कविताऐं महज भावनाऐं नहीं हैं, वे अनुभव हैं।
एक कविता सीखने की खातिर तुम्हे शहरों, लोगों और चीजों को देखना होता है।
तुम्हे समझना होता है, महसूस करना पड़ता है कि पक्षी कैसे उड़ते हैं,
और इन इशारों को जानना होता है जो नन्हे फूल सुबह उठते ही दर्शाते हैं।
कला “पाब्लो पिकासो” की दृष्टि में
हर कोई कला को समझना चाहता है। चिड़िया के गाये गीत को समझने की चेष्टा क्यों नहीं करते? पेंटिंग के मामले में लोगों को समझना होता है... पर क्यों?
वे लोग जो चित्रों की व्याख्या करना चाहते हैं सरासर गलती पर होते हैं।
सन 1947 में बनी फिल्म – मेंहदी, जिसमें नरगिस, बेगम पारा और करन दीवान ने मुख्य भूमिकायें निभाई थीं और संगीत दिया था गुलाम हैदर ने, उस फिल्म में एक गीत मिलता है जो चाँद-रात की खुशियों का बड़ा ही सजीव प्रस्तुतीकरण करता है।
फिल्म मेंहदी का वह मधुर गीत खुद ही सुनकर आनंद उठायें।
गंगा-जमनी संस्कृति कभी जनमानस में कविता, दर्शन और गायकी द्वारा रंग, उमंग और उलासमयी जीवन भरा करती थी। अनेकता में एकता की यह पारद बूँद बंटवारे की राजनीति के चलते बिखरती–बिखरती समाप्त सी होकर अब काव्यगोष्ठियों और समिनारों में सिमट गयी है। गुज़रे गए सुनहरे वक्त के आकाश पर सूफियत और प्रेम के जगमग सितारों में से एक हज़रत नजीर अकबराबादी १८वी सदी में पुरनूर थे। उनकी रचनायें उस धवल दौर का सच्चा प्रतिबिम्ब हैं जिसमें ईद के उल्लास साथ होली भी रंगीनियाँ भी बराबर की भागीदार हैं।
होली के रसमय और रंगमय दिन के लिए उनकी होली सम्बंधित रचनाओं में से एक मस्त नज़्म प्रस्तुत है।
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की। और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की। परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की। ख़ूम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की। महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।
हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की
गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो। कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो। मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो। उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो। सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।
और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवइयों के लड़के, हर आन घड़ी गत फिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के, कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के, कुछ लचके शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के, कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।
ये धूम मची हो होली की, ऐश मज़े का झक्कड़ हो उस खींचा खींची घसीटी पर, भड़वे खन्दी का फक़्कड़ हो माजून, रबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुलफा कक्कड़ हो लड़भिड़ के ‘नज़ीर’ भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो जब ऐसे ऐश महकते हों, तब देख बहारें होली की।
अविभाजित भारत में सन 1911 के फरवरी माह की 13 तारीख को जन्मे फैज़ अहमद फैज़ की नायाब शायरी का ही जादू है कि उनके भौतिक अस्तित्व से हजारों-लाखों गुना बड़ा कद शायर फैज़ का हो गया है और अच्छा शायर जन्मता तो है पर उसकी रुखसती कभी नहीं होती धरा से। वह जिंदा रहता है लोगों के दिलों में। अच्छा कवि वह लीविंग ओर्गेनिज़्म है जो जब भी स्थितियाँ अनूकूल होती हैं तब वह अपने काव्य की बदौलत जन्म ले लेता है।
फैज़ अहमद फैज़ जैसे शायर जिन्होने मानव जीवन के हर रंग का और हर ढ़ंग का विश्लेषण अपनी शायरी के द्वारा किया हो वे तो हर दिन के हर पल कहीं न कहीं जन्मते ही रहते हैं। मानव जीवन के हर भाव के साथ उनका जुड़ाव रहता है चाहे वह मोहब्बत का क्षेत्र हो या जंग का। बात चाहे मानव के शोषण की हो रही हो या जीवन में मनुष्य की स्वतंत्रता के उत्सव की, फैज़ वहीं मिल जायेंगे अपनी शायरी की बेपनाह खूबसूरती के साथ।
उन्होने केवल किताबी शायरी ही नहीं की वरन मनुष्य की स्वतंत्रता के लिये वास्तविक जीवन में भी तानाशाही सत्ता द्वारा दी गई प्रताड़ना झेल कर भी संघर्ष किये।
मनुष्य ऊपर उठना चाहता है। आदर्श की ओर बढ़ना चाहता है। पर शक्तियाँ हैं जो मनुष्य जीवन को नीचे खींचती हैं और उसका पतन करती हैं। विकासोन्मुखी राहों पर चलते चलते ऐसे पड़ाव आते हैं जब बुराइयों के समावेश के कारण तरह तरह के प्रदुषण तौर तरीकों में आ जाते हैं और निराशा जन्म लेने लगती है। जिन्होने अपने जीवन होम कर दिये मानव जीवन के उत्थान के लिये उन्होने क्या इसलिये किया कि सब फिर से भ्रष्ट माहौल की ओर गिरते चले जायें।
ऐसे माहौल में हमेशा ही उनकी बेहद प्रसिद्ध रचना- सुबह-ए-आज़ादी, की याद बरबस ही ताज़ा हो जाती है और वह रचना पड़ाव पर ठहरे मुसाफिरों को जगाती है कि इस किस्म के औसत को पाने के लिये हमने यात्रा आरम्भ नहीं की थी। यह रचना यात्रियों में बीते हुये का विश्लेषण करके बुराइयों को हटाकर आशा के साथ आगे बढ़ने के लिये प्रेरणा का कार्य करती है। आदर्श को अभी भी एक मंजिल बनाये रखती है।
ये दाग दाग उजाला ये शब गजीदा सहर
वो इंतजार था जिसका ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरजू लेकर
चले थे यार के मिल जायेगी कहीं न कहीं
फलक के दश्त में तारों की आखिरी मंजिल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जाके रुकेगा सफीना-ए-गम-ए-दिल
भारत और पाकिस्तान के नामचीन फिल्मकारों, संगीतकारों एवम गायकों ने फैज़ की शायरी के साथ अपनी कला का संगम बार बार किया है।
फैज़ जीवित नहीं हैं आज, पर वे उपस्थित हमेशा रहते हैं। उन्हे याद करने की देर है और वे अपने शब्दों का जादू बिखेरने आ जाते हैं।
फैज़ की शायरी की हद नहीं है। बानगी देखनी हो उनकी रचना ’कुत्ते’ में देखी जा सकती है।
बीसवीं सदी का भारतीय उपमहाद्वीप धन्य हो गया फैज़ अहमद फैज़ को अपने यहाँ जन्मा पाकर।
सन 1911 के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में जन्मे हरेक मनुष्य के पूर्वज शायर फैज़ अहमद फैज़ के जन्म शताब्दी दिवस पर उन्हे श्रद्धा सुमन!
पृथ्वीवासी अब हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक संगीत सम्राट प. भीमसेन जोशी की सजीव संगीत प्रस्तुतियों का आनंद न ले पायेंगे। संगीत के धुनी भक्त्त पंडित जी ने अपने जीवनकाल में इतना और इतना गहरा संगीत रचा है कि भारत देश धन्य रहा है उनके अस्तित्व की मौजूदगी से। भाग्यशाली है यह देश जहाँ ऐसे संगीत उपासक जन्म लेते हैं। भारत ने उनके प्रति कृतज्ञता दिखाते हुये उन्हे भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित करके उनकी संगीत साधना के प्रति आभार प्रकट किया।
दशकों तक पंडित जी की सधी हुयी गायिकी ने श्रोताओं के अंतर्मन को गहरे स्तर पर छुआ है। उनकी आवाज के आरोह-अवरोह की स्वर-लहरियों के साथ तैरते-डूबते-उड़ते श्रोता बाकी सब बातें भूलते रहे हैं। उन्हे सुनते हुये पहले श्रोता संगीत में खोता है, फिर उसके होने का अहसास खत्म हो जाता है और सिर्फ संगीत रह जाता है और कब सब कुछ खत्म होकर सिर्फ आनंद रह जाता है इस प्रगति का पता तब ही चलता है जब पंडित जी का गायन समाप्त होकर श्रोताओं को वापस होश में ले आता है।
आभार तकनीक का भी है जिसके कारण भौतिक रुप से हमारे बीच न होते हुये भी प. भीमसेन जोशी जी की गायिकी हमारे बीच उपस्थित रहेगी और संगीत रसिकों की संगीत संवेदनाओं को दिलासा देती रहेगी। जो उन्होने गा दिया है वह सैंकड़ो सालों तक पृथ्वी के भाल पर सुनायी देता रहेगा और पृथ्वी को संगीतमयी बनाये रखेगा।
अस्सी के दशक के मध्यांतर के बाद के काल में जब दूरदर्शन ने भारत की ’ अनेकता में एकता ’ की विरासत को सम्मान देने के लिये संगीत वीडियो बनाया तो उसकी शुरुआत प. भीमसेन जोशी जी के गायन से ही हुयी। जब वे ‘ मिले मेरा सुर मेरा तुम्हारा ’ गाते परदे पर आते हैं तो किसी भी सुनने वाले को इस देश की एकता और अखंडता के सूत्र मिल जाते हैं।
साभार धन्यवाद पंडित जी की इस देश में उपस्थिति को कि उन्होने इतने दशकों तक भारतवर्ष को संगीत की उच्च विरासत को न केवल संजोकर रखा बल्कि करोड़ों लोगों को संगीत के संस्कार भी दिये।
परलोक भी धन्य हो गया होगा उन्हे पाकर। अब वे वहाँ अपनी अदभुत गायिकी से संगीत लहरियाँ बिखेरेंगे।
किताबों का मोल क्या?
वे तो अमूल्य होती हैं
परन्तु
वाह रे नया जमाना
ऐसी अनमोल धरोहर भी
दुश्मन बन गयी है
मन्नू के लिए,
रोज रुलाती हैं
उसे किताबें
जब
भारी बस्ता बन कर
कन्धों पर
चढ़ जाती हैं।
…
ए फॉर एप्पल
बी फॉर बुक
तीन साल की मन्नू को
रटने की मिली है
बड़ी सजा
मम्मी कसकर दबाती है
नन्ही उंगलिया
आढ़ी-टेढ़ी लिखाती है
सांप सी गिनतियाँ
और वह
चश्मे वाली टीचर
दुश्मन!
धूप में खड़ा कर देती है
मन्नू को
धूप काली डायन बन कर
किताब से डराती है
मन्नू को
…
ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार
मम्मी रटाती है
नन्ही मन्नु
रोज ही भूल जाती है
मम्मी की डाट खाती है
टप टप
आँखों से तारे
उतर आते हैं
चंदा मामा दूर के
मन्नू को सुनते हैं |
ब्रूस ली (Bruce Lee) और उनके कारनामे सालों से दुनिया को आश्चर्यचकित करते रहे हैं। एक बानगी देखें उनकी विलक्षण कला की।
और बीच में सांस लेना न भूलें, वह तो खुद इन कारनामों को देखने में व्यस्त हो सकती है। ऊँगलियों को दाँतों से न दबायें, हानिकारक हो सकता है ऐसा प्रयास। कृपया सचेतन होकर वीडियो का लुत्फ उठायें।