Archive for ‘विकसित भारत’

अगस्त 28, 2011

समय साक्षी है : हिमांशु जोशी का भविष्योन्मुखी उपन्यास आज के परिपेक्ष्य में


लेखक निस्संदेह समाज के अन्य वर्गों की तुलना में करवट लेते समय को ज्यादा गहराई से समझ पाता है, वह आने वाले समय की आहट, और लोगों से पहले ही सुन लेता है। लेखक, अगर भूतकाल में घटी घटनाओं पर भी कुछ लिखता है तो वह गहराई से उस भूतकाल और उस समय हुये घटित का विश्लेषण करता है। यही पैनी दृष्टि और विश्लेषण क्षमता वह वर्तमान में घटित हो रहे घटनाक्रमों के बारे में भी अपनाता है।

अगर हिमांशु जोशी के राजनीतिक उपन्यास “समय साक्षी है” को देखें तो यह भूत काल का भी लगता है और हो सकता है कि सत्तर के दशक के जय प्रकाश आंदोलन से कुछ प्रेरणा उन्होने ली हो इस उपयास को रचते समय। जिन्होने यह उपन्यास पिछली सदी के अस्सी या नब्बे के दशकों में या नयी सदी के पहले दशक में पढ़ा हो उनके सामने यह उपन्यास ऐसी आदर्शवादी कल्पनायें लेकर आता है जहाँ लगता है कि काश ऐसा हो जाये।

लोकतंत्र में राजनीति से किनारा नहीं किया जा सकता। राजनीति और राजनीतिज्ञों की नैतिकता का स्तर किसी भी देश की समूची नैतिकता से जुड़ा होता है। अगर राजनेता ईमानदार हैं तो ऐसा हो नहीं सकता कि देश में भ्रष्टाचार फैल जाये क्योंकि वे बर्दाश्त ही नहीं करेंगे और भ्रष्टाचार करने वाले कर्मचारियों को और जब प्रशासन में ईमानदारी बसेगी तो बाकी जगह अपने आप ईमानदारी से काम होगा।

आदमी एक एकल ईकाई के रुप में ईमानदार नहीं भी हो तब भी अगर उच्च स्तरीय पदों पर ईमानदार लोग बैठे हैं और उसे पता है कि भ्रष्टाचार करने पर उसके लिये मुसीबत खड़ी हो सकती है तो वह हिम्मत ही नहीं करेगा भ्रष्ट आचरण दिखाने की।

भारत में मौजूदा समय में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में भारत के राजनेताओं के चरित्र में कितनी गिरावट आ गयी है। नैतिकता की बात उनके लिये बेमानी हो चुकी है।

भारतीय राजनीति, चुनावी राजनीति, दलगत राजनीति और राजनैतिक एवम समाज को झझकोरने वाले आंदोलन से सम्बंधित यह अपने तरह का एक अलग ही उपन्यास है। किसी किसी पृष्ठ पर ऐसा लगने लगता है कि भारतीय राजनीति की परतें कितनी गहराई से खुरची गयी हैं और इसकी शारीरिक और मानसिक बनावट का बड़ा गहरा अध्ययन किया गया है।

एक उदाहरण देखें- क्या लिखा गया है

समस्त राष्ट्र का भविष्य जब मात्र मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में समा जाता है तो अनेक जटिल समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। यदि उनके निर्णय दूरदर्शितापूर्ण न हों तो राष्ट्र को उनके दूरगामी प्रभावों के परिणाम झेलने के लिए भी विवश होना पड़ता है। भारत आज जिस संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है, उसका दायित्व इन्हीं राजनीतिज्ञों पर है, जिन्होंने राजनीति में से नीति को तिरोहित कर, जाने या अनजाने, चाहे या अनचाहे समस्त राष्ट्र के अस्तित्व को दाँव पर लगा दिया है। आए दिन चारों ओर जो हिंसा, जो रक्तपात जो विघटनकारी घटनाएँ घटित हो रही हैं, उसके मूल में कहीं ये ही कारण हैं कि मात्र अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उन्होंने किस तरह से समस्त राष्ट्र के हितों की बलि चढ़ा दी है।

हिमांशु जोशी उपन्यास की भूमिका में अपनी पैनी दृष्टि का परिचय देते हैं

राजनीति की भी कोई नीति नहीं होती है। नीति का परित्याग कर जब वह नीति अनीति का मार्ग अपनाने लगती है, तब उसके परिणाम घातक होते है- बड़े भयंकर। भारत के गत कुछ वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है।
आज़ादी के बाद लोगों के मन में नई आशाएं, आकांक्षाएं जागीं। सदियों से शोषित दीन-हीन जनों को लगा-उम्मीदों का नया सूरज उगने वाला है,
यातनाओं की काली रात बीतने वाली है।
वह नया सूरज उगा, परन्तु सबके लिए नहीं।
शायद इसलिए काल-रात्रि अभी भी शेष है।

अभी करोड़ों लोग हैं, जिन्हें एक वक्त का भोजन भरपेट नहीं मिल पाता। करोडों लोग हैं। जिनके पास सिर छुपाने के लिए छत नहीं। दो हाथ हैं, पर उन्हें देने के लिए काम नहीं। तन को ढकने के लिए पूरे वस्त्र नहीं, बीमार होने पर दबा नहीं-मरने पर कफन नहीं।
आज़ादी का सपना किसी सीमा तक साकार हुआ, परन्तु वास्तव में वह आज़ादी मिली कहां, जिसके लिए स्वाधीनता-सेनानियों ने लौह-कपाटों के भीतर नारकीय यातनाग्रहों में अपनी देह को गला दिया था, फांसी के तख्तों पर हंस-हंस कर झूलते हुए जीवन के उषाकाल में ही सन्ध्या का वरण कर लिया था। रोटी-रोटी के लिए मोहताज, भीख मांगते ऐसे बच्चे मैंने स्वयं देखे हैं, जिनके अभिभावक स्वाधीनता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे चुके थे। उन अनाम, अज्ञात शहीदों का क्या कहीं लेखा-जोखा है ? लेखा-जोखा उन्होंने चाहा भी न होगा, परन्तु उनके परिणामों का हिसाब आने वाली पीढ़ियां मागें तो उसे अनुचित भी नहीं कहूँगा।

देश के ‘भाग्य विधाता’ देश-सेवा के नाम पर क्या-क्या करते हैं ? अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किस तरह करोड़ों लोगो के भाग्य के साथ खिलवाड़ करते है ? भ्रष्टाचार्य सदाचार के आवरण में किस तरह प्रस्तुत किया जाता है-उसी ‘आदर्शोन्मुख’ समाज का चित्रण प्रस्तुत उपन्यास में किया गया है।

तिमिर वरन, मेघना, पी० पी० या अन्य पात्र काल्पनिक होते हुए भी काल्पनिक नहीं। भारतीय राजनीति से जो तनिक भी परिचित है, उन्हें पात्र भी सुपरिचित लगेंगे। उन्हें किसी-किसी रूप में आपने भी देखा होगा और आज भी देखते होंगे।
राजधानी में गत 25-26 साल से रहने के कारण राजनीति और राजनीतिज्ञों को तनिक निकट से देखने-परखने का मौका मिला। वे ही अनुभव और अनुभूतियां इसके लेखन में सहायक बनीं। कुछ घटनाएं आपको सत्य के इतने निकट लग सकती हैं कि हो सकता है, आप उन्हें सत्य ही मान लें। परन्तु अन्त में मैं यहीं कहूँगा कि मेरा उद्देश्य किसी की कमियों को, कमजोरियों को, रहस्यों को उजागर करके रस लेना नहीं रहा। हाँ जब इसे लिख रहा था, मेरी आंखों के सामने कोटि-कोटि संघर्षरत दीन-दुखियों का चित्र बार-बार अवश्य उभर आता था।

तथ्यों का उद्घाटन स्वयं में एक समस्या है। शायद इसलिए मैं महीनों तक आग के दरिया की धधकती लहरों से जूझता रहा। उन मित्रों का मैं कम आभारी नहीं जिन्होंने इसके लिए सामग्री जुटाने में हर तरह का जोखिम उठाकर मेरी सहायता की।

अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने से और आमरण अनशन करके अपने प्राणों को ताक पर रखने से उपन्यास समय साक्षी है, के तिमिर बारन की याद ताजा हो उठती है और जिस तरह से देश के युवावर्ग ने इस आंदोलन में शिरकत की है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो समय साक्षी है का अंतिम अध्याय दिल्ली में एक नाटक के रुप में खेला जा रहा हो।

जहाँ तिमिर वरन खुद एक राजनीतिज्ञ हैं और बरसों सत्ता में रहे हैं और अपने ही दल के विरोधियों द्वारा उनके खिलाफ किये जा रहे षडयंत्रों के खिलाफ वे उठ खड़े होते हैं। देश हित में वे सड़क पर उतर आते हैं और युवाओं का आह्वान करते हैं। देश को जगाते हैं और बुरी राजनीतिक ताकतों, जो कि देश के हितों के खिलाफ काम कर रही हैं, के खिलाफ आंदोलन छेड़ देते हैं और उसे एक जनांदोलन के रुप में विकसित कर देते हैं।

समय साक्षी है उपन्यास का अंश पढ़ें-

‘नहीं, नहीं यह नहीं होगा। आइ से न्नो ! दांत पीसते हुए तिमिर वरन गरजे। आँखें अंगारे की तरह धधक रही थीं। चेहरा तमतमा आया था। आवेश में सारा शरीर कांपने-सा लगा था।
मुट्ठी भींचते वह दहाड़ने लगे ‘मेरी प्रतिष्ठा पर आंच आई तो सबकी इज़्जत धूल में मिला दूँगा। देखता हूँ- मुझे मंत्रिमंडल से हटाकर कौन सत्ता में टिका रहता है !’ अन्तिम चेतावनी देते हुए वह उठे फाइल बगल में दबाकर, धोती का पल्लू संभालते हुए फटफट बाहर की ओर चल पड़े।
उन्हें इस तरह उत्तेजित देखते ही धूप में बैठा ड्राइवर घबरा उठा और सिगरेट का टोटा फेंकता हुआ गाड़ी की ओर लपका।
चमचमाती हुई, एक नीली-सी लम्बी कार फर्राटे से गेट की ओर मुड़ी और हवा को चीरती हुई, वारीन्द्र घोष मार्ग पर निकल पड़ी।

बैठक में भाग लेनेवाले संसदीय दल के सभी सदस्य  क्षण-भर के लिए सन्न रह गए। तिमिर वरन का यह विकराल रौद्र रूप सबके मन में एक अजीब-सी दहशत पैदा कर गया था। एक भयावनी आशंका की कहीं दल विघटन फिर न हो जाए! इस बार दल के विघटन का अर्थ था। घोर अराजकता, सैनिक-शासन या पूर्ण तानाशाही !
पर देश इसमें से किसी भी स्थिति के लिए तैयार न था।
तिमिर वरन के पीछे पन्द्रह बीस और सदस्य उठ खड़े हुए। एक-एक कार में पाँच छह-छह जन लदकर  उसी दिशा में बढ़े जिधर से तिमिर वरन की विदेश से आयात की गई, कीमती गाड़ी अभी-अभी गुज़री थी।

सत्तर वर्ष के तिमिर वरन आज न जाने किस तरह एक ही छलांग में तीन-तीन चार-चार सीढ़ियाँ पार कर गए थे। और दिन थोड़ा-सा पैदल चलने में उनका दम फूलने लगता था। वह बुरी तरह हांफने लगते थे। आवेश के कारण, आज उन्हें कुछ भी सूझ न रहा था।
तीर की तरह वह सीधे बैठक में गए। सचिव बर्मन पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया। सोफे पर फाइल पलटकर वह धम्म से कुर्सी पर बैठ गए।
‘यस्सर’ की भंगिमाव बनाए बर्मन हाथ में स्लिप वाली सफेद नोट-बुक उठाए, सिर झुकाए सामने खड़ा था।
‘जिन संसद-सदस्यों की सूची तुम्हें कल दी थी, उन्हें गाड़ियां भेजकर बुलाओ। अबरार से कहो कि एक नया  ड्राफ्ट तैयार करें फौरन।’

बर्मन चला गया तो उन्होंने एक लम्बी सांस ली। पाँवों को दूर तक पसारा और टोपी उतारकर मेज़ पर रख दी। देर तक उनका हाथ यों ही टोपी के ऊपर रखा रहा। फिर उनके गंजे सिर पर पहुँच गया, आँखें मूंदकर वह कुछ सोचने लगे।
अब भी उनका चेहरा तमतमा रहा था। अब तक उनका दम फूल रहा था। कभी इस तरह अपमानित किया जाएगा-उन्होंने सपने में भी न सोचा था।
अभी सुबह के नौ भी न बजे थे-चारों ओर घिरा धुंध-सी फैली थी। नमदे की तरह मोटे-मोटे घने काले बादलों से आसमान घिरा था। सर्दी के कारण बाहर निकलना कठिन था। फिर भी सड़कों पर भीड़ कम न थी। साइकलों और कारों की सचिवालय की ओर कतार-सी चली जा रही थी।

तिमिर वरन देर तक उसी मुद्रा में बैठे रहे। उनके विरुद्ध षडयंत्र का जाल निरंतर बुना जा रहा है, उन्हें इसका अहसास था। वह जानते थे, दल के लोग सरकार की नीतियों के कारण बहुत-से छोटे-छोटे गुटों में बट रहे हैं। दूसरी पार्टियों से भी बहुत-से लोग आ गए थे। जिनका एक अलग समुदाय बन रहा था। वे सत्ता को हथियाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे। तिमिर वरन के लिए यह सबसे बड़ा खतरा था। इस चुनौती का सामना करने के लिए उन्होंने भी कम चाले न चली थीं। अपनी तरफ से कहीं कोई कसर न रखी थी। किन्तु अब पासा पलट रहा था। धीरे-धीरे तिमिर वरन को शक्तिहीन करने की सुनियोजित योजना चल रही थी। उप-चुनावों में उनके ही दल के लोंगों ने, उनके समर्थक उम्मीदवारों को हराने के लिए विपक्ष के उम्मीदवारों का छिप-छिपकर समर्थन किया था। इस अभियान में उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली थी।

किन्तु तिमिर वरन भी कोई कच्चे खिलाड़ी न थे। विपक्ष के बहुत-से नेताओं से उनके आत्मीयता के गहरे सम्बन्ध थे। उन्होंने अपने ही दल के कम सदस्य-उम्मीदवारों की ज़मानते ज़ब्द नहीं करवाई थीं। बहुत-से लोग उनका आशीर्वीद प्राप्त कर संसद तक पहुँचने में सफल हुए थे। विपक्ष की बेचों पर  बैठने के बावजूद उन पर अगाध श्रद्धा रखते थे।
उनका व्यक्तित्व बर्फ से ढके ज्वालामुखी जैसा था। बाहर से जितने सौम्य-सन्त लगते थे, भीतर से उतने  ही रीति-नीति के धनी कूटनीतिज्ञ। खादी के साधारण-से कपड़े पावों में बेडोल की चप्पलें और सिर पर हिम श्रृंग की तरह जगमगाती शुभ्र स्वच्छ टोपी !  जब वह समाजवाद या गरीबी से दूर करने के नारे लगाते थे, तब लगता था, वाकई कोई भुक्त भोगी किसान अपने ही दुख-दर्द की बातें कर रहा है !

किसान-परिवार में अपने पैदा होने का उन्हें गर्व था।  मौंके-बेमौके इस तथ्य का उद्घाटन भी भूलते न थे। सोफे से धीरे से उठकर वह कमरे में ही चहलकदमी करने लगे। कमरे में किसी के भी प्रवेश की उन्होंने मनाही कर दी थी।
नई व्यूह-रचना के विषय में वह गम्भीरता से सोचने लगे। उन्हें-इस बार की पराजय का अर्थ है, राजनीति से पूर्ण संन्यास ! यानी कि उनकी राजनीतिक हत्या !

राजनीति से हटने से उन्हें एतराज न था। उम्र भी काफी हो गई थी। दस्तखत करते हुए हाथ कांपते थे। देर तक मीटिंग में बैठना भी कठिन लग रहा था। उस पर दिन रात टूर प्रोग्राम ! जन भाषाओं में भाषण तथा नित उठ खड़ी होने वाली नई-नई उलझने ! पर देश सेवा और जनहित के नाम पर वह वर्षों से इन यंत्रणाओं को सहते आ रहे थे। उनकी अन्तिम आकांक्षा थी कि कभी ऐसा संयोग हो और जनता  उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित कर, अपने पर  किए गए उनके उपकारों का बदला चुकाए तो संभवता वह इस गरीब देश की कुछ सेवा कर सकेंगे।

आज के परिपेक्ष्य में हिमांशु जोशी का उपन्यास- समय साक्षी है, बेहद प्रासंगिक हो उठा है और एक अच्छी कृति की पहचान यही है कि वह समय समय पर जीवित होता रहता है और भिन्न काल की पीढ़ियों को अपने से जोड़ता रहता है।

…[राकेश]

अगस्त 17, 2011

हम खुद ही न मार डालें कहीं अन्ना को!


आजकल हालात के चलते
कई बार सोचने पर मजबूर हूँ
उस सच के बारे में
जिसे सब जानते है
पर बोलने को कोई तैयार नहीं-
यह कि सारे कुएँ में भ्रष्टाचार की भाँग पड़ी है।

मैं दस गुना फीस देकर
डाक्टर से इलाज करा रहा हूँ
उस पर तुर्रा यह
भगवान तुल्य वह बेशर्म डाक्टर
आपरेशन के अलग से मांगता है।

हम में कोई भी कम कहाँ है मित्रों!

बच्चों की आला स्कूल में भरती से लेकर
रेल टिकट तक के लिए
सब खुशी खुशी ऊपर से देते हैं
काले धन बल के बदले
मेघावी उम्मीदवारों को पीछे धकेल
अपनी कर्महीन संतानों के लिए
नौकरियाँ हथियाँ रहे हैं।

सारे कुएँ में भ्रष्टाचार की भांग पड़ी है।

इस बेईमान माहौल में
ये जो बूढा फकीर अन्ना बाबा
ईमान की भीख मांगता फिर रहा है
करनी के हम सब चोर
कथनी से उसे प्रोत्साहित करने वाले
शायद बेचारे को टूटा दिल मार देंगे।

कहो कौन है
अपने काले धन से अटे लॉकर खोलने वाला
बताओ कौन है
जो आगे आकर कहे
बाबा मुझसे पाप हुआ
देश के नाम लो ये
स्विस बैंक की चाबी।

सच तो यह है मित्रों!
सरापा बेईमान हो चुकी इस बस्ती में
ईमान की बात ही फ़िज़ूल है
फिर भी यदि अब भी कहीं
विवेक की चिंगारियाँ बाकी हैं
दुआ करो वे आग बने
काले धन के सर्वव्यापी इस कीचड़ में
ईमान के कंवल खिलें
हो सदा के लिए भ्रष्टाचार के तम का नाश
उजाला हो दिलो में, दिमागों में देश हित का
दुआ करो !प्रकाशित विकास मार्ग पर
कदम मिला कर सब चलें।

(रफत आलम)

जून 16, 2011

बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस


बतकही 1-
बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के

अशोक – एक बार को मान भी लो कि चलो भाई आर.एस.एस ने बाबा रामदेव के कार्यक्रम का समर्थन किया तो ऐसा करना कहाँ गलत है? क्या आर.एस.एस को अधिकार नहीं है भ्रष्टाचार का विरोध करने का? क्या आर.एस.एस भारत का अंग नहीं है।

हरि – अशोक बाबू हमारा आर.एस.एस की अनुदार विचारधारा से हमेशा से मतभेद रहा है परंतु यहाँ हमें भी आपकी बात के कुछ पहलू अनुचित नहीं लगते। कोई भी संगठन क्यों न हो उसका कैसा भी इतिहास क्यों न र्हा हो, उसकी कैसी भी छवि न रही हो, अगर वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष में साथ देना चाहता है तो क्यों उसके इन प्रयासों को गलत नज़र से देखा जाये?

सुनील – यह बात सही है। एक तरफ तो सरकार आतंकवादियों से हथियार छोड़ने, मुख्य धारा में आने और देश के विरोध में अलगाववादी बातें करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं करती और दूसरी ओर इस आसान से मुद्दे को इतना जटिल बना कर पेश कर रही है। यहाँ असली मुद्दा आर्थिक भ्रष्टाचार का है और अगर आर.एस.एस इस लड़ाई में साथ आना चाहती है तो यह स्वागत योग्य कदम है। भाई या तो आर.एस.एस और अन्य संगठनों को देश निकाला दे दो या फिर उनकी आड़ लेकर भ्रष्टाचार जैसे बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे की धार खत्म मत करो।

विजय – लोकतंत्र की बढ़ोत्तरी के लिये भारत के राजनीतिक और सामाजिक रुख में और उदारता और स्पष्टता लाने की जरुरत है। हर मुद्दे को अलग-अलग ढ़ंग से देखे जाने की जरुरत है। अभी अगर आर्थिक मुद्दा हल हो जाये तो अगला मुद्दा नैतिकता का होगा। और उस मुद्दे पर सभी राजनीतिक और सामाजिक संगठन कमजोर नज़र आते हैं। वहाँ सभी दलों और संगठनों में बहुत ज्यादा सुधार की आवश्यकता है।

हरि- मुझे तो ऐसा लगता है कि अन्ना हज़ारे के अनशन के बाद से जैसा माहौल देश में बना था उसमें ज्यादातर नेता, चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों, अपनी साख खो चुके थे और घायल होकर वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वालों के पीछे हाथ धोकर पड़ गये हैं। कांग्रेस को खुश होना चाहिये कि आर.एस.एस भ्रष्टाचार जैसे एक मुद्दे पर मुख्य धारा से जुड़ना चाहती है और यह ऐसा मुद्दा है जिसने पूरे देश के और इसके सभी वर्गों के लोगों के विकास के काम को बाधित किया है।

अशोक – अजी कांग्रेस के राज में इतना भ्रष्टाचार पनपा है। उसे तो घबराहट होगी ही।

सुनील – अशोक जी, यह एकतरफा सोच है। भ्रष्टाचार तो हरेक सरकार के काल में जम कर पनपा है। भाजपा के काल में भी कम नहीं था भ्रष्टाचार। कुछ को ही सही पर कांग्रेस के काल में कलमाड़ी, ए. राजा, और कनीमोझी जैसे शक्तिशाली नेताओं को जेल में बंद किया गया है। उन पर जाँच चल रही है। अशोक – इन्हे तो जनता के दबाव में अंदर किया गया है।

विजय – सुनील जी, आपकी बात वाजिब है। सनक भरी एकतरफा सोच से तो देश का काम चलेगा नहीं। आपकी बात को थोड़ा आगे बढ़ाऊँ तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि भले ही कांग्रेस द्वारा की जा रही कार्यवाही भ्रष्टाचार के विकराल रुप को देखते हुये ऊँट के मुँह में जीरा लगे पर एक शुरुआत तो हुयी है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने चाहे किन्ही भी दबाव में ऐसा किया हो पर आर.टी.आई आदि जैसी सुविधायें जनता को दी हैं। अपने और सहयोगी दलों के नेताओं को जेल भेजा है। कांग्रेस की बदकिस्मती से वक्त्त ऐसा है कि जनता केवल इतने भर से संतुष्ट नहीं है। जहाँ कांग्रेस आशा कर रही थी कि उसे जनता से सहयोग और शाबासी मिलेगी इन निर्णयों को लेने से वहीं जनता के सामने बहुत बड़े बड़े मामले खुलते जा रहे हैं। विदेश में जमा काला धन, देश में काले धन की समांतर अर्थ-व्यवस्था, मंहगाई, राजनीतिक भ्रष्टाचार और अक्षमता आदि मुद्दे जनता को अधीर कर रहे हैं। अब जनता का बहुत बड़ा हिस्सा मूर्ख बन कर नेताओं को लाभ देते रहने की स्थिति को पार कर चुका है या तेजी से पार करता जा रहा है। कांग्रेस को कुछ और ठोस कदम उठाने पड़ेंगे तभी वह कुछ उजली और सक्षम दिख सकती है अन्य दलों के मुकाबले में।

सुनील- विजय जी सही है आपकी बात। मुझे भी ऐसा ही लग रहा है कि कांग्रेस अपने द्वारा लिये गये कुछ अच्छे निर्णयों पर भी जनता से सराहना नहीं पा सकी है और यही इसकी कुंठा है। इसी कुंठा में वह बाबा रामदेव के मुद्दे को ढ़ंग से सुलटा नहीं पायी। उसे यह भी दिख गया कि अगर वह आगे भी अच्छे निर्णय अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव जैसे गुटों के दबाव के कारण लेगी तो उसे कोई राजनीतिक लाभ नहीं होने वाला है। मुझे लगता है कि कुछ निर्णय कांग्रेस अपने आप लेगी और उसकी ही नहीं बल्कि हर दल के नेताओं की अंदुरनी इच्छा और कोशिश यही होगी कि ऐसे गुट निष्प्रभावी हो जायें ताकि जनता में पैंठ बना चुके इन मुद्दों के राजनीतिक लाभ नेताओं को ही मिलें।

हरि – इन विचारों से मेरे दिमाग में एक बात आयी है कि चूँकि कांग्रेस को आर.टी.आई और कलमाड़ी आदि को जेल भेजने के फैसलों का लाभ नहीं मिल पा रहा था तो उसके सामने साफ हो गया कि ये मुद्दे तो अपनी जगह है पर इन मुद्दों की आड़ में राजनीतिक तंत्र की सारी कालिख कांग्रेस के मुँह पर ही मलने के गुपचुप प्रयास भी हो रहे थे। सरकार घोटालों और महंगाई के बावजूद विपक्ष के मुकाबले मजबूत थी और भाजपा समेत विपक्ष के सामने अगले तीन साल तक सरकार को गिराने का बहुत बड़ा अवसर था नहीं। पाँच साल तक दल इंतजार करने को तैयार नहीं थे, खासकर भाजपा। चूँकि कोई भी दल भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम में पाक-साफ नज़र नहीं आ सकता इसीलिये भाजपा और आर.एस.एस ने मौका तलाशते हुये बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे के अंदोलन से उठी जन-जाग्रती की लहर पर सवार होने की चेष्टा की।

अशोक – ऐसा कैसे कहा जा सकता है?

विजय – बात से बात निकलती है। आपकी बात में सच्चाई नज़र आती है सुनील जी। भाजपा खुद ऐसा आंदोलन नहीं खड़ा कर सकती थी क्योंकि उस पर भी भ्रष्टाचार के बहुत बड़े बड़े आरोप लगे हुये हैं। वह ऐसा करती तो दोगली करार दी जाती। तभी जब जनता आंदोलित हो गयी तो भाजपा के प्रवक्त्ता आदि टीवी चैनलों पर एक बात स्थापित करने में जोर लगा रहे हैं कि ये सारे मुद्दे आडवाणी ने उठाये थे। आडवाणी तो उप-प्रधानमंत्री भी रहे हैं और भाजपा अध्यक्ष भी, तब तो उन्होने अपने दल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के खिलाफ कदम नहीं उठाये। भाजपा की राजनीति के पीछे कहीं न कहीं यह इच्छा भी है कि किसी तरह से आडवाणी एक बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले लें। अगर तीन साल और इंतजार किया तो जीवन भर यह मौका हाथ नहीं आयेगा। हो सकता है आने वाले तीन सालों में राजनीतिक फिजां बदल जाये और कांग्रेस कुछ और बड़ी मछलियों को जेल भेजे और जनता अंतत: कांग्रेस के पक्ष में हो जाये। ऐसा लगता है कि कलमाड़ी आदि को जेल भेजना विपक्षी दलों को हिला गया है। भ्रष्ट सभी दल हैं और अगर कांग्रेस अपने नेताओं को जेल भेज सकती है तो दूसरे दल के नेताऒ पर कोताही करने का कोई मतलब है ही नहीं।

हरि- आप लोग कह रहे हैं तो मुझे भी दूर की एक कौड़ी सूझी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन तो अब देश में खड़ा होना ही है और हो रहा है पर कांग्रेस जो कह रही है कि बाबा रामदेव के आंदोलन के पीछे आर.एस.एस का हाथ है तो यह कुछ हद तक सही लगता है। खाली आर.एस.एस का ही नहीं बल्कि अन्य ताकतों का भी जो भी कांग्रेस की सप्रंग सरकार को पाँच साल तक सत्ता में देखने को तैयार नहीं है। देखिये हो सकता है दूर की कौड़ी हो परंतु ध्यान दिया जाये तो जून का महीना भारत में राजनीतिक रुप से इमेरजैंसी वाले महीने के रुप में याद दिलाने की चेष्टा गैर-कांग्रेसी दल करते रहे हैं। भाजपा और आडवाणी इस बात पर विशेष तवज्जो देते रहे हैं। रामदेव का अनशन जून के माह में ही क्यों आयोजित किया गया? यह मार्च में भी हो सकता था जब इतनी गर्मी नहीं थी। या कुछ माह बाद सितम्बर या अक्टुबर में। पर इसे जून में किया गया। अगर आंदोलन केवल रामदेव के हाथों में होता तो शायद वे सरकार से कई मुद्दों पर आश्वासन मिलने के बाद अनशन खत्म कर देते पर उनके ऐसा करने से केवल उन्हे और सरकार को ही लाभ और राहत मिलती। विपक्षी दल अपने आप को सारे मामले से अलग महसूस करते। अनशन न तोड़ने देने के लिये जरुर ही रामदेव को शातिर दिमागों ने सलाह दी होगी। रामदेव राजनीति में नौसिखिया हैं। वे इतनी दूर का नहीं सोच सकते। कुछ लोगों को पक्का पता था कि अगर रामदेव दिल्ली में डटे रहें तो सरकार और रामदेव में टकराव होना ही होना है। उन्होने सोचा था कि सरकार सख्ती करेगी और उस पर आपातकाल के आरोप लगाये जायेंगे। अगर सरकार रामदेव के आंदोलन को कुचलती है तो एक तो रामदेव व्यक्तिगत रुप से उसके खिलाफ हो जायेंगे दूसरे सरकार बदनाम होगी और तीसरे भ्रष्टाचार का मुद्दा रामदेव और अन्ना हज़ारे के पास ही न रहकर विपक्षी दलों खासकर भाजपा के पास आ जायेगा। रामदेव का तो ठीक है कि उन्हे राजनीति की समझ नहीं है पर कांग्रेस को क्या कहा जाये वह भी इन चालों के सामने धराशायी हो गयी? एक से एक शातिर राजनीतिक दिमाग कांग्रेस के पास हैं और वे इन संभावनाओं को नहीं देख पाये और अब टीवी चैनलों पर तमतमाये हुये बयान देते घूम रहे हैं और अपनी और ज्यादा फजीहत करा रहे हैं।

अशोक – आपको लगता है कि आर.एस.एस और भाजपा इतनी आगे की सोच सकते हैं? अगर रामदेव उनके बढ़ाये हुये होते तो उन्हे रामदेव की ऐसी हालत करके क्या हासिल होता। रामदेव की समझ में भी तो आयेगा कि उन्हे इस्तेमाल किया गया है।

सुनील- राजनीतिक दल कितनी भी आगे की सोच सकते हैं। हरि भाई आपकी सोच पर चलें तो अब समझ में आता है राजघाट पर खुशी से नाचने का मतलब। अब यह भी लगता है कि अगर आर.एस.एस और भाजपा को भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चलाना भी है तो उन्हे पहले अपने संगठनों से शुरुआत करनी चाहिये। बल्कि किसी भी राजनीतिक दल को यही करना चाहिये। उन्हे किसने रोका है कि वे अपने दल के आरोपित लोगों के खिलाफ कार्यवाही करें? अभी तो इन सभी दलों ने असली मुद्दे को पीछे ढ़केल दिया है और अपनी अपनी राजनीतिक रोटी सेकने आगे आ गये हैं। आर.एस.एस को खुले रुप में आंदोलन खड़ा करना चाहिये। उनका इतना बड़ा काडर है वे आज तक क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन नहीं कर पाये। भाजपा का इतना बड़ा समर्थक वर्ग है वह खुद से और अपने समर्थकों से शुरुआत क्यों नहीं करती। मुझे ऐसा लगता है कि कोई भी दल और संगठन गम्भीर नहीं है भ्रष्टाचार को समापत करने के लिये। ऐसा करना उनके हितों के खिलाफ है।

विजय- सही है सुनील जी, रामदेव के आंदोलन से सही ढ़ंग से निबटने में कांग्रेस की विफलता ने भाजपा को वह जगह मुहैया करा दी है जो उसे मिल नहीं रही थी उसके लाख प्रयास के बावजूद। लोगों का जिस तेजी से कांग्रेस से मोह भंग हुआ है उसकी भरपाई करने के लिये कांग्रेस को बहुत बड़े कदम उठाने पड़ेंगे। अभी ऐसा माहौल बना दिया गया है कि कांग्रेस के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन गति नहीं पकड़ पा रहा है। जबकि सच्चाई यह नहीं है। सभी दल भ्रष्ट हैं। कांग्रेस ने दिखावे के लिये ही सही पर थोड़े से कदम उठाये हैं, पर वे काफी नहीं हैं। अपनी जमीन वापिस पाने के लिये उसे बड़े कदम उठाने ही पड़ेंगे। अब कांग्रेस को जमीन में तो दफनाया नहीं जा सकता। आर.एस.एस समर्थित भाजपा से तो लोगों की शंकायें रहेंगी ही। देशव्यापी दलों में कांग्रेस ही है जिस पर देश के बहुत सारे वर्गों का भरोसा रहा है। देश की एकजुटता की खातिर कांग्रेस का बने रहना जरुरी है। कांग्रेस को अपनी और देश की खातिर अपनी सफाई और अपने सुधार से शुरुआत करनी चाहिये।

हरि – कांग्रेस और भाजपा, दोनों बड़ी राजनीतिक शक्तियों को चाहिये कि देश हित में भ्रष्टाचार जैसे राक्षस को समाप्त करने के लिये वे भले ढ़ंग से आपस में सहयोग करें। कांग्रेस को चाहिये कि वह बचे हुए तीन सालों में सत्ता का सदुपयोग करके भ्रष्टाचार समाप्त करने की ओर ठोस कदम उठाये। भाजपा को चाहिये कि एक अच्छे विपक्ष की तरह सरकार पर दबाव बनाये रखे। पिछले दरवाजे से सत्ता नहीं मिलने वाली और अगर मिल भी जाये तो यह दलों की साख गिराती ही है। भारत के लोकतंत्र को स्वच्छ और विकसित बनाने के लिये राजनीतिक दलों को शातिर और कुटिल चालों के बजाय साफ-सुथरी और पारदर्शी राजनीति को स्थान देना ही पड़ेगा।

…जारी…

मई 16, 2011

किसान: मैथिलीशरण गुप्त झूठे थे!

कविवर मैथिली शरण गुप्त झूठे थे। उन्होने पता नहीं क्या-क्या देख लिया भारत के किसानों में?

हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है
हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ
आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है कांपना हेमंत में

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा
देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे

घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा
तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
है शीत कैसा पड़ रहा, और थरथराता गात है
तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते

सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है
मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है।

ज़रा उनकी मूर्खता तो देखिये क्या क्या कसीदे उन्होने किसानों के नाम कढ़ दिये।

किसान भी भला कुछ करता है क्या? निठल्ला किस्म का मानव होता है किसान।

न काम का न काज का दुश्मन विकास का।

देश ब्रांडेड चीजों को अपना रहा है और ये देहाती किसान देश को पीछे ढ़केल रहे हैं। न इन्हे ढ़ंग से रहने की तमीज होती है और न ही इन्हे बातचीत का ढ़ंग ही आता है। ये देश के मखमली भविष्य पर टाट के पैबंद सरीखे हैं।

भला इंडिया में किसानों का क्या काम? वे खुद आत्महत्या करके न मरते हों तो नेताओं के इशारे पर चलने वाली राज्यों की पुलिस तो है ही उन्हे निबटाने के लिये।

किसान खत्म हो जायेंगे भारत से तो इसे धनी इंडिया बनने से बाकी के सारे देश मिल कर भी न रोक पायेंगे। किसान का भारत से मिट जाना ही श्रेयकर है।

कुछ नेताओं, और बहुत सारे बिल्डरों, कोरपोरेट इंडिया और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने मिलकर यह पवित्र काम करने का ठेका ले लिया है। जाति, सम्प्रदाय, द्वेष की परम्परा का ईमानदारी से पालन करते राजनीतिक दलों के पिछलग्गू लोग भी इस यज्ञ में अपना योगदान दे सकते हैं। बहुत से दे ही रहे हैं।

कुछ दलों की तो नीति भी तय हो गयी है।

किसान है मक्कार
इसे लगाओ जूते चार

फ़रवरी 23, 2011

Buddhism चीन से आया भारत : Paulo Coelho

बहुधा ऐसा हो जाता है कि विश्व प्रसिद्ध विदेशी लेखक अपनी पुस्तकों में भारत से जुड़ी बातों को गलत ढ़ंग से प्रस्तुत करते हैं। कई बार तो उन्हे जानकारी ही नहीं होती और वे केवल अनुमान के भरोसे कुछ लिख डालते हैं और कई दफा वे भारत के बारे में फैले भ्रमों के कारण उसे हल्के ढ़ंग से लेने के कारण इसे और इससे जुड़े मामलों को गम्भीरता से नहीं लेते और गलत तथ्यों का समावेश अपनी पुस्तकों में कर डालते हैं। फिल्म निर्देशक भी इन मामलों में पीछे नहीं हैं।

Buddhism और भारत के जुड़ाव के सम्बंध में विदेशी लेखकों में अक्सर भ्रम देखने को मिलता है। आयरलैंड के रहने वाले प्रसिद्ध लेखक J. H. Brennan अपनी पुस्तक Tibetan Magic and Mysticism में तिब्बत पर Buddhism के पड़ने वाले असर की चर्चा करते हुये लिखते हैं -

There is no question at all that the doctrines of the Buddha helped change Tibetan history. All the same, Buddhism alone is no guarantee of a peaceful culture. India, the home of Gautam Buddha, has been to war twice in my life time.

शोध करके लिखने वाले लेखकों का यह हाल है कि वे अपने समय के भारत के बारे में भी इस सत्य को नज़रअंदाज कर जाते हैं कि सन 1947 के बाद से ही भारत ने किसी भी देश पर अपनी ओर से आक्रमण नहीं किया है। विभाजन के बाद पहले कश्मीर को लेकर, बाद में सन 1965 में और 1971 में और 1999 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण करके शांतिप्रिय लोकतांत्रिक देश पर युद्ध थोपे थे।  1962 में साम्राज्यवादी चीन ने भारत पर धोखे से आक्रमण किया और अपने इस शांतिप्रिय पड़ोसी देश को युद्ध में घसीटा।

दुनिया में बहुत बड़े-बड़े विदेशी विद्वान हैं जो भारत और चीन को एक ही शीशे से देखते हैं।  और सब बातों में उनके विचार सटीक पाये जाते हैं तब भारत के मामले में वे कैसे इतनी लापरवाही का परिचय दे देते हैं। भारत चीन जैसा शक्त्तिशाली देश नहीं है और न ही चीन की तरह उसे यू.एन में वीटो पॉवर मिली हुयी है और न ही वह चीन की भाँति दुनिया भर को घुड़की देता घूमता है। भारत एक सॉफ्ट देश है और यह बात सभी मुल्क जानते हैं।

दशकों से दक्षिण एशिया के ज्यादातर देशों से लोग विकसित पश्चिमी देशों में काम करने या रहने जाते रहे हैं। प्रवासी चीनी लोग लगभग हर विकसित देश में बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं और वे वहाँ एक समूह के रुप में रहते हैं और वहाँ भी उनकी एक सामुहिक शक्त्ति कायम रहती है। जबकि भारतीय एकल रुप में विकास करने में ज्यादा रुचि लेते हैं और पूजाघरों और अन्य सामाजिक स्थलों पर मेलमिलाप का दिखावा करने के अलावा वे अंदर से बाहर के देशों में भी बँटे ही रहते हैं।

विश्व प्रसिद्ध लेखक Paulo Coelho सन 2005 में प्रकाशित होने वाले उपन्यास – The Zahir में एक स्थान पर लिखते हैं कि Buddhism चीन से भारत में आया।

And he started telling me about his life, while I tried to remember what I knew about the Silk Road, the old commercial route that connected Europe with the countries of the East. The traditional route started in Beirut, passed through Antioch and went all the way to the shores of the Yangtse in China; but in Central Asia it became a kind of web, with roads heading off in all directions, which allowed for the establishment of trading posts, which, in time, became towns, which were later destroyed in battles between rival tribes, rebuilt by the inhabitants, destroyed, and rebuilt again. Although almost everything passed along that route—gold, strange animals, ivory, seeds, political ideas, refugees from civil wars, armed bandits, private armies to protect the caravans—silk was the rarest and most coveted item. It was thanks to one of these branch roads that Buddhism traveled from China to India.

दुनिया में ऐसे भी लोग होंगे जिन्हे भारत और बुद्ध के बारे में न पता हो और Paulo Coelho की किताब में लिखा गलत तथ्य उन्हे सही जानकारी लगेगा और वे इसे ही सत्य मानेंगे।

सन 2006 के फरवरी माह में उन्हे लिखे एक ईमेल में उनकी पुस्तक में उपस्थित इस गलती की ओर उनका ध्यान दिलवाये जाने पर उन्होने जवाब तो लिखा पर इस मुद्दे पर कोई भी बात नहीं लिखी। चूँकि पुस्तक शायद स्पेनिश से अंग्रेजी में अनुवादित होकर प्रकाशित हुयी थी तो बहुत संभावना है कि अनुवाद के कारण ऐसी गलती रह गयी हो। आशा थी कि आने वाले संस्करण में ऐसी तथ्यागत गलती का सुधार करवा लेंगे परंतु हाल ही में The Zahir का एक नया संस्करण देखने को मिला और उसमें गलती अभी तक उपस्थित है।

ऐसी गलती वे अमेरिका और अन्य शक्त्तिशाली देशों से जुड़ी बातों के साथ नहीं करेंगे, परंतु उन्हे भी पता है कि भारत से जुड़ी बातों को कैसे भी प्रस्तुत कर दो।

नेतृत्व से बहुत फर्क पड़ता है कि भारत के नेता कैसा व्यवहार भारत से बाहर करते हैं। कहीं भारत के नेताओं के कपड़े उतार लिये जाते हैं और कहीं भारतीयों से बदसलूकी की जाती है पर भारत के विदेश मंत्रालय के कानों पर जूँ नहीं रेंगती।

सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि विदेश मत्रांलय और इससे जुड़े अधिकारी बाहर के देशों में जाने वाले ज्यादातर भारतीयों को अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्त्ति मानकर चलती है, ज्यादातर तो उनका व्यवहार ऐसा ही रहता है कि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों पर आने-जाने वाला हर साधारण भारतीय कबूतरबाजी या अवैध किस्म के कागजों से विदेश जा रहा है या वहाँ से आया है।

भारत का नेतृत्व और मीडिया इसी बात से खुश रहता है कि किसी शक्त्तिशाली देश ने विदेश यात्रा के दौरान हमारे नेता को भोज दिया या  अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में अपने पड़ोस में बैठा लिया या भोज के बाद हाथ धोने के लिये जाते समय रुककर मुस्कुराकर बातें कीं।

चीन अपने लिये जितने फायदे अपने लिये दूसरे देशों से ले लेता है उतनी समझ और उतने ठसके की कल्पना भी भारत नहीं कर सकता।

दूसरों को सम्मान देने का मतलब उनकी गलत-सलत माँगों के सामने बिछना नहीं होता।

पिछले कम से कम बीस-पच्चीस सालों में भारत में उच्च तबके में समृद्धि भले ही बढ़ी हो पर भारतीय नेतृत्व की कमजोरी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा दिखायी देती रही है। इसे चाहें तो गठबंधन सरकारों का साइड इफेक्ट कह लें या कि बिजनेस के दौर में माँगते रहने की प्रवृत्ति के कारण हर बात को पैसे से तोलने की नयी प्रवृत्ति से अपने को कमजोर समझकर आत्मसम्मान में कमी का प्रभाव।

ताज्जुब होता है यह पढ़कर या सुनकर कि 1971 में बांगलादेश मुक्त्ति के संघर्ष के समय जब अमेरिका ने अपने जहाजी बेड़े भारत की हदों में समुद्र में लाकर खड़े कर दिये थे तब भी भारत गरीब होते हुये भी इस घुड़की में नहीं आया था और देश ने आत्म सम्मान को ज्यादा तवज्जो दी थी।

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में तब भी भारत के रुख के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाया जा रहा था।

उसी दौरान बीबीसी को दिये एक साक्षात्कार से, उस वक्त्त देश की प्रधानमत्रीं रहीं श्रीमति इंदिरा गाँधी के तेवर देख कर रोमांच हो उठता है कि एक गरीब और विकासशील देश दुनिया की आँखों में आँखें डालकर भारत के खिलाफ फैलाये जा रहे दुष्प्रचार का जवाब दे सकता है और विश्व  शक्त्तियों को उनके गलत कार्यों की याद दिला सकता है।

अगर सत्तर के दशक की भारतीय प्रधानमंत्री ऐसा आत्मविश्वास और आत्मसम्मान दुनिया को दिखा सकीं तो आज जबकि भारत पहले से ज्यादा समृद्ध है तब भारत को क्या हो गया है जो वैश्विक मंचों पर एक भ्रष्टाचारी, कमजोर और लुंजपुंज देश के रुप में अपने को प्रस्तुत कर रहा है। भारत अवैध घुसपैठ का मसला हो या बाहरी शक्त्तियों द्वारा देश में फैलाये आतंकवाद का या मुक्त्त व्यापार के नाम पर भारत से ठगी करने का, चुप्पी साधे सब सहन करता जाता है।

भारत और भारतीयों को अपने आत्मसम्मान की फिक्र करनी चाहिये और देश के बारे में फैली किसी भी गलत बात का विरोध उचित मंच पर करना चाहिये।

दंभी होना निम्नस्तरीय दोष है पर एक देश सज्जन होते हुये भी अपने आत्मसम्मान के लिये चारित्रिक दृढ़ता संसार को दिखा सकता है और इस लक्ष्य को पाने में देश में रहने वाले और दुनिया में हर जगह रहने वाले भारतीयों के प्रयास महत्वपूर्ण हैं।

देश की साख होगी तो प्रवासियों को भी उचित स्थान और सम्मान हर देश में मिलेगा। केवल अपने भले के लिये देश की साख पर बट्टा लगाने वाली बातों की अनदेखी इस लोभ से करना कि उनके व्यक्तिगत हितों को विदेश में नुकसान न पहुँचे, भारतीयों को कम से कम ऊँचाई पर तो नहीं ले जाता।

खुले दिमाग वाले विदेशी इस बात को कहते भी हैं कि जाने क्यों भारतीयों को अपने देश के गौरवशाली इतिहास और नायकों को सम्मान देना नहीं आता। विदेशियों की निगाहों में अच्छा और उदार दिखने के लिये भारतीय अपने नायकों को नीचे घसीटने से कभी पीछे नहीं रहते।

जिन भारतीय नायकों को विदेशी भी सर्वोच्च स्थान पर रखते हैं उन्हे भी भारतीय कोसने से बाज नहीं आते।

अनुचित अंधी प्रशंसा न करें पर द्वेषपूर्ण अंधी आलोचना भी तो न करें। एक संतुलित दृष्टिकोण रखना तो अनुचित बात नहीं है न।

राजनीतिक दलों के आपसी द्वंदों में फँसकर आम भारतीय भी बंट गया है और यह बँटवारा भारत की विरासत के साथ अत्याचार कर रहा है। भारत की सामुहिक चेतना का ऐसे टुकड़े टुकड़े होना देश के सम्मान को हर दिशा से खोखला कर रहा है।

…[राकेश]

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