Archive for ‘संगीत’

अगस्त 30, 2011

चाँद-रात

चाँद-रात को समर्पित गीत मिलना एक मुश्किल काम है।

सन 1947 में बनी फिल्म – मेंहदी, जिसमें नरगिस, बेगम पारा और करन दीवान ने मुख्य भूमिकायें निभाई थीं और संगीत दिया था गुलाम हैदर  ने, उस फिल्म में एक गीत मिलता है जो चाँद-रात की खुशियों का बड़ा ही सजीव प्रस्तुतीकरण करता है।
फिल्म मेंहदी का वह मधुर गीत खुद ही सुनकर आनंद उठायें।

मई 7, 2011

गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर: निष्फल कोई पूजा न होगी

आज भारत के गौरव गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर, जो मानवतावादी, प्रकृतिविद, कवि, चित्रकार, संगीतकार, लेखक, शिक्षाविद, और भारतीय संस्कृति एवम कला के ध्वजवाहक रहे हैं, की 150 वीं जयंती का शुभ अवसर है।

वे देशों की सीमाओं को पार कर गये हैं और पिछले सौ सालों से भी ज्यादा समय से दुनिया उनकी योग्यता से लाभान्वित होती आ रही है।

गुरुदेव ने कालजयी काव्य की रचना की है। एक से बढ़कर एक उनकी कवितायें हैं और बहुत सारी कविताओं को पढ़कर ऐसा लगता है कि इससे बेहतर और क्या हो सकता है पर उनकी अपनी ही रचना आकर इस धारणा को तोड़ देती है और पाठक/मानव मुग्ध होकर रबिन्द्र साहित्य में आगे की ओर बढ़ जाता है।

उनकी एक कविता है जिसके बारे में बिना किसी संकोच के साथ कहा जा सकता है कि दुनिया का कोई भी कवि इस भाव से ऊपर नहीं जा सकता जो गुरुदेव टैगोर ने अपनी कविता में रच दिया है। इससे बेहतर कवितायें रची जा सकती हैं, रची गयी हैं और खुद गुरुदेव ने ही रची हैं, इससे ज्यादा लय वाली कवितायें भी रची गयी हैं, पर इस कविता के भाव का मुकाबला कहीं नहीं मिलता। यह अनंत काल तक शाश्वत रहने वाली कविता है। कालजयी आशा के सहारे की इससे बेहतर अभिव्यक्त्ति ईश्वर कर सके तो कर दे वरना मानव के लिये तो यह संभव नहीं दिखायी देता।

जो पूजायें अधूरी रहीं
वे व्यर्थ न गयीं
जो फूल खिलने से पहले मुर्झा गये
और नदियां रेगिस्तानों में खो गयीं
वे भी नष्ट नहीं हुयीं
जो कुछ रह गया पीछे जीवन में
जानता हूँ
निष्फल न होगा
जो मैं गा न सका
बजा न सका
हे प्रकृत्ति!
वह तुम्हारे साज पर बजता रहेगा।

उपरोक्त्त कविता को रचते समय मानो प्रकृत्ति स्वयं अपना सच टैगोर के माध्यम से धरती पर बिखेर रही थी। इस कविता की रचना करने वाला कवि असाधारण प्रतिभा का मालिक ही हो सकता है। इसे रचने वाला केवल कवि न होकर अध्यात्म के रास्ते पर चलने वाला ऋषि ही हो सकता है।

भारत को जो राष्ट्रगान गुरुदेव टैगोर ने दिया है वह चाहे कहीं भी बज जाये, चाहे वह स्कूल और शिक्षण संस्थाओं के प्रांगण हों या भारतीयों का अन्यत्र होने वाला जमावड़ा, यह हमेशा ही भारतीयों के रोम रोम को भारतीयता के भाव से भर देता है।

भारत की स्वर कोकिलायें लता मंगेशकर और आशा भोसले ने इसे गाया है

और हाल के सालों में ए.आर. रहमान के संगीत निर्देशन में भारतीय संगीत की जानी मानी विभूतियों ने इसकी संगीतमयी प्रस्तुती में अपना योगदान दिया है।

भारत का बच्चा बच्चा तो इसे गाता ही है।

गुरुदेव टैगोर का सृजन करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करता आ रहा है और भविष्य में भी करता रहेगा। उन्होने अपनी सृजनात्मक क्षमता से भारत में कला की विरासत को समृद्ध करने में और अपनी वैश्विक दृष्टि के बलबूते देश की उदार परम्परा को सहेजे रखने में  उल्लेखनीय योगदान दिया है।

भारत भूमि धन्य रही है गुरुदेव टैगोर के यहाँ जन्म लेने से।

ऐसी विलक्षण मेधा को शत शत नमन।

…[राकेश]

जुलाई 2, 2010

Waka Waka : धुरंधर और भी हैं शकीरा के अलावा

आप नहीं मानते?

हाथ कँगन को आरसी क्या!

स्वयं आनंद लें और यह जानने में क्या मजा कि कितना वीडियो सच्चा है और कितना इस पर काम हुआ है।

आनंद तो इन महाश्य के कारनामे देखने में ही है जो शकीरा को तगड़ी चुनौती देने की तैयारी में हैं।

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