Archive for ‘कला’

सितम्बर 10, 2010

खत-ओ-किताबत के मिटते निशां

पत्र लिखना मनुष्य की एक बेहतरीन पूंजी और कला हुआ करती थी। पत्र चाहे मित्रों को लिखे जायें या करीबी लोगों को, पत्र लेखन का कोई सानी नहीं है। पत्र चाहे मशहूर लेखक एक दूसरे को लिखें या साधारण मनुष्य अपने करीबी लोगों को लिखें, पत्र लिखना अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करने का एक बेहतरीन जरिया हुआ करता था।

पत्र केवल व्यक्ति की भावनाओं का ही संप्रेषण नहीं करते बल्कि वे अपने युग के दस्तावेज भी होते हैं।

एस.टी.डी फोन आये और पत्र लेखन की कला पर पहला कुठाराघात हुआ। बहुतायत में लोग लिखने से ज्यादा फोन पर बतियाने में ज्यादा विश्वास रखने लगे। कुछ लोग तो पत्र लिखना ही भूल गये। कुछ लोग अभी तक पत्र लेखन का मोह नहीं छोड़ पाये और इस कला को जिंदा रखे रहे।

भाग्य से तभी इंटरनेट का चलन शुरु हो गया और ई-मेल की सुविधा के जन्म के साथ ही इंटरनेट का उपयोग करने वाले बहुत सारे लोग ई-मेल के रुप में पत्र लेखन की विधा को कायम रखे रहे।

इस बीच पोस्टमैन नामक जीव को कुरियर मैन नामक जीव ने स्थान्तरित कर दिया।

सेल फोन मनुष्य के जीवन में दस्तक दी और बाद में SMS और नेट-चैट जैसी सुविधाओं ने लोगों के लिखने का अंदाज़ ही बदल दिया और शब्द छोटे से छोटे रुप में सुहाने लगे लोगों को। हालत ऐसे हो गये कि गणितीय अंकों ने वर्णमाला के शब्दों में घुसपैठ कर दी और Great अब Gr8  हो गया। चलिये कोई खास बात नहीं है।

इस काल के बाद अस्तित्व में आयीं सोशल नेट्वर्किंग साइट्स जैसे ऑरकुट, फेसबुक और टविटर। और अब यह जानना रोचक होगा कि क्या अभी भी लोग व्यक्तिगत पत्र लिखते हैं अपने करीबी लोगों को?

सोशल नेट्वर्किंग साइट्स निस्संदेह लोगों को एक दूसरे के बारे में सूचनायें देती रहती हैं परन्तु ये निश्चित रुप से वह आनंद प्रदान नहीं कर पातीं जो कि व्यक्तिगत लम्बे पत्रों या ई-मेल के मिलने से प्राप्त होता था।

प्रकृति के इस नियम का निषेध नहीं किया जा सकता कि समय अपने साथ परिवर्तन लाता ही लाता है परन्तु इन सब परिवर्तनों के बीच एक कला के खोने के अहसास को प्रकट तो किया ही जा सकता है। उस खोयी हुयी कला को याद तो किया ही जा सकता है।

शायद समय आ गया है जब लोग घरों  में छोटे बच्चों को रात में सुलाते समय कहानियाँ सुनाते हुये अपनी बात कुछ ऐसे शुरु कर सकते हैं,
” यह उस समय की बात है जब लोग पत्र लिखा करते थे”।

पर वास्तव में तो बच्चों को रात में कहानियाँ सुनाने की कला भी लुप्त हो ही चुकी है।

…[राकेश]

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