ कर दिलीप आग-बबूला हो गये। अंजाम से बेखबर भीतर का आस्तिक जाग उठ खड़ा हुआ। कलम की स्याही आध्यमिकता से उबलने लगी। उन्होने खूब खरी- खोटी टिप्पणी ब्लॉगर जी की कविता के विरुद्ध लिख फेंकी। छापने की बात तो दूर अबकी बार तो टिप्पणी बक्से ने छापने सम्बंधित कोई सुझाव भी उन्हे नहीं दिया यानि टिप्पणी वाला बक्सा देर तक खाली ही रहा।

टिप्पणी छपवाने में मिली अब तक की असफलताओं से दिलीप की समझ में आ चुका था कि ब्लॉग सकून से पढ़ कर टिप्पणी छपाने के लिए ब्लॉगर और रचना, चाहे दो कौड़ी की भी ना हो, दोनों की तारीफ जरुरी है।
उन्होने एक और बात नोट की कि भले ही ब्लॉगर प्रतिकूल टिप्पणी को छापे न पर हर टिप्पणी बक्से के ऊपर टिप्पणीकार को आकर्षित करने हेतु ब्लॉगर द्वारा कुछ ना कुछ बेबाक राय छापने सम्बंधित आदर्श वाक्य जरुर लिखे होते हैं।

पुनश्च-:

(1) तीन दिन बाद जाने क्यों दिलीप के मन में हुडक उठी और उनके मन ने लालच दिया – जाओ देखो  तो सही, क्या पता ब्लॉगर महोदय ने अन्तर्रात्मा  की आवाज़ पर तुम्हारी टिप्पणी छाप ही दी हो। पर हाय रे ब्लॉग संसार, ब्लॉग भूमि पर उनके चंचल मन की तीसरी हार हुयी थी, उनकी टिप्पणियों का नामोनिशान तक मौजूद न था।

(2) दिलीप को भूला हुआ एक सबक याद आ गया- बाज़ार चाहे किसी का हो (भले ही बुद्दिजीवियों का ही क्यों ना हो) सौदे स्वलाभ के आधार पर ही किये जाते हैं।
(3) टिप्पणी छपवाने की कीमियागिरी दिलीप ने सीख ही ली थी और जल्द ही ढ़ेर सारे ब्लॉग्स पर उनकी टिप्पणियाँ चमचमाने लगीं।

(रफत आलम)

जुलाई 23, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन: दो उपलब्धियों वाली दास्तान

युगों युगों से महान हिमालय पर्वत श्रंखला के साये में रहने वाले लोग जानते हैं कि उनके आदि पुरुष, देवों में श्रेष्ठतम स्थान पाने वाले शंकर महादेव कितने भोले थे, उन्हे तो भोले शंकर के नाम से भी जाना जाता है। मुल्ला नसरुद्दीन में भी यही भोलापन कूट कूट कर भरा था। भोले शंकर से मिलते जुलते कई गुण उनमें थे।

रावण द्वारा रचित शिव-ताण्डव-स्त्रोत को वे बहुत पसंद करते थे और उसे पूरे भाव से गाते भी थे और नाचते भी थे। उनके गायन को सुन और नृत्य को देख पाने वाले चुनींदा अतिभाग्यशाली मित्र दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते थे। कुछ होने लगता था सबको।

उनके करीबियों को इस बात का पता था कि जब वे करीब पैंतीस साल के थे तो उनके एक परिचित, जिनका बहुत योगदान था पर्वतों से घिरे एक स्थान पर एक खूबसूरत से विश्वविद्यालय की शुरुआत करने में, ने उन्हे उस विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिये राजी कर लिया था। नसरुद्दीन उनका बेहद सम्मान करते थे अतः उन्हे राजी होना पड़ा परंतु वे राजी हुये इस शर्त पर कि वे किसी भी तरह का वेतन न लेंगे छात्रों को पढ़ाने के लिये। उन्होने कहा कि छात्रों को विद्या देकर धन न कमायेंगे, आजीविका के और बहुत सारे साधन हैं। विवाह उन्होने तब तक किया नहीं था और उनके मुताबिक एक अकेली जान को कितना पैसा चाहिये जीने के लिये? वे विवाह के खिलाफ न थे, पर जो काम वे करते थे और बाकी की जिन्दगी में उन्हे करने थे उनकी प्रकृति को देख कर उन्हे लगता था जिससे भी उनका विवाह होगा वह अकारण कुछ परेशानियाँ झेलेगी। मजाक करते हुये वे कहते थे कि वे भी बजरंग बली की तरह पचास साल तक ब्रह्मचर्य को साधना चाहते थे। हालाँकि कुछ साल बाद अड़तीस साल की आयु में उनका विवाह हुआ। कैसे हुआ, किन परिस्थितियों में हुआ, वह कथा किसी और दिन के लिये मुनासिब है।

बहरहाल, विश्वविद्यालय में पढ़ाने से इतना हुआ कि एक तो उन्हे अपनी रुचि के विषयों में शोध करने के लिये एक व्यवस्थित रास्ता मिल गया और बाद में तो वे एक घुमंतु अध्यापक बन गये। आज यहाँ ज्ञान बाँट रहे हैं तो कल किसी और जगह। विभिन्न विश्वविद्यालयों में अनेक मित्र बने, अनगिनत शिष्य और प्रशंसक बने। उनके घनघोर प्रशंसकों और शिष्यों में से एक थे शांतनु।

वे दसवीं में ही रहे होंगे जब उनके माता पिता का देहांत एक दुर्घटना में हो गया था। उनके सामने बहुत मुश्किलें आयीं पर मेहनत, सूझबूझ और अपनी प्रतिभा के दम पर पायी छात्रवृत्ति के बलबूते वे पढ़ते रहे। संयोग से उन्हे बाबा नसरुद्दीन की छत्रछाया मिल गयी।

शांतनु ने नसरुद्दीन के मार्गदर्शन में डाक्टरेट की और बाद में उनकी ही छत्रछाया में उपनिषदों पर बहुत शोध किया और एक सूक्ति ने उन्हे जीवन भर के लिये काज दे दिया। उपनिषद का वह वाक्य था,

अज्ञान तो अंधकार में रखता ही है, ज्ञान उससे भी बड़े अंधकार में धकेल सकता है“।

ये वाक्य उन्हे रात दिन कचोटता और इस एक वाक्य ने उन्हे एक सजग विधार्थी और शोधार्थी बना दिया।

बाद में शांतनु भी एक अन्य विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे। कुछ साल गुजर गये।

इस बीच शांतनु कुछ साल के लिये अमेरिका भी रह आये एक अमेरिकन विश्वविद्यालय के निमंत्रण पर। वे जाना नहीं चाहते थे और उन्होने नसरुद्दीन से सलाह की तो उन्होने कहा कि जाओ बरखुद्दार उधर की दुनिया भी तो देख आओ। जाने से कुछ अरसा पहले ही उनका विवाह भी सम्पन्न हो गया|

जब शांतनु अमेरिका में ही थे तो वहाँ उन्हे एक अन्य भारतीय प्रोफेसर मिले जो कि उनकी तरह ही कुछ समय के लिये वहाँ पढ़ाने के लिये गये हुये थे। प्रोफेसर साब की पत्नी भी उनके साथ थीं और शांतनु की पत्नी और उनमें परदेस में खूब छनने लगी। बच्चे प्रोफेसर साब के थे नहीं। आयु उनकी इकतालिस बयालिस के आसपास ही होगी उस समय, उनकी पत्नी उनसे कोई दसेक साल छोटी थीं।

यूँ तो वे विद्वान थे पर उनमें कुछ सनकें भी थीं। उन्हे अपना तखल्लुस रखने की सनक थी। तखल्लुस तो बहुत लोग रखते हैं पर इन साहब के साथ दिक्कत ये थी कि ये अब तक कम से तीन तखल्लुस बदल चुके थे। उन दिनों वे हिन्द्स्तानी शायरी पर शोध कर रहे थे और उलझन में थे कि क्या तखल्लुस रखें। उनके सामने बहुत सारे विकल्प मौजूद थे।

मीर की शायरी की तर्ज पर अपना तखल्लुस रखें “तीर” कयोंकि बकौल उनके मीर की शायरी एक तीर की तरह सुनने वाले के ह्र्दय में प्रवेश कर जाती है और वह मीरमयी हो जाता है। अमीर खुसरो का काव्य उन्हे “प्रेम” कहकर पुकार रहा था तो गालिब शरारत कर रहे थे कि मियाँ “विद्रोही” हो जाओ| मजाज़ पेश कर रहे थे उन्हे “मिजाज़“।

शायरी की बात हो तो नसरुद्दीन का जिक्र शांतनु को करना लाजिमी था, आखिरकार नसरुदीन ठहरे शायरी के बहुत बड़े कद्रदानों में से एक। शांतनु ने प्रोफेसर से बातचीत करते वक्त्त अपने गुरु नसरुद्दीन के शायरी के प्रति प्रेम को बताया और उनकी विद्वता का बखान भी किया और बखान इतना किया कि प्रोफेसर के दिल में नसरुद्दीन के दर्शन करने की तलब हिलोरे मारने लगी।

उस समय भारत के शायरों पर काम कर रहे प्रोफेसर को कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। खासकर मजाज़ पर शोध करने में उन्हे कठिनाइयाँ आ रही थीं। शांतनु ने उन्हे बताया कि गुरुदेव नसरुद्दीन उनकी सहायता कर सकते हैं। प्रोफेसर साब खिल उठे उन्होने हाथ पकड़ लिये शांतनु के कि तुरंत खत लिखो अपने गुरु को। दिल में कहीं उनके नसरुद्दीन को आजमाने की बात भी थी कि जरा देखें इन नसरुद्दीन साहब का दम खम।

कुछ ही दिन बाद शांतनु को एक बड़ा सा पैकेट पार्सल द्वारा मिला। अपने लिये भेजे गये व्यक्तिगत सामान को निकाल उन्होने प्रोफेसर को नसरुद्दीन द्वारा भेजे गये कागजात दे दिये। प्रोफेसर सारी रात सो नहीं पाये। डिनर करने के बाद नसरुद्दीन द्वारा भेजी गयी सामग्री पढ़नी शुरु की तो कब रात बीती उन्हे पता ही नहीं चला, जब सुबह के सूरज ने अपनी लालिमा से खिड़की के शीशों की मार्फत अंदर आकर कमरे के बाकी स्पेस और साजो सामान को जगा दिया तब उनका ध्यान भंग हुआ।

“कमाल कर दिया गुरु” बड़बड़ाते हुये वे कुर्सी से उठे और एक भरपूर अंगड़ायी लेकर वे तैयार होने चले गये। शांतनु से मिलते ही उन्होने घोषणा कर दी कि वे भी आज से उनके गुरु नसरुद्दीन के मुरीद और शिष्य हो गये हैं और उन्होने तय कर लिया है कि भारत लौटते ही चल रहे शोध कार्य से इतर वे हिन्दुस्तानी शायरी पर एक किताब भी लिखेंगे जो नसरुद्दीन को समर्पित होगी। उन्होने भावविभोर होकर नसरुद्दीन को एक लम्बा सा आभार पत्र लिख भेजा और उसमें भी उन्होने अपने द्वारा उनके शिष्य होने की घोषणा लिख भेजी और उनसे प्रार्थना की कि वे भी उन्हे शिष्य रुप में स्वीकार करें।

अमेरिका से लौटने के कुछ अरसे बाद संयोग कहिये या प्रोफेसर साब के प्रयास, वे भी शांतनु के विश्वविद्यालय में आ गये पढ़ाने। उन्होने दो शोध छात्रों को शायरी पर चल रहे अपने शोध कार्य से जोड़ लिया। भारत आते ही वे नसरुद्दीन से मिलना चाहते थे पर संयोग ऐसा बैठा कि शांतनु और प्रोफेसर के अमेरिका से लौटने से पहले ही नसरुद्दीन चले गये तजाकिस्तान और वहाँ से उन्हे तुर्की जाना था। वे खुद रुमी पर शोध कर रहे थे उन दिनो और इसी सिलसिले में वे दो साल के लिये बाहर चले गये थे। मजाज़ पर शोध के संदर्भ में प्रोफेसर साब उनसे नियमित पत्र व्यवहार करते रहे और नसरुद्दीन भी पत्रों के द्वारा ही उनका मार्ग दर्शन करते रहे। जहाँ भी नसरुद्दीन कहते प्रोफेसर अपने दोनों दोनों शोधार्थियों को वहाँ भेज देते। काम बड़ी तन्मयता से चल रहा था।

नसरुद्दीन के वापिस आने से कुछ अरसा पहले ही प्रोफेसर साब ने शोध कार्य खत्म कर दिया और एक किताब भी तैयार कर दी। प्रोफेसर साब तो नसरुद्दीन को भी सहलेखक के रुप में शामिल करना चाहते थे पर नसरुद्दीन ने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया। प्रोफेसर ने किताब को छपवाने के लिये नहीं भेजा, उन्होने कहा कि नसरुद्दीन आयेंगे और पांडुलिपी का ही विमोचन करेंगे और किताब का नाम तय करेंगे और उनसे मूल पांडुलिपी पर ऑटोग्राफ लेकर ही उसे छपने के लिये प्रेस में भेजा जायेगा।

सारा कार्यक्रम उन्होने शांतनु के साथ मिल कर तय कर दिया कि भारत आते ही नसरुद्दीन वहाँ आयेंगे और पांडुलिपी का विमोचन करेंगे। नसरुद्दीन को मानना पड़ा और पत्र द्वारा उन्होने स्वीकृति और भारत वापसी का अपना कार्यक्रम भेज दिया।

आज का किस्सा सीधे उनके द्वारा की गयी किसी कारगुजारी से सम्बंधित नहीं है पर वे भी उस घटना के एक महत्वपूर्ण पात्र थे।

संयोग अगर संयोग ही उत्पन्न न करें तो उन्हे संयोग ही क्यों कहा जाये? इधर प्रोफेसर साब का शोध पूरा हुआ, पांडुलिपी तैयार हुयी और उधर प्रोफेसर की पत्नी की कोख से भी एक कृति का जन्म हो गया और उन्होने एक पुत्र को जन्म दिया। प्रोफेसर तो नहीं परंतु उनकी पत्नी ग्रह नक्षत्र को बहुत मानती थी। उनके विवाह के लगभग दस ग्यारह साल बाद उन्हे संतान की प्राप्ति हुयी थी सो वे किसी किस्म का कोई रिस्क लेना नहीं चाहती थी। बच्चे के जन्मते ही उसकी जन्मकुंडली बनवाने का इंतजाम उन्होने अस्पताल जाने से पहले ही कर दिया था और ऐसा ही हो भी गया। परंतु दिक्कत ये आ गयी कि पंडित ने घोषणा कर दी कि बालक ने ऐसे नक्षत्रों में जन्म लिया है कि बालक की माता के मातापिता भाई बहन आदि बच्चे को तीन माह तक न देखें। पर दिक्कत ये थी कि प्रोफेसर की पत्नी के परिवार में पीढ़ियों से रिवाज चला आ रहा था कि नवजात शिशु का नामकरण बच्चे का नाना या अगर वह जीवित नहीं है तो बच्चे का मामा करेगा। अगर दोनों ही जीवित नहीं हैं तो जिसे भी बच्चे की माता दिल से अपने पिता या भाई स्वरुप मानती है वह यह कार्य करेगा। और बड़ी दिक्कत यह आयी कि पंडित ने आगे कहा कि बच्चे का नामकरण दो माह के अंदर करना बहुत जरुरी है और जो भी बच्चे का नामकरण करेगा उसे बच्चे के जन्म के बारे में कुछ मालूम नहीं होना चाहिये और बच्चे को एकदम से उसके सामने लाया जाना चाहिये और उसे कुछ ही क्षणों में एक सुयोग्य नाम बच्चे को देना चाहिये।

प्रोफेसर इन सब ग्रह नक्षत्रों की बातों को नहीं मानते थे पर पत्नी को नाहक नाराज भी नहीं करना चाहते थे। नसरुद्दीन वहाँ आ ही रहे थे सो प्रोफेसर की पत्नी और शांतनु की पत्नी ने भी तय कर लिया कि नसरुद्दीन के आने के अवसर पर ही बच्चे के जन्म की खुशी का समारोह आयोजित किया जाये और नसरुद्दीन ही बच्चे का नामकरण भी करें। पर ये बात दोनों ही स्त्रियों ने प्रोफेसर को न बतायी और साथ ही साथ शांतनु को भी विवश कर दिया कि यह बात प्रोफेसर को न बतायी जाये।

प्रोफेसर अपनी पुस्तक की पांडुलिपी के विमोचन की तैयारी में व्यस्त थे पर इसी बीच उपकुलपति के आदेशानुसार उन्हे एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये कुछ दिनों के लिये बम्बई जाना पड़ गया और अब उन्हे उसी दिन वापिस आना था जिस दिन नसरुद्दीन का वहाँ पधारने का कार्यक्रम था। प्रोफेसर ने अपनी पत्नी को निमंत्रण पत्र का मसौदा और किसे किसे निमंत्रण भेजना है, उन सब नामों की लिस्ट दे दी और कहा कि शांतनु और उनके छात्रों की सहायता से वे निमंत्रण पत्र छपवा कर सबको भेज दें। वे नसरुद्दीन के समारोह में आगमन को एक यादगार घटना बनाना चाहते थे। उनके जाने के बाद प्रोफेसर की पत्नी ने किताब के विमोचन के निमंत्रण पत्र को बच्चे के जन्म की खुशी में आयोजित समारोह का निमंत्रण पत्र बना कर सब लोगों को भिजवा दिया। वैसे लगभग सारे नाम तो उन्ही परिचितों के थे, जिन्हे चाहे किसी भी कारण से बुला लो। अतिथियों को भी इस बात का अहसास था कि प्रोफेसर और उनकी पत्नी को निस्संदेह बहुत ज्यादा खुशी होगी विवाह के इतने साल बाद संतान प्राप्ति से। आखिर उनका आँगन भी बच्चे की किलकारियों से गूँजेगा।

नियत दिन आ गया। नसरुद्दीन तो पहुँच गये। शांतनु उन्हे स्टेशन से ले आया और उन्होने बच्चे के नामकरण की रस्म भी विधिवत अदा कर दी और बच्चे को नाम दिया “पुलकित”।

समारोह में अतिथिगण आने लगे पर प्रोफेसर साब न पहुँच पाये थे, रेलवे स्टेशन पर पता किया गया तो पता चला की गाड़ी कुछ देरी से आयेगी।

उधर प्रोफेसर साब भी इस चिंता में घुले जा रहे थे कि नसरुद्दीन वहाँ पहुँच गये होंगे और वे अभी भी रेल में ही हैं। जाने क्या सोचते हों नसरुद्दीन? उन्होने उपकुलपति को थोड़ा कोसा।

ऐसे ही बैचेनी में भरे वे रेल के स्टेशन पर पँहुचने का इंतजार करते रहे और जैसे ही रेल स्टेशन पर पँहुची वे गाड़ी के रुकने से पहले ही रेल के डिब्बे से बाहर प्लेटफॉर्म पर कूद पड़े और तीर की तरह बाहर की ओर भागे। टैक्सी लेकर वे फौरन से पेश्तर घर पँहुचे।

उनका ही इंतजार हो रहा था। घर पँहुचते ही वे सबसे पहले नसरुद्दीन से मिले। उनकी पत्नी ने उन्हे याद दिलाया कि मेहमान कितनी देर से इंतजार कर रहे हैं उनके आने का।

प्रोफेसर ने हाथ मुँह धोकर वस्त्र बदले और अपनी लिखी पुस्तक की पांडुलिपी लेकर वे घर के बाहर ही स्थित समारोह स्थल पर पँहुच गये। लोगों ने ताली बजाकर उनका स्वागत किया।

प्रोफेसर के हाथों में हल्के लाल रंग के रेशमी वस्त्र में लिपटी पांडुलिपी थी। वे नसरुद्दीन, अपने छात्रों और शांतनु को लेकर मंच पर चले गये जहाँ उनकी पत्नी नवजात शिशु को गोद में लिये बैठी थी और पास ही शांतनु की पत्नी भी खड़ी थी। प्रोफेसर ने सबको शांत रहने के लिये अपना एक हाथ उठाकर इशारा किया सब उनकी तरह देखने लगे।

प्रोफेसर ने बोलना शुरु किया।

आज मेरी जिंदगी का बहुत अहम दिन है। आज हमारे बीच शांतनु के गुरु नसरुद्दीन जी मौजूद हैं। उनकी उपस्थिति मुझे कितनी खुशी दे गयी है मैं उसका वर्णन नहीं कर पाऊँगा और आप लोग शायद अनुमान न लगा पायेंगे। उनकी यहाँ उपस्थिति एक बहुत महत्वपूर्ण काम की परिणति होने के परिणामस्वरुप संभव हो पायी है अतः मेरा फर्ज बनता है कि मैं उस महत्वपूर्ण काम पर कुछ प्रकाश डालूँ।

लोगों ने तालियाँ बजानी शुरु कर दीं। वे तो समझ रहे थे कि जैसे उन्हे बच्चे के जन्म की खुशी बाँटने के लिये आमंत्रित किया गया है वैसे ही नसरुद्दीन भी निमंत्रण पर आये होंगे।
प्रोफेसर लोगों को शांत करते हुये आगे बोले।

कई बरसों से मैं जिस काम में लगान हुआ था वह अपनी परिणति को पँहुच गया है। मेरे गुरु नसरुद्दीन ने इतना मेरा मार्गदर्शन किया है इस कठिन कार्य को सम्पन्न करने में कि मैं ताउम्र उनका शुक्रगुजार रहूँगा। आज वे उस कृति को अपने आशीर्वाद से सुशोभित करने आये हैं जिसका जन्म ही उनके आशीर्वाद से सम्पन्न हो पाया है।

लोग नसरुद्दीन की तरह कौतुहल की दृष्टि से देखने लगे। उन्हे नसरुद्द्दीन कोई पीर या संत लगे। प्रोफेसर लोगों का ध्यान नसरुद्दीन की तरफ देख कर बहुत प्रसन्न हुये और उन्होने कहा।

मैं बहुत ज्यादा आभारी हूँ डा. शांतनु का जिन्होने मुझे गुरु के सम्पर्क में लाने का सौभाग्य प्रदान किया। यह उनका कर्ज रहा मुझ पर। अब तो वे मेरे गुरुभाई हैं।

अपने दोनों छात्रों को स्नेहमयी दृष्टि से देखकर मुस्कुराते हुये उन्होने कहा।

उम्र अपना असर दिखाती है और मेरे लिये इतना कठिन कार्य करना संभव न हो पाता यदि ये दो नौजवान अपनी भरपूर शक्ति, लगन और मेरे प्रति भक्ति से इस कार्य को पूरा करने में मेरी सहायता न करते। इन्होने दिन देखा न रात, जब भी मुझे इनकी जरुरत पड़ी ये उपस्थित रहे। इनके कठिन परिश्रम की बदौलत ही यह कार्य सम्पूर्ण हो पाया है। मैं इनके उज्जवल भविष्य़ को साफ साफ देख पा रहा हूँ।

बच्चे के जन्म के अवसर पर आयोजित समारोह में प्रोफेसर और उनकी पत्नी की खुशी में सम्मिलित होने आये अतिथिगण थोड़े भौचक्के से खड़े प्रोफेसर, नसरुद्दीन और प्रोफेसर के छात्रों को देख रहे थे। कुछ मुस्कुरा भी रहे थे।

खैर उन सबको अनर्गल लगने वाले प्रोफेसर के भाषण का रहस्य तब खुल ही गया जब प्रोफेसर ने रेशमी कपड़े में बंधी पांडुलिपी बाहर निकाली पर उन क्षणों की कल्पना ही की जा सकती है जब अतिथि प्रोफेसर के भाषण को बच्चे के जन्म से सम्बंधित समझ रहे थे और प्रोफेसर यह सोचकर बोल रहे थे कि सब अतिथि उनकी पुस्तक की पांडुलिपी के विमोचन के अवसर पर वहाँ एकत्रित हुये हैं।

किस्सा बहुत साल तक विश्वविद्यालय में हास्य उत्पन्न करता रहा।

…[राकेश]

जुलाई 18, 2010

नेता पुराण

विशेषण के वर्गीकरण पर जायें तो ये नेता जी हैं तो उसी बिरादरी के जिसके कभी मनोहर श्याम जोशी जी के “नेताजी कहिन” वाले नेता जी हुआ करते थे पर तब से अब तक यमुना एक गंदे नाले में बदल चुकी है, गंगा में भी प्रदुषण नियंत्रण वालो ने बीओडी सीओडी नापना मापना छोड़ दिया है और बहुत से लोग मान चुके हैं कि अब गंगा किनारे वाली सभ्यता समाप्ति की ओर बह रही है।

सो जब इतने बदलाव आ चुके हैं तो नयी पीढ़ी के नेता जी के रुप, आकार, प्रकृति, प्रवृति और बुद्धि, लालच, क्षमता आदि में भी बदलाव आने स्वाभाविक हैं। विशाल भारद्वाज ने संभवत: अपनी पिछली फिल्म का शीर्षक इन्ही नेता जी के करमों और व्यक्तित्व से उधार लिया होगा। कमीनियत इनमें कूट कूट कर भरी है। इस गुण का हाल ये है कि एक बार इनके एक विरोधी, जो हालाँकि इन्ही की पार्टी के वरिष्ठ सदस्य हैं, ने इनसे नाराज होकर इन्हे डपट दिया था,” क्या कुत्ते की तरह भौंक रहे हो “।

उनका पालतू कुत्ता वहीं खड़ा था वह इस तुलना से इतना नाराज हो गया कि मालिक को काटा तो नहीं पर उनकी वेशभूषा को जरुर तार तार करके डिजायनर वेयर का एक नया और नायाब किस्म का नमूना बना दिया और उनके शरीर पर भी यहाँ वहाँ पंजों से खरोंचे मार दी।

वो तो ये वक्त पर संभल गये वरना कुछ समय पहले इनकी चमचा पार्टी ने तो बाकायदा इन्हे पटा ही लिया था कि कमीनीगिरी के कुछ गुरों पर वर्ल्ड पेटेंट ले लिया जाये। इनके भतीजे ने जो दुनिया के बहुत सारे देशों में भारतीय फिल्मों की पायरेटेड डीवीडी के व्यापार में अच्छा बड़ा हिस्सेदार है, ने इन्हे बता दिया कि चचा क्या कर रहे हो आपसे बड़े बड़े कमीने वैश्विक राजनीति में पड़े हैं और आपकी एप्लीकेशन रिजेक्ट होने के बहुत चांसेज हैं और आपकी जो भी इज्जत है वहाँ इंडिया में उसका फालूदा बन जायेगा, लोग खायेंगे और डकार तक न लेंगे।

नेता जी ने एक बार एक आंदोलन के नाम पर जनता से करोड़ों रुपये जमा कर लिये थे और आज तक किसी को पता नहीं कि उस धन का क्या हुआ। जाने किस की कृपा से एक बार नेता जी, मंत्री भी बन गये थे, उस दौरान सुबह ही झक सफेद कपड़े पहन, माथे पर टीका लगा कर वे कुर्सी पर विराजमान हो जाते थे और अपने चेलों के साथ दिन भर कैसे ज्यादा से ज्यादा धन कमाया जाये इसकी जुगत भिड़ाते रहते थे और मौका मिलते ही पत्रकारों को दी गयी बोलियों की मार्फत हर उस आदमी को हड़काई भेजते रहते थे जो उन्हे भ्रष्टाचार में लिप्त बताता था।

नेता जी की सीनाजोरी का हाल ये रहा है कि एक बार इन्ही की पार्टी की नगर पालिका के स्तर की युवा नेत्री ने इन पर जबरदस्ती शारीरिक शोषण का आरोप लगाया तो इन्होने उसे ही चरित्रहीन बता दिया था और कहा था कि ऐसी स्त्री उनके चरित्र हनन का प्रयास कर रही है। मामला अदालत में जाने तक तो खबरें छपती रहीं बाद में जनता भूल गयी और नेत्री कहाँ गायब हो गयी कोई नहीं जानता।

कुछ समय लो प्रोफाइल रहने के बाद नेता जी फिर सक्रिय राजनीति में अपने गुर दिखाने और अपने खुरों की धार आजमाने पूरे जोर शोर से आ गये और विरोधियों को चुनौती देने लगे कि वे तो खुला खेल फरुखाबादी खेलने आये हैं, जिसमें दम हो सामने आ जाये।

गले में बड़े बड़े रुद्राक्षों के मनकों वाली माला, दोनों हाथों की ऊँगलियों में कम से कम आधा दर्जन अँगूठियाँ पहन किसी तरह से उन्होने अपने दल में महासचिव का पद हथिया लिया और साथ ही उन्होने जुगाड़ कर लिया कि टीवी आदि पर बहस में भी वे दल की तरफ से हिस्सा लेंगे।

एक राज्य में चुनाव होने वाले थे और एक्जिट पोल्स ने इनके दल की हार की संभावना व्यक्त की थी तो इन्होने सारे ऐसे पोल्स को झूठा और विपक्षियों की साजिश बताया। वे कैमरे के सामने  एक्जिट पोल करने वाली संस्थाओं एवम विपक्षी दलों को गरियाते रहे।

हल्ले गुल्ले के मध्य चुनाव हो गये और नेता जी महाश्य टीवी स्टूडियो में चल रहे चुनाव नतीजों पर आधारित कार्यक्रम में शामिल हो गये। चुनाव के नतीजे आने से पहले से ही उन्होने रट लगानी शुरु कर दी थी कि उनके दल को दो तिहाई बहुमत मिलने जा रहा है और उनका दल ही सरकार बनायेगा।

चुनाव नतीजे आने शुरु हुये, वे टीवी पर ही विपक्षी दलों के सदुस्यों से झगड़ा करते रहे। वे एक ही बात बोले जा रहे थे कि उनका दल दो तिहाई बहुमत लेकर रहेगा।

यहाँ तक कि केवल पांच छह सीटों के चुनाव नतीजे रह गये थे और अब तक के नतीजों में उनके दल को बहुमत तो छोड़िये चालीस प्रतिशत सीटे ही मिली थीं। जब चुनाव चर्चा का संचालन कर रहे टीवी जर्नलिस्ट ने उनसे पूछा कि अब आपका क्या कहना है तो तब भी नेता जी दावे कर रहे थे कि उन्हे ही बहुमत मिलेगा।

जर्नलिस्ट ने उन्हे याद दिलाया कि नेता जी गणित पर भी तो ध्यान दीजिये तो नेता जी गरज कर बोले, ये गणित वणित क्या होता है, हमारा दल ही बहुमत से जीतेगा और दो तिहाई बहुमत हमें मिलेगा।

जर्नलिस्ट और विपक्षी दलों के सदस्यों के लिये तो मुश्किल था ही वहाँ स्टूडियो में हँसी रोक पाना, जनता जरुर टीवी पर नेता जी के दावे सुन सुन कर हँस हँस कर दुहरी हुयी जा रही थी।

अगले दिन नेता जी ने प्रेस कांफ्रेंस करके घोषणा कर दी कि चुनाव में धाँधली हुयी है। जब पत्रकारों ने उन्हे याद दिलाया कि पर नेता जी राज्य में सरकार तो आपके ही दल की थी तब दूसरे दल कैसे धाँधली कर सकते हैं तो उन्होने आरोप लगा दिया कि केन्द्र सरकार ने जनता के साथ मिलकर उनके दल के खिलाफ साजिश की है वरना अगर ढ़ंग से निष्पक्ष ढ़ंग से चुनाव हुये होते और ईमानदारी से वोटों की गिनती हुयी होती तो उनके दल को दो तिहाई बहुमत मिलना तय था।

इनके अपने दल में समीकरण कुछ ऐसे पलटे कि इन्हे और इनके जैसे कुछ नेताओं को हाशिये पर डाल दिया गया। ये बहुत कुलबुलाये, बहुत बिलबिलाये पर इनकी ज्यादा चली नहीं।
समीकरण फिर पलटे हैं और वे फिर से कुछ सक्रिय हुये हैं, देखें अब इस बार की पारी में वे क्या गुल खिलाते हैं?

…[राकेश]

जुलाई 3, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन : दुनिया रंग रंगीली बाबा

बात मुल्ला नसरुद्दीन की हो रही थी कि कैसे कई मर्तबा नादानी में वे कैसी कैसी स्थितियों में फँस जाते थे।

सामान्य जन की परिभाषा से देखें तो हर पहुँचे हुये व्यक्ति की तरह नसरुद्दीन भी विरोधाभासों से भरे व्यक्ति थे। उनसे अपेक्षा नहीं की जा सकती थी कि वे ऐसा ही करेंगे जैसा कि दुनिया वाले उनसे उम्मीद लगाये बैठे हैं।

लोग अगर ये समझ लें कि अब तो नसरुद्दीन की उम्र हो चली है और अब तो वरिष्ठ नागरिकों वाले लक्षण उनमें दिखायी देंगे तो वे सबको चौंकाते हुये मैदान में बच्चों के साथ फुटबॉल खेलते हुये दिखायी दे जाते थे। पुल से नदी में छलांग लगाते दिखायी दे जाते थे। तैरने का शौक तो उनका उम्र भर न गया। उनका बस चलता तो वे जल समाधि लेकर ही मृत्युलोक से विदा लेते।

नसरुद्दीन यूँ तो जीवन में नये से नये परिवर्तन के प्रति एकदम बिंदास ढ़ंग से खुले दिल वाले मेजबान बने रहते थे बस एक संगीत ही ऐसा क्षेत्र था जहाँ उन्हे नये परिवर्तन रास नहीं आये। नसरुद्दीन ठहरे उन बिरले लोगों में से जिन्होने बड़े बड़े संगीतकारों के सम्मुख बैठकर उन्हे सुना था।

बिजली वाले रेकार्ड प्लेयर के होते हुये और कैसेट प्लेयर्स के धड़ल्ले से हर तरफ चलन में आने के बाद भी वे घर पर हाथ से चाबी देकर चलने वाले ग्रामोफोन पर नब्बे के दशक तक संगीत सुनते रहे। हजारों नायाब तवे (रेकार्ड्स) उनके पास थे। उनके संग्रह की विशेषता की बात पता चलेगी उनके एक मित्र की मार्फत। उनका मित्र उम्र में उनसे कम से कम पच्चीस साल छोटा रहा ही होगा और इंजीनियर होते हुये भी वह नौकरी छोड़कर संगीत संग्रह नामक दुकान चलाता था, दुकान कहना तो सही नहीं होगा क्योंकि वह तो संगीत के प्रति दीवानगी के चलते ऐसा कर रहा था और अपने इस शौक को ही उसने व्यवसाय भी बना लिया था। उसके पास भी दुर्लभ संगीत का खजाना था। संगीत के व्यसनी कैसा भी दुर्लभ संगीत पाने के लिये उसके पास जाया करते थे और यह बात सिर्फ कुछ गिने चुने लोगों को ही पता थी कि अगर संगीत का कोई नमूना, जिसके लिये उसके पास कोई दीवाना पहुँचता था, उसके पास नहीं भी होता था तो भी वह नसरुद्दीन के संगीत संग्रह के भरोसे ब्लांइड खेल जाता था और मेहमान से दो तीन दिन में आने के लिये कह देता था कि वह उसके द्वारा मांगा गया गीत या संगीत टेप करके दे देगा। इतना विश्वास उसे नसरुद्दीन के संगीत संग्रह पर था और वह कभी निराश भी नहीं हुआ।

घर से बाहर भी संगीत सुनने के लिये नसरुद्दीन ने एक वॉकमैन ले रखा था और अब वे कैसेट्स भी जुटाने में लगे रहते थे और संगीत संग्रह वाला मित्र इस काम में उनकी मदद करता था। उन्ही के संग्रह से तवे लेकर वह उन्हे कैसेट्स में रेकार्ड कर देता था।

एक पुरानी कहावत को वह नसरुद्दीन की शान में कुछ यूँ कहता था “जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे हमारे नवी“। पुरानी कहावत के कवि की तर्ज पर वह नसरुद्दीन को “नवी” कहता था और उसका कहना गलत भी नहीं था संगीत के मामले में नसरुद्दीन ने न दिन देखा न रात, न आँधी न तूफान, न दूरी देखी न धन, बस कहीं अच्छे संगीत का कार्यक्रम देखना सुनना है तो नसरुद्दीन वहाँ पहुँच ही जाते थे। किसी नायाब संगीत के रेकार्ड के बारे में पता चल जाये जो उनके पास न हो तो रात दिन एक कर देते थे उसे पाने के लिये।

नसरुद्दीन तो क्या शास्त्रीय और क्या अर्द्ध शास्त्रीय, क्या भजन और क्या गज़ल, सब तरह के संगीत की गहरी जानकारी रखते थे। फिल्मी दुनिया से निकले अच्छे संगीत के भी वे कद्रदान थे। हाँ संगीत में कमियाँ उन्हे बर्दाशत नहीं होती थीं। एक बार फिल्मी दुनिया के एक बड़े संगीतकार के बहुत बड़ी शोहरत पाने वाले एक गीत को सुनकर उन्होने रेकार्ड कम्पनी के पते पर संगीतकार को चिट्ठी लिख भेजी थी कि मियाँ आप और आपकी गायिका ने यहाँ गलती कर दी है। मेरे मित्र, आपके गुरु, आज जिंदा होते तो आपका कान उमेठ देते, कैसे उनका शिष्य ऐसी गलती कर सकता है?

संगीतकार ने शर्मिंदा होकर चिट्ठी लिखकर गलती मानी और उनके शहर आने पर उनसे मिलने की गुजारिश भी की।

नसरुद्दीन के बच्चों में तो संगीत के प्रति ज्यादा शौक कभी नहीं रहा, हो सकता है पिता के तवे सुन सुन कर ही उनका शौक बचपन में ही पूरा हो गया हो। पर नसरुद्दीन के नाती पोतों ने जरुर उनकी नाक में दम कर दिया एक अच्छा स्टीरियो म्यूजिक सिस्ट्म खरीदने के लिये। बच्चों की न भी सुने आदमी पर नाती पोतों की बात टालना जरा टेढ़ी खीर है।

सन 1992 के अक्टुबर माह के अंतिम दिन थे या नवम्बर माह के शुरुआती दिन। नसरुद्दीन ने हथियार डाल दिये बच्चों के सामने और वे स्टीरियो म्यूजिक सिस्ट्म खरीदने के लिये राजी हो गये। बच्चों ने ही उन्हे बताया कि फलां फलां म्यूजिक सिस्ट्म खरीदने पर दुकान वाला दस कैसेट्स फ्री दे रहा है। उन्होने अपनी अपनी पसंद की कैसेट्स के नाम दे दिये कि फ्री वाले कोटे से इन कैसेट्स को ले आना और दादा पर मेहरबानी करते हुये उन्हे भी दस में से दो कैसेट्स अपनी पसंद की लाने की पेशकश कर दी।

नसरुद्दीन का संगीत संग्रह वाला मित्र अपने परिवार में अनायास उत्पन्न किसी परेशानी के कारण दो माह के लिये अपने पैतृक गाँव गया हुआ था तो उससे सलाह करने का मौका भी नही था।
नसरुद्दीन म्यूजिक सिस्ट्म खरीदने दुकान पर पहुँच गये। मॉडल आदि तो सब बच्चों ने पहले ही तय कर दिया था। जब नसरुद्दीन दुकानदार को बच्चों द्वारा मंगायी गयी कैसेट्स की लिस्ट दे रहे थे तो कुछ लड़के लड़कियाँ हल्ला गुल्ला मचाते दुकान के अंदर आये।

आते ही उन्होने दुकानदार से कहा,” बाबा सहगल देना एक“।

दुकानदार ने उनसे कहा कि जरा मैं भाईसाहब को कैसेट्स दे दूँ

अरे हमें भी जल्दी है, पार्टी में पहुँचना है जल्दी से। हमें बाबा सहगल दे दो, इन्हे देते रहना बाद में।

नसरुद्दीन ने कुछ चकित होकर नौजवानों की भीड़ को देखा और दुकानदार से बच्चों को उनकी कैसेट देने को कहा।

नौजवानों के जाने के बाद नसरुद्दीन ने लगभग खुश होते हुये दुकानदार से कहा,” कमाल है आजकल के बच्चे भी ऐसा संगीत सुनते हैं! “

दुकानदार ने ज्यादा ध्यान न देते हुये कहा,”हाँ भाईसाहब आजकल तो यही चल रहा है इन नौजवानों में“।

नसरुद्दीन ने दुकानदार से कहा कि वह बच्चों की लिस्ट में मौजूद आठ कैसेट्स के सिवा एक कैसेट बेगम अख्तर या मल्लिका पुखराज की दे दे और उन्हे भी एक कैसेट बाबा सहगल की दे दे और ये दोनो कैसेट्स एक अलग लिफाफे में बंद कर दे।

दुकानदार ने आठ कैसेट्स एक पैकेट में और बाकी दो कैसेट्स एक अलग पैकेट में बंद करके उन्हे दे दीं और वे म्यूजिक सिस्टम और कैसेट्स के पैकेट उठाये बाहर आ गये। वे खुश थे और अपने आप से ही कह रहे थे,” नौजवान पीढ़ी उतनी भी बिगड़ नहीं रही है संगीत के मामले में जितना वे सोचते थे आजकल के शोर शराबे वाले बेसुरे संगीत को सुनकर। चलो अदब से तो नहीं बोल रहे थे दुकान पर पर कम से कम सहगल को बाबा तो कह रहे थे।

रास्ते भर वे कितने ही गानों की पंक्तियाँ गुनगुनाते रहे।

बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये…,
ग़म दिये मुस्तकिल…,
ऐ दिल ए बेकरार झूम…,
दुख के अब दिन बीते…,
दिया जलाओ जगमग जगमग…,
मेरे सपनों की रानी…,

घर पहुँच कर उन्होने बच्चों को म्यूजिक सिस्टम और उनकी कैसेट्स का पैकेट दे दिया|  बच्चे तो तभी अपनी पसंद के गाने बजाकर उधम मचाने लगे।

नसरुद्दीन अपनी कैसेट्स अपने कमरे में रखकर किसी और काम से फिर बाहर चले गये। उस दिन सारा समय वे खुशी खुशी सहगल के गाये कितने ही गीत गुनगुनाते रहे। उनसे मिलने वाले भी उन्हे खुश देखकर खुशी पा रहे थे।

अगले दिन दोपहर में अपने संगीत सुनने के समय में उन्होने बड़े प्यार से नयी कैसेट्स का पैकेट निकाला और सहगल वाली कैसेट हाथ में ली। कैसेट पर छपा फोटो उन्हे कुछ अलग लगा फिर उन्होने सोचा कि हो सकता है बाजार वालों ने अपनी कारस्तानी दिखा दी हो।

कैसेट उन्होने अपने वॉकमैन में लगायी और आरामकुर्सी पर आँखे बंद करके अधलेटे हो गये।
पर मिनट ही बीता थी कि वे लगभग कूद कर उठ खड़े हुये। ईयर फोन उनके कान से निकल गये और उनमें से हल्की हल्की आवाज आ रही थी

ठंडा ठंडा पानी ठंडा ठंडा पानी ठंडा ठंडा पानी
प्यास लगी है तो बुझानी भी है
ठंडा ठंडा पानी ठंडा ठंडा पानी ठंडा ठंडा पानी

नसरुद्दीन भौचक्के से खड़े एक बार वॉकमैन को देखते और एक बार कुर्सी के पास रखी छोटी मेज पर पड़ी कैसेट को जिस के कवर से बाबा सहगल की आँखें उन्हे ही देख रही थीं। उन्हे लगा मानो वे आँखे शरारत से उन्हे चिड़ा रही हों।

ईयर फोन से आवाज आ रही थी -

ध्यान मुझे आया मैने पूछा नहीं नाम।

नसरुद्दीन ने जैसे होश में आते हुये वॉकमैन बंद किया। उन्होने कैसेट को कवर में बंद करके, पैकेट में रख दिया।

कहीं गीत बज नहीं रहा था पर उनके कान सहगल की आवाज सुन पा रहे थे

चाह बरबाद करेगी हमें मालूम न था

बच्चे कभी नहीं जान पाये कि दादा जी ने दसवीं कैसेट कौन सी ली थी? उन्हे तो यही लगा कि शायद वे रास्ते में ही गिरा आये दसवीं कैसेट। नसरुद्दीन ने बाद में संगीत संग्रह वाले मित्र को किस्सा तमाम सुनाया जो उसने नसरुद्दीन के देहांत के कई बरस बाद उनकी याद में उनके जन्म दिवस पर हर साल आयोजित होने वाले एक छोटे मगर विशिष्ट संगीत समारोह में सुनाया, जिसमें सिर्फ और सिर्फ विशुद्ध किस्म के संगीत प्रेमी ही शिरकत करते हैं।

…[राकेश]

जून 30, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन लुट गये राम नाम की लूट के फेर में

जैसे विचित्र मुल्ला नसरुदीन वैसे विचित्र उनके साथ होने वाली घटनायें। एक झोंक में काम करने वाले व्यक्ति ठहरे नसरुद्दीन। अगर कुछ करने की सोच लें तो न आगा देखें न पीछा बस जुट जाते थे उस काम को पूरा करने में। दूसरों से सीखने का तो मतलब ही नहीं उठा कभी उनके जीवन में। वे तो सेल्फ मेड व्यक्ति थे वैसे ये बात दीगर है कि कितना निर्माण उनके द्वारा किये कामों से होता था और कितना विध्वंस उनकी हरकतों की वजह से हो जाता था। करने के बाद सोचना उनकी फितरत में था।

खैर घरवाले उन्हे उलहाना दिये रखते कि वे घर के किसी काम से मतलब नहीं रखते और मोहल्ले के बाकी लोग अपने परिवार के साथ घुमने जाते हैं उन्हे मेला दिखाने ले जाते हैं, सिनेमा दिखाने ले जाते हैं पर नसरुद्दीन हमेशा घर और परिवार को नजरअंदाज किये रखते हैं।

नसरुद्दीन इन रोज रोज के वाद विवादों से परेशान होकर वादा कर बैठे कि वे भी परिवार को कहीं न कहीं बाहर ले जाकर सबका मनोरंजन करायेंगे पर स्थान आदि उनकी अपनी मर्जी का होगा।

उनके परिवार वाले ऐसा कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे सो उन्होने झट से हाँ कर दी।

नसरुद्दीन ने सोचा कि मेरी शांति के दुश्मन इन लोगों को कहीं भी ले जाना बिना मतलब की परेशानी को मोल लेना है और सबसे अच्छा इन सबको फिल्म दिखाने ले जाना रहेगा, कम से कम सिनेमा हॉल के अंधेरे में मैं सो तो सकता हूँ।

नसरुद्दीन ने परिवार में क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या स्त्री और क्या पुरुष सबको कह दिया कि अगामी रविवार को सब लोग तैयार रहें और वे उन सबको फिल्म दिखाने ले जायेंगे। चाहें तो वे लोग अपने अपने मित्रों को भी आमंत्रित कर सकते हैं।

पूरे मोहल्ले के लिये चर्चा का विषय बन गया नसरुददीन जैसे आदमी द्वारा परिवार और मित्रों को फिल्म दिखाने ले जाने का कर्यक्रम। रविवार तक पूरी फौज तैयार हो गयी फिल्म देखने जाने के लिये।

नसरुद्दीन उन दिनों तुलसी की राम चरित मानस का अध्ययन कर रहे थे। मुकेश द्वारा गायी राम चरित मानस की कैसेट्स तो उनके साथ ही रहती थीं और वे उनके वॉकमैन में बजती ही रहती थीं।

फिल्में उन्होने बहुत कम देखी थीं पर कुछ फिल्मी लोगों के नाम से वे परिचित थे। अपने रशियन दोस्तों से उन्होने राज कपूर और उनकी फिल्मों की रुस में लोकप्रियता के बारे में भी सुन रखा था।

शुक्रवार को ही राज कपूर की “राम तेरी गंगा मैली” प्रदर्शित हुयी थी। नसरुद्दीन ने फिल्म का नाम पढ़ा और सोचा कि धार्मिक फिल्म लगती है और राम का नाम शीर्षक में मौजूद है तो उनके जीवन के प्रसंग भी इसमें होंगे और हो सकता है कि मेरी रुचि से मिलती जुलती बातें भी फिल्म में मिल जायें। फिल्म के गाने चारों तरफ कुछ दिनों पहले से बजने लगे थे और नसरुद्दीन भी उन गानों से वाकिफ हो चले थे। लता मंगेशकर द्वारा गाया एक गीत “एक राधा एक मीरा” तो उन्हे इतना भाया कि उन्होने एक सज्जन से पूछ ही लिया कि किस फिल्म का गाना है और फिल्म का नाम जानकर उन्हे पूरी तसल्ली हो गयी कि वे एक धार्मिक फिल्म देखने जा रहे हैं। उन्होने तकरीबन दो दर्जन टिकट रविवार के मैटिनी शो के खरीद लिये।

रविवार आया। नसरुददीन सबको सिनेमा हाल ले गये।

सभी समझ गये होंगे कि नसरुद्दीन गये तो थे रामायण देखने और दिखाने पर वहाँ से लेकर आये महाभारत होने के बीज और कल्पना ही की जा सकती है कि कैसी फसल उगी होगी उन बीजों से। फिल्म शुरु होने के एक घंटे के अंदर ही सब लोग वापिस घर पर थे। नसरुद्दीन रास्ते से ही गायब हो गये।

विचित्रताओं के सम्राट नसरुद्दीन ऐसे घटनाचक्रों से दो चार तो होते ही रहते थे। ऐसा ही उन्होने कुछ बरस बाद फिर से किया। पर दूसरा किस्सा किसी और दिन।

…[ राकेश]

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