About

स्वार्थ का विश्वास है किसी पहुँचे हुये महापुरुष द्वारा कही गयी निम्नलिखित सूक्ति में

जब जाना तो ये जाना कि न जाना कुछ भी

मनीषी स्वार्थ साधने अर्थात स्व: + अर्थ (स्वयं का अर्थ) को जानने को सबसे बड़ी खोज कह गये हैं और एक कलाकार या लेखक अपनी सूक्ष्म द्रूष्टि द्वारा जीवन में या जीवन के विभिन्न अर्थ खोजने की चेष्टा करता है। पर उसके लिये भी स्वयं को ही खोजना प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।
कलाकार को अध्यात्म के खोजी साधक की भाँति स्वयं के अंदर डूबकियाँ लगानी ही पड़ती हैं। बाहर ही बाहर और दूसरों पर ही अपनी खोजी दृष्टि रखकर कलाकार का कला कर्म बहुत लम्बे समय तक जीवित नहीं रह सकता। जो स्वयं के जीवन का ही अर्थ नहीं जानता वह कैसे दूसरों के जीवन में अर्थ ढ़ूँढ़ सकता है?

जीवन और कला का आपस में एक अन्तर्निहित सम्बन्ध है। दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं। कला यदि जीवन के कारण अस्तित्व में आती दिखायी देती है तो यह बदले में जीवन को संवारती है, उसे निखारती है, उसका शोधन करती है और उसे बेहतर बनाती है।

सम्पर्क  :  swaarth [at] gmail [dot] com

2s टिप्पणियाँ to “About”

  1. मैं अरविंद शेष हूं। आपसे संपर्क का सिर्फ यही रास्ता नजर आया।
    मैं जनसत्ता हिंदी अखबार में संपादकीय पृष्ठ पर हूं। इस पर रोजाना साभार छपने वाले स्तंभ समांतर के लिए अच्छे ब्लॉग की सामग्रियां निकलता हूं। आपके ब्लॉग पर आया और लगभग सभी सामग्रियां बेहतरीन लगीं। समांतर स्तंभ के लिए लेना चाहता हूं। लेकिन इसमें लेखक के नाम की जगह केवल स्वार्थ लिखा है।

    क्या आप अपना नाम बता सकते हैं, जिससे आपके किसी एक आलेख समांतर के तहत प्रकाशित कर सकूं
    आभारी रहूंगा…

    अरविंद शेष
    जनसत्ता (हिंदी दैनिक)
    संपादकीय विभाग

  2. जान कर सच में ख़ुशी हुई कि आप हिंदी भाषा के उद्धार के लिए तत्पर हैं | आप को मेरी ढेरों शुभकामनाएं | मैं ख़ुद भी थोड़ी बहुत कविताएँ लिख लेता हूँ | हाल ही में अपनी किताब भी प्रकाशित की | आप मेरी कविताएँ यहाँ पर पढ़ सकते हैं- http://souravroy.com/poems/

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