Archive for ‘राजनीति’

अगस्त 28, 2011

समय साक्षी है : हिमांशु जोशी का भविष्योन्मुखी उपन्यास आज के परिपेक्ष्य में


लेखक निस्संदेह समाज के अन्य वर्गों की तुलना में करवट लेते समय को ज्यादा गहराई से समझ पाता है, वह आने वाले समय की आहट, और लोगों से पहले ही सुन लेता है। लेखक, अगर भूतकाल में घटी घटनाओं पर भी कुछ लिखता है तो वह गहराई से उस भूतकाल और उस समय हुये घटित का विश्लेषण करता है। यही पैनी दृष्टि और विश्लेषण क्षमता वह वर्तमान में घटित हो रहे घटनाक्रमों के बारे में भी अपनाता है।

अगर हिमांशु जोशी के राजनीतिक उपन्यास “समय साक्षी है” को देखें तो यह भूत काल का भी लगता है और हो सकता है कि सत्तर के दशक के जय प्रकाश आंदोलन से कुछ प्रेरणा उन्होने ली हो इस उपयास को रचते समय। जिन्होने यह उपन्यास पिछली सदी के अस्सी या नब्बे के दशकों में या नयी सदी के पहले दशक में पढ़ा हो उनके सामने यह उपन्यास ऐसी आदर्शवादी कल्पनायें लेकर आता है जहाँ लगता है कि काश ऐसा हो जाये।

लोकतंत्र में राजनीति से किनारा नहीं किया जा सकता। राजनीति और राजनीतिज्ञों की नैतिकता का स्तर किसी भी देश की समूची नैतिकता से जुड़ा होता है। अगर राजनेता ईमानदार हैं तो ऐसा हो नहीं सकता कि देश में भ्रष्टाचार फैल जाये क्योंकि वे बर्दाश्त ही नहीं करेंगे और भ्रष्टाचार करने वाले कर्मचारियों को और जब प्रशासन में ईमानदारी बसेगी तो बाकी जगह अपने आप ईमानदारी से काम होगा।

आदमी एक एकल ईकाई के रुप में ईमानदार नहीं भी हो तब भी अगर उच्च स्तरीय पदों पर ईमानदार लोग बैठे हैं और उसे पता है कि भ्रष्टाचार करने पर उसके लिये मुसीबत खड़ी हो सकती है तो वह हिम्मत ही नहीं करेगा भ्रष्ट आचरण दिखाने की।

भारत में मौजूदा समय में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में भारत के राजनेताओं के चरित्र में कितनी गिरावट आ गयी है। नैतिकता की बात उनके लिये बेमानी हो चुकी है।

भारतीय राजनीति, चुनावी राजनीति, दलगत राजनीति और राजनैतिक एवम समाज को झझकोरने वाले आंदोलन से सम्बंधित यह अपने तरह का एक अलग ही उपन्यास है। किसी किसी पृष्ठ पर ऐसा लगने लगता है कि भारतीय राजनीति की परतें कितनी गहराई से खुरची गयी हैं और इसकी शारीरिक और मानसिक बनावट का बड़ा गहरा अध्ययन किया गया है।

एक उदाहरण देखें- क्या लिखा गया है

समस्त राष्ट्र का भविष्य जब मात्र मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में समा जाता है तो अनेक जटिल समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। यदि उनके निर्णय दूरदर्शितापूर्ण न हों तो राष्ट्र को उनके दूरगामी प्रभावों के परिणाम झेलने के लिए भी विवश होना पड़ता है। भारत आज जिस संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है, उसका दायित्व इन्हीं राजनीतिज्ञों पर है, जिन्होंने राजनीति में से नीति को तिरोहित कर, जाने या अनजाने, चाहे या अनचाहे समस्त राष्ट्र के अस्तित्व को दाँव पर लगा दिया है। आए दिन चारों ओर जो हिंसा, जो रक्तपात जो विघटनकारी घटनाएँ घटित हो रही हैं, उसके मूल में कहीं ये ही कारण हैं कि मात्र अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उन्होंने किस तरह से समस्त राष्ट्र के हितों की बलि चढ़ा दी है।

हिमांशु जोशी उपन्यास की भूमिका में अपनी पैनी दृष्टि का परिचय देते हैं

राजनीति की भी कोई नीति नहीं होती है। नीति का परित्याग कर जब वह नीति अनीति का मार्ग अपनाने लगती है, तब उसके परिणाम घातक होते है- बड़े भयंकर। भारत के गत कुछ वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है।
आज़ादी के बाद लोगों के मन में नई आशाएं, आकांक्षाएं जागीं। सदियों से शोषित दीन-हीन जनों को लगा-उम्मीदों का नया सूरज उगने वाला है,
यातनाओं की काली रात बीतने वाली है।
वह नया सूरज उगा, परन्तु सबके लिए नहीं।
शायद इसलिए काल-रात्रि अभी भी शेष है।

अभी करोड़ों लोग हैं, जिन्हें एक वक्त का भोजन भरपेट नहीं मिल पाता। करोडों लोग हैं। जिनके पास सिर छुपाने के लिए छत नहीं। दो हाथ हैं, पर उन्हें देने के लिए काम नहीं। तन को ढकने के लिए पूरे वस्त्र नहीं, बीमार होने पर दबा नहीं-मरने पर कफन नहीं।
आज़ादी का सपना किसी सीमा तक साकार हुआ, परन्तु वास्तव में वह आज़ादी मिली कहां, जिसके लिए स्वाधीनता-सेनानियों ने लौह-कपाटों के भीतर नारकीय यातनाग्रहों में अपनी देह को गला दिया था, फांसी के तख्तों पर हंस-हंस कर झूलते हुए जीवन के उषाकाल में ही सन्ध्या का वरण कर लिया था। रोटी-रोटी के लिए मोहताज, भीख मांगते ऐसे बच्चे मैंने स्वयं देखे हैं, जिनके अभिभावक स्वाधीनता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे चुके थे। उन अनाम, अज्ञात शहीदों का क्या कहीं लेखा-जोखा है ? लेखा-जोखा उन्होंने चाहा भी न होगा, परन्तु उनके परिणामों का हिसाब आने वाली पीढ़ियां मागें तो उसे अनुचित भी नहीं कहूँगा।

देश के ‘भाग्य विधाता’ देश-सेवा के नाम पर क्या-क्या करते हैं ? अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किस तरह करोड़ों लोगो के भाग्य के साथ खिलवाड़ करते है ? भ्रष्टाचार्य सदाचार के आवरण में किस तरह प्रस्तुत किया जाता है-उसी ‘आदर्शोन्मुख’ समाज का चित्रण प्रस्तुत उपन्यास में किया गया है।

तिमिर वरन, मेघना, पी० पी० या अन्य पात्र काल्पनिक होते हुए भी काल्पनिक नहीं। भारतीय राजनीति से जो तनिक भी परिचित है, उन्हें पात्र भी सुपरिचित लगेंगे। उन्हें किसी-किसी रूप में आपने भी देखा होगा और आज भी देखते होंगे।
राजधानी में गत 25-26 साल से रहने के कारण राजनीति और राजनीतिज्ञों को तनिक निकट से देखने-परखने का मौका मिला। वे ही अनुभव और अनुभूतियां इसके लेखन में सहायक बनीं। कुछ घटनाएं आपको सत्य के इतने निकट लग सकती हैं कि हो सकता है, आप उन्हें सत्य ही मान लें। परन्तु अन्त में मैं यहीं कहूँगा कि मेरा उद्देश्य किसी की कमियों को, कमजोरियों को, रहस्यों को उजागर करके रस लेना नहीं रहा। हाँ जब इसे लिख रहा था, मेरी आंखों के सामने कोटि-कोटि संघर्षरत दीन-दुखियों का चित्र बार-बार अवश्य उभर आता था।

तथ्यों का उद्घाटन स्वयं में एक समस्या है। शायद इसलिए मैं महीनों तक आग के दरिया की धधकती लहरों से जूझता रहा। उन मित्रों का मैं कम आभारी नहीं जिन्होंने इसके लिए सामग्री जुटाने में हर तरह का जोखिम उठाकर मेरी सहायता की।

अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने से और आमरण अनशन करके अपने प्राणों को ताक पर रखने से उपन्यास समय साक्षी है, के तिमिर बारन की याद ताजा हो उठती है और जिस तरह से देश के युवावर्ग ने इस आंदोलन में शिरकत की है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो समय साक्षी है का अंतिम अध्याय दिल्ली में एक नाटक के रुप में खेला जा रहा हो।

जहाँ तिमिर वरन खुद एक राजनीतिज्ञ हैं और बरसों सत्ता में रहे हैं और अपने ही दल के विरोधियों द्वारा उनके खिलाफ किये जा रहे षडयंत्रों के खिलाफ वे उठ खड़े होते हैं। देश हित में वे सड़क पर उतर आते हैं और युवाओं का आह्वान करते हैं। देश को जगाते हैं और बुरी राजनीतिक ताकतों, जो कि देश के हितों के खिलाफ काम कर रही हैं, के खिलाफ आंदोलन छेड़ देते हैं और उसे एक जनांदोलन के रुप में विकसित कर देते हैं।

समय साक्षी है उपन्यास का अंश पढ़ें-

‘नहीं, नहीं यह नहीं होगा। आइ से न्नो ! दांत पीसते हुए तिमिर वरन गरजे। आँखें अंगारे की तरह धधक रही थीं। चेहरा तमतमा आया था। आवेश में सारा शरीर कांपने-सा लगा था।
मुट्ठी भींचते वह दहाड़ने लगे ‘मेरी प्रतिष्ठा पर आंच आई तो सबकी इज़्जत धूल में मिला दूँगा। देखता हूँ- मुझे मंत्रिमंडल से हटाकर कौन सत्ता में टिका रहता है !’ अन्तिम चेतावनी देते हुए वह उठे फाइल बगल में दबाकर, धोती का पल्लू संभालते हुए फटफट बाहर की ओर चल पड़े।
उन्हें इस तरह उत्तेजित देखते ही धूप में बैठा ड्राइवर घबरा उठा और सिगरेट का टोटा फेंकता हुआ गाड़ी की ओर लपका।
चमचमाती हुई, एक नीली-सी लम्बी कार फर्राटे से गेट की ओर मुड़ी और हवा को चीरती हुई, वारीन्द्र घोष मार्ग पर निकल पड़ी।

बैठक में भाग लेनेवाले संसदीय दल के सभी सदस्य  क्षण-भर के लिए सन्न रह गए। तिमिर वरन का यह विकराल रौद्र रूप सबके मन में एक अजीब-सी दहशत पैदा कर गया था। एक भयावनी आशंका की कहीं दल विघटन फिर न हो जाए! इस बार दल के विघटन का अर्थ था। घोर अराजकता, सैनिक-शासन या पूर्ण तानाशाही !
पर देश इसमें से किसी भी स्थिति के लिए तैयार न था।
तिमिर वरन के पीछे पन्द्रह बीस और सदस्य उठ खड़े हुए। एक-एक कार में पाँच छह-छह जन लदकर  उसी दिशा में बढ़े जिधर से तिमिर वरन की विदेश से आयात की गई, कीमती गाड़ी अभी-अभी गुज़री थी।

सत्तर वर्ष के तिमिर वरन आज न जाने किस तरह एक ही छलांग में तीन-तीन चार-चार सीढ़ियाँ पार कर गए थे। और दिन थोड़ा-सा पैदल चलने में उनका दम फूलने लगता था। वह बुरी तरह हांफने लगते थे। आवेश के कारण, आज उन्हें कुछ भी सूझ न रहा था।
तीर की तरह वह सीधे बैठक में गए। सचिव बर्मन पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया। सोफे पर फाइल पलटकर वह धम्म से कुर्सी पर बैठ गए।
‘यस्सर’ की भंगिमाव बनाए बर्मन हाथ में स्लिप वाली सफेद नोट-बुक उठाए, सिर झुकाए सामने खड़ा था।
‘जिन संसद-सदस्यों की सूची तुम्हें कल दी थी, उन्हें गाड़ियां भेजकर बुलाओ। अबरार से कहो कि एक नया  ड्राफ्ट तैयार करें फौरन।’

बर्मन चला गया तो उन्होंने एक लम्बी सांस ली। पाँवों को दूर तक पसारा और टोपी उतारकर मेज़ पर रख दी। देर तक उनका हाथ यों ही टोपी के ऊपर रखा रहा। फिर उनके गंजे सिर पर पहुँच गया, आँखें मूंदकर वह कुछ सोचने लगे।
अब भी उनका चेहरा तमतमा रहा था। अब तक उनका दम फूल रहा था। कभी इस तरह अपमानित किया जाएगा-उन्होंने सपने में भी न सोचा था।
अभी सुबह के नौ भी न बजे थे-चारों ओर घिरा धुंध-सी फैली थी। नमदे की तरह मोटे-मोटे घने काले बादलों से आसमान घिरा था। सर्दी के कारण बाहर निकलना कठिन था। फिर भी सड़कों पर भीड़ कम न थी। साइकलों और कारों की सचिवालय की ओर कतार-सी चली जा रही थी।

तिमिर वरन देर तक उसी मुद्रा में बैठे रहे। उनके विरुद्ध षडयंत्र का जाल निरंतर बुना जा रहा है, उन्हें इसका अहसास था। वह जानते थे, दल के लोग सरकार की नीतियों के कारण बहुत-से छोटे-छोटे गुटों में बट रहे हैं। दूसरी पार्टियों से भी बहुत-से लोग आ गए थे। जिनका एक अलग समुदाय बन रहा था। वे सत्ता को हथियाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे। तिमिर वरन के लिए यह सबसे बड़ा खतरा था। इस चुनौती का सामना करने के लिए उन्होंने भी कम चाले न चली थीं। अपनी तरफ से कहीं कोई कसर न रखी थी। किन्तु अब पासा पलट रहा था। धीरे-धीरे तिमिर वरन को शक्तिहीन करने की सुनियोजित योजना चल रही थी। उप-चुनावों में उनके ही दल के लोंगों ने, उनके समर्थक उम्मीदवारों को हराने के लिए विपक्ष के उम्मीदवारों का छिप-छिपकर समर्थन किया था। इस अभियान में उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली थी।

किन्तु तिमिर वरन भी कोई कच्चे खिलाड़ी न थे। विपक्ष के बहुत-से नेताओं से उनके आत्मीयता के गहरे सम्बन्ध थे। उन्होंने अपने ही दल के कम सदस्य-उम्मीदवारों की ज़मानते ज़ब्द नहीं करवाई थीं। बहुत-से लोग उनका आशीर्वीद प्राप्त कर संसद तक पहुँचने में सफल हुए थे। विपक्ष की बेचों पर  बैठने के बावजूद उन पर अगाध श्रद्धा रखते थे।
उनका व्यक्तित्व बर्फ से ढके ज्वालामुखी जैसा था। बाहर से जितने सौम्य-सन्त लगते थे, भीतर से उतने  ही रीति-नीति के धनी कूटनीतिज्ञ। खादी के साधारण-से कपड़े पावों में बेडोल की चप्पलें और सिर पर हिम श्रृंग की तरह जगमगाती शुभ्र स्वच्छ टोपी !  जब वह समाजवाद या गरीबी से दूर करने के नारे लगाते थे, तब लगता था, वाकई कोई भुक्त भोगी किसान अपने ही दुख-दर्द की बातें कर रहा है !

किसान-परिवार में अपने पैदा होने का उन्हें गर्व था।  मौंके-बेमौके इस तथ्य का उद्घाटन भी भूलते न थे। सोफे से धीरे से उठकर वह कमरे में ही चहलकदमी करने लगे। कमरे में किसी के भी प्रवेश की उन्होंने मनाही कर दी थी।
नई व्यूह-रचना के विषय में वह गम्भीरता से सोचने लगे। उन्हें-इस बार की पराजय का अर्थ है, राजनीति से पूर्ण संन्यास ! यानी कि उनकी राजनीतिक हत्या !

राजनीति से हटने से उन्हें एतराज न था। उम्र भी काफी हो गई थी। दस्तखत करते हुए हाथ कांपते थे। देर तक मीटिंग में बैठना भी कठिन लग रहा था। उस पर दिन रात टूर प्रोग्राम ! जन भाषाओं में भाषण तथा नित उठ खड़ी होने वाली नई-नई उलझने ! पर देश सेवा और जनहित के नाम पर वह वर्षों से इन यंत्रणाओं को सहते आ रहे थे। उनकी अन्तिम आकांक्षा थी कि कभी ऐसा संयोग हो और जनता  उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित कर, अपने पर  किए गए उनके उपकारों का बदला चुकाए तो संभवता वह इस गरीब देश की कुछ सेवा कर सकेंगे।

आज के परिपेक्ष्य में हिमांशु जोशी का उपन्यास- समय साक्षी है, बेहद प्रासंगिक हो उठा है और एक अच्छी कृति की पहचान यही है कि वह समय समय पर जीवित होता रहता है और भिन्न काल की पीढ़ियों को अपने से जोड़ता रहता है।

…[राकेश]

अप्रैल 19, 2011

बगुलाभगत आये रे!

वो जो बेचते थे
जहर अब तक,
सुना है
पहने झक सफेद कपड़े
डाले गले में आला
महामारी भगाने की
अपनी क्षमता का
विज्ञापन करते
घूम रहे हैं।

भटका दिये गये थे
बहुरुपिये के स्वर्ण मृग रुपी कौशल से राम
हर ली गयी थी
साधु वेश में आये रावण के छल से सीता
दौ सौ साल लूटा
दास बनाकर भारत को
झुककर व्यापार करने की
इजाज़त लेने आये लूटेरों ने।

विदेशी लूटेरे चले गये
विशालकाय तिजोरियाँ खाली छोड़कर
पर उन पर जल्द कब्जे हो गये
वे फिर से भरी रहने लगीं
देश फिर से लूटा जाने लगा,
लूटा जाता रहा है दशकों से।

डाकुओं के खिलाफ आवाज़ें उठी
तो
छलिये रुप बदल सामने आ गये हैं
जो कहते न थकते थे
“पैसा खुदा तो नहीं
पर खुदा की कसम
खुदा से कम भी नहीं”
वे कस्में खा रहे हैं
रुखी सूखी खायेंगे
पानी पीकर
देश का स्वास्थ्य ठीक करेंगे,
भ्रष्ट हो गया है
यह देश
इसे ठीक करेंगे!

होशियार
सियार हैं ये
शेर की खाल ओढ़े हुये
सामने से नहीं
आदतन फिर से
लोगों की
पीठ में ही खंजर भोकेंगे
लोगों की
मिट्टी की
गुल्लकें
ले भागेंगे
हजारों मील दूर रखी
अपनी तिजोरियाँ भरने के लिये।

जाग जाओ
वरना ये फिर ठगेंगे
इंतजार बेकार है
किसी भगीरथ का
जो लाकर दे पावन गंगा
अब तो हरेक को
अपने ही अंदर एक भगीरथ
जन्माना होगा
जो खुद को भी श्वेत धवल बनाये
और आसपास की गंदगी भी
दूर बहा दे।

पहचान लो इस बात को
डर गये हैं कुटिल भ्रष्टाचारी
धूर्तता दिखा रहे हैं
इनके झांसे में न आ जाना
इनका सिर्फ ऊपरी चोला ही सफेद है
ये हंस नहीं
जो दूध और पानी को अलग कर दें
बल्कि ये तो बगुलेभगत हैं
जो गिद्ध दृष्टि गड़ाये हुये हैं
देश की विरासत पर।

सावधान ये करेंगे
हर संभव प्रयास
जनता को बरगलाने का
ताकि बनी रहे इनकी सत्ता
आने वाले कई दशकों तक
दबा-कुचला रहे
आम आदमी इनकी
जूतियों तले
साँस भी ले
तो इनके रहमोकरम
का शुक्रिया अदा करके।

वक्त्त आ गया है जब
इन्हे जाल में फँसा कर
सीमित करनी होगी इनकी उड़ान
तभी लौट पायेगा
इस देश का आत्म सम्मान
असमंजस की घड़ियाँ गिनने का वक्त चला गया
यह अवसर है
धर्म युद्ध में हिस्सा लेने का
जीत हासिल कर
एक नये युग का सूत्रपात करने का।

…[राकेश]

फ़रवरी 12, 2011

खुश तो बहुत होगे आज इजिप्ट : रघुवीर सहाय

ऐसा हो जाता है कि लोग अपने आप को खुदा समझने लगते हैं और ऐसी गलतफहमी पाल बैठते हैं कि देश का भला केवल वे ही कर सकते हैं और जो उनके साथ नहीं हैं वे देश के दुश्मन हैं। ऐसे व्यक्त्ति भारत में भी हैं। और ऐसी संस्थायें भी भारत में भी हैं जो देशभक्त्ति पर अपना एकाधिकार समझती हैं और समझती हैं कि जो उनके तौर तरीकों का समर्थन नहीं करते वे भारतीय तो हैं ही नहीं बल्कि देशद्रोही हैं।

ऐसे नेता होते हैं जो सत्ता की शक्त्ति तो जनहित की लुभावनी बातें करके पाते हैं पर सत्ता की बागडोर पाने के बाद वे एकाधिकार प्राप्त करने की साजिश करते हैं और निरंकुशता की ओर बढ़ते जाते हैं। दुनिया का हर ऐशो आराम उन्हे मिल जाता है पर धीरे धीरे वे जनता से मिलने वाले सबसे जरुरी भाव खोते जाते हैं। जनता में उनके प्रति विश्वास और सम्मान खो जाता है और वे सिर्फ और सिर्फ सत्ता की निरंकुश शक्त्ति की बदौलत देश के शाषक बने रहते हैं।

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री वी. पी. सिंह ने सत्ता से चिपकने वाले नेताओं की ऐसी चिपकू प्रवृत्ति की तरफ इशारा करते हुये एक बड़ी अच्छी कविता लिखी थी।

उसने उसकी गली नहीं छोड़ी
अब भी वहीं चिपका है
फटे इश्तेहार की तरह
अच्छा हुआ मैं पहले
निकल आया
नहीं तो मेरा भी वही हाल होता।

एक वक्त्त आता है जब नेताओं को खुद ही नेतागिरी का भ्रम तोड़ देना चाहिये और सत्ता की राजनीति से दूर हट जाना चाहिये ताकि भरपूर ऊर्जा और नये विचारों एवम ताजगी से भरी नेतृत्व क्षमता आकर लोगों को नेतृत्व दे सके और भविष्य के समय का निर्माण कर सके।

होस्नी मुबारक सत्ता के गलियारे से खदेड़ दिये गये और अपनी भद पिटवा कर वे बाकी का जीवन एक कलंकित शाषक के रुप में जियेंगे।

परिवर्तन कुछ अच्छा ही लेकर आयेगा। रुके पानी के सड़ने से उत्पन्न दुर्गंध में कुछ कमी आयेगी। इजिप्ट कुछ आगे की ओर बढ़ेगा।

मुबारक की विदाई मुबारक साबित हो इजिप्ट के लिये।

कल तक जो जनता सड़कों पर संघर्ष कर रही थी। मुबारक की पुलिस की ज्यादतियाँ सहन कर रही थी आज वही जनता विजेता बनकर उन्ही सड़कों पर नाच रही है, जश्न मना रही है।

जीवन में आने वाले ऐसे ही मौकों के लिये ही तो रघुवीर सहाय ने एक बेशकीमती कविता की रचना की थी। उनकी कविता जीवन के पुनर्निमाण का उत्सव मनाती है।

आज फिर शुरु हुआ जीवन
आज मैंने एक छोटी सी सरल सी कविता पढ़ी
आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा
जी भर आज मैंने शीतल जल से स्नान किया
आज एक छोटी सी बच्ची आयी
किलक मेरे कंधे चढ़ी
आज मैंने आदि से अंत तक
एक पूरा गान किया
आज फिर जीवन शुरु हुआ।

पुनश्च : चित्र स्त्रोत – totallycoolpix.com

नवम्बर 28, 2010

विश्वनाथ प्रताप सिंह : कवि और चित्रकार

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को बहुत सारे लोग भारत के सबसे विवादास्पद प्रधानमंत्री भी कहेंगे।

27 नवम्बर श्री वी.पी सिंह की पुण्य तिथि है अगर वे जीवित होते तो इस साल 25 जून को उनका 79वाँ जन्म दिवस मनाया जाता।

लोकनायक जय प्रकाश नारायण के बाद वही ऐसे राजनेता हुये जिन्होने विपक्ष में रह कर भारत की राजनीति में भूचाल ला खड़ा किया।

अस्सी के दशक के अंत में मंडल कमीशन की सिफारिशों के विरुद्ध खम ठोक कर विरोध करने वाले लोग भी श्री वी.पी.सिंह को सिर्फ इसी एक मुद्दे के बलबूते नकार नहीं पायेंगे। अच्छा या बुरा जैसा भी रहा हो उनके द्वारा उठाये गये कदम का परिणाम पर उनके कदम ने भारत की राजनीति की दिशा ही बदल दी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

इतिहास ऐसे मुँह नहीं मोड़ सकता भारत के पिछले साठ साल के एक ऐसे राजनेता से जिन्होने ईमानदारी के नाम पर सत्ता हासिल करके दिखा दी। जून जुलाई की भयानक गर्मी में मोटर साइकिल पर सवार होकर उन्होने इलाहाबाद में चुनाव प्रचार किया था और अमिताभ बच्चन द्वारा इस्तीफा दिये जाने से खाली हुयी सीट पर हुये उपचुनाव में श्री लाल बहादुर शास्त्री के सुपुत्र श्री सुनील शास्त्री को हराया था। एसी में बैठ रणनीति बनाने वाले नेताओं के बलबूते की चीज नहीं है ऐसा परिश्रम।

नब्बे के दशक में खुद उनके पास चलकर गया प्रधानमंत्री पद सम्भालने का प्रस्ताव, जिसे उन्होने स्वास्थ्य कारणों से ठुकरा दिया। विरोधाभास निस्संदेह उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था। युवावस्था में ही अपनी रियासत की बहुत सारी जमीन उन्होने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से प्रेरित होकर दान कर दी थी। देहरादून में अपनी करोड़ों अरबों की जमीन उन्होने ऐसे ही छोड़ दी उन लोगों के पास जो नाममात्र का किराया देकर वहाँ दुकानें आदि चलाते थे। श्री वी.पी सिंह उन बिरले राजनेताओं में से रहे हैं जिन पर धन के भ्रष्टाचार का आरोप कोई नहीं लगा सकता।

उन्हे सिर्फ एक राजनेता ही नहीं कहा जा सकता। श्री वी.पी सिंह में कई व्यक्तित्व दिखायी देते हैं और उन्हे सिर्फ किसी एक मुद्दे पर खारिज नहीं किया जा सकता। वे एक बेहतरीन कवि, लेखक, चित्रकार और फोटोग्राफर भी थे।

राजा नहीं फकीर है
देश की तकदीर है

का बेहद सटीक नारा गढ़ने वाला व्यक्ति बेहद सक्रिय और तीक्ष्ण बुद्धि का मालिक रहा होगा जिसकी लेखन क्षमता के बारे में संदेह नहीं किया जा सकता।

मंडल कमीशन लागू करने के सामाजिक और राजनीतिक निर्णय ने उनके व्यक्तित्व को बहुत हद तक भ्रम भरे बादलों के पीछे ढ़क दिया है। उनके राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन राजनीतिक इतिहास लिखने वाले लोग करेंगे पर राजनीति से परे उनके अंदर के कलाकार पर तो लेखक और कलाकार समुदाय निगाह डाल ही सकता है।

उनकी कविता में गहरे भाव रहे हैं। उन्होने तात्कालिक परिस्थितियों से उपजी कवितायें भी लिखीं जो काल से परे जाकर भी प्रभाव छोड़ने की माद्दा रखती हैं।

कांग्रेस से इस्तीफा देते समय उन्होने यह कविता भी रची थी।

तुम मुझे क्या खरीदोगे
मैं बिल्कुल मुफ्त हूँ

उनकी कविता आधुनिक है, उसमें हास-परिहास, चुटीलापन भी है और व्यंग्य भी। उनकी कविता बहुअर्थी भी है। बानगी देखिये।

काश उसका दिल एक थर्मस होता
एक बार चाह भरी
गरम की गरम बनी रहती
पर कमबख्त यह केतली निकली।

वे नेताओं के राजनीतिक जीवन की सांझ के दिनों पर भी कविता लिखे बिना नहीं माने।

उसने उसकी गली नहीं छोड़ी
अब भी वहीं चिपका है
फटे इश्तेहार की तरह
अच्छा हुआ मैं पहले
निकल आया
नहीं तो मेरा भी वही हाल होता।

कविता भारत के लगभग हर नेता के जीवन का सच उजागर कर देती है।

आदर्शवाद उनकी कविताओं में भी छलकता है और शायद इसी आदर्शवाद ने उन्हे राजनीति में कुछ खास निर्णय लेने के लिये प्रेरित किया होगा।

निम्नलिखित कविता में नेतृत्व को लेकर कितनी बड़ी बात वे कह गये हैं।

मैं और वक्त
काफिले के आगे-आगे चले
चौराहे पर …
मैं एक ओर मुड़ा
बाकी वक्त के साथ चले गये।

मनुष्य की अंहकार भरी प्रकृति और खासतौर पर समाज में शक्तिशाली व्यक्ति के हथकंडों पर उन्होने एक बेहतरीन कविता लिखी थी।

भगवान हर जगह है
इसलिये जब भी जी चाहता है
मैं उन्हे मुट्ठी में कर लेता हूँ
तुम भी कर सकते हो
हमारे तुम्हारे भगवान में
कौन महान है
निर्भर करता है
किसकी मुट्ठी बलवान है।

मानव मस्तिष्क के अंधेरे बंद कोनों को भी खूब खंगाला उन्होने और कविताओं और पेंटिंग्स के माध्यम से उन्हे अभिव्यक्ति दी।

निराशा का भाव भी उनकी कविताओं में झलकता है और वैराग्य का भाव भी किसी किसी कविता के माध्यम से बाहर आ जाता है।

उनकी एक कविता है मुफ़लिस, जो राजनेता के रुप में उनकी मनोदशा को बहुत अच्छे ढ़ंग से दर्शाती है।

मुफ़लिस से
अब चोर बन रहा हूँ मैं
पर
इस भरे बाज़ार से
चुराऊँ क्या
यहाँ वही चीजें सजी हैं
जिन्हे लुटाकर
मैं मुफ़लिस बन चुका हूँ।

जुलाई 18, 2010

नेता पुराण

विशेषण के वर्गीकरण पर जायें तो ये नेता जी हैं तो उसी बिरादरी के जिसके कभी मनोहर श्याम जोशी जी के “नेताजी कहिन” वाले नेता जी हुआ करते थे पर तब से अब तक यमुना एक गंदे नाले में बदल चुकी है, गंगा में भी प्रदुषण नियंत्रण वालो ने बीओडी सीओडी नापना मापना छोड़ दिया है और बहुत से लोग मान चुके हैं कि अब गंगा किनारे वाली सभ्यता समाप्ति की ओर बह रही है।

सो जब इतने बदलाव आ चुके हैं तो नयी पीढ़ी के नेता जी के रुप, आकार, प्रकृति, प्रवृति और बुद्धि, लालच, क्षमता आदि में भी बदलाव आने स्वाभाविक हैं। विशाल भारद्वाज ने संभवत: अपनी पिछली फिल्म का शीर्षक इन्ही नेता जी के करमों और व्यक्तित्व से उधार लिया होगा। कमीनियत इनमें कूट कूट कर भरी है। इस गुण का हाल ये है कि एक बार इनके एक विरोधी, जो हालाँकि इन्ही की पार्टी के वरिष्ठ सदस्य हैं, ने इनसे नाराज होकर इन्हे डपट दिया था,” क्या कुत्ते की तरह भौंक रहे हो “।

उनका पालतू कुत्ता वहीं खड़ा था वह इस तुलना से इतना नाराज हो गया कि मालिक को काटा तो नहीं पर उनकी वेशभूषा को जरुर तार तार करके डिजायनर वेयर का एक नया और नायाब किस्म का नमूना बना दिया और उनके शरीर पर भी यहाँ वहाँ पंजों से खरोंचे मार दी।

वो तो ये वक्त पर संभल गये वरना कुछ समय पहले इनकी चमचा पार्टी ने तो बाकायदा इन्हे पटा ही लिया था कि कमीनीगिरी के कुछ गुरों पर वर्ल्ड पेटेंट ले लिया जाये। इनके भतीजे ने जो दुनिया के बहुत सारे देशों में भारतीय फिल्मों की पायरेटेड डीवीडी के व्यापार में अच्छा बड़ा हिस्सेदार है, ने इन्हे बता दिया कि चचा क्या कर रहे हो आपसे बड़े बड़े कमीने वैश्विक राजनीति में पड़े हैं और आपकी एप्लीकेशन रिजेक्ट होने के बहुत चांसेज हैं और आपकी जो भी इज्जत है वहाँ इंडिया में उसका फालूदा बन जायेगा, लोग खायेंगे और डकार तक न लेंगे।

नेता जी ने एक बार एक आंदोलन के नाम पर जनता से करोड़ों रुपये जमा कर लिये थे और आज तक किसी को पता नहीं कि उस धन का क्या हुआ। जाने किस की कृपा से एक बार नेता जी, मंत्री भी बन गये थे, उस दौरान सुबह ही झक सफेद कपड़े पहन, माथे पर टीका लगा कर वे कुर्सी पर विराजमान हो जाते थे और अपने चेलों के साथ दिन भर कैसे ज्यादा से ज्यादा धन कमाया जाये इसकी जुगत भिड़ाते रहते थे और मौका मिलते ही पत्रकारों को दी गयी बोलियों की मार्फत हर उस आदमी को हड़काई भेजते रहते थे जो उन्हे भ्रष्टाचार में लिप्त बताता था।

नेता जी की सीनाजोरी का हाल ये रहा है कि एक बार इन्ही की पार्टी की नगर पालिका के स्तर की युवा नेत्री ने इन पर जबरदस्ती शारीरिक शोषण का आरोप लगाया तो इन्होने उसे ही चरित्रहीन बता दिया था और कहा था कि ऐसी स्त्री उनके चरित्र हनन का प्रयास कर रही है। मामला अदालत में जाने तक तो खबरें छपती रहीं बाद में जनता भूल गयी और नेत्री कहाँ गायब हो गयी कोई नहीं जानता।

कुछ समय लो प्रोफाइल रहने के बाद नेता जी फिर सक्रिय राजनीति में अपने गुर दिखाने और अपने खुरों की धार आजमाने पूरे जोर शोर से आ गये और विरोधियों को चुनौती देने लगे कि वे तो खुला खेल फरुखाबादी खेलने आये हैं, जिसमें दम हो सामने आ जाये।

गले में बड़े बड़े रुद्राक्षों के मनकों वाली माला, दोनों हाथों की ऊँगलियों में कम से कम आधा दर्जन अँगूठियाँ पहन किसी तरह से उन्होने अपने दल में महासचिव का पद हथिया लिया और साथ ही उन्होने जुगाड़ कर लिया कि टीवी आदि पर बहस में भी वे दल की तरफ से हिस्सा लेंगे।

एक राज्य में चुनाव होने वाले थे और एक्जिट पोल्स ने इनके दल की हार की संभावना व्यक्त की थी तो इन्होने सारे ऐसे पोल्स को झूठा और विपक्षियों की साजिश बताया। वे कैमरे के सामने  एक्जिट पोल करने वाली संस्थाओं एवम विपक्षी दलों को गरियाते रहे।

हल्ले गुल्ले के मध्य चुनाव हो गये और नेता जी महाश्य टीवी स्टूडियो में चल रहे चुनाव नतीजों पर आधारित कार्यक्रम में शामिल हो गये। चुनाव के नतीजे आने से पहले से ही उन्होने रट लगानी शुरु कर दी थी कि उनके दल को दो तिहाई बहुमत मिलने जा रहा है और उनका दल ही सरकार बनायेगा।

चुनाव नतीजे आने शुरु हुये, वे टीवी पर ही विपक्षी दलों के सदुस्यों से झगड़ा करते रहे। वे एक ही बात बोले जा रहे थे कि उनका दल दो तिहाई बहुमत लेकर रहेगा।

यहाँ तक कि केवल पांच छह सीटों के चुनाव नतीजे रह गये थे और अब तक के नतीजों में उनके दल को बहुमत तो छोड़िये चालीस प्रतिशत सीटे ही मिली थीं। जब चुनाव चर्चा का संचालन कर रहे टीवी जर्नलिस्ट ने उनसे पूछा कि अब आपका क्या कहना है तो तब भी नेता जी दावे कर रहे थे कि उन्हे ही बहुमत मिलेगा।

जर्नलिस्ट ने उन्हे याद दिलाया कि नेता जी गणित पर भी तो ध्यान दीजिये तो नेता जी गरज कर बोले, ये गणित वणित क्या होता है, हमारा दल ही बहुमत से जीतेगा और दो तिहाई बहुमत हमें मिलेगा।

जर्नलिस्ट और विपक्षी दलों के सदस्यों के लिये तो मुश्किल था ही वहाँ स्टूडियो में हँसी रोक पाना, जनता जरुर टीवी पर नेता जी के दावे सुन सुन कर हँस हँस कर दुहरी हुयी जा रही थी।

अगले दिन नेता जी ने प्रेस कांफ्रेंस करके घोषणा कर दी कि चुनाव में धाँधली हुयी है। जब पत्रकारों ने उन्हे याद दिलाया कि पर नेता जी राज्य में सरकार तो आपके ही दल की थी तब दूसरे दल कैसे धाँधली कर सकते हैं तो उन्होने आरोप लगा दिया कि केन्द्र सरकार ने जनता के साथ मिलकर उनके दल के खिलाफ साजिश की है वरना अगर ढ़ंग से निष्पक्ष ढ़ंग से चुनाव हुये होते और ईमानदारी से वोटों की गिनती हुयी होती तो उनके दल को दो तिहाई बहुमत मिलना तय था।

इनके अपने दल में समीकरण कुछ ऐसे पलटे कि इन्हे और इनके जैसे कुछ नेताओं को हाशिये पर डाल दिया गया। ये बहुत कुलबुलाये, बहुत बिलबिलाये पर इनकी ज्यादा चली नहीं।
समीकरण फिर पलटे हैं और वे फिर से कुछ सक्रिय हुये हैं, देखें अब इस बार की पारी में वे क्या गुल खिलाते हैं?

…[राकेश]

मई 5, 2010

भारतीय राजनीति : एक क्विज

क्या आप पहचान सकते हैं कि प्रत्येक प्रश्न के पीछे कौन सा नाम/व्यक्ति छुपा है?

(1) बी एच यू में पढ़ने के दौरान फीस बढ़ने के विरुद्ध इन्होने छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया और बाद में बरसों राष्ट्रीय राजनीति में शिखर पर रहे।

भारत  सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध किया और कुछ माह जेल में रहे और वहाँ डायरी लिखी जो बाद में प्रकाशित हुयी और इस पुस्तक को

काफी प्रसिद्धि मिली।

(2) देश के प्रधानमंत्री द्वारा संसद में किसी खास परिस्थिति पर बयान देने पर इन्होने अपने गंजे सिर की और इशारा करते हुये कहा कि यहाँ भी कुछ नहीं उगता तो क्या इसका कोई महत्व नहीं है?

(3) देश के प्रधानमंत्री से मतभेद होने पर क्षुब्ध होकर उनके खिलाफ राजनीतिक लड़ाई लड़ते हुये इन्होने निम्नलिखित कविता लिखी।

तुम मुझे क्या खरीदोगे, मै बिल्कुल मुफ्त हूँ

(4)मैं जब उनसे मिलने प्रधानमंत्री निवास गया तो वे फर्श पर बैठे अपना काम करने में तल्लीन थे और मुझे ऐसा लगा  जैसे देश का कोई किसान बैठा

कुछ कर रहा है ” किसने ये किसके बारे में कहा था।

(5) किस भारतीय प्रधानमंत्री ने एक अंतर्राष्ट्रीय टीवी पर साक्षात्कार देते समय कहा, “क्या हम जनसंहार होने दें, उन्हे महिलाओं को उनके घर वालों के

सामने बलात्कार करते रहने दें। आप मुझे एक बात बताऎं जब हिटलर जर्मनी में यहूदियों के सफाये में लगा हुआ था तो क्या यूरोप और अमेरिका

आदि हाथ पर हाथ रखॆ बैठे रहे कि उसे कुछ भी करने दो“?

(6) किस मानव संसाधन मंत्री ने आई आई टी शिक्षण संस्थानों की आलोचना की और खास तौर पर देश में काम न आने वाले शोध कार्य को लेकर?

(7) किस भारतीय नेता को उनकी युवावस्था (तब वे राजनीति में नहीं थे) में फिल्म अभिनेता महमूद ने एक एयरपोर्ट पर अपनी अगामी फिल्म में काम

करने का प्रस्ताव दिया था|  वे उनकी असली पहचान नहीं जानते थे?

(8) कौन से स्वास्थ्य मंत्री थे जो संसद साइकिल पर सवार होकर जाते थे?

(9) ये लगभग सबसे बड़ी उम्र में केन्द्र में मंत्री रहे और उम्र का प्रश्न उठने पर इन्होने समुद्र में नौसेना के दो जहाजों के बीच का रास्ता रस्से पर लटक कर तय किया।

(10)वतन को माँ को प्यार करने वाले जज्बे से ज्यादा लैला को

दीवानगी  की हद तक मोहब्बत करने वाले जज्बे की जरुरत है

किस नेता ने ये बयान दिया था जिस पर बहुत शोर मचा था?

(11)आइ हैव रिगेन्ड माय फ्रीडमकिस राष्ट्रीय राजनेता ने अपनी सरकार गिरने के बाद इस्तीफा देने के बाद कहा?

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 44 other followers