Archive for ‘राकेश’

अगस्त 28, 2011

समय साक्षी है : हिमांशु जोशी का भविष्योन्मुखी उपन्यास आज के परिपेक्ष्य में


लेखक निस्संदेह समाज के अन्य वर्गों की तुलना में करवट लेते समय को ज्यादा गहराई से समझ पाता है, वह आने वाले समय की आहट, और लोगों से पहले ही सुन लेता है। लेखक, अगर भूतकाल में घटी घटनाओं पर भी कुछ लिखता है तो वह गहराई से उस भूतकाल और उस समय हुये घटित का विश्लेषण करता है। यही पैनी दृष्टि और विश्लेषण क्षमता वह वर्तमान में घटित हो रहे घटनाक्रमों के बारे में भी अपनाता है।

अगर हिमांशु जोशी के राजनीतिक उपन्यास “समय साक्षी है” को देखें तो यह भूत काल का भी लगता है और हो सकता है कि सत्तर के दशक के जय प्रकाश आंदोलन से कुछ प्रेरणा उन्होने ली हो इस उपयास को रचते समय। जिन्होने यह उपन्यास पिछली सदी के अस्सी या नब्बे के दशकों में या नयी सदी के पहले दशक में पढ़ा हो उनके सामने यह उपन्यास ऐसी आदर्शवादी कल्पनायें लेकर आता है जहाँ लगता है कि काश ऐसा हो जाये।

लोकतंत्र में राजनीति से किनारा नहीं किया जा सकता। राजनीति और राजनीतिज्ञों की नैतिकता का स्तर किसी भी देश की समूची नैतिकता से जुड़ा होता है। अगर राजनेता ईमानदार हैं तो ऐसा हो नहीं सकता कि देश में भ्रष्टाचार फैल जाये क्योंकि वे बर्दाश्त ही नहीं करेंगे और भ्रष्टाचार करने वाले कर्मचारियों को और जब प्रशासन में ईमानदारी बसेगी तो बाकी जगह अपने आप ईमानदारी से काम होगा।

आदमी एक एकल ईकाई के रुप में ईमानदार नहीं भी हो तब भी अगर उच्च स्तरीय पदों पर ईमानदार लोग बैठे हैं और उसे पता है कि भ्रष्टाचार करने पर उसके लिये मुसीबत खड़ी हो सकती है तो वह हिम्मत ही नहीं करेगा भ्रष्ट आचरण दिखाने की।

भारत में मौजूदा समय में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में भारत के राजनेताओं के चरित्र में कितनी गिरावट आ गयी है। नैतिकता की बात उनके लिये बेमानी हो चुकी है।

भारतीय राजनीति, चुनावी राजनीति, दलगत राजनीति और राजनैतिक एवम समाज को झझकोरने वाले आंदोलन से सम्बंधित यह अपने तरह का एक अलग ही उपन्यास है। किसी किसी पृष्ठ पर ऐसा लगने लगता है कि भारतीय राजनीति की परतें कितनी गहराई से खुरची गयी हैं और इसकी शारीरिक और मानसिक बनावट का बड़ा गहरा अध्ययन किया गया है।

एक उदाहरण देखें- क्या लिखा गया है

समस्त राष्ट्र का भविष्य जब मात्र मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में समा जाता है तो अनेक जटिल समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। यदि उनके निर्णय दूरदर्शितापूर्ण न हों तो राष्ट्र को उनके दूरगामी प्रभावों के परिणाम झेलने के लिए भी विवश होना पड़ता है। भारत आज जिस संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है, उसका दायित्व इन्हीं राजनीतिज्ञों पर है, जिन्होंने राजनीति में से नीति को तिरोहित कर, जाने या अनजाने, चाहे या अनचाहे समस्त राष्ट्र के अस्तित्व को दाँव पर लगा दिया है। आए दिन चारों ओर जो हिंसा, जो रक्तपात जो विघटनकारी घटनाएँ घटित हो रही हैं, उसके मूल में कहीं ये ही कारण हैं कि मात्र अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उन्होंने किस तरह से समस्त राष्ट्र के हितों की बलि चढ़ा दी है।

हिमांशु जोशी उपन्यास की भूमिका में अपनी पैनी दृष्टि का परिचय देते हैं

राजनीति की भी कोई नीति नहीं होती है। नीति का परित्याग कर जब वह नीति अनीति का मार्ग अपनाने लगती है, तब उसके परिणाम घातक होते है- बड़े भयंकर। भारत के गत कुछ वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है।
आज़ादी के बाद लोगों के मन में नई आशाएं, आकांक्षाएं जागीं। सदियों से शोषित दीन-हीन जनों को लगा-उम्मीदों का नया सूरज उगने वाला है,
यातनाओं की काली रात बीतने वाली है।
वह नया सूरज उगा, परन्तु सबके लिए नहीं।
शायद इसलिए काल-रात्रि अभी भी शेष है।

अभी करोड़ों लोग हैं, जिन्हें एक वक्त का भोजन भरपेट नहीं मिल पाता। करोडों लोग हैं। जिनके पास सिर छुपाने के लिए छत नहीं। दो हाथ हैं, पर उन्हें देने के लिए काम नहीं। तन को ढकने के लिए पूरे वस्त्र नहीं, बीमार होने पर दबा नहीं-मरने पर कफन नहीं।
आज़ादी का सपना किसी सीमा तक साकार हुआ, परन्तु वास्तव में वह आज़ादी मिली कहां, जिसके लिए स्वाधीनता-सेनानियों ने लौह-कपाटों के भीतर नारकीय यातनाग्रहों में अपनी देह को गला दिया था, फांसी के तख्तों पर हंस-हंस कर झूलते हुए जीवन के उषाकाल में ही सन्ध्या का वरण कर लिया था। रोटी-रोटी के लिए मोहताज, भीख मांगते ऐसे बच्चे मैंने स्वयं देखे हैं, जिनके अभिभावक स्वाधीनता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे चुके थे। उन अनाम, अज्ञात शहीदों का क्या कहीं लेखा-जोखा है ? लेखा-जोखा उन्होंने चाहा भी न होगा, परन्तु उनके परिणामों का हिसाब आने वाली पीढ़ियां मागें तो उसे अनुचित भी नहीं कहूँगा।

देश के ‘भाग्य विधाता’ देश-सेवा के नाम पर क्या-क्या करते हैं ? अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किस तरह करोड़ों लोगो के भाग्य के साथ खिलवाड़ करते है ? भ्रष्टाचार्य सदाचार के आवरण में किस तरह प्रस्तुत किया जाता है-उसी ‘आदर्शोन्मुख’ समाज का चित्रण प्रस्तुत उपन्यास में किया गया है।

तिमिर वरन, मेघना, पी० पी० या अन्य पात्र काल्पनिक होते हुए भी काल्पनिक नहीं। भारतीय राजनीति से जो तनिक भी परिचित है, उन्हें पात्र भी सुपरिचित लगेंगे। उन्हें किसी-किसी रूप में आपने भी देखा होगा और आज भी देखते होंगे।
राजधानी में गत 25-26 साल से रहने के कारण राजनीति और राजनीतिज्ञों को तनिक निकट से देखने-परखने का मौका मिला। वे ही अनुभव और अनुभूतियां इसके लेखन में सहायक बनीं। कुछ घटनाएं आपको सत्य के इतने निकट लग सकती हैं कि हो सकता है, आप उन्हें सत्य ही मान लें। परन्तु अन्त में मैं यहीं कहूँगा कि मेरा उद्देश्य किसी की कमियों को, कमजोरियों को, रहस्यों को उजागर करके रस लेना नहीं रहा। हाँ जब इसे लिख रहा था, मेरी आंखों के सामने कोटि-कोटि संघर्षरत दीन-दुखियों का चित्र बार-बार अवश्य उभर आता था।

तथ्यों का उद्घाटन स्वयं में एक समस्या है। शायद इसलिए मैं महीनों तक आग के दरिया की धधकती लहरों से जूझता रहा। उन मित्रों का मैं कम आभारी नहीं जिन्होंने इसके लिए सामग्री जुटाने में हर तरह का जोखिम उठाकर मेरी सहायता की।

अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने से और आमरण अनशन करके अपने प्राणों को ताक पर रखने से उपन्यास समय साक्षी है, के तिमिर बारन की याद ताजा हो उठती है और जिस तरह से देश के युवावर्ग ने इस आंदोलन में शिरकत की है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो समय साक्षी है का अंतिम अध्याय दिल्ली में एक नाटक के रुप में खेला जा रहा हो।

जहाँ तिमिर वरन खुद एक राजनीतिज्ञ हैं और बरसों सत्ता में रहे हैं और अपने ही दल के विरोधियों द्वारा उनके खिलाफ किये जा रहे षडयंत्रों के खिलाफ वे उठ खड़े होते हैं। देश हित में वे सड़क पर उतर आते हैं और युवाओं का आह्वान करते हैं। देश को जगाते हैं और बुरी राजनीतिक ताकतों, जो कि देश के हितों के खिलाफ काम कर रही हैं, के खिलाफ आंदोलन छेड़ देते हैं और उसे एक जनांदोलन के रुप में विकसित कर देते हैं।

समय साक्षी है उपन्यास का अंश पढ़ें-

‘नहीं, नहीं यह नहीं होगा। आइ से न्नो ! दांत पीसते हुए तिमिर वरन गरजे। आँखें अंगारे की तरह धधक रही थीं। चेहरा तमतमा आया था। आवेश में सारा शरीर कांपने-सा लगा था।
मुट्ठी भींचते वह दहाड़ने लगे ‘मेरी प्रतिष्ठा पर आंच आई तो सबकी इज़्जत धूल में मिला दूँगा। देखता हूँ- मुझे मंत्रिमंडल से हटाकर कौन सत्ता में टिका रहता है !’ अन्तिम चेतावनी देते हुए वह उठे फाइल बगल में दबाकर, धोती का पल्लू संभालते हुए फटफट बाहर की ओर चल पड़े।
उन्हें इस तरह उत्तेजित देखते ही धूप में बैठा ड्राइवर घबरा उठा और सिगरेट का टोटा फेंकता हुआ गाड़ी की ओर लपका।
चमचमाती हुई, एक नीली-सी लम्बी कार फर्राटे से गेट की ओर मुड़ी और हवा को चीरती हुई, वारीन्द्र घोष मार्ग पर निकल पड़ी।

बैठक में भाग लेनेवाले संसदीय दल के सभी सदस्य  क्षण-भर के लिए सन्न रह गए। तिमिर वरन का यह विकराल रौद्र रूप सबके मन में एक अजीब-सी दहशत पैदा कर गया था। एक भयावनी आशंका की कहीं दल विघटन फिर न हो जाए! इस बार दल के विघटन का अर्थ था। घोर अराजकता, सैनिक-शासन या पूर्ण तानाशाही !
पर देश इसमें से किसी भी स्थिति के लिए तैयार न था।
तिमिर वरन के पीछे पन्द्रह बीस और सदस्य उठ खड़े हुए। एक-एक कार में पाँच छह-छह जन लदकर  उसी दिशा में बढ़े जिधर से तिमिर वरन की विदेश से आयात की गई, कीमती गाड़ी अभी-अभी गुज़री थी।

सत्तर वर्ष के तिमिर वरन आज न जाने किस तरह एक ही छलांग में तीन-तीन चार-चार सीढ़ियाँ पार कर गए थे। और दिन थोड़ा-सा पैदल चलने में उनका दम फूलने लगता था। वह बुरी तरह हांफने लगते थे। आवेश के कारण, आज उन्हें कुछ भी सूझ न रहा था।
तीर की तरह वह सीधे बैठक में गए। सचिव बर्मन पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया। सोफे पर फाइल पलटकर वह धम्म से कुर्सी पर बैठ गए।
‘यस्सर’ की भंगिमाव बनाए बर्मन हाथ में स्लिप वाली सफेद नोट-बुक उठाए, सिर झुकाए सामने खड़ा था।
‘जिन संसद-सदस्यों की सूची तुम्हें कल दी थी, उन्हें गाड़ियां भेजकर बुलाओ। अबरार से कहो कि एक नया  ड्राफ्ट तैयार करें फौरन।’

बर्मन चला गया तो उन्होंने एक लम्बी सांस ली। पाँवों को दूर तक पसारा और टोपी उतारकर मेज़ पर रख दी। देर तक उनका हाथ यों ही टोपी के ऊपर रखा रहा। फिर उनके गंजे सिर पर पहुँच गया, आँखें मूंदकर वह कुछ सोचने लगे।
अब भी उनका चेहरा तमतमा रहा था। अब तक उनका दम फूल रहा था। कभी इस तरह अपमानित किया जाएगा-उन्होंने सपने में भी न सोचा था।
अभी सुबह के नौ भी न बजे थे-चारों ओर घिरा धुंध-सी फैली थी। नमदे की तरह मोटे-मोटे घने काले बादलों से आसमान घिरा था। सर्दी के कारण बाहर निकलना कठिन था। फिर भी सड़कों पर भीड़ कम न थी। साइकलों और कारों की सचिवालय की ओर कतार-सी चली जा रही थी।

तिमिर वरन देर तक उसी मुद्रा में बैठे रहे। उनके विरुद्ध षडयंत्र का जाल निरंतर बुना जा रहा है, उन्हें इसका अहसास था। वह जानते थे, दल के लोग सरकार की नीतियों के कारण बहुत-से छोटे-छोटे गुटों में बट रहे हैं। दूसरी पार्टियों से भी बहुत-से लोग आ गए थे। जिनका एक अलग समुदाय बन रहा था। वे सत्ता को हथियाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे। तिमिर वरन के लिए यह सबसे बड़ा खतरा था। इस चुनौती का सामना करने के लिए उन्होंने भी कम चाले न चली थीं। अपनी तरफ से कहीं कोई कसर न रखी थी। किन्तु अब पासा पलट रहा था। धीरे-धीरे तिमिर वरन को शक्तिहीन करने की सुनियोजित योजना चल रही थी। उप-चुनावों में उनके ही दल के लोंगों ने, उनके समर्थक उम्मीदवारों को हराने के लिए विपक्ष के उम्मीदवारों का छिप-छिपकर समर्थन किया था। इस अभियान में उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली थी।

किन्तु तिमिर वरन भी कोई कच्चे खिलाड़ी न थे। विपक्ष के बहुत-से नेताओं से उनके आत्मीयता के गहरे सम्बन्ध थे। उन्होंने अपने ही दल के कम सदस्य-उम्मीदवारों की ज़मानते ज़ब्द नहीं करवाई थीं। बहुत-से लोग उनका आशीर्वीद प्राप्त कर संसद तक पहुँचने में सफल हुए थे। विपक्ष की बेचों पर  बैठने के बावजूद उन पर अगाध श्रद्धा रखते थे।
उनका व्यक्तित्व बर्फ से ढके ज्वालामुखी जैसा था। बाहर से जितने सौम्य-सन्त लगते थे, भीतर से उतने  ही रीति-नीति के धनी कूटनीतिज्ञ। खादी के साधारण-से कपड़े पावों में बेडोल की चप्पलें और सिर पर हिम श्रृंग की तरह जगमगाती शुभ्र स्वच्छ टोपी !  जब वह समाजवाद या गरीबी से दूर करने के नारे लगाते थे, तब लगता था, वाकई कोई भुक्त भोगी किसान अपने ही दुख-दर्द की बातें कर रहा है !

किसान-परिवार में अपने पैदा होने का उन्हें गर्व था।  मौंके-बेमौके इस तथ्य का उद्घाटन भी भूलते न थे। सोफे से धीरे से उठकर वह कमरे में ही चहलकदमी करने लगे। कमरे में किसी के भी प्रवेश की उन्होंने मनाही कर दी थी।
नई व्यूह-रचना के विषय में वह गम्भीरता से सोचने लगे। उन्हें-इस बार की पराजय का अर्थ है, राजनीति से पूर्ण संन्यास ! यानी कि उनकी राजनीतिक हत्या !

राजनीति से हटने से उन्हें एतराज न था। उम्र भी काफी हो गई थी। दस्तखत करते हुए हाथ कांपते थे। देर तक मीटिंग में बैठना भी कठिन लग रहा था। उस पर दिन रात टूर प्रोग्राम ! जन भाषाओं में भाषण तथा नित उठ खड़ी होने वाली नई-नई उलझने ! पर देश सेवा और जनहित के नाम पर वह वर्षों से इन यंत्रणाओं को सहते आ रहे थे। उनकी अन्तिम आकांक्षा थी कि कभी ऐसा संयोग हो और जनता  उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित कर, अपने पर  किए गए उनके उपकारों का बदला चुकाए तो संभवता वह इस गरीब देश की कुछ सेवा कर सकेंगे।

आज के परिपेक्ष्य में हिमांशु जोशी का उपन्यास- समय साक्षी है, बेहद प्रासंगिक हो उठा है और एक अच्छी कृति की पहचान यही है कि वह समय समय पर जीवित होता रहता है और भिन्न काल की पीढ़ियों को अपने से जोड़ता रहता है।

…[राकेश]

जुलाई 20, 2011

प्रेम और इच्छा

प्रेम और इच्छा
एक ही बात नहीं हैं
वे तो बिल्कुल उल्टे हैं
एक दूसरे के।

प्रेम में इच्छा का कोई स्थान नहीं,
इच्छा लोभ है,
इच्छा लालच है
अभीप्सा है,
इच्छा
खाली ह्रदय का खेल है,
इच्छा अतृप्त ह्रदय की
प्रकृति है,
इच्छा भिक्षा मांगने की
प्रवृत्ति है,
इच्छा
केवल स्वहित देखने का
दृष्टिकोण है,
इच्छा केवल पाने भर की
तुच्छ आदत है,
इच्छा
निम्न श्रेणी का भाव है,
इच्छा करने वाला
अपने चारों ओर काँटे
बिखेरता रहता है।

प्रेम इसके विपरित
उच्चतम शिखर पर
बैठा होता है,
प्रेम की इच्छा नहीं की जाती,
प्रेम करने से नहीं होता,
प्रेम कोई प्रयास करके पाने की वस्तु नहीं है,
प्रेम में होने के लिये
अपने को तैयार किया जाता है,
अपने को शुद्ध किया जाता है,
अनुकूल वातावारण देख ही
प्रेम जीवन में उतरता है,
प्रेम में होने के बाद ही,
प्रेममयी ह्र्दय
लबालब भर जाता है
आनंद और देने का भाव
दोनों अंदर जीवित हो जाते हैं
प्रेम में होने वाला
अपने चारों ओर
फूल खिलाता है
सुगंध बिखेरता है।

इच्छा और प्रेम का क्या मेल?
इच्छा दर्पण पर जमी धूल है
यह वासनामयी है।
इच्छा देती प्रतीत तो होती है
पर यह वास्तव में
मानव जीवन से बहुत कुछ ले लेती है।

प्रेम
स्वच्छतम दर्पण है,
जिस पर धूल नहीं जमा करती,
जिसकी चमक कभी कम नहीं हुआ करती,
देना प्रेम का स्वभाव है।

इच्छा को पीछे छुपा कर
प्रेम के बहाने से इसकी पूर्ति
कभी प्रेम के वास्तविक स्वरुप
तक नहीं ले जा सकती,
ऐसा प्रेम अभिनय है,
नकली है,
ढ़कोसला है,
मानव की इसी कुत्सित लुपाछिपी के कारण
इच्छा का घालमेल प्रेम से कराकर
प्रेम को भ्रमित बना दिया गया है,
इसके नकली स्वरुप को असली मानकर और बनाकर
इसे इसके शिखर से नीचे गिरा दिया गया है।

…[राकेश]

जुलाई 6, 2011

बोरियत

सुनहरी चाय के प्याले से उठती
अदरक और चाय की मिली-जुली
सुगंधित भाप
सुहानी प्रतीत हुयी
पर कप उठा चुस्की
लेने के बजाय
हाथ से ढ़क दिया प्याले को।

गर्म गर्म भाप ने हथेली को
गरमा दिया,
भीगा दिया
ताप बहुत देर सहन नहीं हुआ
हथेली की कोमल त्वचा से,
हठा कर देखी हथेली तो
भाप की नमी ने
एक भीगे वृत का रुप ले लिया था ।

कितना अच्छा लग रहा है वह वृत और
उसके अंदर कैद रेखायें
रेखायें हाथ की भीग कर और स्पष्ट हो गयीं
पर क्या गीली होकर चमकती भाग्य रेखा की
भाँति किस्मत भी ऐसे ही किसी भी क्षण
चमक जाती होगी?

क्या जीवन रेखा, भाग्य रेखा, ह्रदय रेखा और
तमाम अन्य रेखाओं
और पर्वतों, त्रिभुजों, वर्गों, वृत्तों, त्रिशूलों एवम शंखों का
यूँ स्पष्ट हो जाना
जीवन से कुछ वास्तविक सम्बंध रखता है?

कुछ देर में तो भीगापन सूखकर गायब हो जायेगा
कुछ और देर बाद वृत के निशान भी मिट जायेंगे
रेखाऐं फिर से धुँधली पड़ जायेंगीं।
फिर क्या था इसका मतलब?

दिमाग ने झुँझला कर उल्टे ही प्रश्न कर डाला
क्यों रखा था हाथ प्याले पर?
रखा तो रखा
पर सोचा क्यों इतना
इस सब पर?
क्या सब व्यर्थ था?

क्या दिमाग बेकार की बातें भी सोच सकता है?
या कि यह
और ऐसे सब क्रिया-कलाप
बाय-प्रोडक्ट होते हैं
बोरियत के?

…[राकेश]

जून 30, 2011

प्रेम से भय कैसा

प्रेम में
खोना पड़ता है
बहुत सारी बातों को
बल्कि खो देना पड़ता है खुद को ही
इस भय से
प्रेम में पूर्ण-समर्पण
न कर पाने वालों
की संख्या अनगिनत है।

सतह पर ही तैरते रहने से
जल की गहराई
नहीं आँकी जा सकती
उसके लिये गहरे पानी पैठना
ही पड़ता है।

प्रेम में होने से
भय कैसा?
मानव जीवन
का सारा लेखा-जोखा बाँच
पता यही चलता है -
चिर काल से ही
प्रेम में उत्थान पाये
अस्तित्व ही
जी पाये हैं
काल की सीमाओं को
पार कर पाये हैं।

इस अदभुत अनुभव
को जी पाने
की संभावना
से मुँह क्यों मोड़ना?

प्रेम करो
प्रेम पाओ
प्रेम में होकर ही तो
पता चलता है
कि प्रेममयी मानव
इतना सब कुछ देख, जान,
और जी सकता है
जो कभी भी संभव न हो पाता
और जीवन कितने ही अनदेखे पहलुओं से
अनभिज्ञ ही रह जाता
अगर प्रेम उसके जीवन में न आया होता।

…[राकेश]

जून 29, 2011

प्रेम जीवन का द्वार

प्रेम में
छिपी होती है
एक आग
जो तपा कर
सोने को कुंदन बना देती है।

प्रेम के
स्वादिष्ट भोज
में
समाविष्ट
रहते हैं
मीठे,
खट्टे,
कड़वे,
और कसैले
भाव रुपी
व्यंजन भी।

प्रेम के
अमृत रुपी
कलश में
ही बसा होता है
मीठा जहर भी।

प्रेम
अस्तित्व में
पूरकता भी लाता है
और यह
एक बहुत बड़े अभाव
की ओर इशारा भी कर देता है।

प्रेम के
साथ आने वाला सुख
गुलज़ार कर देता है
गुलशन
तो इसके साथ आने वाली
पीड़ा
उपजा देती है
एक नासूर भी
जो रिस रिस कर
जीवन को
एक लुभावनी मौत की
ओर खींचता ले जाता है।

प्रेम में
आपस में गुथे होते हैं
हार और जीत
इन्हे अलग नहीं किया
जा सकता।

प्रेम
जीवन की
निजता है
अस्मिता है।

प्रेम कर पाना,
प्रेम में होना,
जीवन जीने की,
जीवन जी पाने की,
जीवन से तारतम्य
बैठा पाने की
कसौटी है।

…[राकेश]

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जून 23, 2011

प्रेमानुभूति

स्त्री हो या पुरुष
प्रेम में होते ही
उन्हे रुबरु होना
पड़ता है
दुख के।

प्रेम दुख
लाता ही लाता है,
गहन प्रेम
गहरा दुख!

प्रेम परिवर्तित करता ही करता है
मानव को
और खुद के सिवा
और दुख भी
मानव में आंतरिक
परिवर्तन लाने
का एक मुख्य औजार है
प्रेम के लिये।

दुख रुपी छैनी-हथौड़े से
प्रेम
मानव मन को एक सुगढ़ रुप
देता है
उसकी साज-सज्जा करता है,
दुख रुपी जल से
उसके अंतर्मन का शोधन करता है।
मानव जीवन के
आरंभ से ही
इतिहास बनता आया हैसभी जानते हैं
समझते हैं
कि
प्रेम
दुख में भी ले जाता है
पर तब भी मानव
प्रेम में होने को उत्सुक
रहता है
क्योंकि
प्रेम
मानव के जीवन में
घटित होने वाली
सर्वोत्तम अनुभूति है।

…[राकेश]

जून 2, 2011

टॉलस्टोय तो नहीं पर बचपन सुझा गया

राइटर्स ब्लॉक ऐसा वायरस है जो रचनाकार के दिमाग को बर्फ की तरह से जड़ बना देता है। उसके दिमाग में विचार आते तो हैं पर वे न जमीन पा पाते हैं विचरने के लिये और न आकाश ही उन्हे मिल पाता है उड़ान भरने के लिये। रचनाकार का दिमाग ऐसा हो जाता है कि उसे विचार सूझते भी हैं तो वह उन्हे विकसित नहीं कर पाता। उसके हाथ नहीं चलते लिख पाने को। उसका दिमाग विचारों को क्रियान्वित न करने की जड़ता को पालने पोसने लगता है। उसे किसी तरह भी अपने ही विचारों पर विश्वास नहीं आ पाता। उसे वे बिल्कुल तुच्छ लगने लगते हैं। वह ऐसी स्थितियों में आ जाता है जहाँ उसे दरकार होने लगती है बाहर से मिल सकने वाले विश्वास की जिससे कि उसका आत्म-विश्वास वापिस आ जाये। पर दूसरों का विश्वास पाने के लिये वह कुछ लिख पाने का साहस नहीं जुटा पाता।

किसी घड़ी किसी स्व:स्फूर्त प्रेरणा से ही राइटर्स ब्लॉक पार्श्व में आ जा पाता है और रचनाकार का दिमाग फिर से ऊर्जा, उत्साह और रचनात्मकता से भर जाता है। क्या चीज, कौन से घटना रचनाकार को प्रेरणा दे जाये इसका कोई भी निश्चित तौर पर अनुमान नहीं लगा सकता।

प्रदीप ने लगी लगाई नौकरी छोड़कर लिखने का प्रयास किया था। फ्री-लांसिग करके नियमित रुप से आमदनी हो जाती थी और बाकी बचे वक्त्त में वह अपनी रचनात्मक कल्पनाशीलता को कागज पर उड़ेलता रहता। लेखन प्रतिभा उसके पास थी। वह जल्दी ही स्थापित भी हो गया। सब ठीक चल रहा था कि लगभग तीन महीने पहले जैसे उसका दिमाग असहयोग आंदोलन करने लग गया। वह छटपटाया, बहुत हाथ-पैर मारे, ढ़ेरों जतन किये पर दिमाग की गंगोत्री से रचनात्मक गंगा नहीं बही।

अपने मनपसंद लेखकों की सर्वश्रेष्ठ पुस्तकें कई बार पढ़ डालीं, दुनिया के श्रेष्ठतम लेखकों की श्रेष्ठतम पुस्तकों के साथ दिन, शाम और रातें बितायीं पर कुछ भी सोयी हुयी लेखन क्षमता को जगा नहीं पाया। दिन में बाजारों में जाकर आवारागर्दी भी की पर कुछ भी प्रेरित न कर पाया।

कई बार शरीर शिथिल पड़ जाता और उसके सारे अस्तित्व में एक गहन उदासी छा जाती। ऐसा लगने लगता जैसे गहरे अवसाद का मरीज बनता जा रहा है। बहुत प्रयास करता तो कुंठा घर कर लेती।

उसका चिड़चिड़ापन उसकी पत्नी और पांच साल के आसपास के वय की बेटी पर भी गाहे-बेगाहे पड़ने लगता, हालाँकि वह भरकस कोशिश करता कि उसकी मानसिक परेशानियों का शिकार उसका परिवार न बने पर कई बार बाजी उसके हाथ से निकल जाती।

उसके फ्री-लांसिंग के कार्य पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा था। वह तो उसकी पत्नी भी नौकरी करती थी सो आर्थिक परेशानियाँ घनघोर रुप धारण न कर पाती थीं परंतु लेखक केवल धन के लिये ही तो लिखता नहीं। जैसे और लोगों को जीवन जीने के लिये धन चाहिये ऐसे ही लेखक को भी चाहिये परंतु लेखन कोई नौकरी तो है नहीं कि जब चाहे छोड़ दी। लेखन अगर ऐसे सस्ते में छूट जाता तो लोग लेखक बनने का कष्ट ही क्यों करते? न लिखें तो शांति से जियें कैसे लेखक? लेखन तो अवश्यम्भावी किस्म की प्रवृत्ति बन जाता है लेखकों के लिये।

उस दिन भी सवेरे से ही प्रदीप लिखने का प्रयास कर रहा था। पत्नी नौकरी पर चली गयी बेटी स्कूल चली गयी, दोपहर को वापिस भी आ गयी, खाना खाकर सो भी गयी, पर किसी भी तरह के एकांत में भी प्रदीप से मन को पसंद आने वाली एक भी पंक्ति न लिखी गयी।

बेटी उठ भी गयी पर प्रदीप की कुंठा और उदासी बरकरार थी। अपने ख्यालों में गुम वह बैठा था कि बेटी वहाँ आ गयी। उसने पिता का हाथ छूकर कहा,” पापा खेलने चलो मेरे साथ”।

प्रदीप की तंद्रा टूटी। परेशानी भरी आँखों से बेटी को देखा। कुछ बोल नहीं पाया।

बेटी का इतने पास खड़ा होना भी उसके दिमाग से भारीपन नहीं हटा पाया। उलझन इतनी थी दिमाग में कि उसकी इच्छा हो रही थी कि बेटी वहाँ से चली जाये तो वह फिर से अपने ख्यालों में खो जाये।

बेटी ने फिर पिता का हाथ झिंझोड़कर कहा,: पापा, खेलने चलो”।

बेटा आप खेलो जाकर।

नहीं पापा आप चलो, आपके साथ खेलना है।

मुझे काम है बेटा।

आप बाद में कर लेना। पहले खेल लो मेरे साथ।

इतने वार्तालाप से उसके ख्यालों में हल्का सा झरोखा बना पर वह अभी भी बाहर नहीं आ पाया था।

बेटी ने जिद करते हुये कहा,” चलो न पापा…खेलेंगे..आप रात को काम कर लेना”।

नहीं बेटा अभी मेरे पास समय नहीं है आप खेलो।

बेटी का चेहरा मुर्झा सा गया और वह रुआंसे स्वर में बोली,” आपके पास नहीं है पर मेरे पास तो समय है न पापा”।

जैसे बिजली कौंध जाती है ऐसे ही उस क्षण में कुछ हो गया प्रदीप को, उसके दिमाग में बेटी की आवाज गूँजने लगी,” आपके पास नहीं है पर मेरे पास तो समय है न”।

उदास बेटी आँखों के सामने खड़ी थी और प्रदीप की इच्छा हो रही थी कि वह जोर जोर से रो ले।

किसी तरह से अपने को रोककर उसने बेटी को सीने से लगा लिया और उसके बालों में ऊँगलियाँ फिराते हुये उसने कहा,” चलो आप तैयारी करो बाहर चल कर मैं अभी आता हूँ। आज खूब खेलेंगे”।

बेटी फिर से खिल उठी और ऊर्जा से भरकर कमरे से बाहर भाग गयी।

प्रदीप की आँखों से आँसू झर-झर टपक रहे थे। दिमाग का ठोस भारीपन द्रवीय बन बह चला था। वह हल्का महसूस कर रहा था।

उसके हाथ की कलम चलने लगी। दिमाग सनासन दौड़ने लगा।

कुछ पंक्तियाँ लिखकर उसने हाथ रोक दिये। अब उसे संजोकर रखने की जरुरत नहीं थी। अब वह कभी भी लिख पायेगा इसका अहसास और विश्वास उसे हो चुका था। आज उसकी बेटी ने उसे जीवन का बहुत बड़ा सबक दे दिया था, शायद इससे बड़ा सबक उसे पहले कभी नहीं मिला था।

अपने प्रिय लेखक लियो टॉल्स्टोय की अपनी मनपसंद कहानी को पढ़ा तो उसने कई बार था पर उसका वास्तविक मर्म आज उसकी बेटी की कही एक बात ने उसके सामने ऐसे स्पष्ट कर दिया था जैसे सूरज के सामने से घने काले बादल छँट गये हों और सूरज फिर से अपनी किरणों से प्रकाश धरती पर फैलाने लगा हो।

वह कुर्सी से उठकर बाहर अपनी बेटी के साथ खेलने चल दिया, जीवन जीने चल दिया।

…[राकेश]

मई 21, 2011

वर्दी वाले गुंडे

रेल से नीचे धकेल दिये गये लोगों के समाचार गाहे-बेगाहे अखबारों की सुर्खियां बनने लगे हैं। एक महिला खिलाड़ी को रेल से नीचे फेंक दिये जाने की खबर छपी तो इस खबर को पढ़कर सुमीत को बरसों पहले की अपनी एक रेल यात्रा की याद हो आयी।
* * *

उस समय सुमीत को किसी भी यात्रा से पहले एक किस्म की बैचेनी होने लगती थी। बस की यात्रा तक तो गनीमत थी कि एक बस निकल जाये तो दूसरी मिल जायेगी पर रेल की यात्रा तो उसकी नींद उड़ा देती थी। घर से समय से निकलने के बावजूद उसे हमेशा संदेह लगा रहता कि वह रेल पकड़ भी पायेगा या नहीं। कई दिनों की छुट्टी अपने दोस्त के यहाँ व्यतीत करने के बाद उसे नौकरी पर वापिस जाना था और वह कोई रिस्क लेना नहीं चाहता था। रेल उसे पकड़नी थी सहारनपुर से और वह ठहरा हुआ था देहरदून जिले में एक छोटे सी जगह विकासनगर के पास। सहारनपुर जाने के लिये उसे पहले हरबर्ट्पुर जाना पड़ता और वहाँ से सहारनपुर के लिये बस लेनी पड़ती। इस भय से कि कहीं रेल न छूट जाये सुमीत ने अपनी यात्रा के नियत दिन से एक दिन पहले ही बस से सहारनपुर जाकर रिहर्सल कर ली। वह सही वक्त्त पर सहारनपुर रेलवे स्टेशन पहुँच गया। उसके पहुँचने के बाद ही एक्स्प्रैस रेल वहाँ आयी। रेल को विदा करके ही वह वापिस लौटा। उसे थोड़ी राहत महसूस हुयी।

अगले दिन सही वक्क्त पर सुमीत सहारनपुर पहुँच गया और रेलवे स्टेशन पर पूछताछ वाली खिड़की से यह पूछ कर कि उसकी वाली एक्सप्रैस रेल किस प्लेटफार्म पर आयेगी वह नियत प्लेटफार्म पर जाकर खड़ा हो गया। रिज़र्वेशन उसके पास था ही।

प्लेटफार्म पर अच्छी खासी भीड़ थी। एक कुली से उसने पूछ लिया कि S5 बोगी कहाँ आकर रुकेगी।

कुली ने उसे बता दिया और साथ ही पूछा कि वह रेल में सामान चढ़ा दे क्या? यूँ तो सुमीत के पास एक सूट्केस और एक बैग ही था और वह खुद आराम से रेल में सामान सहित चढ़ सकता था पर शायद कुली से बोगी के बारे में पूछने के कारण या किसी अन्य कारण से उसने उसे हाँ कह दिया।

रेल एक घंटे की देरी से आयी। रेल में मौजूद लोगों की भीड़ देखकर तो सुमीत के हाथ-पाँव फूल गये। लोग दरवाजे तक खड़े थे। सहारनपुर उतरने वालों और वहाँ से रेल में चढ़ने वालों के बीच दरवाजे पर खड़े लोग दीवार बने खड़े थे। हर तरफ चिल्ल-पौं मची हुयी थी।

सुमीत को लगा कि ऐसे कैसे वह चढ़ पायेगा रेल में?

कुली ने सुमीत से कहा,” बाबू जी, भीड़ बहुत है आप अभी बीस रुपया दे दो, आपको अंदर चढ़ा देंगे। मेरा अंदर जाकर वापिस आना मुश्किल हो जायेगा। आप यहीं पैसे दे दो। आपको अंदर तो चढ़ा ही दूँगा। रास्ते में मौका देख आप अपनी सीट पर पहुँच जाना”।

सुमीत ने कुली को बीस रुपये दे दिये। उसे लग नहीं रहा था कि दरवाजे पर खड़ी भीड़ के अभेद लगते किले को भेदकर वह बोगी में अंदर प्रवेश कर पायेगा।

कुली ने सूटकेस और बैग उठाया और बोगी के दरवाजे पर खड़े लोगों को हटाने का प्रयास करते हुये सूटकेस अंदर उनके सिरों के ऊपर से अंदर फेक दिया। अंदर से गालियाँ सुनायी दीं, लोग इधर उधर हुये और समान के बोगी के फर्श पर पड़ जाने का अनुमान कुली को लग गया। अब उसने सुमीत को उसका बैग थमाया और उसे पीछे से इस तरह धकेलना शुरु किया जैसे किसी गाड़ी में धक्का लगा रहा हो। लोगों को अपनी बोली से चेतावनी देते हुये उसने जबरन सुमीत को बोगी के अंदर धकेल ही दिया।

सुमीत भीड़ में मूर्ति बना खड़ा हो गया। न पैर हिलते थे और न ही हाथ इधर उधर या ऊपर नीचे करने की ही गुंजाइश उसे दिखायी पड़ती थी। बैग उसके कंधे पर इस तरह से रखा हुआ था जैसे कैलेंडरों आदि में हनुमान जी को गदा लिये दिखाया जाता है। इस जड़ता में अपनी आरक्षित सीट तक जाने की बात सोचना भी दुस्साहस से बड़ी बात थी। उसका तो एक पैर भी फर्श पर पूरी तरह टिका हुआ नहीं था। भीड़ के कारण गरमी भी बहुत लग रही थी और साँस लेने के लिये हवा भी कम और कमजोर मालूम पड़ती थी। सुमीत समेत लोग रेल के चलने की दुआ कर रहे थे। चलने से कम से हवा तो आयेगी।

रेल चली। जो बैग उसे पहले हल्का और बाद में ठीके-ठाक वजन वाला लग रहा था अब उसे बेहद भारी लगने लगा था। हाथ और कंधें में दर्द की तरफ ध्यान जाता तो बार बार उसकी इच्छा होती कि बैग को उछालकर चलती रेल से नीचे फेंक दे। ऐसे ही कष्ट सहते-सहते अम्बाला कैंट तक की यात्रा पूरी हुयी। उसे अपनी सहन क्षमता पर कुछ गर्व भी हुआ। आश्चर्य-मिश्रित प्रसन्नता से भरे हुये जैसे ही उसने पाया कि दो-तीन यात्रियों को अम्बाला कैंट स्टेशन पर उतरना है, उसने और दरवाजे पर खड़े लोगों ने उन यात्रियों को ऐसा स्वागत करते हुये नीचे उतारा जैसे बारातियों का स्वागत कर रहे हों। उन यात्रियों के उतरने के उपक्रम में सुमीत को जगह मिल गयी अपने कंधे पर सवार बैग को नीचे फर्श पर गिरा देने की।

बैग गिराते ही वह सूटकेस और बैग को लगभग भूल कर प्रभावित कंधे को गोल गोल घुमाने लगा। सामान को भूल जाने में ही राहत मिलनी थी हाल फिलहाल तो।

तभी रेलवे पुलिस के सिपाहियों के साथ टी.टी.ई महोदय बोगी के दरवाजे पर अवतरित हुये। वर्दीधारी सिपाहियों की अकड़ और लाठियों के तांडव ने दरवाजे पर जमे खड़े यात्रियों को गतिमान बनाया और गुंजाइश न दीखने वाली जगह में भी टी.टी.ई और चार सिपाही अंदर घुस आये।

सिपाहियों की लाठियों के सहारे बोगी में लोगों की भीड़ के चक्रव्यूह को भेदते हुये टी.टी.ई आगे बढ़ा तो सुमीत भी अपनी सीट तक पहुँचने के लिये किसी तरह वहाँ खड़े लोगों से सहायता की गुज़ारिश करके अपना सूटकेस और बैग उठाये हुये इस सरकारी कारवां की पूँछ पकड़कर खिसक-खिसक कर आगे बढ़ने लगा। किसी तरह अपनी सीट पर पहुँचा तो पाया कि वहाँ बगैर आरक्षण के एक परिवार धरना दिये हुये था। परिवार में बच्चों और महिलाओं की संख्या ज्यादा थी। वे लोग भी हर तरफ खड़ी भीड़ में किसी तरह से सीटों पर जमे हुये थे। नैतिकता जोर मारने लगी और सुमीत का साहस नहीं हुआ कि उस परिवार से कहता कि वे लोग उसकी सीट खाली कर दें। उसने हालात से समझौता करते हुये अपने बैठने के लिये कोने में ज़रा सी जगह देने की गुज़ारिश की।

बैठकर शरीर को कुछ राहत मिली तो इधर उधर खड़े लोगों की भीड़ से पता चला कि एक राजनीतिक दल की रैली थी दिल्ली में और पंजाब लौटने वाले लोगों ने रेल की कई जनरल बोगियों के साथ-साथ आरक्षित बोगियों पर भी कब्जा कर लिया और मजबूरन लोगों को जिस बोगी में जगह मिली उसी में घुस जाना पड़ा।

कुछ ही देर बाद सिपाही लौटे। जिनके पास आरक्षण  नहीं था उनसे वे इस आरक्षित बोगी में यात्रा करने की अनुमति के बदले उनकी आगे तय की जाने वाली दूरी के अनुसार रुपये ले रहे थे। सुमीत की आरक्षित सीट पर बैठे परिवार को जम्मू जाना था अतः सिपाहियों ने प्रति सदस्य पचास रुपयों की मांग की। परिवार के लिये शायद मुश्किल था इनते रुपये देना। उन्होने सिपाहियों से प्रार्थना की तो सिपाहियों ने उन्हे नीचे उतारने की चेतावनी दी। परिवार की मुश्किल देख कर सुमीत ने सिपाहियों से कहा कि वे उसकी आरक्षित सीट पर यात्रा कर रहे हैं, इतनी भीड़ में कहाँ जायेंगे महिलायें और बच्चे। उन्हे परेशान न किया जाये।

एक सिपाही गुर्रा कर बोला,” बाबू तू जुर्माना देगा क्या। बुलाऊँ टी.टी.ई को, अभी चालान काटेगा, अपनी सीट पर बिना आरक्षण वाले लोगों को साथ ले जाने के लिये। और इन सबको ले जावेंगें जेल”।

परिवार बेचारा क्या करता? उन्होने सिपाहियों को रुपये दे दिये।

लोगों को उस बोगी में बने रहने के लिये पुलिस फोर्स की स्वीकृति खरीदनी पड़ी। जिन बोगियों पर राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं ने कब्जा कर लिया था वहाँ तो सिपाही घुस भी न पाये होंगे पर बाकी बोगियों से उन्होने हजारों के वारे न्यारे कर लिये होंगे।

सुमीत सोच रहा था कि अगर चोर डाकुओं को वर्दी पहना दी जाये तो शायद वे भी इस कुशलता से उगाही का काम न कर पायेंगे जैसा कि कानून के इन तथाकथित रखवालों ने अपने शौर्य से कर दिखाया है।

बोगी में जिस किसी ने रुपये देने में असमर्थता दिखायी या नियमों की दुहाई देने का दुस्साहस किया तो उसे सिपाहियों ने थप्पड़ों और घूँसों का प्रसाद देकर टॉयलेट के पास खड़ा होने के लिये भेज दिया। अगले स्टेशन पर उनके उतारने की बात सुनायी पड़ती रही।

रेल चली तो कुछ समय बाद टी.टी.ई टिकट चैक करता हुआ आया। सीट के आरक्षण के लिये लोग रुपये हाथ में लेकर उसे घेरे हुये थे। और वह भी किसी-किसी को उपकृत कर रहा था। शायद आदमी के हाथ की हरियाली देखकर वह निर्णय ले रहा था।

सिपाहियों के घमासान मचाने से लोग इधर उधर व्यवस्थित खड़े हो गये थे और गैलरी में इधर-उधर देखने लायक जगह दिखायी पड़ती थी।  टी.टी.ई टिकट चैक करके अपने लिये निर्धारित सीट पर पहुँचा तो पाया कि उससे पहले वहाँ पहुँच चुके सिपाहियों ने उसकी सीट का सौदा भी दो यात्रियों से कर लिया था। उसकी सीट पर जमे बैठे यात्रियों ने उठने से मना कर दिया। टी.टी.ई ने सिपाहियों से उन यात्रियों से अपनी सीट खाली करवाने की बात कही।

एक सिपाही ने खैनी मलते हुये कहा,” अरे अम्बाले में तो तू कह रिया था कि किसी तरह से बोगी में पहुँचा दो, अब कह रिया है कि सीट दिलवा दो, थोड़ी देर में कहेगा कि हिसाब भी समझा दो। हमारी तरह चुपचाप यहाँ टायलेट के पास खड़ा रह। बीड़ी-सिगरेट पी और ऐश कर। नहीं तो नीचे उतर जाइयो अगले स्टेशन पर। दूसरी बोगी में देख लियो, कहीं सीट मिल जावे बैठने की तो। हम भी तेरी तरह ड्यूटी पर हैं”।

सिपाही से दो टूक जवाब पाकर टी.टी.ई का चेहरा गुस्से और विवशता से अजीब सा हो गया।

पर कर भी क्या सकता था। अपमान का घूँट पीकर रह गया। सिपाहियों से चलती रेल में पंगा लेना खतरनाक था। इतनी भीड़ में कौन, कब, कैसे टपक गया चलती रेल से, बाद में कौन जान सकता है?

सरकारी अमले की आपसी मुठभेड़ को देखकर, सुमीत को अन्य यात्रियों, जो सिपाहियों और टी.टी.ई की धन-उगाही कार्यवाही के शिकार बने थे, की तरफ से भी कुंठा में कुछ राहत महसूस हुयी।

एक सिपाही टी.टी.ई से कहता सुनायी दिया,”अरे बाबू, ये रास्ता खोल दे दोनों बोगियों के बीच वाला। तू यहीं खड़ा रह आराम से, हमारा आदमी जावेगा दूसरी बोगी में और वहाँ से बिना आरक्षण वाले यात्रियों को यहाँ भेजेगा। तू भी कुछ कमा-धमा ले और हमें भी जेब भारी कर लेने दे। रोज़ रोज़ तो ऐसे मौके आते नहीं।”

सुमीत देख नहीं पाया कि टी.टी.ई पर इस प्रस्ताव की प्रतिक्रिया क्या हुयी।

कुछ समय बाद टॉयलेट की तरफ से गाली-गलौच और मार-पीट का शोर आने लगा। ऐसा लगा जैसे सिपाहियों का यात्रियों से झगड़ा हो रहा हो। या शायद यात्री ही आपस में लड़ रहे हों और सिपाही दोनों गुटों की ठुकाई में व्यस्त हों।

इस शोर-गुल में कई तरह की आवाजों के मध्य ऐसी पुकारें भी सुनायी दीं…अरे गिर गये… अरे कूद गये…अरे धकेल दिया।

बहुत देर तक शोर होता रहा।

अगले दिन सुमीत को अखबार में ही एक छोटी सी खबर पढ़ने को मिली कि जिस एक्स्प्रैस रेल में वह यात्रा कर रहा था उसमें बिना टिकट यात्रा करने वाले दो युवक टी.टी.ई से झगड़ा करने लगे और सुरक्षा बल के सिपाहियों के आने पर अफरातफरी में चलती रेल से बाहर कूद गये और अपनी जान गँवा बैठे।
* * *

इंसानी जान की कोई कीमत है नहीं इस देश में…- ठंडी सांस छोड़कर अपने आप से कहते हुये सुमीत ने अखबार सामने मेज पर रख दिया।

…[राकेश]

मई 7, 2011

गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर: निष्फल कोई पूजा न होगी

आज भारत के गौरव गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर, जो मानवतावादी, प्रकृतिविद, कवि, चित्रकार, संगीतकार, लेखक, शिक्षाविद, और भारतीय संस्कृति एवम कला के ध्वजवाहक रहे हैं, की 150 वीं जयंती का शुभ अवसर है।

वे देशों की सीमाओं को पार कर गये हैं और पिछले सौ सालों से भी ज्यादा समय से दुनिया उनकी योग्यता से लाभान्वित होती आ रही है।

गुरुदेव ने कालजयी काव्य की रचना की है। एक से बढ़कर एक उनकी कवितायें हैं और बहुत सारी कविताओं को पढ़कर ऐसा लगता है कि इससे बेहतर और क्या हो सकता है पर उनकी अपनी ही रचना आकर इस धारणा को तोड़ देती है और पाठक/मानव मुग्ध होकर रबिन्द्र साहित्य में आगे की ओर बढ़ जाता है।

उनकी एक कविता है जिसके बारे में बिना किसी संकोच के साथ कहा जा सकता है कि दुनिया का कोई भी कवि इस भाव से ऊपर नहीं जा सकता जो गुरुदेव टैगोर ने अपनी कविता में रच दिया है। इससे बेहतर कवितायें रची जा सकती हैं, रची गयी हैं और खुद गुरुदेव ने ही रची हैं, इससे ज्यादा लय वाली कवितायें भी रची गयी हैं, पर इस कविता के भाव का मुकाबला कहीं नहीं मिलता। यह अनंत काल तक शाश्वत रहने वाली कविता है। कालजयी आशा के सहारे की इससे बेहतर अभिव्यक्त्ति ईश्वर कर सके तो कर दे वरना मानव के लिये तो यह संभव नहीं दिखायी देता।

जो पूजायें अधूरी रहीं
वे व्यर्थ न गयीं
जो फूल खिलने से पहले मुर्झा गये
और नदियां रेगिस्तानों में खो गयीं
वे भी नष्ट नहीं हुयीं
जो कुछ रह गया पीछे जीवन में
जानता हूँ
निष्फल न होगा
जो मैं गा न सका
बजा न सका
हे प्रकृत्ति!
वह तुम्हारे साज पर बजता रहेगा।

उपरोक्त्त कविता को रचते समय मानो प्रकृत्ति स्वयं अपना सच टैगोर के माध्यम से धरती पर बिखेर रही थी। इस कविता की रचना करने वाला कवि असाधारण प्रतिभा का मालिक ही हो सकता है। इसे रचने वाला केवल कवि न होकर अध्यात्म के रास्ते पर चलने वाला ऋषि ही हो सकता है।

भारत को जो राष्ट्रगान गुरुदेव टैगोर ने दिया है वह चाहे कहीं भी बज जाये, चाहे वह स्कूल और शिक्षण संस्थाओं के प्रांगण हों या भारतीयों का अन्यत्र होने वाला जमावड़ा, यह हमेशा ही भारतीयों के रोम रोम को भारतीयता के भाव से भर देता है।

भारत की स्वर कोकिलायें लता मंगेशकर और आशा भोसले ने इसे गाया है

और हाल के सालों में ए.आर. रहमान के संगीत निर्देशन में भारतीय संगीत की जानी मानी विभूतियों ने इसकी संगीतमयी प्रस्तुती में अपना योगदान दिया है।

भारत का बच्चा बच्चा तो इसे गाता ही है।

गुरुदेव टैगोर का सृजन करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करता आ रहा है और भविष्य में भी करता रहेगा। उन्होने अपनी सृजनात्मक क्षमता से भारत में कला की विरासत को समृद्ध करने में और अपनी वैश्विक दृष्टि के बलबूते देश की उदार परम्परा को सहेजे रखने में  उल्लेखनीय योगदान दिया है।

भारत भूमि धन्य रही है गुरुदेव टैगोर के यहाँ जन्म लेने से।

ऐसी विलक्षण मेधा को शत शत नमन।

…[राकेश]

मई 6, 2011

मौन के एक क्षण की गुज़ारिश है

एक्टिविस्ट कवि Emmanuel Ortiz की प्रसिद्ध कविता Moment of Silence [A Moment of silence, Before I start this poem] का हिंदी अनुवाद

इससे पहले कि मैं कविता शुरु करुँ
मैं अपने साथ ले चलना चाहता हूँ तुमको
मौन के क्षण में,
उन सब लोगों के सम्मान में
जो मारे गये वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में
और पेंटागन में
पिछले सितम्बर की 11 तारीख को।
मैं गुज़ारिश करता हूँ तुमसे
मौन के क्षण
उन सबको अर्पित करने के लिये,
जिन्हे शोषित किया गया,
कैद में रखा गया,
जो गायब कर दिये गये
जो प्रताड़ित किये गये
जिनका बलात्कार किया गया
जिन्हे मार डाला गया
उस एक घटना के बदले के रुप में,
उन सब लोगों के लिये जो शिकार बने
अफ़गानिस्तान और अमेरिका में।

और अगर मैं जोड़ पाऊँ…

एक पूरा दिन मौन भरा!
उन हजारों फिलिस्तिनियों के लिये
जो मारे जा रहे हैं सालों से
अमेरिका के समर्थन से
इज़रायल के हाथों।
छह महीने मौन भरे!
उन पंद्रह लाख इराकियों के लिये,
जिनमें बच्चे सबसे ज्यादा शामिल थे,
जो कि मारे गये हैं
कुपोषण और भूखमरी से
क्योंकि ग्यारह साल से
अमेरिका ने उनके देश पर
व्यवसायिक एवम व्यापारिक प्रतिबंध
थोप रखे हैं।

इससे पहले कि मैं कविता शुरु करुं।
दो महीने मौन भरे उन काले लोगों के लिये
जिनके जीवन नरक बने रंगभेद करने वाले द. अफ्रीका में,
जहाँ देश की सुरक्षा के नाम पर उन्हे अपने ही देश में
अजनबी बना दिया गया।
नौ महीनों का मौन हिरोशिमा-नागासाकी में मरने वाले लोगों की स्मृति में,
वहाँ मौत ऐसे बरपी कि उसने कंक्रीट, स्टील, धरती और आदमी की खाल की हर परत उधेड़ डाली
और बचने वाले भी जिये नहीं।
एक मौन भरा साल वियतनाम के उन लाखों लोगों के लिये,
जिन पर युद्ध थोपा गया,
जिन्हे आदत हो गयी अपने करीबियों के शव जलने की दुर्गंध सहने की
जिनके बच्चे इस दुर्गंध को सूँघकर ही बड़े हुये।
एक साल का मौन कम्बोडिया और लाओस में मरने वालों के लिये
जो कि एक गुप्त युद्ध का शिकार बने….
श्श्श्श…कुछ मत कहो…
हमें उन्हे नहीं बताना चाहिये कि वे मृत लोग हैं।
दो महीने मौन भरे कोलम्बिया में मारे गये लोगों के लिये
जिनके नाम, उनके शवों के ढ़ेर की तरह,
बढ़ते चले गये हैं और
हमारी ज़ुबान से फिसलते चले गये हैं।

इससे पहले कि मैं कविता शुरु करुं।
एक मौन भरा घंटा एल-सल्वाडोर के लिये…
एक मौन भरी शाम निकारागुआ के लिये…
दो दिन मौन भरे ग्याटेमाल्टेकोस के लिये…
इनमें से किसी के भी नागरिकों ने
शांति के क्षण नहीं देखे जीते जी।
45 सेकेण्ड का मौन आक्टियल,चियापास में मरने वालों के लिये
25 साल का मौन उन करोड़ों अफ्रीकन लोगों के लिये
जिन्हे समुद्र में इतनी गहराई पर कब्रें मिलीं
जितनी ऊँचाई तक कोई इमारत आकाश को नहीं भेद सकती,
कोई डीएनए टैस्ट या दंत परीक्षा नहीं की जायेगी उनके अवशेषों की।
और उन लोगों के लिये
जो लटकाये और झुलाये गये
ऊँचे साइकोमोर पेड़ों से,
दक्षिण में, उत्तर में, पूर्व में और पश्चिम में…

सौ सालों का मौन…
उन करोड़ों मूल निवासियों के लिये
जिनकी जमीन और ज़िंदगियाँ छीन ली गयीं
पाइन रिज, वूंडेड नी, सैंड क्रीक, फालेन टिम्बर्स, और ट्रेल ऑफ टियर्स, जैसी शातिर योजनाओं के द्वारा
अब तो ये सब स्मृतियाँ हमारी सर्द हो चुकी
संवेदनाओं और चेतना को छू भी नहीं पातीं।

तो तुम्हे एक क्षण चाहिये मौन भरा?
और हमसे कुछ कहते नहीं बनता
हमारी ज़ुबानें लटक रही हैं हमारे मुँह से
हमारी आँखें कर दी गयीं हैं बंद
मौन भरा एक क्षण
और सब कवि मार दिये गये हैं
ड्रम तोड़ कर धूल-धूसरित कर दिये गये हैं।

इससे पहले कि मैं कविता शुरु करुं।
तुम्हे चाहिये मौन भरा क्षण
तुम शोक कर रहे हो
कि अब संसार पहले जैसा नहीं रहेगा
और हम सब भी आशा करते हैं कि
यह पहले जैसा नहीं रहेगा,
जैसा पहले था वैसा तो
बिल्कुल ही नहीं रहेगा।

क्योंकि यह 9/11 की कविता नहीं है
यह 9/10 की कविता है
यह 9/9 की कविता है
यह 9/7 की कविता है
यह 1492 को समर्पित कविता है।

यह कविता उस स्थिति के बारे में है
जो ऐसी कवितायें लिखने के लिये कारण बनती है
और अगर यह 9/11 की कविता है, तब:
यह चिली में 1971 के 11 सितम्बर की कविता है
यह द. अफ्रीका में 1977 के 12 सितम्बर की कविता है
जब स्टीवन बिको मारा गया था।
यह न्यूयॉर्क के आटिका जेल में 13 सितम्बर को मरने वाले ब्रदर्स की कविता है
यह सोमालिया के लिये 14 सितम्बर 1992 की कविता है
यह कविता है हर उस तारीख के लिये
जो राख बना दी गयी
यह कविता है उन 110 कहानियों को समर्पित
जो कभी बतायी नहीं गयीं
वो 110 कहानियाँ जिन्हे टैक्स्ट बुक्स में जगह नहीं मिली
वो 110 कहानियां जिन्हे CNN, BBC, The New York Times, और Newsweek ने नज़रअंदाज़ कर दिया।
यह कविता उस सुनियोजित साजिश को बाधित करने के लिये है।

और तुम्हे अभी भी अपने करीबी की मौत के लिये मौन भरा क्षण चाहिये?
हम तुम्हे दे सकते हैं
जीवन भर का खालीपन:
गुमनाम कब्रें,
लुप्त हो चुकी भाषायें,
जड़ से उखाड़ दिये गये पेड़ और इतिहास,
गुमनाम बच्चों के चेहरों पर मुर्दा भाव,
इससे पहले कि मैं यह कविता शुरु करुँ
हम खामोश करा दिये जा सकते हैं हमेशा के लिये
और भूखे छोड़ दिये जा सकते हैं
ताकि समय खुद ही मार डाले हमें
और तुम अभी भी पूछते हो
हमसे खामोश रहने के लिये।

अगर तुम्हे मौन का एक क्षण चाहिये
तब बंद कर दो तेल का उत्सर्जन
बंद कर दो मशीनें और टेलीविजन
डूबा डालो युद्धपोत
स्टॉक मार्केट को नष्ट कर दो
चर्चों से और हर जगह से
संदेशों को हटा दो
ट्रेनों, और ट्रामों को हटा दो।

अगर तुम्हे एक मौन भरा क्षण चाहिये
तो टैको बैल की खिड़की ईँट से बंद कर दो
और कर्मचारियों को भुगतान करो उनकी हानि के लिये
बंद कर दो शराब की दुकानें
उखाड़ डालो
टाऊनहाऊसेज़, व्हाइट हाऊसेज़, जेलघर, पेंटहाऊसेज़ और प्लेब्वॉयज़।

अगर तुम्हे एक मौन भरा क्षण चाहिये
तो इसे ग्रहण करो
सुपर बाऊल वाले संडे के दिन,
4 जुलाई को,
Dayton की तेरह घंटों की सेल के अवसर पर,
और उस दिन जब तुम्हारे गोरे अंहकार को ग्लानि महसूस हो
मेरी कौम के काले खूबसूरत लोगों की भीड़ को देखकर।

अगर तुम्हे एक मौन भरा क्षण चाहिये
तब इसे अभी ले लो
इससे पहले कि यह कविता शुरु हो।
यहाँ मेरी आवाज़ की गूँज में
कदमताल करते जवानों के दो हाथ उठने के बीच के समय में
आलिंगनबद्ध दो शरीरों के मध्य की दूरी में,
यहाँ तुम्हारे लिये मौन है,
इसे ले लो
पर इसे इसकी सम्पूर्णता में ही लेना
इसकी श्रंखला काट कर नहीं।
अपने मौन को अपराध के शुरुआती चरण से जोड़ दो।
लेकिन हम,
आज की रात भी हम अपने मारे गये लोगों के लिये
गाने के अधिकार को बनाये रखेंगे।

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