फ़ना होना ये ही है अंजामे-इश्क, उसमे ज़िन्दगी ना ढूंढ,
आफताब का जलवा देख, ज़र्रे में रौशनी ना ढूंढ|
नए आयाम को देख, जो हो चुका उसे मुड कर न देख,
ग़म दबा हुआ निकाल, बेवजह पड़ा ग़म ना देख |
मेरे हाल-ए-बेज़ार से नफरत न कर, दिल को देख,
सहर भी जिसकी शाम हो , उसकी ज़िन्दगी ना देख !
(बकुल ध्रुव)


