स्वार्थ का विश्वास है किसी पहुँचे हुये महापुरुष द्वारा कही गयी निम्नलिखित सूक्ति में
” जब जाना तो ये जाना कि न जाना कुछ भी “
मनीषी स्वार्थ साधने अर्थात स्व: + अर्थ (स्वयं का अर्थ) को जानने को सबसे बड़ी खोज कह गये हैं और एक कलाकार या लेखक अपनी सूक्ष्म द्रूष्टि द्वारा जीवन में या जीवन के विभिन्न अर्थ खोजने की चेष्टा करता है। पर उसके लिये भी स्वयं को ही खोजना प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।
कलाकार को अध्यात्म के खोजी साधक की भाँति स्वयं के अंदर डूबकियाँ लगानी ही पड़ती हैं। बाहर ही बाहर और दूसरों पर ही अपनी खोजी दृष्टि रखकर कलाकार का कला कर्म बहुत लम्बे समय तक जीवित नहीं रह सकता। जो स्वयं के जीवन का ही अर्थ नहीं जानता वह कैसे दूसरों के जीवन में अर्थ ढ़ूँढ़ सकता है?
जीवन और कला का आपस में एक अन्तर्निहित सम्बन्ध है। दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं। कला यदि जीवन के कारण अस्तित्व में आती दिखायी देती है तो यह बदले में जीवन को संवारती है, उसे निखारती है, उसका शोधन करती है और उसे बेहतर बनाती है।
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