Archive for ‘समसामायिक’

सितम्बर 9, 2011

अंधेर नगरी चौपट राज : मुफ्त मरती जनता

चौंक कर जागे थे चौपट राज

मंत्री!
जाकर देखो
ये महल के बाहर पटाखा चलाने की
हिम्मत किसने की है?

हुज़ूर!
बम विस्फोट हुआ है
आतंकवादी हमला।

मंत्री!
तुम एकदम नाकारा हो
व्यापारी मच्छरमार बत्ती बना सकता है
तुमसे ससुरी आतंककारी मारक
टिकिया भी नहीं बनवाई जाती,
कहाँ थे सुरक्षा के मुहाफिज़?

हुज़ूर!
सफेदपोशों की
मोटी तोंदों की हिफाज़त में लगे है
ताकि कहीं घोटाले न उगल दें।

अच्छा..अच्छा ये तो तुमने ठीक किया,
रेड अलर्ट करा दिया।

जी हुज़ूर!

मीडिया के सामने हमारी वही
आतंकवाद के विरुद्ध
पुरानी लंबी लड़ाई वाली
टेप चलवा दो।

जी हुज़ूर!

चौपट राज फिर सो गए!

अंधेर नगरी के वासी
गूंगे बहरे अंधे
मांस के लोथड़ों में
उन्हें ढूंढ कर थक आये
जो कभी परिजन थे
आदमी की ओलाद थे
पिता भाई पति …
तीन दिन का शोक
चार-पांच लाख रुपये जिंदगी की कीमत के एवज
सारी जिंदगी का दर्द
कुछ एक घरों में सिमट कर रह जाता है।

चौपट राज कायम रहे
सलामत रहें मंत्री, संत्री और कारिंदे
सरकार पर कोई आंच नहीं
मीडिया भी नई सनसनी की तलाश में
निकल चुका है,
जनता को भी संवेदनहीनता मुबारक
लहू की नदी रास्ते में बहते बहते
कई लावारिस अटेचियाँ दिखा रही है
जिन्हें कोई नहीं देख रहा है
भागमभाग में मशीन बना आदमी
फिर बेपरवाह हो गया है
फिर किसी हादसे के इन्तेज़ार में है शहर।

(रफत आलम)

सितम्बर 5, 2011

मास्टर, डॉक्टर और पुलिस - भ्रष्टाचार के तीन स्त्रोत

वह एक पुलिस का सिपाही है
जो तलाश रहा है
एक सभ्य नागरिक
जिसकी ज़ेब से निकलवा सके
वह आखिरी नोट।

और

वह जो बंगला है ना
सामने
मेडिकल कॉलेज के एक
डॉक्टर का है
वहाँ जो भीड़ है
वह पागलों की है
बीमारों की है
मरीजों के साथ साथ उनके परिजन भी
बीमार हो गये हैं।
पागलों का इलाज करते करते
डॉक्टर भी हो गया है पागल पैसे के पीछे।

और

ये महाश्य जो अभी अभी घड़ी देखते
तेजी से घर से निकले हैं
वो रहे…
वो नाक की सीध में बढ़ते हुये
अध्यापक हैं
उन्हे पढ़ानी है ट्यूशन
फेल करते हैं बच्चों को एक एक नम्बर से
हर वीकली टैस्ट में
डर जाते हैं माँ-बाप
डर जाता है पूरा समाज
और पढ़ने लगता है ट्यूशन

ताकि हो सके सभ्य
और हो जाये पागल
दे सके ज़ेब का आखिरी नोट
किसी पुलिसिये को
किसी पागल डॉक्टर को
या फिर मास्टर को।


समाज को ये तीनों ही बचायेंगे…
फिर खायेंगे।


{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 3, 2011

भ्रष्टाचार: कुछ अनबुझे सवाल

एक किसान होकर मैं
पूछता हूँ कि,
बीज बोने से लेकर
फसल काटने तक
किसान, खेत मज़दूर जो
जीतोड़ मेहनत करके
अपनी फसल तैयार करके
मंडी में बेचने ले जाता है
और वहां कौड़ियों के भाव
अपनी फसल बेचने के बाद
खाली हाथ लौटकर
क़र्ज़ के बोझ तले
घुटन भरी जिंदगी जीने को मजबूर
आत्महत्या को विवश होता है,

और

किसान से खरीदी गयी
उसी फसल को
चौगुने दाम बेचने वाले’ दलालों’
और जो खुली बाज़ार व्यवस्था के नाम पर
किसान, मज़दूर के भाग्य से
खुलकर खेलतें हैं
उन मुनाफाखोरों से निबटने का
क्या लोकपाल के पास
कोई उपाय है?

जो किसान, खेत-मजदूर अन्न उगाए
वही पेट भर न खाए
व्यवस्था की इससे बड़ी नाकामी
और कोई है क्या?

यह केवल अन्याय ही नहीं
एक बड़ा अत्याचार भी है
जो रोटी पैदा करे
उसी से रोटी छीन ली जाए
और अन्न
बड़े बड़े ताले लगे गोदामों में
ज्यादा कीमतों के फेर में
भूखे गरीब का पेट भरने के बजाय
सड़, गल कर फैंक दिया जाए
तो ऐसे जमाखोरों से
निबटने के लिए
लोकपाल के पास
है कोई उपाय?

इसलिए
उस शहरी पढे लिखे मध्यम वर्ग
जिसने थाली में पड़ी
गोल रोटी तो देखी है
पर जिसे यह अहसास नहीं कि
इस रोटी के पीछे
किसान खेत मज़दूर की
कितनी पसीने की बूंदे बहीं हैं
भला सोचो वह क्योँ और
कितनी कशिश से
इसके विरुद्ध लड़ाई लड़ सकता है?

सबको रोटी कपड़ा
पैदा करने वाला किसान, खेत मज़दूर
जब तक पेटभर रोटी और
पूरा तन ढकने के लिए कपड़ा
तक भी न जुटा पाएगा
तब तक
भ्रष्टाचार के विरुद्ध
लड़ी जाने वाली कोई भी लड़ाई
इसलिए सफल न होगी

क्योंकि…

अत्याचार और अन्याय
किसी भी किस्म के
भ्रष्टाचार से बढकर होता है!

(अश्विनी रमेश)

अगस्त 29, 2011

कौन रहेगा ईमानदार?


विजय दिवस था कल
एक बूढी लाठी के आगे
नतमस्तक हुए शाह–वजीर
अचरज से देख रहे थे
कबाड़े से निकल आई
गाँधी टोपियों का कमाल
सिर पर रखते ही
हरीशचन्द्र बन रहे थे लोग
जिन्हें लेख का शीर्षक भी पता नही
टीकाकार बन गए थे कौवे
कोयलें चुप थीं।

उस बड़े मैदान में
सुनहरे कल के सपने
प्यासों के आगे
बिसलेरी बोतलों के समान
उछाले जा रहे थे,
परंतु जो सपना उठा लाया
वह रात भर सो न सका
उसे याद आ गया था
माटी बने पुल की नींव से
कमीशन खोद कर निकालना है,
उसने भी माइक पर
ईमान की कसम दोहराई थी
रोज गीता–कुरआन पर
हाथ रख कर,
झूठी गवाहियाँ देने वाला दिल
व्याकुल रहता कब तक?

वह उठा और
माटी के पुल के रास्ते चल पडा
उस समय तक सभी सियार
जश्न का खुमार उतरने के बाद
शेर की खाल ओढ़ रहे थे,
रोज़मर्रा समान
निजी लाकरों और स्विस बैंकों के
दफ्तर भी खुल चुके थे।

(रफत आलम)

अगस्त 28, 2011

समय साक्षी है : हिमांशु जोशी का भविष्योन्मुखी उपन्यास आज के परिपेक्ष्य में


लेखक निस्संदेह समाज के अन्य वर्गों की तुलना में करवट लेते समय को ज्यादा गहराई से समझ पाता है, वह आने वाले समय की आहट, और लोगों से पहले ही सुन लेता है। लेखक, अगर भूतकाल में घटी घटनाओं पर भी कुछ लिखता है तो वह गहराई से उस भूतकाल और उस समय हुये घटित का विश्लेषण करता है। यही पैनी दृष्टि और विश्लेषण क्षमता वह वर्तमान में घटित हो रहे घटनाक्रमों के बारे में भी अपनाता है।

अगर हिमांशु जोशी के राजनीतिक उपन्यास “समय साक्षी है” को देखें तो यह भूत काल का भी लगता है और हो सकता है कि सत्तर के दशक के जय प्रकाश आंदोलन से कुछ प्रेरणा उन्होने ली हो इस उपयास को रचते समय। जिन्होने यह उपन्यास पिछली सदी के अस्सी या नब्बे के दशकों में या नयी सदी के पहले दशक में पढ़ा हो उनके सामने यह उपन्यास ऐसी आदर्शवादी कल्पनायें लेकर आता है जहाँ लगता है कि काश ऐसा हो जाये।

लोकतंत्र में राजनीति से किनारा नहीं किया जा सकता। राजनीति और राजनीतिज्ञों की नैतिकता का स्तर किसी भी देश की समूची नैतिकता से जुड़ा होता है। अगर राजनेता ईमानदार हैं तो ऐसा हो नहीं सकता कि देश में भ्रष्टाचार फैल जाये क्योंकि वे बर्दाश्त ही नहीं करेंगे और भ्रष्टाचार करने वाले कर्मचारियों को और जब प्रशासन में ईमानदारी बसेगी तो बाकी जगह अपने आप ईमानदारी से काम होगा।

आदमी एक एकल ईकाई के रुप में ईमानदार नहीं भी हो तब भी अगर उच्च स्तरीय पदों पर ईमानदार लोग बैठे हैं और उसे पता है कि भ्रष्टाचार करने पर उसके लिये मुसीबत खड़ी हो सकती है तो वह हिम्मत ही नहीं करेगा भ्रष्ट आचरण दिखाने की।

भारत में मौजूदा समय में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में भारत के राजनेताओं के चरित्र में कितनी गिरावट आ गयी है। नैतिकता की बात उनके लिये बेमानी हो चुकी है।

भारतीय राजनीति, चुनावी राजनीति, दलगत राजनीति और राजनैतिक एवम समाज को झझकोरने वाले आंदोलन से सम्बंधित यह अपने तरह का एक अलग ही उपन्यास है। किसी किसी पृष्ठ पर ऐसा लगने लगता है कि भारतीय राजनीति की परतें कितनी गहराई से खुरची गयी हैं और इसकी शारीरिक और मानसिक बनावट का बड़ा गहरा अध्ययन किया गया है।

एक उदाहरण देखें- क्या लिखा गया है

समस्त राष्ट्र का भविष्य जब मात्र मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में समा जाता है तो अनेक जटिल समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। यदि उनके निर्णय दूरदर्शितापूर्ण न हों तो राष्ट्र को उनके दूरगामी प्रभावों के परिणाम झेलने के लिए भी विवश होना पड़ता है। भारत आज जिस संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है, उसका दायित्व इन्हीं राजनीतिज्ञों पर है, जिन्होंने राजनीति में से नीति को तिरोहित कर, जाने या अनजाने, चाहे या अनचाहे समस्त राष्ट्र के अस्तित्व को दाँव पर लगा दिया है। आए दिन चारों ओर जो हिंसा, जो रक्तपात जो विघटनकारी घटनाएँ घटित हो रही हैं, उसके मूल में कहीं ये ही कारण हैं कि मात्र अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उन्होंने किस तरह से समस्त राष्ट्र के हितों की बलि चढ़ा दी है।

हिमांशु जोशी उपन्यास की भूमिका में अपनी पैनी दृष्टि का परिचय देते हैं

राजनीति की भी कोई नीति नहीं होती है। नीति का परित्याग कर जब वह नीति अनीति का मार्ग अपनाने लगती है, तब उसके परिणाम घातक होते है- बड़े भयंकर। भारत के गत कुछ वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है।
आज़ादी के बाद लोगों के मन में नई आशाएं, आकांक्षाएं जागीं। सदियों से शोषित दीन-हीन जनों को लगा-उम्मीदों का नया सूरज उगने वाला है,
यातनाओं की काली रात बीतने वाली है।
वह नया सूरज उगा, परन्तु सबके लिए नहीं।
शायद इसलिए काल-रात्रि अभी भी शेष है।

अभी करोड़ों लोग हैं, जिन्हें एक वक्त का भोजन भरपेट नहीं मिल पाता। करोडों लोग हैं। जिनके पास सिर छुपाने के लिए छत नहीं। दो हाथ हैं, पर उन्हें देने के लिए काम नहीं। तन को ढकने के लिए पूरे वस्त्र नहीं, बीमार होने पर दबा नहीं-मरने पर कफन नहीं।
आज़ादी का सपना किसी सीमा तक साकार हुआ, परन्तु वास्तव में वह आज़ादी मिली कहां, जिसके लिए स्वाधीनता-सेनानियों ने लौह-कपाटों के भीतर नारकीय यातनाग्रहों में अपनी देह को गला दिया था, फांसी के तख्तों पर हंस-हंस कर झूलते हुए जीवन के उषाकाल में ही सन्ध्या का वरण कर लिया था। रोटी-रोटी के लिए मोहताज, भीख मांगते ऐसे बच्चे मैंने स्वयं देखे हैं, जिनके अभिभावक स्वाधीनता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे चुके थे। उन अनाम, अज्ञात शहीदों का क्या कहीं लेखा-जोखा है ? लेखा-जोखा उन्होंने चाहा भी न होगा, परन्तु उनके परिणामों का हिसाब आने वाली पीढ़ियां मागें तो उसे अनुचित भी नहीं कहूँगा।

देश के ‘भाग्य विधाता’ देश-सेवा के नाम पर क्या-क्या करते हैं ? अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किस तरह करोड़ों लोगो के भाग्य के साथ खिलवाड़ करते है ? भ्रष्टाचार्य सदाचार के आवरण में किस तरह प्रस्तुत किया जाता है-उसी ‘आदर्शोन्मुख’ समाज का चित्रण प्रस्तुत उपन्यास में किया गया है।

तिमिर वरन, मेघना, पी० पी० या अन्य पात्र काल्पनिक होते हुए भी काल्पनिक नहीं। भारतीय राजनीति से जो तनिक भी परिचित है, उन्हें पात्र भी सुपरिचित लगेंगे। उन्हें किसी-किसी रूप में आपने भी देखा होगा और आज भी देखते होंगे।
राजधानी में गत 25-26 साल से रहने के कारण राजनीति और राजनीतिज्ञों को तनिक निकट से देखने-परखने का मौका मिला। वे ही अनुभव और अनुभूतियां इसके लेखन में सहायक बनीं। कुछ घटनाएं आपको सत्य के इतने निकट लग सकती हैं कि हो सकता है, आप उन्हें सत्य ही मान लें। परन्तु अन्त में मैं यहीं कहूँगा कि मेरा उद्देश्य किसी की कमियों को, कमजोरियों को, रहस्यों को उजागर करके रस लेना नहीं रहा। हाँ जब इसे लिख रहा था, मेरी आंखों के सामने कोटि-कोटि संघर्षरत दीन-दुखियों का चित्र बार-बार अवश्य उभर आता था।

तथ्यों का उद्घाटन स्वयं में एक समस्या है। शायद इसलिए मैं महीनों तक आग के दरिया की धधकती लहरों से जूझता रहा। उन मित्रों का मैं कम आभारी नहीं जिन्होंने इसके लिए सामग्री जुटाने में हर तरह का जोखिम उठाकर मेरी सहायता की।

अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने से और आमरण अनशन करके अपने प्राणों को ताक पर रखने से उपन्यास समय साक्षी है, के तिमिर बारन की याद ताजा हो उठती है और जिस तरह से देश के युवावर्ग ने इस आंदोलन में शिरकत की है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो समय साक्षी है का अंतिम अध्याय दिल्ली में एक नाटक के रुप में खेला जा रहा हो।

जहाँ तिमिर वरन खुद एक राजनीतिज्ञ हैं और बरसों सत्ता में रहे हैं और अपने ही दल के विरोधियों द्वारा उनके खिलाफ किये जा रहे षडयंत्रों के खिलाफ वे उठ खड़े होते हैं। देश हित में वे सड़क पर उतर आते हैं और युवाओं का आह्वान करते हैं। देश को जगाते हैं और बुरी राजनीतिक ताकतों, जो कि देश के हितों के खिलाफ काम कर रही हैं, के खिलाफ आंदोलन छेड़ देते हैं और उसे एक जनांदोलन के रुप में विकसित कर देते हैं।

समय साक्षी है उपन्यास का अंश पढ़ें-

‘नहीं, नहीं यह नहीं होगा। आइ से न्नो ! दांत पीसते हुए तिमिर वरन गरजे। आँखें अंगारे की तरह धधक रही थीं। चेहरा तमतमा आया था। आवेश में सारा शरीर कांपने-सा लगा था।
मुट्ठी भींचते वह दहाड़ने लगे ‘मेरी प्रतिष्ठा पर आंच आई तो सबकी इज़्जत धूल में मिला दूँगा। देखता हूँ- मुझे मंत्रिमंडल से हटाकर कौन सत्ता में टिका रहता है !’ अन्तिम चेतावनी देते हुए वह उठे फाइल बगल में दबाकर, धोती का पल्लू संभालते हुए फटफट बाहर की ओर चल पड़े।
उन्हें इस तरह उत्तेजित देखते ही धूप में बैठा ड्राइवर घबरा उठा और सिगरेट का टोटा फेंकता हुआ गाड़ी की ओर लपका।
चमचमाती हुई, एक नीली-सी लम्बी कार फर्राटे से गेट की ओर मुड़ी और हवा को चीरती हुई, वारीन्द्र घोष मार्ग पर निकल पड़ी।

बैठक में भाग लेनेवाले संसदीय दल के सभी सदस्य  क्षण-भर के लिए सन्न रह गए। तिमिर वरन का यह विकराल रौद्र रूप सबके मन में एक अजीब-सी दहशत पैदा कर गया था। एक भयावनी आशंका की कहीं दल विघटन फिर न हो जाए! इस बार दल के विघटन का अर्थ था। घोर अराजकता, सैनिक-शासन या पूर्ण तानाशाही !
पर देश इसमें से किसी भी स्थिति के लिए तैयार न था।
तिमिर वरन के पीछे पन्द्रह बीस और सदस्य उठ खड़े हुए। एक-एक कार में पाँच छह-छह जन लदकर  उसी दिशा में बढ़े जिधर से तिमिर वरन की विदेश से आयात की गई, कीमती गाड़ी अभी-अभी गुज़री थी।

सत्तर वर्ष के तिमिर वरन आज न जाने किस तरह एक ही छलांग में तीन-तीन चार-चार सीढ़ियाँ पार कर गए थे। और दिन थोड़ा-सा पैदल चलने में उनका दम फूलने लगता था। वह बुरी तरह हांफने लगते थे। आवेश के कारण, आज उन्हें कुछ भी सूझ न रहा था।
तीर की तरह वह सीधे बैठक में गए। सचिव बर्मन पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया। सोफे पर फाइल पलटकर वह धम्म से कुर्सी पर बैठ गए।
‘यस्सर’ की भंगिमाव बनाए बर्मन हाथ में स्लिप वाली सफेद नोट-बुक उठाए, सिर झुकाए सामने खड़ा था।
‘जिन संसद-सदस्यों की सूची तुम्हें कल दी थी, उन्हें गाड़ियां भेजकर बुलाओ। अबरार से कहो कि एक नया  ड्राफ्ट तैयार करें फौरन।’

बर्मन चला गया तो उन्होंने एक लम्बी सांस ली। पाँवों को दूर तक पसारा और टोपी उतारकर मेज़ पर रख दी। देर तक उनका हाथ यों ही टोपी के ऊपर रखा रहा। फिर उनके गंजे सिर पर पहुँच गया, आँखें मूंदकर वह कुछ सोचने लगे।
अब भी उनका चेहरा तमतमा रहा था। अब तक उनका दम फूल रहा था। कभी इस तरह अपमानित किया जाएगा-उन्होंने सपने में भी न सोचा था।
अभी सुबह के नौ भी न बजे थे-चारों ओर घिरा धुंध-सी फैली थी। नमदे की तरह मोटे-मोटे घने काले बादलों से आसमान घिरा था। सर्दी के कारण बाहर निकलना कठिन था। फिर भी सड़कों पर भीड़ कम न थी। साइकलों और कारों की सचिवालय की ओर कतार-सी चली जा रही थी।

तिमिर वरन देर तक उसी मुद्रा में बैठे रहे। उनके विरुद्ध षडयंत्र का जाल निरंतर बुना जा रहा है, उन्हें इसका अहसास था। वह जानते थे, दल के लोग सरकार की नीतियों के कारण बहुत-से छोटे-छोटे गुटों में बट रहे हैं। दूसरी पार्टियों से भी बहुत-से लोग आ गए थे। जिनका एक अलग समुदाय बन रहा था। वे सत्ता को हथियाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे। तिमिर वरन के लिए यह सबसे बड़ा खतरा था। इस चुनौती का सामना करने के लिए उन्होंने भी कम चाले न चली थीं। अपनी तरफ से कहीं कोई कसर न रखी थी। किन्तु अब पासा पलट रहा था। धीरे-धीरे तिमिर वरन को शक्तिहीन करने की सुनियोजित योजना चल रही थी। उप-चुनावों में उनके ही दल के लोंगों ने, उनके समर्थक उम्मीदवारों को हराने के लिए विपक्ष के उम्मीदवारों का छिप-छिपकर समर्थन किया था। इस अभियान में उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली थी।

किन्तु तिमिर वरन भी कोई कच्चे खिलाड़ी न थे। विपक्ष के बहुत-से नेताओं से उनके आत्मीयता के गहरे सम्बन्ध थे। उन्होंने अपने ही दल के कम सदस्य-उम्मीदवारों की ज़मानते ज़ब्द नहीं करवाई थीं। बहुत-से लोग उनका आशीर्वीद प्राप्त कर संसद तक पहुँचने में सफल हुए थे। विपक्ष की बेचों पर  बैठने के बावजूद उन पर अगाध श्रद्धा रखते थे।
उनका व्यक्तित्व बर्फ से ढके ज्वालामुखी जैसा था। बाहर से जितने सौम्य-सन्त लगते थे, भीतर से उतने  ही रीति-नीति के धनी कूटनीतिज्ञ। खादी के साधारण-से कपड़े पावों में बेडोल की चप्पलें और सिर पर हिम श्रृंग की तरह जगमगाती शुभ्र स्वच्छ टोपी !  जब वह समाजवाद या गरीबी से दूर करने के नारे लगाते थे, तब लगता था, वाकई कोई भुक्त भोगी किसान अपने ही दुख-दर्द की बातें कर रहा है !

किसान-परिवार में अपने पैदा होने का उन्हें गर्व था।  मौंके-बेमौके इस तथ्य का उद्घाटन भी भूलते न थे। सोफे से धीरे से उठकर वह कमरे में ही चहलकदमी करने लगे। कमरे में किसी के भी प्रवेश की उन्होंने मनाही कर दी थी।
नई व्यूह-रचना के विषय में वह गम्भीरता से सोचने लगे। उन्हें-इस बार की पराजय का अर्थ है, राजनीति से पूर्ण संन्यास ! यानी कि उनकी राजनीतिक हत्या !

राजनीति से हटने से उन्हें एतराज न था। उम्र भी काफी हो गई थी। दस्तखत करते हुए हाथ कांपते थे। देर तक मीटिंग में बैठना भी कठिन लग रहा था। उस पर दिन रात टूर प्रोग्राम ! जन भाषाओं में भाषण तथा नित उठ खड़ी होने वाली नई-नई उलझने ! पर देश सेवा और जनहित के नाम पर वह वर्षों से इन यंत्रणाओं को सहते आ रहे थे। उनकी अन्तिम आकांक्षा थी कि कभी ऐसा संयोग हो और जनता  उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित कर, अपने पर  किए गए उनके उपकारों का बदला चुकाए तो संभवता वह इस गरीब देश की कुछ सेवा कर सकेंगे।

आज के परिपेक्ष्य में हिमांशु जोशी का उपन्यास- समय साक्षी है, बेहद प्रासंगिक हो उठा है और एक अच्छी कृति की पहचान यही है कि वह समय समय पर जीवित होता रहता है और भिन्न काल की पीढ़ियों को अपने से जोड़ता रहता है।

…[राकेश]

अगस्त 17, 2011

मुनादी…(धर्मवीर भारती)

सत्तर के दशक में डा. धर्मवीर भारती द्वारा लिखी कविता “मुनादी” उस समय की घटनाओं से प्रेरित थी पर किसी भी दौर में जब जब सत्ता निरंकुशता की ओर बढ़ेगी और जनता से कोई आगे आकर सत्ता की असंवेदनशीलता के खिलाफ आवाज उठायेगा तब-तब “मुनादी“-कविता, प्रासंगिक हो जायेगी। आज के हालात में भी “मुनादी” सटीक बैठती है। बार-बार “मुनादी” का सतह पर आना इसके कालजयी रचना होने का प्रमाण है।

खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का
हर खासो-आम को आगह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुंडी चढा़कर बन्द कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है

शहर का हर बशर वाकिफ है
कि पच्चीस साल से मुजिर है यह
कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाए
कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाए
कि मार खाते भले आदमी को
और असमत लुटती औरत को
और भूख से पेट दबाये ढाँचे को
और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को
बचाने की बेअदबी की जाये

जीप अगर बाश्शा की है तो
उसे बच्चे के पेट पर से गुजरने का हक क्यों नहीं ?
आखिर सड़क भी तो बाश्शा ने बनवायी है !
बुड्ढे के पीछे दौड़ पड़ने वाले
अहसान फरामोशों ! क्या तुम भूल गये कि बाश्शा ने
एक खूबसूरत माहौल दिया है जहाँ
भूख से ही सही, दिन में तुम्हें तारे नजर आते हैं
और फुटपाथों पर फरिश्तों के पंख रात भर
तुम पर छाँह किये रहते हैं
और हूरें हर लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ी
मोटर वालों की ओर लपकती हैं
कि जन्नत तारी हो गयी है जमीं पर;
तुम्हें इस बुड्ढे के पीछे दौड़कर
भला और क्या हासिल होने वाला है ?

आखिर क्या दुश्मनी है तुम्हारी उन लोगों से
जो भलेमानुसों की तरह अपनी कुरसी पर चुपचाप
बैठे-बैठे मुल्क की भलाई के लिए
रात-रात जागते हैं;
और गाँव की नाली की मरम्मत के लिए
मास्को, न्यूयार्क, टोकियो, लन्दन की खाक
छानते फकीरों की तरह भटकते रहते हैं…
तोड़ दिये जाएँगे पैर
और फोड़ दी जाएँगी आँखें
अगर तुमने अपने पाँव चल कर
महल-सरा की चहारदीवारी फलाँग कर
अन्दर झाँकने की कोशिश की

क्या तुमने नहीं देखी वह लाठी
जिससे हमारे एक कद्दावर जवान ने इस निहत्थे
काँपते बुड्ढे को ढेर कर दिया ?
वह लाठी हमने समय मंजूषा के साथ
गहराइयों में गाड़ दी है
कि आने वाली नस्लें उसे देखें और
हमारी जवाँमर्दी की दाद दें

अब पूछो कहाँ है वह सच जो
इस बुड्ढे ने सड़कों पर बकना शुरू किया था ?
हमने अपने रेडियो के स्वर ऊँचे करा दिये हैं
और कहा है कि जोर-जोर से फिल्मी गीत बजायें
ताकि थिरकती धुनों की दिलकश बलन्दी में
इस बुड्ढे की बकवास दब जाए

नासमझ बच्चों ने पटक दिये पोथियाँ और बस्ते
फेंक दी है खड़िया और स्लेट
इस नामाकूल जादूगर के पीछे चूहों की तरह
फदर-फदर भागते चले आ रहे हैं
और जिसका बच्चा परसों मारा गया
वह औरत आँचल परचम की तरह लहराती हुई
सड़क पर निकल आयी है।

ख़बरदार यह सारा मुल्क तुम्हारा है
पर जहाँ हो वहीं रहो
यह बगावत नहीं बर्दाश्त की जाएगी कि
तुम फासले तय करो और
मंजिल तक पहुँचो

इस बार रेलों के चक्के हम खुद जाम कर देंगे
नावें मँझधार में रोक दी जाएँगी
बैलगाड़ियाँ सड़क-किनारे नीमतले खड़ी कर दी जाएँगी
ट्रकों को नुक्कड़ से लौटा दिया जाएगा
सब अपनी-अपनी जगह ठप
क्योंकि याद रखो कि मुल्क को आगे बढ़ना है
और उसके लिए जरूरी है कि जो जहाँ है
वहीं ठप कर दिया जाए

बेताब मत हो
तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है
बाश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से
तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए
बाश्शा के खास हुक्म से
उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा
दर्शन करो !
वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी
बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी
ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा
नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा
और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा
लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में
और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो
ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से
बहा, वह पुँछ जाए

बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं

अगस्त 17, 2011

हम खुद ही न मार डालें कहीं अन्ना को!


आजकल हालात के चलते
कई बार सोचने पर मजबूर हूँ
उस सच के बारे में
जिसे सब जानते है
पर बोलने को कोई तैयार नहीं-
यह कि सारे कुएँ में भ्रष्टाचार की भाँग पड़ी है।

मैं दस गुना फीस देकर
डाक्टर से इलाज करा रहा हूँ
उस पर तुर्रा यह
भगवान तुल्य वह बेशर्म डाक्टर
आपरेशन के अलग से मांगता है।

हम में कोई भी कम कहाँ है मित्रों!

बच्चों की आला स्कूल में भरती से लेकर
रेल टिकट तक के लिए
सब खुशी खुशी ऊपर से देते हैं
काले धन बल के बदले
मेघावी उम्मीदवारों को पीछे धकेल
अपनी कर्महीन संतानों के लिए
नौकरियाँ हथियाँ रहे हैं।

सारे कुएँ में भ्रष्टाचार की भांग पड़ी है।

इस बेईमान माहौल में
ये जो बूढा फकीर अन्ना बाबा
ईमान की भीख मांगता फिर रहा है
करनी के हम सब चोर
कथनी से उसे प्रोत्साहित करने वाले
शायद बेचारे को टूटा दिल मार देंगे।

कहो कौन है
अपने काले धन से अटे लॉकर खोलने वाला
बताओ कौन है
जो आगे आकर कहे
बाबा मुझसे पाप हुआ
देश के नाम लो ये
स्विस बैंक की चाबी।

सच तो यह है मित्रों!
सरापा बेईमान हो चुकी इस बस्ती में
ईमान की बात ही फ़िज़ूल है
फिर भी यदि अब भी कहीं
विवेक की चिंगारियाँ बाकी हैं
दुआ करो वे आग बने
काले धन के सर्वव्यापी इस कीचड़ में
ईमान के कंवल खिलें
हो सदा के लिए भ्रष्टाचार के तम का नाश
उजाला हो दिलो में, दिमागों में देश हित का
दुआ करो !प्रकाशित विकास मार्ग पर
कदम मिला कर सब चलें।

(रफत आलम)

अगस्त 15, 2011

तिरंगा: कहाँ हैं इसे ऊँचा रखने वाले?

हम कब जानते हैं
स्वतत्रता दिवस का अर्थ?

हाथ रिक्शे–ठेले खेंचते
फावड़े-कुदाल चलाते
पसीने में नहाये जिस्मों के लिए
भीख के लिए फैले हाथों के लिए
मजदूर-किसानों के लिए
चंद एक रुपयों का मिलना
सर्वोपरी और महत्वपूर्ण है।

सदियों से मुफलिसी के गुलामों को
आज़ादी के दिन का क्या पता?

बाकी बचे छात्र–बाबू–नौकरीपेशा-व्यापारी
उनके लिए यह पावन दिन
औकात के मुताबिक
फार्म हाउसों से चाय की थडी तक
मौज मस्ती मनाने के लिए
सरकारी छुट्टी के सिवा कुछ नहीं।

किसे याद हैं
कौन याद दिलाता है.
गोलियाँ, लाठियां, काला पानी और जलियाँवाला
भगत सिंह, बोस, अशफाक….
अनगिनत थे आज़ादी के परवाने।

बेचारे अमिताभ-सलमान से हार गए
हमने राष्ट्रपिता उस नंगे फकीर
बापू का
आज़ादी के बदले शुक्रिया गोली से दिया
अब हम उसके ऐनक चुराते फिर रहे हैं।

हम ज़मीर फरोशों के
चहरों पर मुंह नहीं मुखौटे हैं
फिर शर्म किसे आयेगी
तिरंगा ही तो फहराना है
ऐसे नहीं तो वैसे
जैसे-तैसे फहरा ही देंगे।

(रफत आलम)

जुलाई 14, 2011

लहूलुहान हैं फिर मुम्बई, देश और इंसानियत

मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है
परन्तु
प्लेट-ग्लास-बर्तन तोड़ने के सिवा
क्या कर सकता हूँ?

मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है
उस बेईमान-लचर और नपुंसक व्यवस्था पर
जिसे
हमारे क्षत-विक्षत अंगों में धँसे
बोल्ट और छर्रे नज़र नहीं आते
ना सुने जाते है
कायर बमों के धमाके
हर बार दुश्मन को अंतिम चेतावनी देकर
मंत्री- कारिंदे– चाटूकार सब
घोटालों की नींद में सो जाते हैं।

मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है
क्यों नहीं मुझे लावारिस
थैले-पैकेट नज़र नहीं आते
सुरक्षा के मुहाफिज़ तो
ए.के-47 की जगह
लाठियां हाथों में लिए
चरस–स्मैक और दारु के ठिकानों से
हफ्ता वसूली में लगे हैं
या मोटी तोंदों वाले सफेदपोशों की
हिफाज़त कर रहे हैं।

मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है
पर क्या करूँ?
…क्या करूँ?
सर झुकाने के सिवा…!
………….

लहूलुहान फिर शहर है क्या किया जाए
खोट अपने ही भीतर है क्या किया जाए
बस हम ही नहीं हैं खुद निगेहबान अपने
अदू की हम पे नज़र है क्या किया जाए

अदू ==दुश्मन

(रफत आलम)

जून 22, 2011

बतकही : जाम

बतकही : आरम्भ ,
सोनिया गाँधी और संघ परिवार ,
और उदारीकरण और भारत
से आगे :-

…9 जनवरी, 2005…

विजय और हरि भी बोले,” सुनील जी बधाई”।

सुनील बैठते हुये बोले,” हमें भी रात ही पता चला बेटे के फोन से। मिठाई आप लोगों के घर पहुँच गयी होगी अभी छोटे बेटे को बोलकर ही चला था कि आप सबके यहाँ मिठाई देकर आये। आप लोग मेरे साथ चलोगे ही घर पर वहीं चाय मिठाई हो जायेगी।”

अजी ये सब तो होता रहेगा। बड़े दिनों बाद ढ़ंग की धूप निकली है जरा आनन्द तो उठा लें धूप का। हरीश जी बोले।

हाँ ये भी ठीक है। यहाँ धूप में गपशप कर लें। लौटते समय हमारे यहाँ से होकर निकल लेना। सुनील बोले।

आप तो कुछ समय पहले बता भी रहे थे कि बेटे का प्रमोशन ड्रयू है। विजय बाबू ने कहा।

हाँ होना तो पिछले साल फरवरी में ही था पर कोई कमीशन बैठा था उसकी रिपोर्ट आने के बाद ही इस जनवरी में आदेश हो पाये।

चलिये अब तो हो गया प्रमोशन। उसने तो वेलिंग्टन कालेज वाला कोर्स भी कर रखा है। अब तो काफी आगे तक जायेगा।

देखिये विजय बाबू जाना तो चाहिये ऊपर तक। बाकी सब तो किस्मत है। सुनील ठण्डी साँस छोड़कर बोले।

अजी सही उम्र में सब कुछ हो रहा है जायेगा कैसे नहीं अपनी निर्धारित प्रगति तक? पर आप ये तो बताओ कहाँ रह गये थे आप हम लोग तो कब से आपकी राह देख रहे हैं। रहा है जैसे पूरा बाजार ही घर ले आये हो। अशोक ने कहा।

गया था मिठाई लेने। एक दो काम और भी थे घंटाघर की तरफ। सोचा पहले वहीं के काम निबटाता चलूँ। वहाँ से काम करके वापिस आने ही लगा था कि पाया कि छात्रों का जलूस निकल रहा है विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के चुनावों के ​सिलसिले में। ऐसा जाम लगा कि एक घंटे से ज्यादा वहीं फंसे रहे न आगे जा सके न पीछे। सुनील रोष से बोले।

एक तो शहर की सड़कें ही इतनी चौड़ी हैं कि मुश्किल से एक ही गाड़ी निकल पाती है और ऊपर से बाजार में इतनी भीड़ हो गयी है कि अब तो ट्रैफिक के कारण डर और लगता है बाजार जाने में। ये भीड़ भड़क्का कहीं आने जाने लायक छोड़गा ही नहीं इस शहर को। वहीं पैदल, साइकिल, रिक्शा चल रहे हैं वहीं घोड़ा ताँगा और वहीं स्कूटर, मोटरसायकिल, कार, बसे और ट्रक चल रहे हैं। बस एक रेल की कमी रह गयी है। और मंडी की तरफ तो बहुत ही बुरा हाल है। हम तो चला नहीं पाते बाजार में कोई भी वाहन। एक जगह खड़ा करके पैदल ही काम निबटाते हैं। विजय बाबू शिकायती लहजे में बोले।

अजी इतने ट्रैफिक में भी इन लड़कों को देखो कैसे सायं सायं करते हुये आड़े तिरछे चलाते हैं मोटरसायकिल। और मोटरसायकिल तो हो गया है पुराना शब्द। अब तो सीधे बाइक बोला जाता हैं। एक भी हेलमेट नहीं लगाता और रोज एक्सीडैन्ट होते हैं इनके और या तो ये बाइक वाले खुद चोट खाते हैं या दूसरों को चोट देते हैं। अशोक ने कहा।

अशोक बाबू कहीं न कहीं घर के लोग भी जिम्मेदार हैं। बारह चौदह साल के लड़कों को बाइक दे देते हैं और लड़कियाँ ही कौन सा कम हैं जब से सेल्फ स्टार्ट वाले दुपहिया वाहन आ गये हैं लड़कियाँ भी दौड़ी घूम रही हैं। लाइसेंस लेने की उम्र हुयी या न हुयी हो बस बाइक लेकर निकल पड़ते हैं शहर में। सुनील बोले।

सुनील जी बच्चे भी क्या करें। स्कूल कालेज से छुटकर कोई कोचिंग करने जा रहा है कोई कुछ अन्य रूचि की चीज सीखने जा रहा है। समय बदल गया है और लोगों की जरूरतें भी पर शहर की सुविधायें वहीं की वहीं हैं जहाँ बीस तीस साल पहले थीं। सड़कें तो उतनी ही चौड़ी हैं और संख्या में गाडि़याँ बढ गयी हैं बेतहाशा जाम न लगे तो क्या हो। विजय ने कहा।

हरि बोले,” जाम लगने की अच्छी बात कही। परसों का सुनो। पिछले हफ्ते नातिन आयी हुयी थी नये साल की छुट्टियाँ मनाने पर यहाँ आकर उसे लग गयी ठंड। तो मैं उसे छोड़ने रूड़की चला गया। रात में सोचा कि जब रूड़की तक आ गया हूँ तो अगले दिन सुबह जल्दी हरिद्वार जाकर वहीं से वापसी की बस ले लूँगा। बस सुबह हरिद्वार पहुँच गया और गंगा जी के दर्शन करके बारह बजे की बस ले ली सोचा था पाँच नहीं तो छह घंटे में घर पहुँच ही जाऊँगा। रूड़की तक पहुँचते-पहुँचते आँख भी लग गयी। नींद खुली तो पाया कि बस रूकी हुयी थी। दूर दूर तक गाडि़याँ ही गाडि़याँ दिखायी दे रही थीं। बड़ा तगड़ा जाम लग रहा था। बस में चाट और मूंगफली बेचने वाले लड़के चढ़े तो मैने पूछा कि माजरा क्या है और कहाँ रूके हुये हैं। उसने बताया कि पुरकाजी से करीब आधा किमी पहले बस खड़ी है और पहले आगे ​सिखों का कोई जलूस निकल रहा था और जिसके कारण पुरकाजी के दोनों ओर जाम लग गया जो अब इतनी खराब ​स्थिति में पहुँच चुका है कि जल्दी खुलने वाला है नही। बस से नीचे उतरे तो देखा बसें, ट्रक, ट्रैक्टर अपनी लम्बी ट्रालियों सहित, कारें,  और भैंसा-बुग्गी, आदि सब कुछ आपस में गडमड होकर फंसे हुये थे। दर्जनों ट्रक तो गन्ने से लदे दिखायी दे रहे थे। दो तीन सेना के ट्रक भी दिखायी दे रहे थे।

थोड़ा रूककर हरि बोले,” दिखायी तो दे ही रहा था कि जाम जल्दी खुलने वाला है नहीं पर दिल को कैसे राहत हो। हर आदमी को जल्दी होती है। नीचे खड़े लोगों में से कुछ जलूस को कोस रहे थे कि इसे भी आज ही निकलना था। जलूस वाले तो अपना काम कर गये पर इस जाम में फंसे लोगों के कामों का क्या होगा।

अशोक बोले,” जब से डा. मनमोहन ​सिंह पी.एम बने हैं तबसे सिखों में जोश भी बहुत ज्यादा आ गया है। रोज़ ही इनके जलूस निकल रहे हैं”।

हरि हँस कर बोले,” अजी और क्या अब तो पहली बार सेना प्रमुख भी एक ​सिख बने हैं। जोश तो आना ही चाहिये। सही मायने में नारा सही हो गया है कि राज करेगा खालसा। पर अभी कुछ साल पहले ही तो खालसा के तीन सौ साल पूरे होने के जश्न मनाये गये थे। अब कौन सा अवसर आ गया इतना बड़ा जलूस निकालने का। और वह भी पुरकाजी जैसी छोटी जगह में?”

अब सरकार को गम्भीरता से सोचना चाहिये इन धार्मिक और राजनीतिक जलूसों के बारे में कोई नीति बनाने के बारे में। रोज ही कोई न कोई जलूस निकल रहा है और जनता परेशान होती रहती है। हर सम्प्रदाय और राजनीतिक दल को इस जलूस निकालने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहिये। विजय ने कहा।

सुनील भी सहमति में बोले,” हाँ जी कोई जनहित याचिका होनी चाहिये इस पर भी। सुप्रीम कोर्ट आदेश देगा तब ही कुछ हो पायेगा। कोई भी सरकार अपने आप कुछ करने वाली है नहीं ऐसे मामले में सबको सबके वोट चाहियें। फिर यहाँ तो ये हाल है कि दूसरे सम्प्रदाय और दूसरे दल के जलूस आदि खराब हैं और हमारे तो मतलब से ही निकलते हैं।”

हरि ने कहा,” अजी आप आगे तो सुनो जाम की बात। हमारी बस के एक यात्री ने अपने मोबाइल से किसी को फोन किया तो पता चला कि वे महाशय भी इसी जाम में फंसे हुये हैं जबकि वे हमारी बस से दो घंटे पहले वाली बस से चल पड़े थे। मतलब दो घंटे पहले से तो जाम लगा ही हुआ था। हमारी बस करीब दो बजे जाम में आकर रूकी थी और करीब चार बजे जाम खुलने पर खिसकी। रात़े साढ़े आठ बजे घर पहुँचे। रास्ते में कहीं मौका नहीं लगा कि घर पर फोन करके बता दें। बस वाला फिर कहीं रूका ही नहीं सवारियों को उतारने के अलावा।”

हाँ जी चिन्ता तो हो ही जाती है घर पर। मोबाइल का बड़ा फायदा है ऐसे समय। कहीं भी फंसे हों ऐसी ​स्थिति में कम से कम घर पर फोन से बता तो सकते हैं। अशोक ने कहा।

उस दिन तो हमें भी मोबाइल के फायदे नजर आये। पर सबसे खराब लगा एक एम्बूलैंस को देखकर। जब जाम खुला तो थोड़ा सा चलने के बाद ही हमारी बस को क्रॉस किया एम्बूलैंस ने। कहीं पास में दुघर्टना हुयी होगी और घायल लोग भी कब से जाम में फंसे पड़ होंगें। एम्बूलैंस लगभग जाम के बीच में फंसी हुयी थी। ना तो रूड़की की तरफ जा सकते थे और ना ही वापस मुजफ्फरनगर की ओर। छोटे बच्चों का अलग बुरा हाल था। हरि बोले।

जलूस निकालने वालों या जाम लगाने वालों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि उनके काम का दूसरे लोगों पर क्या फर्क पड़ रहा हैं। ये लोग तो अपनी ही धुन की ऊर्जा से भरे हुये होते हैं इन्हे कुछ दिखायी नहीं देता अपनी जरूरत के ​सिवा। विजय ने कहा।

सुनील बोले,” सड़क जाम करना तो सबसे आसान काम है अपने देश में। इलाके का ट्रांसफारमर फूक गया है तो सड़क जाम कर दो। सरकार की किसी बात से नाराजगी है तो सड़क जाम कर दो। ये सरकार को संदेश पहुँचाने का एक आसान तरीका लगता है लोगों को। जाम वाले ये नहीं सोचते कि सड़क पर चल कौन रहा है किसे अपने काम पर जाने की जल्दी है? उनके जैसे ही जनता के आम लोग। इन मंत्रियों और बड़े अधिकारियों का क्या फर्क पड़ता है ऐसे जामों से। भुगतना तो आम आदमी को ही पड़ता है”।

एक और बात भी तो है किस तरह सरकार तक अपनी आवाज पहुँचायी जाये। खैर छोड़ो इस बात को। तो सुनील जी जी शहर में आज छात्रों का चुनाव प्रचार चल रहा है। अशोक ने पूछा।

हाँ कारों की छतों पर बैठकर छात्र छात्रायें चुनाव प्रचार कर रहे थे। इतनी कारें, स्कूटर, मोटरसायकिलें थीं उन लोगों के काफिले में कि अचरज होता है सोचकर कि ये कालेजों के छात्रसंघ के चुनाव के लिये प्रचार हो रहा है। ऐसा लगता था जैसे एम.एल.ए या सभासद के चुनाव के चुनाव के लिये निकले हों।

अरे छात्रसंघों के चुनावों से लाभ क्या होना है इन कालेजों और विश्वविद्यालयों का। चारों तरफ दीवारें पोस्टरों से पाट देते हैं। चुनाव तो ये लोग ऐसे अन्दाज़ में लड़ते हैं जैसे विधायकी या सांसदी का चुनाव लड़ रहे हों। ऊपर से चुनाव में होने वाले इन इन लोगों के झगड़े। हरि बोले।

विजय बोले,”चुनाव की जरूरत क्या है और चुनाव हो भी तो प्रत्याशियों के लिये पढ़ाई में मेरिट सबसे बड़ा क्राइटेरिया होना चाहिये। अभी तो ये हाल हो गया है कि चुनाव वे छात्र लड़ते हैं जिनका पढ़ने लिखने से कोई मतलब नहीं रह गया है। राजनीति तो कालेज स्तर से ही खराब हो जाती है। वहीं से युवा लोग गुंडों के सामने नत-मस्तक होना सीख जाते हैं क्योंकि जहाँ बहुमत शिक्षा प्राप्त करके अपना जीवन संवारने के लिये वहाँ जाता है वहीं राजनीतिक महत्वाकांक्षा लिये हुये गुंडे टाइप युवा सिर्फ राजनीति चमकाने कालेजों में पड़े रहते हैं और अच्छे विधार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं”।

…जारी…

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