ज़ुल्म की काली घटाओं के पीछे
बंधक है
न्याय-समता-समानता का सूरज।
अश्रु पीने को मजबूर हैं
प्यासे किसान,
मेहनतकश मजदूर हैं भूखे।
रौशनी जागीर बनी
खेतों की लाशों पर उग आये
महलों की।
भूख से मौत,
क़र्ज़दार किसानो की खुद्कुशी
विरासत है फैले दामनों की।
मुफलिसी के पावों में
ज़ुल्मत की ज़ंजीर हैं
अंधेरा गरीब की तकदीर है।
ऐसे क्रंदनमय माहौल में
घोर तम के पीछे से
यहाँ वहाँ कुछ रोशन किरणे,
झिलमिला उठी हैं
झोपडों के टूटे छप्परों पर।
इन्ही नन्हे प्रकाश पुंजों में
कोई सूरज बनकर जागेगा
पस्त-त्रस्त-शोषित लोगों
कल उजाला तुम्हारा होगा।
(रफत आलम)
